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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

७२ • • हित चौरासी
उक्त पद संख्या छः में इसी प्रकार की रति विपरीत क्रीड़ा का कुशल
सङ्केत प्रतीत होता है।
– ७ –
अवतरण– शरद की रात्रि में शीतल एवं मन्द समीर सौरभ वासित
व्यजन झल रहा है। सुधाकर अपनी सुधा रश्मियों से वृन्दावन का सिञ्चन कर
रहा है। अतीव सुखमय अवसर है। किसी सघन नव पल्लव मण्डित लता
मण्डप में रसिक शेखर युगल किशोर अनिर्वचनीय रस क्रीडा में तल्लीन हैं
और बाहर कुअ रन्ध्रों से लगी रस लोलुप सहचरियाँ युगल किशोर की रसमयी
क्रीड़ा के दर्शन से परम सुख का अनुभव कर रही हैं। इस निभृत निकुअ विहार
रस का वर्णन श्रीहित हरिवंश महाप्रभु इस प्रकार करते हैं–
बिलावल
मूल–आजु निकुंज मंजु में खेलत,
नवल किसोर नवीन किसोरी।
अति अनुपम अनुराग परस्पर,
सुनि अभूत भूतल पर जोरी।।
विद्रुम फटिक विविध निर्मित धर,
नव कर्पूर पराग न थोरी।
कौंमल किसलय सैन सुपेसल,
तापर स्याम निवेसित गोरी।।
मिथुन हास परिहास परायन,
पीक कपोल कमल पर झोरी।
गौर स्याम भुज कलह मनोहर,
नीवी बंधन मोचत डोरी।।
हरि उर मुकुर बिलोकि अपनपौ,
विभ्रम विकल मान जुत भोरी।
चिबुक सुचारु प्रलोइ प्रबोधत,
पिय प्रतिबिंब जनाइ निहोरी।।

हित चौरासी • • ७३
'नेति नेति' बचनामृत सुनि सुनि,
ललितादिक देखतिं दुरि चोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश करत कर धूनन,
प्रनय कोप मालावलि तोरी॥७॥
भावार्थ – सुन्दर निकुंज मंदिर में नवल किशोर स्याम एवं नवल किशोरी
श्रीराधा रस क्रीड़ा संलग्न हैं। दोनों का पारस्परिक अनुराग भी अति अनुपम
है। यह अनोखी जोड़ी भूतल (स्थित श्रीवृन्दावन) में ही सुनी एवं देखी जाती है
निकुंज मंदिर की भूमि दिव्य मूँगा स्फटिक आदि नाना मणियों से खचित है।
उस मणिमय भूमि पर नव कर्पूर की रज बिखर रही है। सुकोमल नव पल्लव
रचित एक शय्या सुशोभित है। उस शय्या पर श्याम सुन्दर ने श्रीप्रियाजी को
आग्रह पूर्वक विराजमान किया है। भाव यह है कि उन्हें निकुञ्जान्तर्गत शय्या में
पौढ़ाया है। हास परिहास परायण युगल किशोर ने परस्पर कपोल–कमल पर
ताम्बुल की पीक अंकित करके रस विस्तार किया है। उस समय गौर–श्याम
का बाहु कलह बड़ा मनोहर प्रतीत होता है। पश्चात् श्यामसुन्दर श्री प्रियाजी के
कटि बन्धन मुक्त करने का सरस प्रयास करते हैं। श्रीराधा प्रियतम के उज्ज्वल
वक्ष में अपनी छवि देखकर विभ्रम से व्याकुल तथा मान–युक्त हो जाती हैं। तब
प्रियतम उनके अत्यन्त सुन्दर चिबुक को सहलाकर अनुनयपूर्ण निवेदन करते
हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यह आपकी सुन्दर छवि का ही प्रतिबिम्ब है। श्रीहित
हरिवंश कहते हैं कि इस प्रेम कलह में श्रीप्रिया के मुख से 'नेति–नेति' वचनामृत
सुनकर ललितादि सहचरी छिपकर चोरी चोरी इस प्रेम कलह का दर्शन कर
रही हैं। श्रीप्रियाजी ने हाथापाई करते हुए प्रणय कोप वश श्रीलालजी के वक्ष
स्थल की मालाएँ तोड़ दीं।
टिप्पणी–(१) मान जुत भोरी–
वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा अद्भुत रूप लावण्य की वह पराकाष्ठा हैं। अपने
नित्य नवीन रूप सौन्दर्य पर स्वयं मुग्ध होकर द्वैतात्मक भ्रम से व्याप्त हो
जाती हैं। अतः प्रियतम के हृदय मुकुर में अपना प्रतिबिम्ब देखकर मानवती हो
गयीं कि जाने किस सुन्दरी ने इन के हृदय पर अधिकार कर लिया और
इन्होंने उसे स्थान दे रखा है।

७४ • • हित चौरासी
इसलिये वे विभ्रम से व्याकुल हो गयीं। इस भ्रम और मान का निवारण
श्रीलालजी ने बड़ी चतुरता से किया। उन्होंने अपने दीन अनुनय से श्रीप्रियाजी
को जँचा दिया कि मेरे हृदय की मणि चौकी में आपका ही प्रतिबिम्ब है; किसी
अन्य सुन्दरी का नहीं।
– ८ –
अवतरण – आज की रात्रि किसी अनिर्वचनीय विलास रस के आस्वादन
में बीती है। युगल किशोर रात भर के अनींदे हैं, प्रभात हुआ जान कर सखि
जन उन्हें शय्या कुञ्ज से मङ्गल कुञ्ज में ले जा रही हैं। सालस प्रिया के पग
डगमगाते जा रहे हैं। प्रभात की इस छबि को देखकर श्रीहित अलि ने श्रीप्रियाजी
से कहा–
बिलावल
मूल– अति ही अरुन तेरे नयन नलिन री।
आलस जुत इतरात रँगमगे,
भये निसि जागर मषिन मलिन री।।
सिथिल पलक में उठति गोलक गति,
बिंधयौ मोंहन मृग सकत चलि न री।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
संभ्रम देत भ्रमरनि अलिन री।।८।।
भावार्थ – अरी सखि ! आज तुम्हारे नयन कमल बड़े अरुणिम हैं। रात्रि
के भर विलास एवं जागरण के चाव से अत्यन्त आलस्य युक्त हो रहे हैं। मिलन
के गौरव से गर्वित, प्रेम रंग से छलक रहे हैं एवं कज्जल रंजित श्यामलता से
शोभित है। सम्मोहन कारी नयनों की थकित पलकों में युग गोलक की मंथर
गति ने मोहन मृग (श्रीश्याम सुन्दर) को वेध सा दिया है वे रस मुग्ध अवस्था
में गति हीन से हो गये हैं।)
श्रीहित हरिवंश कहते हैं–हे मरालवत् सुन्दर गति शीले ! तुम तो एक
ओर भ्रमरों को अपने नेत्रों की सुन्दरता से कमल का संभ्रम उत्पन्न कर रही हो

हित चौरासी • • ७५
तथा दूसरी ओर अपनी सुन्दर मराल गति द्वारा सखियों से रात्रि के रति
विलास के गोपन की चेष्टा करती हुई प्रिय संगम के रहस्य का संशय उत्पन्न
कर रही हो मानो कि तुमने प्रियतम से समागम ही प्राप्त नहीं किया हो।
– ९ –
अवतरण—नाना तरु लताकीर्ण श्रीवृन्दावन के मध्य भाग में अत्यन्त
रमणीय नव निकुञ्ज मन्दिर है। मन्दिर के दिव्य कक्ष में महा महा मणि रत्नों से
खचित उच्च सिंहासन है। सिंहासन अनेक अनेक कोमल और स्वच्छ आस्तरणों
से मण्डित है। यथा योग्य स्थलों पर कनक तारों से जटिल उपवर्हण (तकिये)
रखे हैं। उन उपवर्हणों का सहारा लिये युगल किशोर सिंहासनासीन हैं। चारों
ओर प्रधान प्रधान सखियाँ चँवर, व्यजन, ताम्बूल, परिमल पात्र दर्पण आदि
लिये खड़ी हैं।
युगल किशोर की छबि छटा देखते ही बनती है। सखियों ने उन्हें बहुत
बहुत प्रकार से सजाया है। दिव्य वस्त्र आभूषण अंगों में झलक रहे हैं। ललाट
पटल पर खौर है। काले घुँघराले कुन्तल कहीं तो भ्रमर की तरह मुख कमल
मधु का पान कर रहे हैं; तो कहीं काली, कोमल नागिनियों की भाँति एकत्र
करके बाँध दिये गये हैं। अतुल शोभा है। जिसका वर्णन श्रीहिताचार्य पाद
करते हैं-
सारंग
मूल– बनी श्रीराधा मोहन की जोरी।
इंद्र नील मनि स्याम मनोहर,
सात कुंभ तनु गोरी॥
भाल बिसाल तिलक हरि,
कामिनि चिकुर चंद्र बिच रोरी।
गज नाइक प्रभु चाल, गयंदनि–
गति वृषभानु किसोरी॥

७६ • • हित चौरासी
नील निचोल जुवति, मोहन पट-
पीत अरुन सिर खोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक राधा पति,
सुरत रंग में बोरी॥९॥
भावार्थ-अति अनुपम जोड़ी है श्रीराधा मोहन की। मनोहर श्याम सुन्दर
इन्द्र नील मणि की भाँति हैं। तो वृषभानु किशोरी श्रीराधा काञ्चन तनु हैं। लाल
के विशाल भाल पर तिलक शोभित है, तो कामिनि प्रिया की केश चन्द्रिका के
मध्य (माँग) में रोरी लसित है। मोहन लाल की गति (चाल) मत्त गजराज जैसी
मोहक और श्रीवृषभानु नन्दिनी की मत्त करिणी जैसी मद मंथंर है। नव तरुणि
श्रीराधा के श्रीअंग में नीलाम्बर शोभिते हैं और श्याम सुन्दर के श्यामाङ्ग पर
पीत कौशेय धारण है। उपरोक्त नख शिख शृङ्गार की पूर्णता शिरोभाग पर
लसित अरुण खोरी (छोर) कर रहा है। श्रीहित हरिवंश कहते हैं यह जोड़ी
सौन्दर्य एवं रस की सीमा है। राधापति श्रीकृष्ण रसिक चूड़ामणि हैं और
श्रीराधा सुरत रस सिन्धु रूपा हैं।
टिप्पणी-इस पद में युगल किशोर के वाह्य और आन्तर शृङ्गार का
साम्य दिग्दर्शन है। क्रमशः वपु वर्ण से प्रारम्भ करके चन्दन लेप गमन गति,
पट धारण और अन्त में रस की ओर सङ्केत है। इसमें अन्तिम बात 'रसिक
राधा-पति, सुरत रंग में बोरी' यह पदांश श्रीहिताचार्य्य का हृदय और पूर्ण पद
का जीवन स्वरूप है।

  • १० -
    अवतरण-मध्याह्न शृंगार के उपरान्त युगल किशोर रास-रस परायण
    हैं जहाँ नृत्य-पूरक नाना सुमधुर ताल-स्वर युक्त वाद्य झंकृत हो रहे हैं। रास
    लास्य विचक्षणा श्रीराधा की अद्भुत नृत्य गति पर सहचरि वृन्द अपने प्राण
    बलिहार करता है-
    सारंग
    मूल-आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर,
    कहा कहौं, अंग अंग परम माधुरी।

हित चौरासी • • ७७
करत केलि कंठ मेलि बाहु दंड गंड-गंड,
परस, सरस रास लास मंडली जुरी।।
स्याम-सुंदरी विहार, बाँसुरी मृदंग तार,
मधुर घोष नूपुरादि किंकनी चुरी।
(जै श्री) देखत हरिवंश आलि, निर्त्तनी सुधंग चलि,
वारि फेरि देत प्राँन देह सौं दुरी।।१०।।
भावार्थ- आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर
अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है।
सहचरि परिकर में अनुराग विवश युगल, परस्पर स्कन्ध वाहु परिवेष्टित,
कपोल का स्पर्श किये हुए सरस रास लास्य का विस्तार करते हैं। सुन्दर
श्यामा-श्याम के रास विहार में वंशी मृदंग और तार वाद्यों का मधुर घोष
क्षरित है एवं श्रीअंग पर धारण नूपुर किंकिणी वलयादि आभूषणों का मधुर
सिञ्अन स्वर सम्मिलित है।
नृत्यगति शीला श्रीराधा की तीव्र नृत्य गति को देखकर स्वामिनी की
अंग भूता रस विमुग्धा हित अलि अपने प्राणों को बारम्बार न्यौछावर करती हैं।

  • ११ -
    अवतरण-शरद की सुन्दर रजनी है। आकाश में निर्मल एवं पूर्ण चन्द्र
    सुशोभित है। मञ्जुल श्रीवृन्दावन में चन्द्र देव की शुभ्र किरणों का वितान तना
    हैं। शीतल पवन सौरभ भार लेकर मन्थर मन्थर गति से बह रहा है। यमुना के
    निकट तट पर एक रम्य कुञ्ज कुटी है लतावेष्टित, प्रसून पल्लव मण्डित।
    रस लम्पट श्रीमोहनलाल अनुनय एवं चाटुकारी पूर्ण वचनों से प्रियतमा
    श्रीराधा को प्रसन्न करना चाह रहे हैं। इस पद में दिव्य सौरत पूर्व रस का वर्णन
    किया गया है।
    विलावल
    मूल-मंजुल कल कुंज देस, राधा हरि विसद वेस,
    राका नभ कुमुद-बंधु, सरद जामिनी।

७८ • • हित चौरासी
साँवल दुति कनक अंग, विहरत मिलि एक संग;
नीरद मनि नील मध्य, लसत दामिनी।।
अरुन पीत नव दुकूल, अनुपम अनुराग मूल;
सौरभ जुत सीत अनिल, मंद गामिनी।
किसलय दल रचित सैन, बोलत पिय चाटु बैन;
मान सहित प्रति पद, प्रतिकूल कामिनी।।
मोहन मन मथत मार, परसत कुच नीवी हार;
वेपथ जुत ‘नेति–नेति,’ बदति भामिनी।
"नरवाहन" प्रभु सुकेलि, वहु विधि भर, भरत झेलि,
सौरत रस रूप नदी जगत पावनी।।११।।
भावार्थ—शरद् की मधुमयी राका निकुंज प्राङ्गण को पूर्ण चन्द्र की रजत्
रश्मियों से आलोकित कर रही हैं। सुन्दरातिसुन्दर निकुञ्जान्तर कक्ष में सौन्दर्य
धाम श्रीराधा एवं श्रीहरि सुन्दर श्रृंगार से सुसज्जित हैं। विहरणशील युगल की
श्याम और गौर अङ्ग कान्ति मिलकर ऐसे प्रतिबिम्बित हैं जैसे नील मणिवत्
जलधर में चपला का चाञ्चल्य। श्याम सुन्दर के सुभग अङ्ग पर पीत दुकूल
सज रहा है और श्रीराधा के गोराङ्ग पर लाल (सुरङ्ग) चूनरी फब रही मानो यह
अरुण पीत वस्त्र अनुराग प्रेम के मूलाधार हैं। इधर सुवासित शीतल समीर
मन्द मन्द व्यजन झल रहा है। निकुञ्ज भवन में किशलय दल निर्मित शय्या पर
(विराजित) प्रियतम अनेक अनुनय विनय एवं प्रणय वाक्यों के द्वारा प्रेयसी
श्रीराधा को सुरत केलि के हेतु सहमत करने का प्रयास करते हैं। किन्तु
कामिनी कणकण में रस तृषा वर्द्धन करती हुई प्रति पद क्षण क्षण में वामता
ग्रहण करती जा रही है। प्रेमावेशित मोहन का मन स्मर रुज से व्यथित हो गया
है। अतः बारम्बार उरोज कटि बन्धन एवं हार आदि का स्पर्श कर देते हैं तब
लज्जा क्रान्त कंपित कामिनी "नहीं" "नहीं" का मधुर शब्द रूप मौक्तिक क्षरित
करती है। श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि श्रीयुगल की इस कल्लोल माला
को नरवाहन हृदय में विविध प्रकार से अनवरत धारण करते हैं क्योंकि यह
सुख केलि सरिता जगमंगल मयी है।

हित चौरासी • • ७६
टिप्पणी-हित चौरासी के एकादश एवं द्वादश संख्या वाले दो पद श्रीहित
महाप्रभु ने किसी विशेष बात पर रीझ कर अपने शिष्य नरवाहन जी को भेंट
किये हैं। एवं उनके नाम की छाप दी है। वस्तुतः दोनों पद श्रीहित हरिवंश चन्द्र
रचित हैं।

  • १२ -
    अवतरण - आज वंशीवट के तट की शोभन यमुना पुलिन पर श्याम
    सुन्दर ने रास नृत्य की आकाँक्षा की है। सुखद शीतल एवं उज्ज्वल शारदीय
    राका रजनी है। अनन्त सहचरि समूह एकत्रित हो गया है। किन्तु रासेश्वरी
    राधा जिनके बिना रास नृत्य सम्भव नहीं, अन्यत्र मानिनी बनी बैठी हैं। हित
    अलि लाल पर करुणा करके प्रिया को मनाने गयीं। मानिनि के निकट जाकर
    उन्होंने कहा-
    मूल-चलहि राधिके सुजान, तेरे हित सुख निधान;
    रास रच्यौ स्याम तट कलिंद नंदिनी।
    निर्तत जुबती समूह, राग रंग अति कुतूह;
    बाजत रस मूल मुरलिका अनंदिनी।।
    बंसीवट निकट जहाँ, परम रमनि भूमि तहाँ;
    सकल सुखद मलय बहै वायु मंदिनी।
    जाती ईषद विकास, कानन अतिसै सुवास;
    राका निसि सरद मास, विमल चंदिनी।।
    नरवाहन' प्रभु निहारि, लोचन भरि घोष नारि,
    नख सिख सौंदर्य काम दुख निकंदिनी।
    विलसहि भुज ग्रीव मेलि भामिनि सुख सिंधु झेलि;
    नव निकुंज स्याम केलि जगत बंदिनी।।१२।।
    भावार्थ - हे रस विचक्षण राधिके चलकर देखो कि केवल तुम्हारे ही
    कारण श्याम सुन्दर ने कलिन्द नन्दिनी यमुना के तट पर रास की रचना की
    है। जहाँ समस्त युवति समूह अत्यधिक राग-रङ्ग और उत्साह पूर्वक नृत्य
    परायण है तथा श्याम सुन्दर की रस मूल एवं आनन्दमयी वंशी का मधुर गान
    मुखरित है परम रम्य स्थली वंशीवट के निकट सुखद मलयज पवन मन्द मन्द

८० • • हित चौरासी
प्रवाहित है और मन्द मुकुलित मल्लिकादि पुष्प श्रीवृन्दा कानन को अपनी
सुगन्ध से पूरित कर रहे हैं। मधुमयी शरद् शर्वरी पूर्ण हिमकर की मरीचिमाला
से अलंकृत है। श्रीहित सखी कहती हैं–हे गोप कुमारि ! हे भामिनि !! आप
नरवाहन के प्रभु प्रेम स्मर ताप से व्यथित श्रीश्याम सुन्दर को प्रेममयी चितवन
से धन्य धन्य कीजिये; हे निखिल सौन्दर्य राशि! आप मानत्याग पूर्वक प्रियतम
के कण्ठ को अपनी मृणाल बाहुओं से अलंकृत करते हुए अतुल आनन्द राशि
का अवगाहन कीजिये। नव निकुञ्जान्तर्गत आपकी यह श्याम सङ्गम केलि का
उज्ज्वल रस अखिल विश्व वन्द्य है। सर्व श्रेयस्कर है।
– १३ –
˙अवतरण – प्रातः काल श्रीप्रियाजी अपने मणिमय निकुञ्ज प्राङ्गण में
बैठी अपनी त्रुटित माला का गुम्फन कर रही थीं। उसी समय परम ललित
नायक श्रीलालजी उस वीथी से हो निकले और उन्होंने जान बूझ कर एक
'काँकरी' प्रियाजी की ओर फेंकी। प्रियाजी ने लाल की ओर देखा और वे
नायकोचित प्रियतम के गुण, रूप एवं माधुर्य्य पर मुग्ध हो गयीं। 'काँकरी
फेंकने का प्रयोजन पूर्ण हुआ।
श्रीप्रियाजी अपनी मनःस्थिति हित सखी से कह रही हैं–
मूल– नंद के लाल हरयौ मन मोर।
हौं अपने मोतिनु लर पोवति,
काँकरि डारि गयौ सखि भोर॥
बंक बिलोकनि चाल छबीली,
रसिक सिरोमनि नंद किसोर।
कहि कैसें मन रहत श्रवन सुनि,
सरस मधुर मुरली की घोर॥
इंदु गोबिंद वदन के कारन,
चितवन कौं भये नैन चकोर।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक रस जुवती।
तू लै मिलि सखि प्रान अँकोर।।१३।।

हित चौरासी • • ८१
भावार्थ—श्रीप्रियाजी ने कहा— "सखि ! नन्द नन्दन ने तो मेरा मन हर
लिया है। मैं अपने भवन में बैठी मुक्ता माल पिरो रही थी उन्होंने सबेरे सबेरे
मुझ पर काँकरी फेंक कर मेरी तन्मयता भंग करके अपनी ओर आकृष्ट कर
लिया।
नयनाभिराम रसघन मोहन मूर्त्ति नन्द किशोर की तिरछी चितवन एवं
मद मत्त पद गति को देखकर तथा मधुर रस पूर्ण वंशी स्वर को सुनकर किस
प्रकार मन स्थिर रह सकता है ? अथ च इन्दीवर श्याम के मुख दर्शन के लिये
मेरे नेत्र चकोर वत् तृषित हैं।
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि श्रीप्रिया मुख से उपरोक्त बात सुनकर (सखी
ने कहा कि हे युवति ! तुम प्राणों को न्यौछावर करती हुई अपने प्रियतम रसिक
वर लाल का मिलन प्राप्त करो।
– १४ –
अवतरण—युगल किशोर के स्नान का समय है अतः सखियों ने दोनों
का कुआन्तर किया है किन्तु प्रियतम श्रीलालजी को यह अल्प कालीन वियोग
भी असह्य है। वे आतुर होकर हित सजनी से प्रार्थना करते हैं कि मुझे प्रियाजी
के निकट आप पहुँचा दें। किन्तु हित सजनी भी उन्हें इस समय प्रियाजी के
स्नान कुञ्ज में पहुँचाने में आपत्ति मान रही है। (अन्ततः प्रियतम के सन्तोष के
लिये उन्होंने एक उपाय निकाला कि वे उन्हें सहचरि बनाकर ही कुञ्ज तक ले
जायँ किन्तु उनके सहचरि बनाकर यहाँ तक लाने का भेद खुल गया, तो
अवश्य प्रियाजी रूठ जायेंगी)। ऐसी दशा में चतुर हित सजनी ने एक चाल
चली।। वे एक खासे समय तक श्रीलालजी को बातों में उलझाये रहीं तब तक
प्रियाजी स्नान कर चुकीं। प्रियतम को उलझाये रखने की बातें थीं—उनको
सहचरि कैसे बनाया जाय ? और कैसे प्रिया जी तक ले जाया जाय ताकि भेद
न खुले। यदि कदाचित भेद खुल गया तो क्या क्या हो सकता है ? इत्यादि !
समस्या के निराकरण में बहुत सा समय लग गया तब तक श्रीप्रियाजी
स्नान श्रृंगार से निवृत हो लीं और पश्चात् हित सजनी ने उन्हें प्रियाजी के
समीप पहुँचा दिया। दोनों मिल गये। वियोग व्यथा मिट गयी।

८२ • • हित चौरासी
इस पद में हित सजनी एवं लाल की उसी समस्या वार्त्ता का वर्णन है-
मूल- अधर अरुन तेरे कैसे कैं दुराऊँ?
रवि ससि संक भजन किये अपबस,
अदभुत रंगनि कुसुम बनाऊँ॥
सुभ कौसेय कसिव कौस्तुभ मनि,
पंकज सुतनि लै अंगनि लुपाऊँ।
हरषित इंदु तजत जैसे जलधर,
सो भ्रम ढूँढ़ि कहाँ हौं पाऊँ॥
अंबु न दंभ कछू नहीं व्यापत,
हिमकर तपै ताहि कैसे कैं बुझाऊँ।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक नवरँग पिय
भृकुटि भौंह तेरे खंजन लराऊँ॥१४॥
भावार्थ- (हित सखि ने कहा-) "हे रसिक वर लाल ! आपके अत्यन्त
अरुण अधरों का राग किस प्रकार छिपाऊँ ? यदि मैं कदाचित् उन अधरों की
अद्भुतता कुसुम रङ्गों से रंजित करूँ तो भी मुझे रवि शशि रूप प्रेम की आशङ्का
है, (अर्थात् ताप शैत्य उभय गुण विशिष्ट प्रेम आपके अधरों में वैवर्ण्य, शुष्कता,
कम्पन आदि रूपों में प्रियतमा दर्शन के समय प्रकट हो ही जायगा। तब मेरा
रङ्ग निर्माण रूप प्रयास व्यर्थ होगा।) यदि आपके कौस्तुभ मणि को उज्ज्वल
कौशेय वस्त्रों से छिपा दिया जाय और पङ्कज पराग के लेपन पूर्वक आपकी
श्याम अंग कान्ति का अदर्शन भी कर दूँ किन्तु जब जलद अवगुण्ठन से
निर्मुक्त चन्द्रमा की भाँति आपका श्रीमुख उल्लसित हो उठेगा (और इससे
आपका भेद खुलने लगेगा, तब मैं वहाँ पर श्रीप्रिया के सम्मुख) कौन सा मिष
(संभ्रम) उपस्थित करूँगी? तब तो उस समय वहाँ पर श्रीप्रियाजी के समक्ष न
शीतल वचन काम देंगे और न दम्भ, छल या कृत्तिमता ही सफल हो सकेगी।
अरे! जब चन्द्रवत! शीतल स्वभाव मयी श्रीप्रिया ही तप्त (कुपित) हो उठेंगी तब
मैं उन्हें किन वचनों के द्वारा शान्त व प्रबोधित करूँगी।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "किन्तु फिर भी हे रसिक नायक
प्रियतम! आपके खञ्जन वत् चपल नयनों का श्रीराधा की भृकुटियों से- अवश्य
मिलन करा दूँगी।"

हित चौरासी • • ८३
नोट : इस पद के भावार्थ में प्राचीन टीकाकारों का प्रायः वैमत्य है। लेखक ने भी
अपने विचारानुसार सामान्य अर्थ प्रकट किया है।
– १५ –
अवतरण– प्रातः काल स्वामिनी श्रीराधा की सुरतालस पूर्ण तन्मय दशा
को देखकर हित सखी सावधान करने के हेतु मधुर सम्भाषण पूर्वक उनका
ध्यान आकृष्ट करती हैं–
मूल–अपनी बात मोसों कहि री भामिनी,
औंगी मौंगी रहति गरब की माती।
हौं तोसों कहत हारी सुनि री राधिका प्यारी,
निसि कौ रंग क्यौं न कहति लजाती।।
गलित कुसुम बैंनी सुनि री सारँग नैनी,
छूटी लट, अचरा वदति, अरसाती।
अधर निरंग रँग रच्यौ री कपोलनि,
जुवति चलति गज गति अरुझाती।।
रहसि रमी छबीले रसन बसन ढीले,
सिथिल कसनि कंचुकी उर राती।
सखी सौं सुनि श्रवन वचन मुदित मन,
चली हरिवंश भवन मुसिकाती।।१५।।
भावार्थ–प्रियतम मिलन सुख उन्म के गौरव से उन्मादित हे श्यामे ! तुम
अपने हृदय का रसमय आवेश मुझसे प्रकट करो जो तुम गुमसुम मौन पूर्वक
आस्वादन कर रही हो। लाड़िली राधे ! मैं तुमसे पूछते पूछते परिश्रान्त प्राय हो
गयी हूँ किन्तु तुम अपने सरस चिन्तन की अन्तर्मुखी वृत्ति से तनिक भी निवृत्त
नहीं होतीं। रात्रि कालीन.मधुमय प्रिय सङ्गम का सुख वर्णन क्यों नहीं करती,
अपनी इस निज दासी से लज्जा क्यों?
हे मृग नयनी! तुम्हारे श्रीअङ्गों पर रति चिह्न स्पष्ट है। वेणी गुम्फित पुष्प
विगलित हैं केश राशि शिथिल है एवं सहज लज्जा का अनुभव करती हुई तुम
वसनाञ्चल की ओट लिये बोलती हो। मधुप मोहन ने तुम्हारे अधर कमल कोष

८४ • • हित चौरासी
का मुक्त पान किया है, जिससे अधर कमल की अरुणता मन्द है, सुभग
कपोलों पर प्रेमावेशित प्रियकृत चुम्बन पूर्वक रुचिर ताम्बूल राग रंजित है। रस
विमुग्ध युवति ! तुम मत्त करिणि की भाँति मन्थर पद न्यास पूर्वक अभिगमन
करती हो। इस प्रकार रस उद्दीपन कराती हुई सखी कहती है अब अधिक
गोपन का प्रयास मत करो। तुमने छबीले नायक के साथ सुरत रसोत्सव सुख
लूटा है तभी तो तुम्हारे कटि भूषित वस्त्राभरण श्लथ हैं एवं वक्षस्थल पर
बन्धन निर्मुक्त अरुण कंचुकि शोभित है।
हित हरिवंश कहते हैं-प्रिय सहचरि से अपने मदनारधन की बात सुनकर
प्रसन्न भूता शुचि स्मिता श्रीराधा निकुंज मंदिर की ओर चल पड़ी।

  • १६ -
    अवतरण-चूँकि श्रीलालजी परम ललित नायक हैं वचन विदग्ध और
    क्रिया चतुर भी हैं, फिर भी उनके अनेक प्रयत्नों एवं सावधानी के पश्चात् भी
    परम रूप, गुण, लावण्य मयी अतुला नायिका श्रीराधा कभी कभी मानिनि बन
    ही बैठती हैं। कभी तो मान सकारण होता है कभी अकारण ही। रस वृद्धि के
    लिये कह दें या उनके भोलेपन में मान तो हो ही जाता है। तब रूठी हुई भोली
    प्रिया को मना लेना प्रियतम के लिए काम रखता है। ऐसे अवसरों पर वे किसी
    का आश्रय ढूढ़ते हैं तब उन्हें चतुर दूतिका हित सजनी के सिवाय और कोई
    दृष्टि ही नहीं आता।
    आज भोलीं स्वामिनी रूठ बैठी हैं। प्रियतम उन्हें नहीं मना सके हैं। अब
    उन्होंने अपनी प्रियतमा को मना लाने के लिये श्रीहित सजनी को दूतिका
    बनाकर उनके पास भेजा है। दूतिका जाकर अपनी वचन चातुरी से क्षण भर
    में ही प्रसन्न कर लेती है और इतना प्रसन्न कर लेती है कि प्रियाजी प्रेमाकुल
    होकर अति आतुर भाव से प्रियतम से जा मिलती हैं। मिलन के अवसर में
    "आलिंगन चुंबन परिरम्भन," जाने क्या क्या होता है। इतना कि कोटि कोटि
    काम समूह भी व्याकुल हो उठते हैं, उनके अनन्त रस विलास से। इस विषय
    का रस पूर्ण वर्णन श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु की अमृत वाणी में देखें। दूतिका
    नायिका से रास रस प्रसङ्ग का वर्णन करते हुए रस उद्दीपन पूर्वक कहती है-

हित चौरासी • • ८५
टोड़ी
मूल- आजु मेरे कहैं चलौ मृगनैनी।
गावत सरस जुबति मंडल में,
पिय सौं मिलैं भलैं पिक बैनी।।
परम प्रवीन कोक विद्या में,
अभिनय निपुन लाग गति लैनी।
रूप रासि सुनि नवल किसोरी,
पलु पलु घटति चाँदनी रैनी।।
(जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर,
राधा रमन सुरत सुख दैनी।
रहसि रभसि आलिंगन चुबंन,
मदन कोटि कुल भई कुचैनी।।१६।।
भावार्थ-(दूती ने कहा-) “हे मृग लोचनि राधे ! आज मेरे कहने पर
चलो तो सही ! हे पिक वचनि वहाँ युवति मण्डल में सरस गान परायण प्रियतम
से मिलन ही श्रेष्ठ है-भला है। आप तो कोक विद्या में परम प्रवीण हैं, अभिनय
(क्रीड़ाओं) में निपुण हैं और नृत्य की अलग लाग आदि गतियों के लेने में भी
कुशल हैं। हे रूप राशि नवल किशोरी, सुनिये ! (विलम्ब उचित नहीं है।)
अरी ! क्रमशः पल पल करके चाँदनी रात घट ही तो रही है !”
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं (कि सखी के वचनों को सुनकर)
रमण (प्रियतम) को सुरत सुख प्रदान करने वाली श्रीराधा अत्यन्त आतुर भाव
से चल पड़ीं और उन्होंने एकान्त के रस भरे आलिङ्गन चुम्बन आदि से कोटि
कोटि मदन कुल को भी बेचैन कर दिया, (अर्थात कोटि कोटि काम को भी
सन्तप्त कर दिया!)
– १७ –
अवतरण-आज वृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में ब्रज सुन्दरी श्रीराधा
और श्रीमोहन लाल हिल मिल कर किसी अनिर्वचनीय प्रेम सुख का आस्वादन
कर रहे हैं। श्रीहित सखी उस अनिर्वचनीय सुख का दर्शन रस पान कर रही हैं

२. पद २६-५०: युगल-स्वरूप, वन-विहार एवं रास-विलास

८६ • • हित चौरासी
और उस दर्शन सुखानुभव का वर्णन अपनी सहेलियों से इस प्रकार कर
रही हैं-
टोड़ी
मूल- आजु देखि ब्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि।
अंस अंस बाहु दै किसोर जोर रूप रासि,
मनौं तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि॥
नव निकुंज भ्रमर गुंज, मंजु घोष प्रेम पुंज,
गान करत मोर पिकनि अपने सुर सौं मेलि।
मदन मुदित अंग अंग, बीच बीच सुरत रंग,
पलु पलु हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि॥१७॥
भावार्थ - (श्रीहित सजनी कहती हैं-)" सखियों! देखो आज ब्रज सुन्दरि
श्रीराधा और मोहन की क्रीड़ा (कैसी भली) बनी है ! रूप की राशि युगल किशोर
परस्पर एक के स्कन्ध पर दूसरे की बाहुलता लपेट कर ऐसे शोभित हैं मानो
तमाल (द्रुम) से सरस स्वर्ण बेलि लिपट रही हो। नव निकुञ्ज में भ्रमर समूह का
सुन्दर और मधुर गुञ्जार हो रहा है। गुञ्जार क्या है प्रेमपुञ्ज है उस गुञ्जन से
अपना-अपना स्वर मिलाकर मयूर और कोयल भी गान कर रहे हैं। इधर
युगल किशोर भी अङ्ग-अङ्ग से प्रेम मुदित होकर बीच बीच में सुरत आनन्द ले
रहे हैं और हरिवंश चन्द्र (सजनी रूप से) इस आनन्द रस को अपने नयन
पात्रों में झेल कर प्रति पल पान कर रहे हैं (अर्थात् दर्शन का रस पी रहे हैं।)

  • १८ -
    अवतरण - इस पद में श्रीहिताचार्य्य चरण ने अपनी स्वामिनी
    वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा के रूप प्रभाव एवं महत्व का वर्णन स्तुति व्याज से किया
    है। वे कहते हैं-
    आसावरी
    मूल-सुनि मेरो वचन छबीली राधा।
    तैं पायौ रस सिंधु अगाधा॥

हित चौरासी • • ८७
तूँ वृषभानु गोप की बेटी।
मोहनलाल रसिक हँसि भेंटी॥
जाहि विरंचि उमापति नाये।
तापै तैं वन फूल बिनाये॥
जौ रस नेति नेति श्रुति भाख्यौ।
ताकौ तैं अधर सुधा रस चाख्यौ॥
तेरौ रूप कहत नहिं आवै।
(जै श्री) हित हरिवंश कछुक जस गावै॥१८॥
भावार्थ- "हे छविमयी राधे ! तू मेरी बात सुन ! तूने रस का गम्भीर
समुद्र पाया है। यद्यपि तू वृषभानु गोप की ही बेटी है, फिर भी तूने प्रसन्नता
पूर्वक रसिक मोहन लाल का आलिङ्गन किया है, जिन श्रीकृष्ण का नमन ब्रह्मा
और उमापति शङ्कर भी करते हैं, तूने उन्हीं से फूल बिनाये (चुनवाये) हैं। अरी !
जिस श्रीकृष्ण (परम पुरुष भगवान्) के रस (लीला, प्रभाव, गुण माहात्म्य
आदि) के लिये श्रुतियों ने भी (असमर्थता पूर्वक) नेति नेति कह दिया तूने तो
उसका भी अधर रस पान किया है। राधे! तेरा रूप तो कुछ कहने में ही नहीं
आता, हित हरिवंश तो तेरा कुछ थोड़ा सा सुयश मात्र ही गा रहा है)"
टिप्पणी-
तैं, तूँ, तेरौ-
'हित चौरासी' के प्रायः अधिकांश पदों में देखा जाता है कि ग्रन्थकार
अपनी इष्टाराध्या, महामहिम स्वामिनि सर्वेश्वरी श्रीराधा के लिये भी यत्र तत्र
तैं, तूँ तेरौ, तोसौँ आदि सामान्यता सूचक एक वचन शब्दों का ही प्रयोग करते
हैं। किन्तु जब परमार्थ दृष्टि से उपास्य उपासक सम्बन्ध में ऐसा व्यवहार कुछ
उचित नहीं माना जाता तब आचार्य्य वर्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र के द्वारा ऐसा
होना अवश्य एक रहस्य होगा, अतः विचारणीय है।
भक्ति क्षेत्र में भगवत् सम्बन्ध पाँच भावों के द्वारा स्थापित है ऐसा शास्त्रों
का मत है। वे पाँच भाव क्रमशः शान्त, दास्य, सख्य वात्सल्य एवं मधुर के नाम
से कहे जाते हैं। इनमें प्रत्येक क्रमशः उत्तरोत्तर एक दूसरे से श्रेष्ठ है क्योंकि

८८ • • हित चौरासी
उनमें क्रमशः भगवदीय, ज्ञान, ऐश्वर्य, माहात्म्य, प्रभुता आदि का लोप हो
जाता है। और अन्तिम मधुर भाव में सर्व दोष वर्जित विशुद्ध प्रेम ही प्रेम रह
जाता है। यहाँ तक कि भक्ति का लोप कह दें तो अत्युक्ति न होगी। शान्त भाव
से दास्य इसलिये श्रेष्ठ है कि दास्य के चित्त में ज्ञान और मुक्ति की स्पृहा
मिटकर अनुराग का बीज पाया जाता है। दास भक्त का सर्वस्व अपने प्रभु का
होता- प्रभु के लिये होता है।
दास से सखा भाव श्रेष्ठ है क्योंकि सखा में दास की अपेक्षा भगवदैश्वर्य
ज्ञान का भी अभाव होकर प्रेम का प्राबल्य है।
सख्य से वात्सल्य इसलिये श्रेष्ठ है कि माता और पिता को अपना पुत्र
जितना प्यारा होता है, सम्भव है मित्र को मित्र, उतना न हो, क्योंकि पुत्र ही
पिता या माता की आत्मा है। भगवती श्रुति कहती है-
आत्मावै जायते पुत्रः।
अर्थात् ("पिता की) आत्मा ही पुत्र रूप में प्रकट होती है।"
किन्तु इस वात्सल्य रस में भी सर्व भावेन द्वैत का अभाव नहीं है। पूर्णतया
वह उत्सर्ग नहीं जो दाम्पत्य सम्बन्ध में है, जिसे कान्त भाव भी कहते हैं। यही
मधुर रस है। इसीमें प्रेम आनन्द, तन्मयता और सर्व दोष वर्जित एकात्मता है।
यहाँ ऐश्वर्य नहीं, ज्ञान नहीं, माहात्म्य नहीं, मुक्ति की वासना तक नहीं। है तो
केवल प्रेम-सङ्कोच रहित प्रेम ही। इसे देखिये श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध में-
मथुरा से उद्धव आये हैं गोपियों के पास श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर।
चाहते हैं अपनी बात उनसे एकान्त में कहूँ क्योंकि वे सोच रहें हैं कि हैं तो
आखिर ये बातें श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रणय सम्बन्ध की ही न ! फिर कैसे
कही जाय सबके बीच? उनको क्या पता था कि गोपियों ने श्रीकृष्ण के लिये
अपनी लोक लाज कुल मर्यादा, मान प्रतिष्ठा, स्वर्ग अपवर्ग, भोग मोक्ष सब
छोड़ दिया है। वे श्रीकृष्ण भगवान की भक्त नहीं है। वे हैं नन्द किशोर की
प्रणयिनि। वे श्रीकृष्ण के मथुरा पुरी के ऐश्वर्य से कुण्ठित नहीं, वे आज भी उन्हें
ब्रज का ग्वाला समझ रही है। अभी भी पूर्व की भाँति वे उन्हें गालियाँ सुना
सकती हैं, ताने दे सकती हैं, जो एक प्रेमी के लिये योग्य है।

हित चौरासी • • ८६
गोपियाँ उद्धव के मन की बात जान गयीं और उन्होंने एक भ्रमर को बीच
में लेकर श्रीकृष्ण एवं उद्धव के प्रति जो कुछ कहा उससे उनके ऐश्वर्य ज्ञान
रहित शुद्ध प्रेम का अच्छा परिचय मिलता है। उन्होंने कहा-
मधुप कितव वन्धो मा स्पृशाङ्गिं सपत्न्या,
कुच विलुलित माला कुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः।
वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं;
यदु सदसि विडम्व्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक।।
श्रीमद्भागवत १०।४७।१२
अर्थात् "हे मधुकर ! हे छलिया के मित्र ! तू हमारे चरणों का स्पर्श मत
कर, क्योंकि तेरी मूंछें हमारी सौतों के कुचों पर विलुलित माला के कुङ्कुम से
सनी हुई है। ऐसे क्षणिक प्रेम करने वाले तुम्हारे जैसे जिनके दूत हैं, जो
यदुवंशियों की सभा में विडम्बनीय है एवं उन मानिनियों का जो कृपा प्रसाद है
उस प्रेम को मधुपति श्रीकृष्ण ही वहन करें।"
इसके आगे वे और भी बहुत कुछ कह गयीं। उनकी बातें उद्धव को कुछ
जँची नहीं। उद्धव ने युक्ति उपस्थित की, "गोपियों ! तुम जिसकी इतनी
छीछालेदर कर रही हो जानती हो वह कौन हैं ? ब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ।
और तुम कौन हो ? जीव कितना अनुचित है तुम्हारा प्रयास ?
गोपियों ने इसका भी खासा जवाब दिया
कौन ब्रह्म की जोति ज्ञान कासौ कहौ ऊधौ ?
हमरे सुन्दर स्याम प्रेम कौ मारग सूधौ ।।
उद्धव अवाक् रह गये। उन्हें अब सूझा 'प्रेम कौ मारग सूधौ' है। उसमें
ऐश्वर्य नहीं है, ज्ञान नहीं है माहात्म्य नहीं है और वह सब कुछ भी नहीं है जो प्रेम
से अतिरिक्त है।
अस्तु; प्रेम में पूज्य पूजक भाव का अभाव होकर निरन्तर निकट साहचर्य
पूर्ण सम भाव रहता है। क्योंकि इस साम्य-साहचर्य के बिना सहज रस विलास
सम्भव नहीं। इस प्रेम में सङ्कोच, लज्जा एवं भय भी प्रेम रूप होकर शोभा पाते
हैं, और अन्य रूपों में इनका भी अभाव रहता है, क्योंकि यह भी निः सङ्कोच प्रेम

६० • • हित चौरासी
के व्यवधान हैं। प्रेम में सङ्कोच लज्जा एवं भय के अभाव की स्पष्ट झाँकी
आचार्य्य चरण श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने बड़े ही अनोखे ढंग से करायी
है। सखियाँ श्रीलालजी से कहती हैं-
किं रे धूर्त्त प्रवर निकटं यासि नः प्राणसख्या,
नूनं बाला कुच तट कर स्पर्श मात्राद्विमुह्येत।

  • श्रीराधा सुधानिधि।
    अर्थात् "क्यों रे धूर्त्त श्रेष्ठ ! तू हमारी प्राण प्यारी सखि (श्रीराधा) के
    निकट आ रहा है ? निश्चय है कि तू इस बाला के कुच तट स्पर्श मात्र से ही
    विमोहित हो जायगा।"
    अस्तु, उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि प्रेम में ऐश्वर्य, ज्ञान,
    माहात्म्य, लज्जा, घृणा सङ्कोच, भय और ऐसी ऐसी अन्यान्य अनेक बातों का
    सर्वथा त्याग है- अभाव है। आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने उसी
    दिव्यतम रस का गान किया है जो प्रेम का सार और विशुद्ध रूप है। जिसका
    लक्ष्य श्रीहित ध्रुवदासजी ने इस प्रकार कराया है-
    औरौ भजन आहिं बहुतेरे।
    ते सब प्रेम भजन के चेरे।।
    नारदादि सनकादि 'ध्रुव; उद्धव अरु ब्रह्मादि।
    गोपिनु कौ सुख देखि किय, भजन आपुनौ बादि।।
    तिन गोपिनु तें दुर्लभ माई।
    नित्य विहार सहज सुखदाई।।
    सिव श्रीपति जद्यपि ललचाहीं।
    मन प्रवेस तिनहूँ कौ नाहीं।।
    ऐसे रसिक किसोर विहारी।
    उज्ज्वल प्रेम-विहार अहारी।।
    अति आसक्त परसपर प्यारे।
    एक सुभाव दुहुँनि मन हारे।।
    रस मय बढ़ी नेह की बेली।
    तेहि अवलंबे नवल नवेली।।

हित चौरासी • • ६१
'हित ध्रुव' दुर्लभ सबनि तें, नित्य विहार स्वरूप।
ललितादिक निजु सहचरी, सो सुख लहतिं अनूप॥
दुर्लभ कौ अति दुर्लभ माई।
वृंदा विपिन सहज सुख दाई॥
इहि विधि विलसत प्रेमहिं सजनी।
जानत नहिं कित वासर रजनी॥
प्रेम धाम वृंदा विपिन, मध्य मधुर वर जोर।
सरिता रस सिंगार की, जगमगात चहुँ ओर॥
वैभव सब ऐश्वर्यता, ठाढ़ी सेवत दूरि।
परसन पावत कबहुँ नहिं, श्री वृन्दावन धूरि॥
ब्रह्म जोति कौ तेज जहाँ, जोगेश्वर धरैं ध्यान।
ताही कौ आवरन तहाँ, नहिं पावै कोउ आन॥
अतएव श्रीहिताचार्य्य पाद ने श्रीकृष्ण आह्लादिनी निकुञ्जेश्वरी रस प्रतिमा
श्रीराधा अपनी आराध्या के लिये एक वचन समता सूचक, ऐश्वर्य भाव रहित
"तूँ, तैं, तेरौ, तोसों आदि शब्दों का प्रयोग किया है क्योंकि प्रेम नगर की यही
रीति है-
यत्राधर्म एव धर्मः स्थापितः।
अर्थात् "जहाँ अधर्म ही धर्म रूप में स्थापित है।"

  • १९ -
    अवतरण - सर्वश्री सम्पन्न वृन्दावन नाना दिव्य तरु लता गुल्मों से
    अलङ्कृत हैं। शरद की शोभन ऋतु है। विमल चन्द्रिका पूर्ण रजनी है। आकाश
    से भूतल तक चन्द्र देव की शीतल रश्मियों का वितान तन रहा है।
    ऐसे सुन्दर अवसर में श्याम सुन्दर ने अपनी महामधुर वंशी बजायी
    और अनेकों ब्रज बालाएँ रास क्रीड़ा के लिये एकत्र हो गयी हैं। रास नृत्य में
    युगल किशोर सबके मध्य में शोभित है। इस झाँकी का वर्णन श्रीहित हरिवंश
    चन्द्र महाप्रभु इस प्रकार करते हैं-