काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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(अमावास्या) बना दिया और 'इमां तु नाभिजानेहममावास्यां त्रयोदशीम् ।
(भीष्म पर्व ३।३२)' यह व्यास वचन भी है, अतः कृष्ण चतुर्दशी का अभिप्राय -
अमावास्या ही ग्राह्य है ।
चन्द्रादित्यावुभौ ग्रस्तावेकाह्ना हि त्रयोदशीम् ।
अपर्वणि ग्रहं यातौ प्रजा संक्षयमिच्छतः ॥
( भीष्म ३।२८ )
चन्द्रसूर्यावुभौ ग्रस्तावेकमासीं त्रयोदशीम् ।
( भीष्म ३।३२ )
इस व्यास वचन के सूक्ष्म अनुशीलन से एक ही मास में चन्द्रग्रहण के बाद
तेरहवें दिन सूर्यग्रहण सिद्ध होता है । ऐसा मानने में ही 'एकमासीं त्रयोदशीं'
की सार्थकता है । अतः 'अलक्ष्यः प्रभयाहीनः पौर्णमासीं च कार्तिकीम्' से चन्द्र-
ग्रहण का और 'मांसवर्षं पुनस्तीव्रमासीत् कृष्णचतुर्दशीम्' से सूर्यग्रहण का संकेत
प्राप्त होता है । मार्गशीर्ष की पूर्णिमा और पौषकृष्ण अमावास्या या चतुर्दशी
का उल्लेख न होने के कारण भी मार्गशीर्ष कृष्ण ही तेरह दिनों का पक्ष सिद्ध
होता है ।
यदैकमासे ग्रहणं जायते शशिसूर्ययोः ।
शस्त्रकोपैः क्षयं यान्ति तदा भूपाः परस्परम् ॥
( शीघ्रबोध ४।१६१ )
'जो सूर्य चन्द्र का एक मास में ग्रहण हो तो राजा आपस में शस्त्र द्वारा
नाश को प्राप्त हों ।।'
एक पक्षे यदा यान्ति तिथयश्च त्रयोदश ।
त्रयस्तत्र क्षयं यान्ति वाजिनो मनुजा गजाः ॥
( शीघ्रबोध ४।१७६ )
'जो एक पक्ष में तेरह तिथियां हों तो हाथी, घोड़े और मनुष्य तीनों का
नाश हो ।'