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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(२८२)

कवीरपंथी—

गावहिं दास जो परम अनंदा ॥ पाय प्रसाद जल अचवन कीन्हा।
महाप्रसाद दासको दीन्हा ॥ जाते काल भयो आधीना ॥ जबसे
हंस भये परवीना ॥ कहैं कवीर पूरन भये भाग । जब सतगुरु
मस्तक दिये हाथ ॥

॥ धुन ॥

सतके भोग दयाके व्यंजन तुमको मालुम होय । महा पुरुष
मानिये निज सोय ॥

इंगला पिंगला चौका पोते, छिमा मंत्र निज डार । बलकी फूंक
अकलकी आंगी, चाहके चूल्ह सँवार ॥ दिलदायाकी दाल बनाये,
लक्षके नोन मिलाय । मनसा हींग डार व्यंजनमें, चहुँ दिस बास
उडाय ॥ भाव भक्ति घृत निर्मल नीरा, दिल गड़वा जल डार ।
सतसुकृत जहां भोजन पावैं, घर मानिक उजियार ॥ आसन मूल
बैठ हठ अविचल, सुखमन बाव डोलाय । सुतं नितं दौय पाट
सँवारे, संत परोसैं आय ॥ सकल संत मिल आरती उतारैं, गावैं मंगल
चार । कहैं कवीर जिन सतगुरु सेवा, सो सतलोक सुधार ॥

शब्द गारी ।

देहु न देहु प्रभुजन अपनेको, समर्थके गुन गाऊँ केहांजू ॥
गगनमंडल मोरे सजन बसत हैं, उनहुँको नेवत बुलाऊँ केहांजू ॥
काम कोध मद लोभ पांवडे, भीतर भवन बिछाऊँ केहांजू ॥
नैननके जल चरन पखारों, चित चौकी बैठाऊँ केहांजू ॥ करनीके
पातर कथनीके दोना, सारखीके सीक लगाऊँ केहांजू ॥ भावको
भात औ दार दयाको, शब्दके बरा बनाऊँ केहांजू ॥ मनसा मांडे
सरस बनाऊँ, प्रेमके घृत चुवाऊँ केहांजू ॥ सतके दूध करनीके
खोवा, शक्रर सुमत मिलाऊँ केहांजू ॥ यह सुख पाय जेवैं सजन
हमारे, स्वासाके बाव टुलाऊँ केहांजू ॥ सीसा सार भरे जल अमृत,

शब्दावली

(२८३)

सो अचवन करवाऊं केहांजू ॥ पांच पचीस पकर नौ नारी, सजनको गारी गवाऊं केहांजू ॥ तत्त्व तमोलिन सुधर सुमतिले, सजनको बिरियां खवाऊं केहांजू ॥ एकईस खंड महलके भीतर, निरभय पलंग बिछाऊं केहांजू ॥ शील संतो खवास हमारे, सजनके चरन दवाऊं केहांजू ॥ धर्मदास कहे साहब मोरे, मुक्ति मनोरथ पाऊं केहांजू ॥

शब्द अचवन ।

सेवक लिये प्रेम जलझारी, खरचा ब्रह्म ज्ञान ।
सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥
भाव भक्तिसों बीरा लीजे संतन जीवन प्रान. महाप्रभु ।
अमी उगार दासको दीजे जिनको परम कल्यान ॥
सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥
हृदयकमल बिच पलंग बिछाऊं पौढें पुरुषपुरान. महा० ॥
चरनकमलकी सेवा करिहों दासातन परमान ।
सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥
सुरतके बिजना डोलाऊं मैं ठाडी ।
एक टक लागों ध्यान. महा० ॥
धर्मदास पर दायी कीजे पूरन पद निर्बान ।
सो अचवन कीजे गुरु कृपा निधान ॥

शब्द विजना ।

मेरे सतगुरु आये द्वारको रसको बिजना । काहेके बैठक देउं सुरत रसको बिजना ॥ चंदन पिठिया गुरु बैठका रसको बिजना । नीरन चरन पखारों सुरत रसको बिजना ॥ भात रिंधों रस दूधमें रसको बिजना । धोय मूंगके दार सुरत रसको बिजना ॥ काहेके थार परोसों हो रसको बिजना । काह कटोरन दूध सुरत रसको बिजना ॥ सोनेके थार परोसों हो रसके बिजना । रूप कटोरियन

(२८४)

कवीरपंथी-

दूध सुरत रसको बिजना ॥ जेईलेव सतगुरु पाहुना रसको बिजना ।
मुखभर देहु अशीस सुरत रसको बिजना ॥ पाथरको का पूजनी
रसको बिजना । मुख बोले ना खाय सुरत रसको बिजना ॥ सांचे
पूजहु साधुको रसको बिजना । मुख बोले ओ खाय सुरत रसको
बिजना ॥ खाय पाय मुख सेजमें रसको बिजना । करले शब्द
शृंगार सुरत रसको बिजना ॥ पानन बिरियां खवाऊं हो रसको
बिजना । दोउ कर चरन दबाय सुरत रसको बिजना ॥ बिजना
बिजना सब कोई कहे रसको बिजना । बिजना लखे न कोय
सुरत रसको बिजना ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों रसको बिजना ।
रहत अमरपुर छाय सुरत रसको बिजना ॥

भोगकी आरती ।

सुमरन भजन आरती पूजा, सनमुख करले सेव । सिर पर
राखिये हो, सोई परम गुरुदेव ॥ अजपा जाप जपो बिन जिह्वा-
मूलमंत्र आराधि । अस्थिर ध्यान अमर हृद अविचल, लागी
सहज समाधि ॥ मानसरोवर मंजन करले, त्रिबेनीको घाट ।
अनहद धुन सुन पांचों मोहे, खुलगये ज्ञानकपाट ॥ बिन नदिया
बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । शब्द सिंढी ऊपर ले राखो,
घरही है निज द्वार ॥ चांद सूर निसि वासर नाहीं, नाहिंन विद्या
बेद । साहब कवीर भये जहां गुरुमुख, बिरले पावहि भेद ॥

चौकाकी रमनी ।

प्रथमहिं मंदिर चौक पुराये । उत्तम आसन श्वेत बिछाये ॥
हंसा पग आसन पर दीन्हा । सतकवीर कही कह लीन्हा ॥
नाम प्रताप हंस पर छाजे । हंसहि भार रती नहिं लागे ॥ भार
उतार आप सिर लीन्हा । हंस छुडाय कालसों लीन्हा ॥ साधसंत
मिलि बैठे आई । बहु बिध भक्ति करे चितलाई ॥ पान सुपारी
नारियर केरा । लौंग लायची किसमिस मेवा ॥ सवा सेर आनो

शब्दावली

(२८५)

मिष्टाँना । सत सवासा उत्तम पाना ॥ सात हाथ बस्तर परवाना ।
सो सतगुरुके आगे आना ॥ इतना होय और नहीं भाई । जासों
काल दगा मिट जाई ॥ धन्य संत जिन आरति साजा । दुख-
दारिद्र वाके घरसे भागा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । ओहँ
सोहँ शब्द प्रगासा ॥

साखी-चौका चन्दन कीजिये, मलयागिरको नाम ।

चारो कमल सुधारहू, मध्य ताहिको धाम ॥ १ ॥

उग्र ज्ञानका कहों संदेशा । धर्मदास मानो उपदेशा ॥ धर्मदास
मानो चितलाई । रहो ठीका पर उचट न जाई ॥ अजर लोकमें
आरती कीन्हा । सो आरती हम तुमको दीन्हा ॥ जा घर आरती
नाहिन साजी । ता घर धर्मरायके बाजी ॥ जा घर आरती करो
बनाई । निरभै हंस लोकको जाई ॥ कोटिन ज्ञान कथे नर लोई ।
बिन आरती बांचे नहि कोई ॥ अजर जोत आरती परकाशा ।
दूत भूत जम मानै त्रासा ॥ कहें कबीर सुनो धर्मदासा । हँसा
पावे लोक निवासा ॥

साखी-कलस आरती दल शिला, नरियर पान मिष्ठान ।

पुंगी फलपुष्प लौंग लायची, शब्द भजन धुन ध्यान २॥

धर्मदास तुम पंथ उजागर । अरपो दल परसो सुखसागर ॥
चंदन चौका रचो बनाई । सत सुकृत जहां बैठे आई ॥ सतबारीकै
फूल मँगावा । सो सतगुरुको आन चढावा ॥ धर्मदास उठ बिनती
कीन्हा । हो सतगुरु हम तुमको चीन्हा ॥ जो तुम कहो मानलेउं
सोई । तुम गुरुछोड और नहि कोई ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा ।
बीरा नाम करो परकाशा ॥

सा०-लौंग इलायची नारियर, आरती धरो लेसाय ।

कहें कबीर धर्मदास सों, काल दगा मिट जाय ॥ ३ ॥

(२८६)

कवीरपंथी-

धर्मदास तुम बीरा लेहू । जंबूद्वीपके जीवन देहू ॥ मैं का
जानो पंथके आदी । जंबूद्वीप बसे बकबादी ॥ पढे वेद औ करे
अचारा । वे नहि माने शब्द तुम्हारा ॥ जो नहि माने शब्द
हमारा । सो चलि जैहै जमके द्वारा ॥ जो कोइ माने शब्द हमारा ।
सो चल अइहै लोक मंझारा ॥ अंतर कपट करे मन माहीं । ताको
लोक पहुंच नहि जाहीं ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । बीरा नाम
करो परकाशा ॥

सा०—अंसरेख सुर सीखको, गुरु स्वांसा घर एक ।

तामो नरियर मोरहु, टूटे विघ्न अनेक ॥ ४ ॥

चौकाके पद ।

भक्ति सतगुरु आनी संतो, कोई बूझे पंडित ज्ञानी संतो ॥
पाहन फोर गंग एक निकसी, चहुँ दिस पानी पानी । वा पानी
दोय पर्वत बूढे, दरिया लहर समानी ॥ उठ माखी तरवर पर बैठी,
बोले अमृत बानी । वा माखीके मक्खा नाहीं, गर्भ रहा बिन पानी ॥
राई बरोबर वस्तु हमारा, अर्ध राई अस्थूला । लहर लहर वह
घट बिच होवे, सोई पुरुष निज मूला ॥ नारी एक सकल जग
जायो, ताते रहत अकेला । कहैं कवीर यह पद को बूझे, सो
सतगुरुका चेला ॥ १ ॥

गुनका भेद न्यारा न्यारा, कोई जानेगा जाननहारा ॥ सोई
सुन्दर जाके पियको, बरत है अज्ञाकारी होई ॥ और सकल सब
श्वान कूकरी, सुंदर बदन ना होई ॥ सोई गजराज राजकुल मंडन,
जाके मस्तक मोती ॥ और सकल सब भार लदनुवाँ, महिषासुरके
गोती ॥ सोई भुजंग जाके मस्तक मनि, मनि उजियारे खेले ॥
और सकल सावनके केंचुवा, जगत पांउतर डोले ॥ सोई पर्वत

शब्दावली

(२८७)

सुमेर उजागर, अष्टौ धात निवासा ॥ और सकल पाखान बरोबर, टांकी अगिन प्रकाशा ॥ कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, नाम भजन अधिकारी ॥ और सकल साहबका बाना, देखो तत्त्व विचारी ॥

साखी-जो रचना है लोकके, सो चौका विस्तार ।

की बैठे निज बिंदसुत, की पूरा कंडिहार ॥ २ ॥

चीन्हो रे नरलोई सतगुरु ।

जासों मिटे तेरो जनम जोयनी, आवागमन न होई ॥ गुरु जगतमें बहुत कहावै, मंत्र देत हैं काना ॥ उपजे बिनसे औसागरमें, भेद यरम नहि जाना ॥ बेद पुरान भागवत गीता, सब मिल रही डिठाई ॥ धन सोई जीवसुफल सोई प्रानी, निज पूरे गुरुपाई ॥ चौर औ साहु जगतमें व्यापे, जो लखपावै कोई ॥ सांचे मिलै तवै सुख उपजे, तनके तपन बुझाई ॥ सांचे एक जगतमें सतगुरु, भौतारन कंडिहारा ॥ कहैं कवीर सब जगके गुरुवा, मर मर ले औतारा ॥

साखी-द्वादश दल जहां रचिके, करहु प्रेम परकाश ।

मध्यक्षेत्र विस्तारहु, अंक नाम विश्वास ॥ ३ ॥

गगनमंडलका बासा संतो, जहां देखो अजब तमासा संतो ॥ गढ़ मेरो गगन सुरत मेरो चौका, चेतन चँवर डुरावै ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नारी, अनहद बेन बजावै ॥ अष्ट कमल दल पंखुरी बिराजे, उलटा ध्यान लगावै ॥ पांचपचीस एक घर लावौ, तब धुनकी सुध पावैं ॥ त्रिकुटी घाट अस्नान जो करले, रबि शशि सुषमन होई ॥ हंसा केल करत राजन संग, एक महलमें दोई ॥ विन बादल जहां बिछुली चमके, बिना सीपके मोती ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरखहु निरमल ज्योती ॥

(२८८)

कवीरपंथी—

साखी-जापर बसे निह अक्षर, ताहि पवनके नाम ।

शब्द सुधारस खान है, हम तुम ताही धाम ॥ ४ ॥

अब हम अविगतसे चलिआये । काहू भेद भरम नहीं पाये ॥
ना हम जनमें गरभ बसेरा, बालक होय खिलाये ॥ काशी शहर
जलहि बिच डेरा, तहाँ जुलाहा पाये ॥ हते विदेह देहधर आये,
काया कवीर कहाये ॥ बस हेत हंसनके कारन, रामानंद समुझाये ॥
ना मोरे गगन धाम कछु नाहीं, दीसत अगम अपारा ॥ शब्द
स्वरूपी नाम साहबका, सोई नाम हमारा ॥ ना हमरे घर मात
पिता है, नाहीं हमरे दासी ॥ जात जोलाहा नाम धराये, जगत
कराये हांसी ॥ ना मोरे हाड चाम ना लोहू, हौ सतनाम उपासी ॥
तारन तरन अभय पद दाता, कहैं कवीर अविनासी ॥ ५ ॥

होत अनंद अनंद भजनमें ।

बरषत शब्द अमीकी बादर, भीजत हैं कोई संत ॥ अग्रवास जहाँ
तत्त्वकी नदियाँ, मानो अठारा गंग । कर अस्नान मगन है बैठे,
बढ़त शब्दके रंग ॥ पियत सुधारस लेत नामरस, चुवत अग्रके
बुंद । रोम रोम सब अमृत भीजे, पारस परसत अंग ॥ श्वासा
सार रचे मोरे साहब, जहाँ न माया मोहंग । कहैं कवीर सुनो
भाई साधू, जपो सोहंग सोहंग ॥

साखी-रामनरायन जगत गुरु, करें बोध संसार ।

वचन प्रतापसे ऊबरे, भौजलमें कडिहार ॥ ६ ॥

दर्शन देहु कवीर अब मोहिं ।

अघ तम पुंज दहन रवि भासत, निरमल होत शरीर ॥ श्वेत कमल
पुरयनपर चौका, कर्मके कागद चीर । सुमरन करके दल तहाँ
धरिया, सीतल जल हल नीर ॥ हंस बोलाय पुरुष जब लीन्हा,
दीन्हो अंमर चीर । अमृत भोजन हंसा पावे, शब्द दूधके खीर ॥

शब्दावली

( २८९ )

सेज्या पुष्प श्वेत सिंघासन, माथे छत्र मनि हीर । कहें कवीर
सुनो भाई साधू, सुमरण करो अस्थीर ॥

साखी-चार गुरु संसारमें, धर्मदास बड़ अंस ।

मुक्तराज तुमको दिये , अटल बयालिस वंश ॥ ७ ॥

पदचोरी ।

शब्द सिंघासन पाटमें, तुम हंसा बैठो आये हो । कौन नाम
मुक्तामनी, कौन नाम वे अंस । कौन नाम वे पुरुष हैं, कौन नाम
वे हंस ॥ अजर नाम मुक्तामनि, उग्रनाम वे अंस । ज्ञानी नाम वे
पुरुष हैं सुतं, नाम वे हंस ॥ मूलद्वीप निज द्वीप है, और सुनो
हम पांह । बैठे हंस उबारही, सोहंगमके बांह ॥ जंबुद्वीपके हंसा
भाई, पांजी बैठे आय । कहें कवीर धर्मदास सो, तुम लावहु
बांह चढ़ाय ॥

साखी-हंसा छूटे बाज जों, कोट सिंघका जोर ।

सुमरन दीनदयालका, पहुँच गया निज ठौर ॥ १ ॥

नाम सनेह न छाड़िये, भावे तन मन धन जरजाय हो ॥ पानीसे
पैदा किया, नख सिख सीस बनाय । वह साहबको विसारिया,
तेरो गाढो होत सहाय ॥ महल चुने खाई खने, ऊंचे ऊंचे धाम ।
जब जम बैठे कंठमें तेरो, कोई न आवे काम ॥ मात पिता सुत
बंधुवा, और दुलारी नार । यह सब हिलमिल बीछुरे, तेरी शोभा
है दिन चार ॥ जैसे लागी औरसे, दिन दिन दूनी प्रीत । नाम
कवीर न छाड़िये, भावे हार होयके जीत ॥

साखी-उनमुनि चढी अकाशमें, गई गगनमें छूट ।

हंस चलासो जात हैं, काल रहा सिरकूट ॥ २ ॥

अबकी बेर उबारिये मेरी अर्जी दीनदयाल हो ॥ आई थी

कवीरपंथी शब्दावली १ ०

(२९०)

कवीरपंथी—

वही देशसे, भई परदेशी नार । वह मारगमें भूलिया, बिसर गई
निज नाह ॥ जुगन जुगन भरमत फिरे, जमके हाथ बिकाय ।
करजोरि बिनती करो, माहि मिलके बिछुर मत जाव ॥ विषम नदी
बिकराल है, वाहित करिया धार । मोह मगरके घाटमें, खाये
सुर नर झार ॥ शब्द जहाज कवीरका, सतगुरु खेवनहार ॥
कोइ २ हंस उबारहीं, पलमें लेहिं गोहार ॥

साखी—चली जु पुतली नोनकी, थाह सिन्धुकी लैन ।
आपन गल पानी भई, उलट कहे को बैन ॥ ३ ॥

कौन मिलावै जोगिया, जोगिया विन रहो न जाय हो ॥
हों हरनीं पिय पारथी, मारा शब्दका बान । जाहि लगे सो जानिया,
और दरद नहिं आन ॥ पिय कारन पियरी भई, लोग कहे तन
रोग । जप तप लंघनमें करो, पिया मिलनके योग ॥ हुं तो प्यासी
पीव की, रटों सदा पिव पीव । पिया मिले तो जीविहों, ना तो
(सहजे) त्यागों जीव ॥ कहैं कवीर सुन जोगिनी, तनही में मनही
समाय । पिछली प्रीतके कारने, (जोगी) बहुरि मिलेंगे आय ॥

साखी—अस बीरा प्रताप बल, प्रबल काल ते होय ।

जेह सतगुरु बहियां मिले, हंस न जाय बिगोय ॥ ४ ॥

हंसा डुरमत छोड़ दे तूं तो, निर्मल होय घर आव हो ॥
दूधहि से दधि होत है दधि, मथ माखन होय । माखनसे घृत
होत है, बहुर न छाँछ समोय ॥ ऊँखहिसे गुड़ होत है, गुड़से
खाँड होइजाय । सतगुरु मिल मिसरी भये, बहुरि न ऊँख समाय ॥
खाँड जो बगरी रेतमें गजमुख, चुनी न जाय । जात बरण कुल
खांय के, चींटी होय चुन खाय ॥ दाग जो लागा नीलका, नौ मन
साबुन धोय । कोट यतन परमोधिये, कागा हंस न होय ॥ कहैं
कवीर सुन केशवा, तेरी गत अगम अपार । बाप बिनोरा हो रहे,
पूत भये चौतार ॥

शब्दावली

(२११)

साखी-बीरा पद जिन जानहु, पुरुष नाम निजमूल ।
जा दिन हंसा तन तजै, मेटै संशय शूल ॥ ६ ॥

शब्दसनेही हंसा तुम, जग तज होहु न्यारा हो ॥ सतशब्द
निज डोर है, तुम हंसा गहो बनाय । सतबीरा निज नाम है, (तुम)
चाखतही घर जाव ॥ बिना बीज को जामि है, बिन अंकुरको
झाड़ । बिन डोडी फल लागिया, कोइ साधू करे बिचार ॥
अजर केर अंकुरा भये, अजर केर लागी डार । अजर फूल फल
लागिया, (कोइ) साधू करे अहार ॥ मोहि अजर कर जानहु,
अमर देऊं बताय । जेहि भांडे निज साँच है, (हम) तामो रहें
समाय ॥ कहें कवीर धर्मदास सो, बेग जाहु संसार । सोहँगमके
बाँह से, (तुम) हंस उतारो पार ॥

साखी-उत्तर घाटी उत्तरे, पांजी बैठे जाय ।

तहवां सुर्त समावै, पुरुषके परसे पाय ॥ ६ ॥

चौपड़ ।

चल सखी चौपड़ खेलिये, तन मनसे बाजी लाय हो ॥
चौपड़ खेलौं सुन्नमें, खेलौं दिन औ रात । चल हंसा घर आपने,
जहां तेरी उतपात ॥ चौपड़ खेलौं पीवसे, बाजी लगावों जीव ।
जो हारों तो पीव की, जो जीतों तो पीव ॥ चार गली घर एक है,
चार बरन एक सार । पासो ढारा प्रेमका, जीत चली सोई नार ॥
चौपड़िया के खेलमें, जुग नाहनेको दाव । नरु अकेली हो रही,
छिन पल खावे घाव ॥ चौरासी घर भस्मके, पौमें अटकी आय ।
अबकी पौं जो ना परे तो, फिर चौरासी जाय ॥ पगरासे बाजी
लगी, परे अठारा दाव । सार गँवाई हाथसे, सिर पर लागे घाव ॥
जात बरन कुल मेटिके, पाये भक्ति अटूट । कहें कवीर धर्मदा-
ससों, कोई न पकड़े खूट ॥

(२९२)

कवीरपंथी—

साखी—मैं कवीर बिचलों नहीं, शब्द मोर समरन्थ ।

जाको लोक पठाइया, चढे शब्दके रथ ॥ ७ ॥

ज्ञान रतनकी आंखिया, तुम देखो जमके जाल हो ॥
जमके फंदा काटो हंसा, जग तज होहु न्यार । सतगुरु दर्शन
देयँगे, तुम उतरो भौजल पार ॥ जो तुम हंसा निर्गुन चाहो,
सर्गुन करो बिचार । निर्गुन सर्गुन छोड़िके, ( तुम ) दोउ तज
होहु न्यार ॥ अष्ट कमल दल ऊपरे, भँवर गुफाके घाट । सहस
पंखुरीको कमल है, पश्चिम दिशाके बाट ॥ नौ खंड हेत बिसारो
हंसा, शब्द सुरत चित धार । कहैं कवीर धर्मदाससों, तुम उतरो
भौजल पार ॥

साखी—नाद संघाती कवीर हो, बिंदहि देहु न भार ।

जुग जुग हंस हिरम्मर, नाद उबारन हार ॥ ८ ॥

बीकाकी आरती ।

मंगलरूप आरती साजे, अभय निशान ज्ञान धुन गाजे ॥
टे० ॥ अक्षे वृक्षकी अमर छाया । प्रेम प्रताप अमृत फल पाया ॥
निसि बासर जहाँ सूर न चंदा । परम पुरुष जहाँ करत अनंदा ॥
तन मन धन जिन अर्पन कीन्हा । पुरुष पुरुष परमात्म चीन्हा ॥
जरा मरनकी संसे मेटो । सुरत संतायेन सतगुरु भेटो ॥ कहैं
कवीर हिरंमर होई । निरख नाम निज चीन्हे सोई ॥

मंगल ।

बनजारिन बिनती करें सुन साजना । ( साधो ) नरियर लीन्हो
हाथ संत सुन साजना ॥ बिना बीजको वृक्ष है सुन साजना ।
( साधो ) बिन धरती अंकूर संत सुन साजना ॥ जाको मूल
पताल है संत सुन साजना । ( साधो ) नरियर सीस अकाश संत
सुन साजना ॥ बिना भेद जनि मोरहु सुन साजना । ( साधो )
जीव इकोतर हानि संत सुन साजना ॥ गुरुके शब्दले मोरहु सुन

शब्दावली

(२९३)

साजना । ( साधो ) खुले जमको कपाट संत सुन साजना ॥
सखियाँ पाँच सहेलरी सुन साजना । ( साधो ) नौ नारी विस्तार
संत सुन साजना । कहैं कवीर बचेलसे सुन साजना ॥ रानी इंद्रमती
सदाँर संत सुन साजना ॥

नारियलका शब्द ॥

मोरहु नरियर मोरहु हो, आपन अंस बचाय । बिना शब्द
जिन मोरहु, जिव परले तरजाय ॥ तीन अंश नरियर महाँ, तामों
एक हमार । आपन अंस बचायके, जमके अंस निनार ॥ जमको
अमल मिटावहू, पवन बतीस बिलोय । नीर नेह निवारहू, चलो
महातम खोय ॥ धरती रेख सुधारहू, पौरुष पवन अमान ।
बिना भेद जिन मोरहु, जीव एकोतर हान ॥ सोई पवन निज
गहि रहो, नरियर वास समोय । तो नौ तत्व सुधारहू, काल
निकट नहि होय ॥ धरती गुन गहि प्रगटहू, करो शब्द परकाश ।
साहब कवीर कर दीहल, दृढ मानो धर्मदास ॥

भोगका शब्द ।

सत पुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे हो ॥
कदली पत्र साजो पनवारा । सीतल शब्द जोत उजियारा ॥
नरियर मोरि खुरौरी कीन्हो । आद नाम अंतर घट चीन्हो ॥
सुघर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीत भावसे संत मंगाई ॥ लौंग
लायची किसमिस मेवा । सुघर मधुर रस दाख घनेवा ॥ सुख-
सागरको निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सतपुरुषको
अर्पन कीन्हा ॥ शंख शब्द धुन बाजे बीना । सो पनवार दासको
दीन्हा । जाते काल भयो आधीना ॥ पान पसाद जीव जो पावे ।
अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ऐसा भेद करो परकाश । सत्य शब्द
मानो विश्वास ॥ कहैं कवीर सुनो धर्मदास । बीरानाम करो परकाश ॥

(२९४)

कबीरपंथी—

शब्द तिनूकाका ।

जमनियाके डार साहब तोड़ दीजे हो ॥

एक जमनियाकी चौदह डार, सार शब्द ले तोड़ दीजे हो ॥
सुरत हमारे अजब पियासै, प्रेम अमीरस घोर दीजे हो ॥ गुरु
हमारे ज्ञान जौहरी, हीरा पदारथ अमोल दीजे हो ॥ यह संसार
बिषैरस माते, भरम किंवरिया खोल दीजे हो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं, जीवनको बंध छोर दीजे हो ॥

शब्द कंठीका ।

पायो निजनाम गलेको हरवा ॥

सतगुरु पटवा अजब लहरवा । छोटी मोटी डोलिया चार
कहंरवा ॥ प्रेम प्रीतकी पहिर चुनरिया । निहुर नचो साहब दर-
बरवा ॥ सतगुरु कूंची दर्ई महलमें । जब चाहो तब खोल केवरवा ॥
एही मेरो ब्याह यही मेरो गवना । कहैं कबीर बहुर नहिं अवना ॥ १ ॥

शब्द नामका ।

गुरु पईयां लागों नाम लखाय दीजो हो ॥

जुगन जुगनके सोये मनुवा । दे सत शब्द जगाय लीजेहो ॥
घट अँधियार कछू नहि सूझे । ज्ञानकी दृष्टि खुलाय दीजे हो ॥
विषकी लहर उठे घट भीतर । अमृत बुंद चुवाय दीजेहो ॥ गहरी
नेदिया नाव पुरानी । खेयके पार लगाय दीजेहो ॥ धर्मदासकी
अरज गोसाईं । जीवन बंध छोड़ाय दीजे हो ॥ २ ॥

शब्द दीहल प्रारम्भः ।

आमिन बिनती बिनवई, सुनहु हो बंदीछोर । भौसागर मोहिं
तारहु, इतना मोर निहोर ॥ भौसागर अहैं भयावना, सूझे वार
न पार । झंझर नाव पुरातमा, खेइ उतारो पार ॥ कोट कर्म छूटे
नहीं, या जिव कीट समान । भुंगी होय गुरुतारहु, अधम उधारन
मान ॥ आसन आदि पुरुषको, धर्मदासको दीन्ह । चार अंश

शब्दावली

(२९५)

चौका महि, तामो लोन्हो चीन्ह ॥ कहें कवीर सुन आमिनी, रहो हमारी आस । जीवन पार उतारिहौं, होइ चूरामन दास ॥ १ ॥

दीहल कालज्ञान ।

पांच घरी वायें चले, सोई दहिने होय । दस स्वासा सुख-
मन चले, ताहि विचारो लोय ॥ आठ पहर जबही चले, पिंगला
माहीं स्वास । तीन बरस काया रहे, ता पीछे होय नास । आठ
दिना जबहीं चले, स्वासा रवि की ओर । दोय बरस काया रहे,
प्राण जाय तन छोर ॥ सोरह दिन जबहीं चले, भान दाहिने
होय । बरस दिना काया रहै, पीछे रहै न कोय ॥ बीस रैन औ
बीस दिन, चले दाहिनो स्वास । षष्ट मास काया रहै, ता पीछे
होय नास ॥ एक मास औ एक दिन, रविके पहरा होय । स्वास
सरोधा सत्य है, नर जीवे दिन दोय ॥ नहि चंदा नहि सूर है,
नहीं सुषुमना बास । सुख सेती स्वासा चले, पहरमें होय बिनास ॥
कहें कवीर विचारके, गहो शब्द टकसार । सत्य लोक हंसा चले,
आवा गमन निवार ॥ २ ॥ निज अनंद घर महलमें, करो सदा
सुखबास । सो वर चीन्हौं संतो, काटो जमके फांस ॥ निज
उत्तम घर आपनो, सो तुम चीन्हत नाहि । बिन चीन्है कहाँ
जैहो, यह बड़ अचरज आहि ॥ अबहुं कहो जो मानहु, उलखो
वचन हमार । दुबधा डुरमत छोड़के, चीन्हो वस्तु सम्हार ॥
पांचतत्व निज मूल है, करता इनहीं मांहि । नख सिख तन
निज ढारिया, सो कहुं अन्ते नाहि ॥ अनत होय तो को गढे,
यह तन सुंदर रूप । सकल साज एक बुंदमें, ऐसा ख्याल
अनूप ॥ अगिन पवन जल पृथवी, इनमें साहब जीव । पुहुप
मध्य ज्यों बास है, दूध मध्य ज्यों घीव ॥ घरमें जल जलमें
घर, बोलनहार संजोग । सांचे सांचे ढारिया सांचें सुख भोग ॥

(२९६)

कबीरपंथी—

तब जो हता सो अब है, फेर फार कछु नाहिं । बिन स्वरूपको साहब, सो कतहुं नहिं आहिं ॥ निगुण नाथ निरंजना, जिनके पिंड न प्रान । सो बर बरो सबन मिलि, कामिन रूप जहान ॥

गुरुमुख भई सगाई, सुमरन लागो नेह । तत्वको तेल चढ़ाय के, भूल गई गुन देह ॥ ज्ञानको मंडप छाइले, ध्यानको भराई ठाँव ।

बिन अक्षरको मंगल, बिन रसना गुण गाँव ॥ दूल्ह देव निरंजन, दृष्ट मुखसे चीन्ह । पृथी अकाशके बाहिरे, या विधि भाँवर दीन्ह ॥

भाँवर भई अनंद भये, अजहुं मिलना नाहिं । तन छूटे, गुरु दूटे तब वेगहि हैं बाँहिं ॥ ऐसी आशा अवधि बद, गये गुन राह बताय ।

नाम अधार सो रहगई, दुल्हिन अतिसुख पाय ॥ अवध पूजे जब आयके दुल्हिन, जोवैं बाट । तन छूटे वे ना मिले, कौन सहे अपघाट ॥

गोहरावे आवे नहीं, बिन देखेकी प्रीत । आप अपुन चीन्है बिना नहिं आवे, परतीत ॥ आशा भई निराशा, को आवे को जाय । भौजल नदिया भयावना, फिर फिर गोता खाय ॥

अगम अगाह अथाह है, थाह न पावे कोय ॥ सतगुरु थाह थहावे, जीवन मुक्ता होय ॥ जा कारण जग नाचिया, नाना भेष बनाय ॥

सो ना मिलौ ना मिलि हैं, नाहक गोता खाय ॥ बिन परचे जिन भूलियो, कहैं कबीर विचार । जिनको परचे अब भई, तिनके अटल दिदार ॥ ३ ॥

सुखसागर सुख विलसहू, छाँडो दुखकी आस अपने जिवन धन चीन्हहू, सब सुख तुम्हरे पास ॥

जुगल रूप जग भीतरे, कांता कामिनि नेह । अष्टधातको जुगल तन, एक प्रान दोय देह ॥ तन सूरत मन मूरत, साहब बोलन हार । नर नारी सुख बिलसो, करता सिरजन हार ॥

यह छबि आय सकल विधी, दुखका मूल बिसार । एक बुन्दते सिर-जिया, एकहि है करतार ॥ आपुहि तखत बनावै पानी पवन

शब्दावली

(२१७)

संयोग । अष्ट धातके महलमें क्रीडाकरे सुखभोग ॥ आपुहि राजा परजा, आपुहि रंक फकीर । आप सर्व गुन आगरे, आपुहि गुन गंभीर ॥ आपुहि जती सती है, आपुहि है दयापाल । आपुहि जोगी जंगम, आप कियो विस्तार ॥ आपुहि गावै बजावे, आपुहि तोरे ताल । आपुहि लखे अपन पौ, आप अपुनमें काल ॥ आपुहि करे करावै, लेय औरको नांव । आपुहि खलक ऊजरे, आप बसावे गांव । जुग असंखलो शंकर, धरे सुन्नमें ध्यान । उनहुँ न लखो अपुनपो, तू नर कयोँ वौरान ॥ ब्रह्मा विष्णु थकित भये, खोजत पार न पाय । औरन्हकी मति केतिक, नाहक गोता खाय ॥ शिव सनकादिक नारद, शारद शेष सुरेश । अस्तुति करत थकित भये, उनहुँ न कहा संदेश ॥ एके जपै निरंजन, निर्गुन और निरंकार । पाँच तत्वके बाहिरे, उनके भये अकार ॥ अलख अपार परम गुरु, अरु मूरत वे पिंड । औगह अगह अवीज है, जोत सरूप अखंड ॥ सुध बुध वा पहुँचे नहीं, महा कठिन ऊ पंथ । सुमिरन साखकी खबर नहीं, कथकथ मरे ग्रंथ ॥ हाथ माथ पग पिंड बिन, केतिक बडो वह कोड । किसबिध चेरी आगरी, किसबिध खसम निगोड ॥ कथकथ मुनिजन उडगये, जस भैवे अकाशे गिद्ध । चारा वाके भुई धरो, कहा उडे भये सिद्ध ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्ध, कोट अनंतन दास । उनहुँ न लखो अपुनपो, भरमत फिरत उदास ॥ कस्तूरी है कुंगरंग, चले पवनके बास । मृगमध्य नाभी बसे, मृग दूँडे वन घास । कहैं कवीर अब कहतहुँ, डार भर्मकी मोट, अपनो भलो जो चाहऊ, परखलेउ खर खोट ॥ ४ ॥ सुन्न सरोवर भीतरे, तीरथ एक अनुप । तेज पुंज जहां झलकई, प्रगटे जोत स्वरूप ॥ कदल कमलदल अंतरे, रजनी बासर नाहिं । अनहद घंटा बाजई, पाँच

(२९८)

कवीरपंथी-

सुत्रके माहिं ॥ कंचन कूट औटाइले, भिन कबहुँ नहिं होय ।
परमल बास पलासकी, काष्ठ कहे नहिं कोय ॥ काष्ठ माहिं पावक
बसे, ज्यों तिल मद्धे तेल । जुक्ति बिना नहिं नीकसे, ऐसा अद्धुत
खेल ॥ परम पुरुष संग दुलहिन, खेलै आतम सार । एक वरण
एक अंक है, एक रूप अनुहार ॥ साहब कवीरके दीहल, सुनियो
संत सुजान । समुझत सुख ऊपजे, नातो दुकख निदान ॥ ५ ॥
सुकृत फूल गुलाबके, सबघट रहो समाय । कहु कैसेके पाहये,
गुरु बिन लखो न जाय ॥ तीन त्रिकुटीके ऊपरे, फुलै सोहंगम
फूल । जहां न धर्मकी आसना बिन अझर निजमूल ॥ चार
जोजनके ऊपरे, पुरुष विदेही पूर । जगरमगर वह नग्र है, बाजत
अनहद तूर ॥ अपने ठीका हम खडे, सतगुरु दिया बताय ।
खिरकी खोल दिखाइया, राह गगनकी जाय ॥ कहैं कवीर धर्म-
दास सों, प्रगट दीहल बताय । सो हंसा भल पावई, नहिं आवे
नहिं जाय ॥ ६ ॥ अचरज देखो कामिनी, कहतेको पतियाय ।
अधर साहब हम देखिया, सतगुरु डंडिया फँदाय ॥ चंद सूर
जहँवां नहीं, जहां न धरनि अकास । तीन पुरुष मोरे प्रीतम,
केहि विधि करो निवास ॥ गुरु दर्शनके कारने, सरवस देउँ
लुटाय । एक पलकके बीछुरे, अब मोहिं कहु न सोहाय ॥ गुरु
दरसन हम पायल, छूटल कुल परिवार । अब जहँ पुर आपने,
परख परख टकसार ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों, हिरदे करो बिचार ।
अरस परस करो कामिनि, निर्गुण नाह तुम्हार ॥ ७ ॥ दरिया पार
हिंडोरना, दीन्हो कंथ बताय । कोई एक नार सुलक्षनी, हरदम
झूलै जाय ॥ अरध उरध दोय खंभ हैं, सुखमन लागी डोर ।
जेठी सुतं सम्हारले, रचले गगन मन मोर ॥ द्वादश केर हिंडोरना,
झूलै पाँचों नार । मेघ घटा घन गरजई, पिय बिन जग अंधियार ॥

शब्दावली

(२९९)

अव्वल घरी मोरे जोबन, समुझ न आई मोह । मैं सकुची दौय
नैनमें, पियसों परो विछोह ॥ चंद लहर मोरे अंचला, सूर लहर
मोरे पीठ । मनरे पवन गहि आसन, करले साहब सो डीठ ॥
कंथ हमारे निरगुन, हम अवगुनियां नार । एक पलक सुख सेजमें,
बात न पुछे हमार ॥ पोहप दीप बसे बालमा, उहांते आयेल
संदेश । छाडो छाडो जमपुरी, बिहँसि चलो वहि देस ॥ स्वेत
बरण एक सुंदरी, शोभा अगम अपार । कहें कवीर सुन धर्मनी,
आवौ लोक हमार ॥८॥ गुरुके वचन मोरे प्रीतम, हरदम खबर
जो लेय । जो चित अंते जाइहै, हँसि पिया तजि न देय ॥ पार
बसे मोरे प्रीतम, दुरवल भई मोर देह । पांच भइया संग दारुन,
तिनसो छूटल सनेह ॥ जाके आँगन नदिया बहे, सो कस कुवा
नहाय । जा घर नार सुलक्षनी, सो कस परघर जाय ॥ गुह अंगना
नहिं भावई, सुख संपत न सुहाय । निर्गुण नाह मोरे आवई,
सेज गई कुम्हिलाय ॥ जो साहब बर पाइहों, नइहर धरो उठाय ।
सेज बैठ सुख विलसही, गुरुमुख मंगल गाय ॥ कहें कवीर मैं
थाकल, छूटल यह संसार । चरन कमल चित राखहू, पूरण नाम
अधार ॥९॥ अरे ! अरे ! बालसंधातिनि, सखी सुनो तुम आय ।
हम जो भई परदेसिन, गुरुमुख मंगल गाय ॥ पिया हमारे तीन
जने, दुलहिन पांच पचीस । इन प्रपंच हम भूलिया, जन्म गयो
सब खीस ॥ सबे कहावे पीवकी, चहुँ दिस पिउ पिउ सोय । ना
जानों या झुंडमें, कौन सोहागिन होय ॥ है कोई प्रेम पियारी,
जस इतनो करलेव । जुगन जुगनके बीछुरे, पिया मिलन करदेव ॥
सतगुरु लगन लिखाइया, हमे दिहल वा देश । जा घर उगे न
आथवे, पवन नहीं परवेश ॥ गई धिया नहिं बहुरे, सुन ससुरेकी
बात । अन्न पानी नहिं भावई, सीतल भई सब गात ॥ साहब

(३००)

कवीरपंथी-

कवीर कहि दीहल, सुनियो हो धर्मदास । निर्गुन केर सुलच्छनी,
निर्गुण कियो निवास ॥ १० ॥ आरती साजहु दुलहिन, आवहि
कंथ सबेर । निर्गुण मंगल गावहु, अब जिन लावहु बेर ॥ तन
रुइया कर बातियां, मन तिलको कर तेल । सुरत हाथ दियना
धरो, निरत चली कर केल ॥ अच्छे पलंग जहाँ पचरंग, सो रे
बिछावौ झार । सुषुमन सेज सँवारहु, सुकृत गढवा धार ॥ हँसिके
प्रीतम आइया, बिहँसि के लीन्हो पाय । सुख देखत सुख ऊपजे,
सुमिरत कर्म कटाय ॥ ईगला लिये कर झारी, पिंगला पंखा गाँस ।
सतगुरु शब्द सहायक, पहुँच पियाके पास ॥ हियरा गहभर
भेटिया, सुक पलोटे पांय । सुख देखत सुख ऊपजे, तनकी तपन
बुझाय ॥ कहैं कवीर धर्मदाससो, सुनियो संत सुजान । पिया
मिलो सुख बिलसो, जम जीतो मैदान ॥ ११ ॥ भौसागर मोर
नइहर, निर्गुण सासुर मोर । आवत बटिया भुलानी, काल करे
घन घोर ॥ आग लगे वह नइहर, धोख परे असगार । सास ननद
झगरा करे, नित उठ माँडे रार ॥ अनचिन्ह ससुरे के लोगवा,
नित उठ लावे दोस । पार परोसिन बैरिन, एक पियाके भरोस ॥
बालम मंदिर छवायेल, झलके अघर अकास । छिन छिन बदन
निहारत, देखत बहुत हुलास ॥ प्रेम सुरत गहु कामिनि, जामों
निर्गुन बास । परम अनंद सुफल भये, जम माने (जाके) त्रास ॥
बहुर न या जग आइहो, बहुर न धरिहो देह । साहब कवीर
कहि दीहल, निरख परख कर लेह ॥ १२ ॥

मिलरहु सखी री तू मिलरहु, अपने पिया सुख जान । नइहर
आपन कोई नहीं, जासों करो पहिचान ॥ मोरे जीवको भावतो,
छाय रह्यो वही देस । मैं विरहिन निशदिन फिरों, कर जोगिनको
भेस ॥ तात मात कोई संग नहीं, संग नहीं सग भाय । काम न

शब्दावली ।

(३०१)

काहू कुटुम्ब सों चली, निसान बजाय ॥ चंद सूरकी पालकी,
तेहि चढ वैठी नार । मुखमन संग सहेलरी, दुलहिन उतरी पार ॥
कमल जो फुले अकासमें, अलि गुंजे चहुँओर । पियाको लै वैठी
तहाँ, डुरे सोहँगम चौर ॥ सोहँगम मूरत मोरे, हिरदे रही समाय ।
कहे कवीर धर्मदाससे, सो लाजो दरसाय ॥ १३ ॥

दीहल आगन तान ।

पांच सखी संग दुलहिन, सासुर झगरा होय । ससुर चौर
घर मुसही, कासों कहों दुख रोय ॥ वासर चंदा ऊगही, निस-
कर ऊगे सूर । गंग जमुन दौय सम बहे, हंस गवन बड़ दूर ॥
गंग जमुनके अंतरे, परवत धोल सुजाव । चितवन नजर न
आवई, जमको अमल अमान । ध्रुव मंडल नहिं दरसई, नेत्र
गुंज अनुसार । चित गहि चेतो संतहो, मास परे जमधार ॥
स्वासा सुर नहीं बंदई, केहर बंदन लेय । आठे पाखके भीतरे,
हंस पयाना देय ॥ कायापुर पाटन परचे, याका यही सुभाव ।
चितगहि चेतो कडिहारहो, औ घट लगे न नाव ॥ जैमुन लगन
संभारहु, सुमिरन निर्गुन सार । पान छत्रपति साजहु, हंस उतारो
पार ॥ पच्छिम लहर जुगावहु, पूरब चंदा तान । निर्गुन शब्द
उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ चंद उदय सुर आयवे, कूच
नगारा होय । साहब कवीर कर दीहल, देखो शब्द विलोय ॥ १४ ॥
जुगत जान जुग बांधहु, चार पवन परवान । हंस हंस चलो
बिहँसत, जम जीतो मैदान ॥ काल कठिन दुर्गदानी, हंसनके
घटवार । तुरतहिं पार उतारई । जिन गहिले टकसार ॥ चौथे
पवन जुग बंधना पवन बहतार डोर । हंस हंस चल सत्तपुर,
उतरो घाट करोर ॥ दान मांगें जगातिया, ना रोके घटवार ।
जंबूद्वीप देव लेखा, परख परख टकसार ॥ भौजल नदिया भया-
वना, सूझे वार न पार । अमित पवन वासा रहे, जिनरे गहल