काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( ४७ )
शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते ।
राजत्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्विषम् ॥ ३२ ॥'
( श्री वा० रा० कि० का० १८. )
कुछ हेर-फेर से ये श्लोक मनुस्मृति में मिलते हैं ।
'शासनाद्वा विमोक्षाद्वा स्तेनः स्तेयाद्विमुच्यते ।
अशासित्वा तु तं राजा स्तेनस्याप्नोति किल्विषम् ॥ ३१६ ॥
राजभिः कृतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१८ ॥
( मनुस्मृति अध्याय ८ )
श्री मद्वाल्मीकीय रामायण चौबीसवें त्रेता में भगवान् श्रीराम के अवतार
के समय बना है और मनुस्मृति इस वैवस्वत मनु के पहले जबकि ६ मनु और
बीत चुके हैं। इसे सर्वप्रथम स्वायम्भुव मनु के उपदेश से भृगु ने निर्माण
किया है। उद्धरण की प्रक्रिया के अनुसार मनुस्मृति का काल सृष्टि के प्रारम्भ
से ही होने के कारण वर्तमान संवत् २०३५ तक १ अरब ९५ करोड़
८८ हजार ७९ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं।
वस्तुतः दैव असुर दो प्रकार के भूतसर्ग बराबर ही चला करते हैं तथा
सृष्टि प्रक्रिया भी पूर्ववत् ही चला करती है। यह श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है—
'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।'
( श्री० म० भा० गी० ८।१९ )
अतः आस्तिकता-नास्तिकता दोनों ही सिद्धान्त अनादि काल से ही प्रचलित
हैं। नया कोई सिद्धान्त नहीं है। इसी सृष्टि से श्री मद्वाल्मीकीय रामायण
में बुद्ध का नाम आना असमञ्जस नहीं है। वेदों में भी 'कथमसतस्सज्जायेत'
आदि कहकर इस असद्वाद ( शून्यवाद ) का खण्डन किया है।
इस समय श्रीकृष्ण द्वैपायन द्वारा निर्मित पुराण उपलब्ध हैं, किन्तु इसके
पहले भी ब्रह्मा जी द्वारा प्रोक्त पुराण थे। उनकी चर्चा वेदों और वाल्मीकीय
रामायण में है।
( ४८ )
अतः सभी वेद और वेदानुसारी आर्ष धर्मग्रन्थ भगवद्रूप ही हैं—
‘काव्यालापाश्च ये केचित् गीतकान्यखिलानि च ।
शब्दमूर्तिधरस्यैतद्वपुर्विष्णोर्महात्मनः ॥
( वि० पु० १।२२।८४ )
वे सभी सृष्टि के आरम्भ से ही प्रवृत्त हैं । पाश्चात्यों द्वारा उठाई गयी
प्रक्रिया अधकचरी है । उस प्रक्रिया से तत्त्व निर्णय नहीं हो सकता ।
महाभारत युद्ध
महाभारत युद्ध कब प्रारम्भ हुआ और कब उसका अन्त हुआ ? भीष्म-
पितामह कितने दिनों तक शरशय्या पर आसीन रहे ? अभिप्राय यह कि उनका
निर्वाण संग्राम की समाप्ति और शरशय्या की प्राप्ति के कितने दिन बाद हुआ,
ये सब विचारणीय प्रश्न हैं ।
महाभारत और उसके रचनाकाल के सम्बन्ध में आधुनिक विचारकों ने
बड़े ही समारोह के साथ विचार प्रारम्भ किया है । उनकी प्रामाणिकता पर
महाभारत के सर्वथा अनुरूप विचार अपेक्षित है ।
यह स्मरण रखना आवश्यक है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने धर्मभूमि-कुरुक्षेत्र
में युद्धारम्भ से पूर्व विषादग्रस्त अर्जुन को जो उपदेश दिया, वह श्रीमद्भगद्-
गीता नाम से महाभारत में प्रसिद्ध है । अतः महाभारत युद्ध के आरम्भ की
और गीता-जयन्ती की तिथि एक ही होनी चाहिये ।
श्रीमहाभारतकार ने ‘महाभारत युद्ध के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य-
काल में’ कलि का प्रवेश माना है—
ना धर्म्यम भवत् तत्र सर्वो धर्मरुचिर्जनः ।
बभूव नरशार्दूल यथा कृतयुगे तथा ॥
कलिमासन्नमाविष्टं निर्वास्य नृपनन्दनः ।
भ्रातृभिः सहितो धीमान् बभौ धर्मबलोद्धतः ॥
( अश्वमेध० ९४।१९-२० )
( ४९ )
"धर्मराज युधिष्ठिर के राज्य में कहीं कोई अधर्मयुक्त कार्य नहीं होता
था। सब लोग धर्मविषयक रुचि रखते थे। पुरुष सिंह ! जैसे सत्ययुग में
समस्त प्रजा धर्मपरायण रहती थी, उसी प्रकार उस समय द्वापर में भी हो
गयी थी।"
"कलियुग को समीप आया देख बुद्धिमान नृपनन्दन युधिष्ठिर उसका
निर्वासन कर भाइयों के साथ धर्मबल से अजेय होकर शोभा पाने लगे।"
भीमसेन द्वारा अनीति पूर्वक आघात से दुर्योधन के पराजित होने पर
क्रुद्ध श्रीबलराम को समझाते हुए 'प्राप्तं कलियुगं विद्धि प्रतिज्ञां पाण्डवस्य
च।' (शल्य० ६०।२५) श्रीकृष्ण भगवान् के इस वचन से युद्धकाल में
कलियुग के प्रवेश का प्रभाव विदित होता है। साथ ही—
अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् ।
समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥
( महा० आदि० २।१३ )
इन श्लोकों के अनुशीलन से महाभारत युद्ध के वर्ष का संकेत प्राप्त है।
युद्धारम्भ और युद्धान्त के संदर्भ में सप्ताह के सात दिनों में किसी भी
दिन का उल्लेख महाभारत में नहीं है, अतः दिन की दृष्टि से विचार
असम्भव है।
'शरदन्ते हिमागमे' ( उद्योग० ८३।६, ७), 'निवृत्तमात्रे त्वयन
उत्तरे वै दिवाकरे।' ( शान्ति० ४७।३ ), 'विनिवृत्ते दिनकुरे प्रवृत्ते चोत्त्-
रायणे।' ( अनुशासन० १६६।१४ ) ।
इन स्थलों में हेमन्त एवं दक्षिणायन का उल्लेख स्पष्ट ही 'अयन' को
सिद्ध करता है।
युद्ध के सन्दर्भ में शरद् का अन्त, हेमन्त का प्रारम्भ, कौमुद (कार्तिक)
मास का उल्लेख निश्चय ही उपयोगी है।
४
'पौर्णमासीं च कार्तिकीम्' (भीष्म० ग२३), 'कृष्ण चतुर्दशीम्' (भीष्म
पर्व ३।३३), 'अमावास्यां त्रयोदशीम् (भीष्म० ३।३२) 'सप्तमाच्चापि
दिवसाद्मावास्या भविष्यति' (उद्योग० १४२।१८) 'त्रिभाग शेषः पक्षोऽयं
शुक्लो भवितुमर्हति' (अनुशासन० १६७।२८) में कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष का
स्पष्ट उल्लेख पक्ष निर्णय में उपयोगी है। इन्हीं वचनों से तिथि का भी
निर्देश प्राप्त होता है। रेवती, ऐन्द्र (ज्येष्ठा), श्रवण, पुष्य, अनुराधा नक्षत्र
के उल्लेख भी तिथि निर्णय के साथ ही तिथि निर्णय में भी उपयोगी हैं।
'सप्तमाच्चापि दिवसात्' (उद्योग० १४२।१८), 'चत्वारिंशदहान्यद्य
द्वे च' (शल्यपर्व ३४।६), 'अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः' (अनुशासन० १६७।२७),
'अष्टादशाभवत्' (आदि० २।३८१) आदि वचन दिन संख्या के द्योतक हैं।
इस तरह महाभारत युद्धकाल का निर्णय करते समय वर्ष, अयन, मास,
पक्ष, तिथि, नक्षत्र और दिन संख्या की दृष्टि से विचार कर्तव्य है।
पृष्ठभूमि
भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के दूत और नायक होकर हेमन्त ऋतु के
शुभागमन पर कौमुद मास (कार्तिक) रेवती नक्षत्र में उपप्लव्य नगर से
हस्तिनापुर के लिये प्रस्थान किया—
ततो व्यपेततमसि सूर्ये विमलवोद्गते ।
मैत्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते मृदर्चिषिदिवाकरे ॥
कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे ।
स्फीतसस्य सुखे काले कल्पः सत्त्ववतां वरः ॥
(महा० उद्योग० ८३।६,७)
"उसके बाद जब रात्रि का अन्धकार दूर हुआ और निर्मल आकाश में
सूर्यदेव का उदय होने पर उनकी कोमल किरणें सब ओर फैल गयीं, कार्तिक
मास के रेवती नक्षत्र में मैत्र नामक मुहूर्त उपस्थित होने पर सत्त्वगुणी
पुरुषों में श्रेष्ठ एवं समर्थ श्रीकृष्ण ने यात्रा प्रारम्भ की। उन दिनों शरद ऋतु
( ५१ )
का अन्त और हेमन्त का आरम्भ हो रहा था। सब ओर पर्याप्त उपजी हुई
खेती लहलहा रही थी।'"
यद्यपि उपप्लव्य से चलकर रात्रि विश्राम वृकस्थल में वर्णित है (उद्योग
पर्व ८४।१५-२३)। वृकस्थल उन पाँच गाँवों में एक था, जिनके मिल
जाने पर पाण्डव बिना युद्ध के भी सन्तुष्ट हो सकते थे—
अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दीं वारणावतम्।
अवसानं भवेत्तत्र किञ्चिदेकं च पञ्चमम्॥
(उद्योग० ३१।१९)
पुनः रात्रि बीतने पर हस्तिनापुर पहुँचने का उल्लेख है (उद्योग० ८५।
१६-१८; ८६।१), फिर विदुर जी के घर में रात्रि विश्राम का वर्णन है
(उद्योग० ९१।४१)। तत्पश्चात् प्रातः से सायं तक कौरव-सभा में असफल
शान्तिवार्ता का निरूपण है। उसी दिन श्रीकुन्तीदेवी से पाण्डवों के लिये
युद्ध की आज्ञा प्राप्त कर तथा कर्ण को एकान्त में कौन्तेय बताकर
उनसे पाण्डव पक्ष में सम्मिलित होने के अनुरोध का वर्णन है। अन्त
में कर्ण के अस्वीकार करने पर भीष्म, द्रोण, शल्य एवं दुर्योधन के प्रति
युद्धारम्भ सम्बन्धी सन्देश की घोषणा है—
सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भविष्यति।
संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्॥
(उद्योग० १४२।१८)
“आज से सातवें दिन अमावास्या होगी। उसके देवता इन्द्र कहे गये हैं।
इसी में युद्ध प्रारम्भ किया जाय।”
तत्पश्चात् उपप्लव्य आकर पाण्डवों और समुपस्थित राजाओं को सन्देश
सुनाकर रात्रि विश्राम का वर्णन है।
इस तरह उपप्लव्य से चलकर पुनः उपप्लव्य लौट आने तक तीन दिनों
ही विवरण प्राप्त होने पर भी पाण्डवों से भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कथित
( ५२ )
'प्रयाध्वं वै कुरुक्षेत्रं पुष्योद्येति पुनः पुनः' ( उद्योग० १५०।३ ) इस दुर्योधन
वाक्य से यह सिद्ध होता है कि रेवती से पुष्य नक्षत्र तक शान्तिवार्ता के
सन्दर्भ में भगवान् श्रीकृष्ण के व्यतीत हुए । दुर्योधन की सेना ने असफल
शान्तिवार्ता के दिन ही कुरुक्षेत्र के लिए प्रस्थान किया । साथ ही रात्रि विश्राम
के अनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण के निम्नलिखित वचन से यह सिद्ध होता है
कि दूसरे दिन भी पुष्य नक्षत्र का योग था—
न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालनोदिताः ।
निर्गच्छध्वं पाण्डवेयाः पुष्येण सहिता मया ॥
( शल्य० ३५।१० )
अस्तु ! पाण्डव सेना ने भी 'पुष्य' में ही कुरुक्षेत्र के लिए प्रस्थान किया ।
इस तरह 'रेवती हस्तिनापुर के लिये प्रस्थान नक्षत्र' और 'पुष्य सैन्य-
निर्याण दिवस' सिद्ध होता है ।
श्री भगवान् के 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्मावास्या भविष्यति, ...... तामाहुः
शक्रदेवताम्' इस सन्देश से इस तथ्य का प्रकाश होता है कि इन्द्र देवता
सम्बन्धी ज्येष्ठा नक्षत्र में मार्गशीर्ष की अमावास्या थी । अतः उससे पूर्व श्री
कृष्ण का हस्तिनापुर प्रस्थान के दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी या द्वादशी
और सैन्य निर्याण के दिन पञ्चमी तिथि सिद्ध होती है । यद्यपि 'इन्द्रस्य
चित्रा' ( तैत्तरीय ब्राह्मण १।५।१ ) इस श्रुति के अनुसार गौणीवृत्ति से चित्रा
ऐन्द्र नक्षत्र है और ज्योतिषशास्त्र की प्रसिद्धि के अनुसार कृत्तिका के अग्नि और
ज्येष्ठा के इन्द्र स्वतन्त्र देवता हैं । परन्तु तिथि के अनुगुण आद्योपान्त नक्षत्रोप-
लब्धि को देखते हुए प्रसंगानुसार इन्द्र ज्येष्ठा के अधिपति रूप में ग्राह्य हैं । स्वयं
श्री वेदव्यास को भी इस सन्दर्भ में यही मत मान्य है—
श्वेतो ग्रहः प्रज्वलितः सधूम इव पावकः ।
ऐन्द्रं तेजस्वि नक्षत्रं ज्येष्ठामाक्रम्य तिष्ठति ॥
( भीष्मपर्व ३।१६ )
( ५३ )
“केतु नामक उपग्रह धूमयुक्त अग्नि के समान प्रज्वलित हो, इन्द्र देवता
सम्बन्धी तेजस्वि-ज्येष्ठा नक्षत्र पर जाकर स्थित है।”
अब क्योंकि पुष्य के बाद दश में स्थान पर ज्येष्ठा है। इसलिए पञ्चमी से
अमावास्या तक दो नक्षत्र एवं दो तिथियों का क्षय असम्भव परिलक्षित होता
है। अतः 'सप्तमाच्चापि' का अभिप्राय 'आज के सातवें दिन' की अपेक्षा
'सप्ताह बाद' ( दशवें दिन ) ग्राह्य है।
यद्यपि 'इन्द्रस्यचित्रा' इस वचन में त्वष्टा ही परमैश्वर्य सम्पन्न होने के
कारण इन्द्र कहे गये हैं, जैसा कि श्रीमत्सायणाचार्य विरचित माधवीय वेदार्थ
प्रकाश के अनुशीलन से सिद्ध है—
पूर्वं चित्रा नक्षत्रस्वामी योऽमिन्द्र उक्तः सोऽयं त्वष्टा परमैश्वर्ययोगादिन्द्र
उच्यते । अन्यत्र 'त्वष्टा नक्षत्रमभ्येति चित्राम्' इति मन्त्राम्नानात् ।
तथापि अमावास्या में चित्रा मानने पर भी आगे श्रवण में युद्धान्त सिद्ध
करने के लिए मार्गशीर्ष शुक्ल में पूर्णिमा से पूर्व एक तिथि की वृद्धि, पूर्णिमा से
युद्धारम्भ तथा तथा पौष शुक्ल द्वितीया को युद्धान्त मानना होगा। इस दृष्टि से
यद्यपि पुष्य से श्रवणोत्तर श्रवण तक श्रीबलदेवजी के बयालीस दिन हो जायेंगे,
परन्तु चौदहवें दिन का रात्रियुद्ध पौषकृष्ण त्रयोदशी को सिद्ध होगा। अतः
उत्तररात्रि में तीन या चार मुहूर्त रात्रि शेष रहने पर चन्द्रोदय का वर्णन
बाधित-सा होगा।
यद्यपि श्रीवेदव्यासजी के निम्नलिखित वचनों से यह सिद्ध होता है कि दो
तिथियों का क्षय होने के कारण कृष्णपक्ष तेरह दिनों का था—
चतुर्दशीं पञ्चदशीं भूतपूर्वां च षोडशीम् ।
इमां तु नाभिजानेऽहममावास्यां त्रयोदशीम् ।
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् ॥
( भीष्मपर्व ३।२ )
“एक तिथि का क्षय होने पर चौदहवें दिन, तिथिक्षय न होने पर पन्द्रहवें
दिन और एक तिथि की वृद्धि होने पर सोलहवें दिन अमावास्या होना तो पहले
( ५४ )
देखा गया है, परन्तु इस पक्ष में तेरहवें दिन यह अमावास्या आ गई है, ऐसा
पहले भी कभी हुआ है, इसका मुझे स्मरण नहीं है । इस एक ही मास में तेरहवें
दिन चन्द्र और सूर्य दोनों ग्रस्त हुए ।।"
भगवान् श्रीकृष्ण के बचन से भी यही सिद्ध होता है—
एवं पश्यन् हृषीकेशः सम्प्राप्तं कालपर्ययम् ।
त्रयोदश्याममावास्यां तान् दृष्ट्वा प्राब्रवीदिदम् ।।
चतुर्दशी पञ्चदशी कृतेयं राहुणा पुनः ।
प्राप्ते वै भारते युद्धे प्राप्ता चाद्य क्षयाय नः ।।
( महा० मौसल० २।१८, १९ )
"इस तरह काल का उलट-फेर प्राप्त हुआ देख और तेरहवें दिन अमावास्या
का संयोग जान् भगवान् श्रीकृष्ण ने सब लोगों से कहा--वीरो ! इस समय राहु
ने फिर चतुर्दशी को ही अमावास्या बना दिया है । महाभारत युद्ध के समय
जैसा योग था, वैसा ही आज भी है । यह सब हम लोगों के विनाश का
सूचक है ।।"
परन्तु प्रश्न उठता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष त्रयोदश दिनों का था या
पौष कृष्ण ?
अलक्ष्यः प्रभयाहीनः पौर्णमासीं च कार्तिकीम् ।
चन्द्रोभूदग्नि वर्णश्च पद्मवर्णं नभस्तले ।।
( भीष्मपर्व २।२३ )
मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्ण चतुर्दशीम् ।।
( भीष्मपर्व ३।३३ )
उक्त स्थल में कार्तिकी पूर्णिमा के पश्चात् कृष्ण चतुर्दशी का उल्लेख है,
साथ ही उसके लिए 'आसीत्' शब्द का प्रयोग है; अतः मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की
चतुर्दशी का ही संकेत प्राप्त श्लोक में हुआ है, ऐसा सभी मानते हैं । अब
क्योंकि श्रीकृष्ण वचन से यह सिद्ध है कि चतुर्दशी को राहु ने पञ्चदशी
( ५५ )
(अमावास्या) बना दिया और 'इमां तु नाभिजानेहममावास्यां त्रयोदशीम् ।
(भीष्म पर्व ३।३२)' यह व्यास वचन भी है, अतः कृष्ण चतुर्दशी का अभिप्राय -
अमावास्या ही ग्राह्य है ।
चन्द्रादित्यावुभौ ग्रस्तावेकाह्ना हि त्रयोदशीम् ।
अपर्वणि ग्रहं यातौ प्रजा संक्षयमिच्छतः ॥
( भीष्म ३।२८ )
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् ।
( भीष्म ३।३२ )
इस व्यास वचन के सूक्ष्म अनुशीलन से एक ही मास में चन्द्रग्रहण के बाद
तेरहवें दिन सूर्यग्रहण सिद्ध होता है । ऐसा मानने में ही 'एकमासीं त्रयोदशीं'
की सार्थकता है । अतः 'अलक्ष्यः प्रभयाहीनः पौर्णमासीं च कार्तिकीम्' से चन्द्र-
ग्रहण का और 'मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्णचतुर्दशीम्' से सूर्यग्रहण का संकेत
प्राप्त होता है । मार्गशीर्ष की पूर्णिमा और पौषकृष्ण अमावास्या या चतुर्दशी
का उल्लेख न होने के कारण भी मार्गशीर्ष कृष्ण ही तेरह दिनों का पक्ष सिद्ध
होता है ।
यदैकमासे ग्रहणं जायते शशिसूर्ययोः ।
शस्त्रकोपैः क्षयं यान्ति तदा भूपाः परस्परम् ॥
( शीघ्रबोध ४।१६१ )
'जो सूर्य चन्द्र का एक मास में ग्रहण हो तो राजा आपस में शस्त्र द्वारा
नाश को प्राप्त हों ।।'
एक पक्षे यदा यान्ति तिथयश्च त्रयोदश ।
त्रयस्तत्र क्षयं यान्ति वाजिनो मनुजा गजाः ॥
( शीघ्रबोध ४।१७६ )
'जो एक पक्ष में तेरह तिथियां हों तो हाथी, घोड़े और मनुष्य तीनों का
नाश हो ।'
भारतसावित्री और श्री नीलकण्ठाचार्य के मत का अनुशीलन करने पर
भी इसी तथ्य का प्रकाश होता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण तेरह दिनों का
पक्ष था ।
सप्तमाच्चापि दिवसादमावास्या भविष्यति ।
संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम् ॥
( उद्योग० १४२।१८ )
युद्धारम्भ के सम्बन्ध में जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण का उक्त वचन मान्य है,
वहाँ युद्धान्त के सम्बन्ध में श्रीबलराम जी का निम्नलिखित वचन प्रमाण है—
चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृतस्य वै ।
पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः ॥
शिष्ययोर्वै गदा युद्धं द्रष्टु कामोऽस्मि माधव ।
( शल्यपर्व ३४।६-६३ )
“आप लोगों से मिलकर तीर्थयात्रा के उद्देश्य से चले हुए आज मुझे
बयालीस दिन हो गये । पुष्य नक्षत्र में चला था और श्रवण में पुनः वापस
आया हूँ ।। माधव ! मैं अपने दोनों शिष्यों का गदा युद्ध देखना चाहता हूँ ।''
सैन्य निर्याण के दिन श्री बलराम जी भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डवों से
मिलकर तीर्थयात्रा के उद्देश्य से उपप्लव्य से चलकर सरस्वती के तट पर
रुक गये । उन्होंने द्वारका से यात्रा के उपयुक्त ब्राह्मण, अग्नि और अन्य
सामग्रियों को मंगवाकर अनुराधा नक्षत्र में तीर्थयात्रा प्रारम्भ की—
युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् ।
रौहिणेये गते शूरे पुष्येण मधुसूदनः ॥
( शल्यपर्व० ३५।१५ )
“सात्यकि सहित भगवान् श्रीकृष्ण ने पाण्डवों का पक्ष लिया । रोहिणी-
नन्दन शूरवीर श्रीबलरामजी के चले जाने पर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण ने
पाण्डवों को आगे करके पुष्य नक्षत्र में कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान किया ।''
( ५७ )
ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः ।
तीर्थयात्रां हलधरः सरस्वत्यां महायशाः ॥
मैत्रे नक्षत्र योगे स्म सहितः सर्व यादवैः ।
आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिन्दमः ॥
( शल्यपर्व० अ० ३६।१४-१५ )
श्रीबलदेव जी गदायुद्ध के समय श्रवण नक्षत्र में देवर्षि नारद से प्रेरित
होकर आये । इस तरह पुष्य से श्रवणोत्तर श्रवण नक्षत्र तक उनके बयालीस
दिन हो गये ।
अतः युद्धारम्भ के सम्बन्ध में भगवान् श्रीकृष्ण का और युद्धान्त के सम्बन्ध
में श्रीबलराम जी का वचन प्रमाण मानकर विचार होना चाहिये अथवा
किन्हीं एक के ही वचन को प्रमाण मानकर विचार होना चाहिये, यह
मुख्य प्रश्न है ।
गदायुद्ध ही अन्तिम युद्ध था । उसी दिन सौप्तिक संहार भी हुआ । यह
सर्वमान्य सिद्धान्त है । अतः युद्धान्त में श्रीबलदेव वचन अकाट्य प्रमाण है ।
'पुष्य से चलकर आज श्रवण में आया हूँ । आज बयालीस दिन हो रहे हैं। मैं
दोनों शिष्यों का गदायुद्ध देखना चाहता हूँ।' यह वचन व्यावहारिक स्थिति
का ज्यों-का-त्यों अनुवाद है । अत गौणार्थक कदापि नहीं हो सकता । प्रसङ्गा-
नुसार उसी दिन गदायुद्ध और सौप्तिक संहार सिद्ध भी है । अतः युद्धान्त में
श्रीबलदेव वचन प्रमाण है । इसका कोई बाधक वचन भी नहीं है ।
अठारह दिन
अब विचारणीय विषय यह है कि ज्येष्ठा से श्रवणोत्तर श्रवण बत्तीसवें स्थान
पर है । 'अठारह दिनों तक युद्ध हुआ' महाभारत में एवं भारत-सावित्री में
आद्योपान्त ऐसा ही उल्लेख है, लोक-प्रसिद्धि भी ऐसी ही है । अब यदि श्रवण
को युद्धान्त और लगातार अठारह दिनों तक युद्ध मानकर विचार करें तो
मृगशिरा से युद्धारम्भ सिद्ध होता है । श्रीनीलकण्ठाचार्य के अनुसार मार्गशीर्ष-
शुक्ल चतुर्दशी मृगशिरा से पौषशुक्ल प्रतिपदा श्रवण तक युद्धकाल निश्चित
होता है ।
( ५८ )
परन्तु ऐसा मानने पर 'सप्तमाच्चापि दिवसाद्अमावास्या भविष्यति । संग्रामो
युज्यतां तस्यां............' ( उद्योग० १४२।१८ ) भगवान् श्रीकृष्ण का यह वचन
अत्यन्त गौण सिद्ध होता है । क्योंकि मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा म मार्गशीर्ष
शुक्ल चतुर्दशी 'मृगशिरा' पन्द्रहवें स्थान पर है । पुष्य नक्षत्र में चली हुई सेना
ज्येष्ठा में कुरुक्षेत्र पहुँची, ऐसा भी नहीं कह सकते । करोड़ों की संख्या में
उपस्थित उभय पक्ष के सैनिक लगभग तीन सप्ताह में शिविरादि का निर्माण और
युद्धभूमि का परिष्कार कर पाये, ऐसा भी नहीं कह सकते । साथ ही ज्येष्ठा से
श्रवण तक बत्तीस दिनों में ही एक-एक दिन अवकाश देकर युद्ध हुआ, यह भी
संभव नहीं । 'संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्रदेवताम्' इस श्रीकृष्ण वचन के
रहते हुए मृगशिरा से रोहिणी तक युद्ध के अनारम्भ का प्रामाणिक हेतु प्रकाश
में लाना चाहिये । अथवा अवकाश और अनवकाश-युक्त युद्ध की कोई प्रामाणिक
रूपरेखा का अनुसन्धान करना चाहिये ।
श्रीभीष्मपितामह के नेतृत्व में दश दिनों तक, द्रोणाचार्य के नेतृत्व में पाँच
दिनों तक, कर्ण के नेतृत्व में दो दिनों तक तथा शल्य के नेतृत्व में आधा दिन
युद्ध हुआ । उसके बाद भीमसेन और दुर्योधन का गदायुद्ध हुआ । फिर सौप्तिक
संहार हुआ । इस तरह अठारह दिन तक युद्ध हुआ अथवा अठारह दिनों में
महाभारत युद्ध पूर्ण हुआ ।
परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रमनीकहा ।
जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
( भीष्मपर्व १३।११ )
युद्धं कृत्वा दिनान् पञ्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् ।
ब्रह्मलोकं गतो राजन् ब्राह्मणो वेदपारगः ॥
( द्रोणपर्व २०१।१०० )
युद्धं कृत्वा महद्घोरं पञ्चाहानि महाबलः ।
ब्राह्मणो निहतो राजन् ब्रह्मलोकमवाप्तवान् ॥
( द्रोण० २०२।१५५ )
ततः पार्थं समासाद्य पतङ्ग इव पावकम् ।
पञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्वितीयेऽहनि दारुणः ॥
( आश्वमेधिक० ६०।२१ )
अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
तस्मिंस्तदार्द्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
( आश्वमेधिक० ६०।२४ )
अथापराह्ने तस्याह्नः परिवार्य सुयोधनः ।
ह्रदादाहूय युद्धाय भीमसेनेन पातितः ॥
( शल्यपर्व १।१२ )
भारत सावित्री ने भी इसी तथ्य का प्रकाश किया है--
दिनानि दश भीष्मेण भारद्वाजेन पञ्च च ।
दिनद्वये तु कर्णेन शल्येनार्धं दिनं तथा ॥
दिनार्धं तु गदायुद्धमेतद्भारतमुच्यते ।
एवमष्टादशं हन्ति अक्षौहिण्यो दिन क्रमात् ॥
( भारत सावित्री ७९-८० )
'अठारह अक्षौहिणी सेना और अठारह दिनों तक युद्ध' महाभारत की यह
प्रसिद्धि महाभारत में ही एक श्लोक में सन्निहित है--
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया ।
तन्महादारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ॥
( आदिपर्व २।३८१ )
अवकाश-सहित
श्रवण युद्धान्त अथवा लगातार अठारह दिनों तक युद्धवाली गणनाओं की
समीक्षा करने से पूर्व अवकाश के औचित्य और अनौचित्य का निर्णय परमा-
वश्यक है ।
मूल के अनुशीलन से यह सिद्ध है कि श्री द्रोणाचार्य के नेतृत्व से लेकर
दुर्योधन वध तक लगातार युद्ध हुआ । द्रोणाचार्य ने अभिमन्यु वध-तक प्रतिज्ञा
( ६० )
पूर्वक युद्ध किया । अभिमन्यु वध से क्रुद्ध अर्जुन ने जयद्रथ वध की अमोघ
प्रतिज्ञा की । जयद्रथ के पश्चात् क्रुद्ध दुर्योधन ने रात्रियुद्ध की घोषणा की ।
उसी रात्रियुद्ध में घटोत्कच के वध से शोकार्त धर्मराज युधिष्ठिर जब कर्ण से
युद्ध करने का निश्चय कर जीवन को संकट में डालकर आगे बढ़ रहे थे, तब
श्री व्यासदेव ने उन्हें ऐसा करने से रोका और दिव्यदर्शिता के अमोघ
प्रभाव से आँशीर्वाद देते हुए कहा—
भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पार्थिवैश्च महात्मभिः ।
कौरवान् समरे राजन् प्रतियुद्ध्यस्व भारत ॥
पञ्चमे दिवसे तात पृथिवी ते भविष्यति ।
( द्रोणपर्व १८३।६४, ६५ )
“भरतवंशी नरेश ! तुम अपने समस्त भाइयों तथा महामना भूपालों
के साथ जाकर समरभूमि में कौरवों का सामना करो । तात ! आज के पाँचवें
दिन सारी पृथिवी तुम्हारी हो जायगी ।”
श्रीवेदव्यासजी का उक्त वचन तभी सार्थक हो सकता है जब उसके बाद
युद्ध लगातार संभव हो ।
तमिस्रा रात्रि के घोर अन्धकार को देखकर तथा प्रचण्ड युद्ध में उभय
पक्ष को श्रमित और निद्रित देखकर प्राज्ञ पार्थ ने रात्रियुद्ध को कुछ समय
के लिये विश्राम दिया । सबों ने युद्धभूमि में ही विश्राम किया । उत्तररात्रि
में चन्द्रोदय के प्रकाश में पुनः युद्धारम्भ हुआ । बस, द्रोणाचार्य के नेतृत्व का
अन्तिम दिन आ गया—
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता ।
तस्य चाह्णस्त्रिभागेन क्षयं जग्मुः पतत्रिणः ॥
( द्रोणपर्व १९१।९ )
“उनके निरंतर बाण चलाते चार दिन और एक रात का समय बीत
चुका था । उस दिन के ( पन्द्रह भागों में ) तीन ही भाग में उनके सभी
बाण समाप्त हो गये ।”
( ६१ )
उक्त वचन से तो स्पष्ट ही है कि श्री द्रोणाचार्य के नेतृत्व में अवकाश
की बात कौन कहे, एक रात्रि-युद्ध भी हुआ । जो अवकाशयुक्त युद्ध मानते
हैं, उन्हें भी चौदहवें और पन्द्रहवें दिन का युद्ध लगातार मानना पड़ता है ।
अब रही भीष्माचार्य के नेतृत्व में एक-एक दिन अवकाश की बात !
पितामह के नेतृत्व काल में सायंकाल चौथे दिन के अवहार के समय उनका
वचन है—
तन्न मे रोचते युद्धं पाण्डवैर्जितकारिभिः ।
घुष्यतामवहारोऽद्य श्वो योत्स्यामः परैः सह ॥
( भीष्मपर्व ६४।७० )
“अतः विजय से सुशोभित होने वाले पाण्डवों के साथ इस समय युद्ध
करना मुझे नहीं रुचता । आज युद्धविराम घोषित कर दिया जाय, कल
सबेरे हम विपक्षियों से युद्ध करेंगे ।”
साथ ही अवहार के बाद रात्रि बीतने पर पुनः नित्य ही युद्धारम्भ का
वर्णन भी भीष्माचार्य के नेतृत्व में अवकाशयुक्त युद्ध को अप्रामाणिक सिद्ध
करता है ।
भीष्म पतन के बाद अवकाशयुक्त युद्ध इसलिये भी असम्भव है, क्योंकि
ऐसा मानने पर शेष आठ दिन का युद्ध पितामह के शरशय्या के पन्द्रह दिन
सिद्ध करेगा ।
फिर भी विचारकों के सम्मुख यह गम्भीर प्रश्न उपस्थित होता है कि
मार्गशीर्ष अमावास्या ज्येष्ठा से मार्गशीर्ष शुक्ल त्रयोदशी रोहिणी तक युद्ध को
अनारम्भ रखना भी अनुमान सिद्ध ही है । इस अनुमान में लगातार अठारह
दिनों तक युद्ध और श्रवण में युद्धान्तरूप वचन प्रमाण है । इसी तरह यह भी
कहा जा सकता है कि जैसे युद्धान्त में श्रीबलदेव वचन प्रमाण है, वैसे ही
युद्धारम्भ में श्रीकृष्ण वचन प्रमाण है । न तो श्रीकृष्ण वचन के कारण
बलदेव वाक्य बाधित होने योग्य है और न बलदेव वचन के कारण श्रीकृष्ण
वचन ही बाधित होने योग्य है । साथ ही एक-एक दिन अवकाशयुक्त युद्ध
भी असम्भव है । इधर द्रोणाचार्य के नेतृत्व से लेकर युद्धान्त तक प्रतिज्ञा-
( ६२ )
बद्ध है दैनिक युद्ध का उल्लेख है, अतः इस अवधि में भी अवकाशयुक्त
युद्ध की धारणा असिद्ध है। अस्तु ! श्रीभीष्माचार्य के नेतृत्व में लगातार युद्ध
की सामान्य सिद्धि, श्रीकृष्ण भगवान् के विशेष वचन के बल पर बाधित
होने के योग्य माना जा सकता है। क्योंकि जैसे श्रीकृष्ण भगवान् के उपप्लव्य
से हस्तिनापुर प्रस्थान और पुनः हस्तिनापुर से उपप्लव्य आने तक केवल
तीन दिनों का विवरण प्राप्त है, परन्तु वह सामान्य विवरण प्रयाध्वं वै कुरु-
क्षेत्रं पुष्योद्येति पुनः पुनः' इस श्रीकृष्ण मुख निर्गत दुर्योधन वाक्य से बाधित
हो जाता है, वैसे ही भीष्माचार्य के नेतृत्व में दैनिक युद्ध सम्बन्धी सामान्य
वचन श्रीकृष्ण वचन से बाधित होकर उसका अभिप्राय 'आगामी युद्ध काल
अर्थात् एक दिन अवकाश के बाद' ग्राह्य है।
परन्तु ऐसा मानने पर भी मार्गशीर्ष अमावस्या ज्येष्ठा में युद्धारम्भ नहीं
सिद्ध होता। कदाचित् इस दिन सैन्य शिक्षण और युद्धधर्म मर्यादा निर्धारण
मानें तो भी मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा को युद्धारम्भ नहीं सिद्ध होता, क्योंकि
ऐसा मानने पर मार्गशीर्ष पूर्णिमा आर्द्रा में आठवें दिन का युद्ध सिद्ध होगा।
महाभारत के अनुसार उस दिन प्रदोष काल में अन्धकार होना चाहिये—
रजनी मुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये।
अवहारं ततः कृत्वा सहिताः कुरुपाण्डवाः॥
न्यविशन्ति यथाकालं गत्वा स्वशिविरं तदा ॥
(महा० भीष्म० ९६।८०)
‘फिर महाभयानक तथा अत्यन्त रौद्र रूप वाले प्रदोष काल में कौरव तथा
पाण्डव एक साथ अपनी सेनाओं को लौटाकर यथासमय शिविर में जा पहुँचे
और विश्राम करने लगे ॥'
साथ ही मार्गशीर्ष शुक्ल द्वितीया पूर्वाषाढा से युद्धारम्भ मानने पर यद्यपि
आठवें दिन के युद्ध में पौषकृष्ण द्वितीया प्राप्त होती है, परन्तु उस दिन भी
प्रदोष काल में, 'रजनीमुखे सुरौद्रे तु वर्तमाने महाभये' यह लक्षण आंशिक ही
घटित होता है।
( ६३ )
साथ ही ऐसा मानने पर भी दो तिथियों और नक्षत्र को या तो पौषकृष्ण
को त्रयोदश दिनों का पक्ष मानकर पूर्ण करना होगा अथवा मार्गशीर्ष शुक्ल
चतुर्थी श्रवण से युद्धारम्भ मानकर द्रोणाभिषेक पर्यन्त अवकाश युक्त युद्ध मानना
होगा। मार्गशीर्ष कृष्ण में ही दो तिथियों का क्षय संभव और पौषकृष्ण
में असम्भव सिद्ध होने पर उक्त रीति से श्रवण से श्रवण तक युद्धकाल
मान्य होगा।
परन्तु भीष्म पतन के बाद अवकाश के दिन शरशय्या में सम्मिलित होने
के कारण युद्ध तुल्य सिद्ध होंगे। अतः मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी श्रवण में युद्धधर्म
मर्यादा निर्धारण और शुक्ल पञ्चमी धनिष्ठा में गीता जयन्ती एवं युद्धारम्भ
मानना उपयुक्त है। पौषकृष्ण चतुर्थी में आठवें दिन का युद्ध, पौषकृष्ण अष्टमी
चित्रा में भीष्म पतन और उसके पश्चात् पौषशुक्ल प्रतिपदा श्रवण तक अनवरत
युद्ध उपयुक्त परिलक्षित होता है। इस दृष्टि से पौषकृष्ण द्वादशी में जयद्रथ वध
तथा त्रिभागशेष उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय और युद्धारम्भ एवं पौषशुक्ल प्रतिपदा
में युद्धान्त सिद्ध होता है।
इस पक्ष में मार्गशीर्ष अमावास्या ‘ज्येष्ठा’ में स्वस्तिवाचन आदि माङ्गलिक
कृत्य और सीमा निर्धारण आदि तथा मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा मूल नक्षत्र से
मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया उत्तराषाढ़ा तक सैन्य शिक्षण सिद्ध होता है।
'मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्ण चतुर्दशीम्' ( भीष्म० ३।३३ ) इस व्यास
वचन में आसीत् का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी
( अमावास्या ) के बाद श्री व्यास भगवान् ने धृतराष्ट्र को उद्बोधित करते हुए
संजय को दिव्य-दृष्टि प्रदान किया। पुनः—
ततः पूर्वापरे सैन्ये समीक्ष्य भगवानृषिः ।
सर्ववेदविदां श्रेष्ठो व्यासः सत्यवती सुतः ॥
भविष्यति रणे घोरे भरतानां पितामहः ।
प्रत्यक्षदर्शी भगवान् भूतभव्य भविष्यवित् ॥
वैचित्र वीर्यं राजानं सरहस्यं ब्रवीदिदम् ।
शोचन्तमातं ध्यायन्तं पुत्राणामनयं तदा ॥
( भीष्म २।१-३ )
( ६४ )
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्ता वेकमासीं त्रयोदशीम् ।
अपर्वणि ग्रहेणैतौ प्रजाः संक्षपयिष्यतः ॥
( भीष्म० ३।३३ )
उक्त व्यास वचनों में निर्दिष्ट 'भविष्यति रणे घोरे' तथा 'प्रजा संक्षप-
यिष्यतः' उक्तियों से युद्ध के अनारम्भ की सूचना मिलती है । साथ ही—
पतन्त्युल्काः सनिर्घाताः शक्राशनि समप्रभाः ।
अद्यचैव निशां व्युष्टामनयं समवाप्स्यथ ॥
( भीष्म० ३।३५ )
उक्त वचन से 'रात्रि बीतने पर आज ही' युद्धारम्भ का निर्देश प्राप्त होता
है । इस तथ्य की पुष्टि संजय के निम्नलिखित वचन से भी होती है—
यथा सभगवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।
तथैव सहिताः सर्वे समाजग्मुर्महीक्षितः ॥
( भीष्म० १७।१ )
उक्त अवकाश युक्त गणना के अनुसार 'चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृत-
स्य वै ।' इस बलदेव वाक्यस्थ बयालीस दिनों की सिद्धि इस प्रकार
सम्भव है—
क्योंकि कार्तिकी पूर्णिमा कृत्तिका या रोहिणी में संभव है । अतः उपप्लव्य
से श्रीहरि का हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान कार्तिक शुक्ल द्वादशी को न मानकर
कार्तिक शुक्ल एकादशी रेवती को माना जाय ? इस दृष्टि से कार्तिकी पूर्णिमा
रोहिणी में सिद्ध होगी । अब क्योंकि मार्गशीर्ष कृष्ण में दो तिथियों का क्षय
था, अतः पञ्चमी से पूर्व एक तिथि का क्षय मान कर मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी
पुष्य में भगवान् श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर से उपप्लव्य आगमन सिद्ध होता है ।
पुनः रात्रि विश्राम के अनन्तर पञ्चमी और पुष्य के योग में ही श्रीबलदेवजी का
शुभागमन और प्रस्थान एवं तत्पश्चात् कुरुक्षेत्र के लिए सैन्य निर्याण सिद्ध होता
है । अब क्योंकि इस पक्ष में चतुर्दशी को राहु ने अमावास्या बना दिया था,
अतः पञ्चमी के बाद एक तिथि का क्षय मानकर युद्धान्त पौषशुक्ल प्रतिपदा तक
( ६५ )
इकतालीस दिन होते हैं । अतः मार्गशीर्ष शुक्ल में युद्धारम्भ से पूर्व एक तिथि
की वृद्धि मान लेने पर तिथिक्षय की पूर्ति और श्रीबलदेवजी के अभीष्ट दिनों की
सिद्धि संभव है ।
रही ज्येष्ठा से उत्तराषाढ़ा तक सैन्य शिक्षण की प्रामाणिकता की बात !
भीष्म पर्व के आरम्भ में सैन्य मर्यादा निर्धारण का उल्लेख है । परन्तु उस
अध्याय का नाम पुष्पिकानुसार सैन्यशिक्षण है । अतः इससे अनुमान लगाना
चाहिये कि इन चार दिनों में युद्धक्षेत्र निर्धारण, मंगलाचरण और सैन्य शिक्षणादि
कृत्य सम्पन्न हुए । जैसे यज्ञ का पूर्वरूप भी यज्ञारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य है,
वैसे ही युद्धारम्भ का पूर्वरूप भी युद्धारम्भ के अन्तर्गत ही मान्य ' होना
चाहिये ।
ज्योतिष के अनुसार श्रवण एवं धनिष्ठा ऊर्ध्वमुख नक्षत्र हैं, अतः इनमें
युद्धारम्भ उपयुक्त है—
उत्तरा त्रितयं पुष्यो रोहिण्यार्द्रा श्रुतित्रयम् ।
ऊर्ध्ववक्रोगणो ज्ञेयो नक्षत्राणां मनीषिभिः ॥
प्रासादच्छत्र गेहानि प्राकार ध्वज तोरणम् ।
नानाभिषेकमश्वं च कुर्यादूर्ध्वमुखे गणे ॥
( शीघ्रबोध २।८१-८२ )
'तीनों उत्तरा, पुष्य, रोहिणी, आर्द्रा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिभिषा ये
नक्षत्र पण्डितों को ऊर्ध्वमुख जानना चाहिये । महल, छत्र, घर, परकोटा, ध्वजा
तोरण, अभिषेक और घोड़े आदि की सवारी ऊर्ध्वमुख में उत्तम हैं ॥'
अब विचारणीय विषय यह है कि जैसे मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, त्रयोदशी
या चतुर्दशी में युद्धारम्भ मानने पर 'संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र
देवताम्' यह भगवद् वचन बाधित होता है; वैसे ही मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चमी को
युद्धारम्भ मानने पर भी होता है । अतः भीष्मपितामह के नेतृत्वकाल में अव-
काशयुक्त युद्ध मानने की क्या उपयोगिता है, जबकि 'श्वो योत्स्यामः परैः स'
( भीष्मपर्व ६४।७० ) यह भीष्म वचन भी बाधित ही हो रहा है ?
५
( ६६ )
इसका उत्तर यह है कि जैसे आहुति प्रदान रूप मुख्य यज्ञ नवग्रहादि पूजन
रूप कृत्यों का सहिष्णु होता है, वैसे ही अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग रूप मुख्य युद्ध
चार दिनों का अतिरिक्त व्यवधान सह सकता है। क्योंकि युद्ध-मर्यादा रूप
व्यवधान तो व्यास वचन से ही सिद्ध है। शेष व्यवधान 'सैन्य शिक्षण और
स्वस्तिवाचनादि' संकेतों से अनुमेय है।
अवकाश-दिन से पूर्व यदि कार्यालय का कोई अधिकारी सेवकों से कहे—
“अब आज कार्यालय बन्द कर दो, शेष कार्य 'कल' करूँगा" तो उसके इस
वचन का अभिप्राय जैसे एक दिन बाद समझा जायगा, यदि इसी शैली में
भीष्मजी का उक्त सामान्य वचन मान्य हो तब तो यह संगति उपयुक्त है।
अन्यथा भीष्म प्रतिज्ञा की तरह भीष्म-वचन ही पूर्ण सत्य रहने दिया जाय और
अठारह दिन लगातार युद्ध मान कर श्रीनीलकण्ठाचार्य की शैली में श्रीबलभद्र
वाक्य के सर्वंथा अनुगुण श्रवण नक्षत्र और उसके अनुकूल तिथि से सत्रह दिन
पूर्वं मार्गशीर्ष शुक्ल मृगशिरा नक्षत्र में ही युद्धारम्भ उपयुक्त माना जाय ?
रही 'सप्तमाच्चापिदिवसात्' के अनुसार पुष्य के सातवें दिन ज्येष्ठा नक्षत्र
की बात ? तो पहले की तरह 'ज्येष्ठा' को ऐन्द्र नक्षत्र मानकर तथा मार्गशीर्ष
कृष्ण पञ्चमी से अमावास्या तक एक तिथि एवं उसके अनुगुण एक नक्षत्र का
क्षय मानकर पुष्य से नवें स्थान पर ज्येष्ठा है, अतः 'सप्तमाच्चापि' का 'एक
सप्ताह बाद अर्थात् मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी पुष्य के पश्चात् नवें दिन' ऐसा भावार्थ
ग्रहण करना चाहिये ।
अवकाश-रहित
अब प्रतिदिन लगातार अठारह दिनों तक युद्ध को प्रमाण मानकर मार्ग-
शीर्ष शुक्ल दशमी, द्वादशी या त्रयोदशी तक युद्ध के अनारम्भ की दृष्टि से
विचार प्रारम्भ किया जाता है—
नवीन पञ्चाङ्गों के अनुसार तथा प्रचलित प्रसिद्धि के अनुसार गीता जयन्ती
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को सिद्ध होती है ।
नक्षत्र गणना के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा मृगशिरा या आर्द्रा में संभव है,
अतः शुक्ल एकादशी को अश्विनी और भरणी नक्षत्र होना चाहिये । अश्विनी