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काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 64

( ५३ )
“केतु नामक उपग्रह धूमयुक्त अग्नि के समान प्रज्वलित हो, इन्द्र देवता
सम्बन्धी तेजस्वि-ज्येष्ठा नक्षत्र पर जाकर स्थित है।”
अब क्योंकि पुष्य के बाद दश में स्थान पर ज्येष्ठा है। इसलिए पञ्चमी से
अमावास्या तक दो नक्षत्र एवं दो तिथियों का क्षय असम्भव परिलक्षित होता
है। अतः 'सप्तमाच्चापि' का अभिप्राय 'आज के सातवें दिन' की अपेक्षा
'सप्ताह बाद' ( दशवें दिन ) ग्राह्य है।
यद्यपि 'इन्द्रस्यचित्रा' इस वचन में त्वष्टा ही परमैश्वर्य सम्पन्न होने के
कारण इन्द्र कहे गये हैं, जैसा कि श्रीमत्सायणाचार्य विरचित माधवीय वेदार्थ
प्रकाश के अनुशीलन से सिद्ध है—
पूर्वं चित्रा नक्षत्रस्वामी योऽमिन्द्र उक्तः सोऽयं त्वष्टा परमैश्वर्ययोगादिन्द्र
उच्यते । अन्यत्र 'त्वष्टा नक्षत्रमभ्येति चित्राम्' इति मन्त्राम्नानात् ।
तथापि अमावास्या में चित्रा मानने पर भी आगे श्रवण में युद्धान्त सिद्ध
करने के लिए मार्गशीर्ष शुक्ल में पूर्णिमा से पूर्व एक तिथि की वृद्धि, पूर्णिमा से
युद्धारम्भ तथा तथा पौष शुक्ल द्वितीया को युद्धान्त मानना होगा। इस दृष्टि से
यद्यपि पुष्य से श्रवणोत्तर श्रवण तक श्रीबलदेवजी के बयालीस दिन हो जायेंगे,
परन्तु चौदहवें दिन का रात्रियुद्ध पौषकृष्ण त्रयोदशी को सिद्ध होगा। अतः
उत्तररात्रि में तीन या चार मुहूर्त रात्रि शेष रहने पर चन्द्रोदय का वर्णन
बाधित-सा होगा।
यद्यपि श्रीवेदव्यासजी के निम्नलिखित वचनों से यह सिद्ध होता है कि दो
तिथियों का क्षय होने के कारण कृष्णपक्ष तेरह दिनों का था—
चतुर्दशीं पञ्चदशीं भूतपूर्वां च षोडशीम् ।
इमां तु नाभिजानेऽहममावास्यां त्रयोदशीम् ।
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् ॥
( भीष्मपर्व ३।२ )
“एक तिथि का क्षय होने पर चौदहवें दिन, तिथिक्षय न होने पर पन्द्रहवें
दिन और एक तिथि की वृद्धि होने पर सोलहवें दिन अमावास्या होना तो पहले