कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(२८४)
कवीरपंथी-
दूध सुरत रसको बिजना ॥ जेईलेव सतगुरु पाहुना रसको बिजना ।
मुखभर देहु अशीस सुरत रसको बिजना ॥ पाथरको का पूजनी
रसको बिजना । मुख बोले ना खाय सुरत रसको बिजना ॥ सांचे
पूजहु साधुको रसको बिजना । मुख बोले ओ खाय सुरत रसको
बिजना ॥ खाय पाय मुख सेजमें रसको बिजना । करले शब्द
शृंगार सुरत रसको बिजना ॥ पानन बिरियां खवाऊं हो रसको
बिजना । दोउ कर चरन दबाय सुरत रसको बिजना ॥ बिजना
बिजना सब कोई कहे रसको बिजना । बिजना लखे न कोय
सुरत रसको बिजना ॥ कहैं कवीर धर्मदाससों रसको बिजना ।
रहत अमरपुर छाय सुरत रसको बिजना ॥
भोगकी आरती ।
सुमरन भजन आरती पूजा, सनमुख करले सेव । सिर पर
राखिये हो, सोई परम गुरुदेव ॥ अजपा जाप जपो बिन जिह्वा-
मूलमंत्र आराधि । अस्थिर ध्यान अमर हृद अविचल, लागी
सहज समाधि ॥ मानसरोवर मंजन करले, त्रिबेनीको घाट ।
अनहद धुन सुन पांचों मोहे, खुलगये ज्ञानकपाट ॥ बिन नदिया
बिन नावरी, गुरु अघर उतारे पार । शब्द सिंढी ऊपर ले राखो,
घरही है निज द्वार ॥ चांद सूर निसि वासर नाहीं, नाहिंन विद्या
बेद । साहब कवीर भये जहां गुरुमुख, बिरले पावहि भेद ॥
चौकाकी रमनी ।
प्रथमहिं मंदिर चौक पुराये । उत्तम आसन श्वेत बिछाये ॥
हंसा पग आसन पर दीन्हा । सतकवीर कही कह लीन्हा ॥
नाम प्रताप हंस पर छाजे । हंसहि भार रती नहिं लागे ॥ भार
उतार आप सिर लीन्हा । हंस छुडाय कालसों लीन्हा ॥ साधसंत
मिलि बैठे आई । बहु बिध भक्ति करे चितलाई ॥ पान सुपारी
नारियर केरा । लौंग लायची किसमिस मेवा ॥ सवा सेर आनो