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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

॥ श्रीहित राधावल्लभ ॥
प्राक्कथन
'रस' एक ऐसा विलक्षण तत्व है जो एक होकर भी अनेक रूपों में
प्रतिभासित होता रहता है। इसी लिये रस को ब्रह्म कहा गया है- रसो वै सः;
(श्रुति...)। भोजन के छः और साहित्य के नव (नौ) रस तो प्रसिद्ध ही हैं किन्तु
इनके सिवाय रस के और भी भेद प्रभेद हो सकते हैं। इसी विचार से श्रीरूप
गोस्वामी ने भक्ति को एक रस स्वीकार किया है जो साहित्य के नौ रसों से परे
है। महाप्रभु श्री हित हरिवंश चन्द्र कृत 'हित चौरासी' में जिस रस का गान
किया गया है वह भक्ति रस से अत्यन्त परे है। जिसके लिये श्रीहरिराम जी
'व्यास' ने कहा है-
नवधा लौं सब भक्ति उबीठी रति भागौत कथा की।
रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभा की॥
नवधा में अन्तिम आत्म निवेदन और श्रीमद् भागवत कथित रति-गोपी
प्रेम से भी श्रेष्ठ है रसिक अनन्यों की रहनी एवं करनी। जिस रस को धारण
करके उपासक 'रसिक अनन्य' कहलाते हैं; वह है वृन्दावन रस। यह वृन्दावन
रस सबसे विलक्षण है। इसके समक्ष धर्म अर्थ, काम, मोक्ष, योग ध्यान, धारणा,
ज्ञान कर्म सब निस्तेज हो जाते हैं।
इस 'वृन्दावन-रस' का स्वरूप क्या है ? इसके प्राकट्य-कर्त्ता आचार्य्य
कौन हैं ? इत्यादि प्रश्न पाठकों के लिये आवश्यकीय हैं; अतः इस विषय में
प्रथम हम रसिकाचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद का
संक्षिप्त जीवन परिचय देकर फिर उनके द्वारा प्रकाशित 'श्रीवृन्दावन रस' की
चर्चा करेंगे-
रसिकाचार्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र का परिचय -
"श्रीराधा चरण प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी" श्रीहित हरिवंश चन्द्र
महाप्रभु पाद का यथार्थ परिचय तो भक्तमाल कार श्रीनाभा स्वामी के इस
छप्पय से मिलता है-

२४ • • हित चौरासी
श्रीराधा चरन प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी।
कुंज केलि दंपती तहाँ की करत खबासी।।
सर्बसु महा प्रसाद प्रसिद्ध ताके अधिकारी।
विधि निषेध नहिं दासि अनन्य उत्कट ब्रत धारी।।
श्रीव्यास सुवन पथ अनुसरै सोइ भलैं पहिचानि है।
(श्री) हरिवंश गुसाईं भजन की रीति सकृत कोउ जानि है।।
– श्री नाभा जी
इन दिव्य विभूतियों का लोक परिचय क्या ? ये तो सदा ही अलौकिक
हैं। जैसे इनका आगमन नित्य लोक से होता है वैसे ही इनका अन्त्य और नित्य
निवास भी नित्य लोक में ही होता है। बीच का जो थोड़ा सा काल आविर्भाव एवं
तिरोभाव के रूप में दीख पड़ता है, एक लीला-कौतुक मात्र है। इस काल में ये
चाहे संसारी की तरह व्यवहार कर लें; चाहे योगिराज की तरह; इन्हें बन्धन तो
मानो छूते ही नहीं। सच तो यह है कि इन्हें जैसा योग वैसा ही भोग। ये नित्य
जल कमल वत् हैं। यदि ये भोगी की तरह रह जाते हैं तो उस भोग में भी महान्
योग की शिक्षा प्रदान कर जाते हैं और तब इनके योग की तो चर्चा ही कौन
करे ? इनके जन्म, कर्म, गुण, रूप सभी अपार होते हैं।
किन्तु विश्व-जनों का स्वभाव भी बड़ा विचित्र है जो ऐसी विभूतियों का
लौकिक परिचय-जल कमलवत् रहनी की जानकारी किये बिना असन्तोष का
अनुभव करता है, तब उन्हें उन्हीं की रीति से परिचय भी देना पड़ता है। इस
दृष्टि से हमारे महाप्रभु पाद का जन्म ब्रज मण्डलान्तर्गत मथुरा के समीप
'बाद' नामक ग्राम में विक्रम संवत् १५५९ वैशाख शुल्क एकादशी सोमवार
को हुआ था। पिता का नाम व्यास मिश्र और माता का नाम तारा रानी था।
व्यास मिश्र कुलीन गौड़ ब्राह्मण थे। विद्वान् होने के नाते प्रतिष्ठित इतने कि
तत्कालीन दिल्ली नरेश सिकन्दर लोदी भी जिनका सम्मान किया करता।
इनके ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ज्ञान पर रीझ कर बादशाह ने इन्हें चार
हजारी मनसब की निधि प्रदान की थी। किसी समय व्यास मिश्र बादशाह के
साथ अपनी राज नगरी देववन (सहारन पुर) से ब्रज मण्डल सकुदुम्ब आये
थे, इसी यात्रा काल में श्रीहरिवंश चन्द्र का जन्म 'बाद' में हुआ था। बाद ग्राम

हित चौरासी • • २५
में सुख पूर्वक छः मास निवास करके व्यास मिश्र सपरिवार देव वन चले गये।
हरिवंश चन्द्र का बाल्य काल एवं यौवन देव वन में ही बीता।
'होनहार विरवान के होत चीकने पात' के न्याय से श्रीहरिवंश के बाल्यकाल
में ही अनेकों चमत्कार देखने में आये। केवल छः मास की अवस्था में "श्रीराधा
सुधा निधि स्तव" का गान, तीन वर्ष की आयु में श्री प्रियाजी (राधा) की
भावना-ध्यान सिद्धि श्रीराधा द्वारा प्रत्यक्ष भोग आरोगना, फूलमाला प्रसादी
देना, नीलाम्बर उढ़ा देना, पाँच वर्ष की आयु में कुए में कूदकर अनन्त श्री
ठाकुर रंगी लालजी का श्रीविग्रह निकालना (प्रकट करना) और उनकी सेवा
पूजा की सुन्दर व्यवस्था करना; अल्प काल में ही सर्व शास्त्र पारङ्गत हो
जाना, आठ वर्ष की आयु में स्वामिनी श्रीराधा से मंत्र ग्रहण करके शिष्य होना
इत्यादि बातें इनके अलौकिक स्वरूप को प्रकट करती हैं।
अस्तु; उपवीत संस्कार और विद्याध्ययन के पश्चात् व्यास मिश्र ने आपका
विवाह किया। आपकी धर्मपत्नी श्रीरुक्मणी देवी, पूर्ण पति परायणा, सुशीला
और भक्ता थीं अतः उनके संग से आपको राधा भक्ति के प्रचार में अच्छी
सहायता मिली। स्वामिनी श्रीराधा की आज्ञानुसार आपने अपने देश में विशुद्ध
प्रेम लक्षणा श्रीराधा भक्ति का प्रचार किया। इस तरह घर में ही आपकी आयु
बत्तीस वर्ष की हो गयी। इस बीच में आपके तीन पुत्र और एक पुत्री ने जन्म
ग्रहण किया ; जिनके नाम क्रमशः श्रीवन चन्द्र, कृष्ण चन्द्र गोपीनाथ और
साहिब देवी हैं।
विपुल सम्पत्ति, योग्य सन्तति, अनुकूल पत्नी और सबसे विशिष्ट राज
प्रतिष्ठा का भी परित्याग करके आप बतीस वर्ष की आयु में लोक कल्याण की
भावना से श्रीवन के लिये विदा हुए। किन्तु श्रीकृष्ण की अचिन्त्य लीला शक्ति
ने अपना काम किया। आपको एक की जगह दो दो कन्याओं से विवाह करना
पड़ा। दहेज में अपार सम्पत्ति के साथ श्रीराधा वल्लभ जी का श्रीविग्रह भी
मिला। आत्मदेव अपनी दोनों कन्याएँ श्रीकृष्ण दासी एवं मनोहरी दासी को
श्रीहरिवंश चन्द्र को समर्पित कर भजन करने हिमालय चले गये और आप
प्रभु विधान को सहर्ष स्वीकार कर समस्त समाज के साथ श्रीवन आये। विक्रम
संवत् १५९१ कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को आपने श्रीवन में प्रथम निवास

२६ • • हित चौरासी
किया। ब्रज वासियों ने आपका खूब आदर सत्कार किया, रहने को भूमि दी,
कुटियाएँ निर्माण कीं, और तन, मन धन से आपकी सेवा में लग गये। भै गाँव
के राजा नरवाहन जी तो आपके स्वरूप पर मुग्ध होकर मंत्र शिष्य ही हो गये।
अब आचार्य्यपाद अपने परिकर सहित श्रीवन में सुख पूर्वक निवास करने लगे।
आपके श्रीवन आगमन के एक वर्ष पश्चात् संवत् १५९२ कार्तिकारम्भ
में ओरछे के राज पण्डित श्रीहरिराम व्यास श्रीवन आए और आचार्य्यपाद के
शिष्य हो गए। स्वामी श्रीहरिदास से भी श्रीहिताचार्य्य की गाढ़ी प्रीति हो गयी।
तत्पश्चात् श्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वती पाद ने आपकी शरण ग्रहण की और
इस प्रकार श्रीवृन्दावन रसिक अनन्यों का खासा अखाड़ा बन गया। इनमें से
श्रीहरिवंशी श्रीहरिदासी का योग मानों मणि काञ्चन योग हुआ और उसमें
व्यासजी के मिलने पर यह रसिक संगम 'रसिक त्रिवेणी' के नाम से प्रख्यात हो
गया।
अस्तु; श्रीहिताचार्य्य पाद श्रीवन में अठारह वर्ष संवत् १६०९ विक्रम
तक विराजमान् रहे और शारदीय पूर्णिमा को आप अपने नित्य परिकर में चले
गये। आपने अपने १८ वर्ष श्रीवन वास के जीवन में जिस रस की धारा बहायी
वह रस- 'वृन्दावन रस' के नाम से प्रख्यात है। वह आपके ग्रन्थ श्रीराधा सुधा
निधि, हित चौरासी एवं स्फुट वाणी के रूप में प्राप्त है। इस वृन्दावन रस को
समझने के लिये पाठकों को तीन बातों का जानना आवश्यक है-
१. श्रीहित हरिवंश का इष्ट तत्व
२. श्रीहित हरिवंश का उपासना भाव
और ३. नित्य विहार का स्वरूप
अतः अब हम इन तीनों का क्रमशः संक्षिप्त वर्णन करेंगे-
श्रीहित हरिवंश का इष्ट तत्व-
श्रुति ने जिसे-रसो वै सः रस रूप ब्रह्म कहा है वह रस ब्रह्म वृन्दावन
विलासी श्रीकृष्ण है। ये श्रीकृष्ण समस्त श्रुति स्मृति पुराण एवं तन्त्रादिकों से
प्रतिपादित सार-सारतत्व हैं किन्तु फिर उनसे अलक्षित भी हैं। उनके लीला

हित चौरासी • • २७
विहार स्वरूप को अचिन्त्य और अतर्क्य समझ कर ही इन्हें श्रुतियाँ 'नेति नेति'
कह कर पुकारती हैं। इसी प्रकार-
यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

  • श्रुति
    अर्थात् "जिस तक वाणी नहीं पहुँच सकती और जो मन एवं इन्द्रियों से
    भी अप्राप्य है।" ऐसा कहकर श्रीकृष्ण के विहारी स्वरूप का ही संकेत किया
    गया है। यह विहारी श्रीकृष्ण रूप, रस, श्रृंगार, माधुर्य्य, अनुराग एवं भाव की
    परावधि है।
    किन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसा परात्पर तत्व, अव्यक्त ब्रह्म
    विहारी श्रीकृष्ण भी किसी अनिर्वचनीय दिव्या किशोरी मणि के श्रीचरणों में
    अपना शिखि पिच्छ विलुण्ठित करते देखा जाता है।¹ यह श्रीकृष्ण वन्दिता,
    आराधनीया श्रीराधा ही रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र की इष्ट आराध्या
    हैं। इनके तात्विक रूप का वर्णन करते हुए आपने बताया है-
    प्रेम्णः सन् मधुरोज्वलस्य हृदयं श्रृंगार लीला कला,
    वैचित्री परमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता।
    ईशानी च शची महा सुख तनुः शक्तिः स्वतन्त्रा परा,
    श्रीवृन्दावन नाथ पट्ट महिषी राधैव सेव्या मम।।
    श्रीराधा सुधानिधि, श्लो.-७८
    अर्थात् "जो मधुर एवं उज्ज्वल प्रेम की प्राण स्वरूपा, शृङ्गार लीला कलाओं
    की विचित्रता पूर्ण परम अवधि भगवान् श्रीकृष्ण की भी आराधनीया और
    अनिर्वचनीय शासन कर्त्री हैं। जो ईश्वर रूप श्रीकृष्ण की शची तथा परम सुख
    मय वपु धारिणि परा एवं स्वतन्त्रा शक्ति हैं। श्रीवृन्दावन नाथ श्रीकृष्ण की
    पट्ट-महिषी श्रीराधा ही मेरी सेव्या-आराधनीया स्वामिनी हैं।"
    1 रसघन मोहन मूर्त्ति विचित्र केलि महोत्सबोल्लासितम्।
    राधा चरण विलोडित रुचिर शिखण्डं हरिं वन्दे।।
    -श्रीराधा सुधा निधि, श्लोक २००

२८ • • हित चौरासी
इन श्रीराधा ने श्रीकृष्ण को निरन्तर अपने वश में कर रखा है। श्रीकृष्ण
सदा इनके प्रति चाटुकारी करते रहते हैं, प्रार्थना एवं स्तुति करते हैं और
बार-बार उनके चरणों में लोट जाते हैं-
केनापि नागर वरेण पदे निपत्य संप्रार्थितैक परिरम्भ रसोत्सवायाः।
सभ्रूविभङ्गमतिरङ्गनिधेः ............... ।।
श्रीराधा सु. ९
अर्थात् "हे राधिके ! कोई चतुर शिरोमणि किशोर आपके श्रीचरणों में
बारम्बार गिरकर आपसे परिरम्भण सुखोत्सव की याचना कर रहे हों....।"
और
किंचैकं बहु मान भङ्गि रसवच्चाटूनि कुर्वत् परम्।
अर्थात् "एक (श्रीकृष्ण) रस पूर्ण वचनों के द्वारा चाटुकारी परायण हैं
और दूसरी (श्रीराधा) अत्यन्त मानभङ्गिमा युक्त।"
इसी प्रकार
कालिन्दी तट कुञ्ज मन्दिर गतो योगीन्द्र वद्यत्पद-
ज्योतिर्ध्यान परः सदा जपति यां प्रेमाश्रु पूर्णो हरिः।
श्रीराधा सुधा निधि ९५
अर्थात् "योगीन्द्रों के समान जिनकी चरण ज्योति के ध्यान परायण
होकर प्रेमाश्रु पूर्ण नेत्र तथा गद्गद् वाणी से कालिन्दी तट के किसी निकुञ्ज
मन्दिर में विराजमान् श्रीहरि भी स्वय जिस राधा नाम का जप करते हैं।"
इतना ही नहीं श्रीकृष्ण तो सदैव श्रीराधा कृपा की वाञ्छा करते रहते
हैं-
नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं।
(जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि भावै सो करहु प्रेम के नातैं।।

  • हित चौरासी, पद सं ७३
    भाव यह है कि श्रीकृष्ण के हृदय में यह लालसा शेष ही रही आती है कि
    मेरी स्वामिनी ने कभी प्रसन्नता एवं कृपा पूर्ण दृष्टि से मेरी ओर नहीं देखा।

हित चौरासी • • २६
अस्तु, उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीहितहरिवंश चन्द्र की
आराध्या श्रीराधा हैं जो कि श्रीकृष्ण आराध्या , परा एवं स्वतन्त्रा शक्ति ही नहीं
वरन श्रीकृष्ण की भी शासन कर्त्री और प्रेम रस (की भी) हृदय रूपा हैं। पुराणों
एवं श्रुतियों में राधा के जिस रूप का वर्णन है वह रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश
को स्वीकार नहीं है क्योंकि वहाँ श्रीराधा का स्वरूप श्रीकृष्ण आराधिका (विशेष
प्रेमी भक्ता) मात्र है। अतएव श्रुति अनुमोदित राधा के रूप के भाव को अस्वीकार
(गौण) करके आपने श्रीराधा का रूप श्रुति शेखर, श्रुति हृदय और श्रुति
अलक्षित ही अपने ग्रन्थों में यत्र तत्र बताया है देखिये-
(१) अलक्ष्यं राधाख्यं निखिल निगमैरप्यात्तितरां
रसाम्भोधेः सारं...
अर्थात् "राधा नामक कोई रसाम्भोधि सार तत्व समस्त वेदों को भी
अत्यन्त अलक्षित है।"
(२) यद वृन्दावन मात्र गोचरमहो यन्नश्रुतीकं शिरो-
प्यारोढुं क्षमते न यच्छिव शुकादीनां तु यद्ध्यानगम्।।
अर्थात् "जो केवल श्रीवृन्दावन मात्र में दृष्टि गोचर होता है; जिसका
वर्णन करने में श्रुति शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं, जो शुक शिवादि के
भी ध्यान में नहीं आता।"
(३) श्रीराधा श्रुति मौलि शेखर लता नाम्नी मम प्रीयताम्।
अर्थात् श्रीराधा नामक श्रुति मौलि शेखर लता मुझ पर प्रसन्न हों।"
श्रीहिताचार्य्य पाद की राधा केवल वेदों से ही अलक्षित नहीं वरं वेद
वादियों और वेद प्रतिपाद्य ब्रह्म से भी अलक्षित है-
ब्रह्मेश्वरादि सुदुरूह पदारविन्द श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवायाः।
सर्वार्थसार रस वर्षि कृपार्द्र दृष्टेस्तरया नमोस्तुवृषभानु भुवोमहिम्ने।।

  • श्रीराधा सुधा निधि, श्लोक२
    अर्थात् "जिनके चरण कमल ब्रह्मा शङ्कर आदि के लिये भी अत्यन्त
    सुदुरूह हैं,.......मैं उन्हीं श्रीवृषभानु नन्दिनी जू की महिमा को नमन करता हूँ।"

३० • • हित चौरासी
और इसीलिये आपने समस्त आर्ष पौरुषेय ग्रन्थों एवं समस्त आचार्यों
के मतों का खण्डन सा करते हुए श्रीराधा के प्रकृष्ट रूप का वर्णन किया है।
देखिये-
श्रीराधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्य सद्वैभवे
स्वस्तोत्र स्वकृपात एव सहजोयोग्योप्यहं कारितः।
पद्येनैव सदापराधिनि महन्मार्ग विरुद्ध्यत्वदे-
काशेस्नेह जलाकुलाक्षि किमपि प्रीतिं प्रसादी कुरु।।
–श्रीराधा सुधा निधि श्लोक २६९
अर्थात् "श्रीराधे ! आपका वैभव श्रुतियों, बुध जनों एवं स्वयं भगवान् के
लिये भी अन्वेषणीय है किन्तु फिर भी आपकी कृपा के द्वारा आपका स्तोत्र पद्य
रूप करने के लिये मैं सहज योग्य बना दिया गया अतएव हे स्नेह जल पूर्ण
आकुल नयनि! सदापराधी एवं महत् मार्गों का भी विरोध करके एक मात्र
तुम्हारी ही आशा रखने वाले मुझ पर अपनी अनिर्वचनीय कृपा प्रीति का प्रसाद
कीजिये।"
जिन शास्त्रों, श्रुतियों एवं आचार्यों द्वारा राधा का यह प्रकृष्ट रूप न
देखा जाने से सामान्य किंवा लघु रूप से वर्णित कर दिया गया, उसके लिये
आपने आश्चर्य एवं पश्चाताप भी प्रकट किया-
यत्पादाम्बुरुहैक रेणु कणिकां मूर्ध्ना निधातुं न हि
प्रापुर्ब्रह्म शिवादयोप्यधिकृतिं गोप्यैक भावाश्रयाः।
सापि प्रेम सुधा रसाम्बुधि निधी राधापि साधारणी-
भूता काल गति क्रमेण बलिना हे दैव तुभ्यं नमः।।
श्रीराधासुधा निधि श्लोक ७२
अर्थात् "ओ दैव ! तुझे नमस्कार है। धन्य है तेरी महिमा !! जिससे प्रेरित
होकर काल क्रम के प्रभाव वश प्रेमामृत-रस-समुद्र श्रीकृष्ण की भी निधि
श्रीराधिका साधारण हो गयीं ! अहो ! जो गोपियों के भावों की एकमात्र आश्रय
हैं, जिनके चरण-कमलों की रेणु के कण मात्र को ब्रह्मा शिव आदि भी अपने
सिर पर धारण करने की इच्छा रखते हुए भी प्राप्त नहीं कर पाते।"

हित चौरासी • • ३१
ऐश्वर्य की दृष्टि से श्रीराधा श्रुतिशेखर लता श्रुति अलक्षित, ब्रह्मा शंकर
नारदादि से अगम्य, श्रीकृष्ण वन्दिता हैं। माधुर्य्य दृष्टि से प्रेम रस की अधिष्ठात्री,
श्रीकृष्ण को भी अपने रस दान से रसिक बनाने वाली और सौन्दर्य्य माधुर्य्य,
लावण्य, कारुण्य सुख, छबि, रूप, वैदग्ध्य एवं रति केलि विलास की सार
रूपा हैं। जिनका वसनाञ्चल वयार स्पर्श प्राप्त करके योगीन्द्र दुर्गम गति
मधुसूदन भी कृतकृत्यता का अनुभव करते हैं। इनकी चरण रज में श्रीकृष्ण
को भी वश में करने की विलक्षण शक्ति है। वैसे तो ये ब्रह्मेश्वरादि दुर्गम हैं
तथापि कृपा परवश वृषभानु भवन में प्रकट भी हो जाती हैं तब इनकी चरण
रज को गोपियाँ भी धारण करके अपने मनोभिलषित पदार्थ—रसिक शेखर
श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकती हैं। ये राधा कन्दर्प कोटि शर मूर्च्छित नन्द
नन्दन की जीवन दात्री संजीवनी हैं। अनन्त भाव भङ्गिमाओं की निधान एवं
पूर्णानुराग सागर सार मूर्त्ति होने से इनके अङ्ग अङ्ग से रस के अमित समुद्र
लहरियाँ लेते रहते हैं और लता निकुंज में विराजित कृपा रस पुंज की वृष्टि
करती रहती हैं। कोक कलाओं में अतिशय प्रवीण होने से सदा ही सुरत रङ्गिणि
बनी रहती हैं प्रियतम उदधि से सङ्गम करने की लालसा नित्य धावमान हैं
इनमें।
इन निकुंज अधीश्वरि के चरणों को हृदय में धारण करके श्रीकृष्ण
अपने तीव्र स्मर ताप को शान्त करते हैं। यही चरण अपने आश्रित वर्ग के लिये
सदा उज्ज्वलतम प्रेम का प्रवाह प्रवाहित करते रहते हैं, अतएव श्रीराधा आश्रितों
की चिन्तामणि ब्रज नागरियों की चूडामणि, वृषभानु वंश की कुल मणि, सकामी
श्याम की शान्ति मणि और हित हरिवंश की हृदय मणि हैं।
अखिल सौन्दर्य्य राशि श्रीराधा जब अपने प्रियतम से बातों के रंग में
ढलती हैं तो अरुण होठों से सौन्दर्य्य की अपार राशि निकल निकल कर चारों
ओर फैल जाती है। ताम्बूल रंजित दंतावली, सिन्दूर अलंकृत मौक्तिक पंक्ति
की शोभा को भी तिरस्कृत करने लगती है। जिनके संलाप में अनन्त अनंग
तरंग मालाएँ क्षुभित हो उठतीं और अक्षर प्रत्यक्षर में अपार रस का समुद्र
प्रसवित होने लगता है। ये अपनी माधुर्य्य स्निग्ध वाणी से निकुञ्ज भवन ही

३२ • • हित चौरासी
नहीं समस्त जड़ चेतनमय जगत को संप्लावित कर देती हैं। आपकी चारु मूर्त्ति
अनन्त विद्युल्लताओं जैसी पीतारुण और प्रौढ़ अनुराग मद से पूर्ण विह्वल रही
आती है। नव यौवन के नित्य विकास में युगल कनक कलशों का सोल्लास
विलास ? मानों सघनतम अनुराग सार सरोवर का कमल मुख चन्द्र की
कौमुदी प्राप्त करके फिर अपनी छाती चीर कर दो हो गया है। आपके युगल
कुच कलश, क्रीड़ा सरोवर के दो कमल कुडमल हैं अथवा स्वानन्द पूर्ण रस
कल्पतरु के दो फल जो भुवन मोहन को भी मोहित करते रहते हैं। कितना
लावण्य है राधा सुन्दरी के नेत्र संचलन में कि जिनके कटाक्ष शर-पात से
श्याम सुन्दर का वेणु हाथ से गिर पड़ता, पीताम्बर श्री अङ्गों से खिसक
पड़ता, सिर से मयूर-पिच्छ स्खलित हो जाता और वे अन्ततः मूर्च्छित होकर
गिर भी पड़ते हैं। ये हैं तो अबला (किन्तु इनकी बल-राशि का कोई माप है?)
सौन्दर्य बल राशि का चमत्कार तो देखिये-
देखौ माई ! अबला के बल-रासि।
अति गज मत्त निरंकुस मोहन निरखि बँधे लट पासि।।
अबही पंगु भई मन की गति बिनु उद्दिम अनियास।
तब की कहा कहौं जब पिय प्रति चाहति भृकुटिविलास।।
कच संजमनि व्याज भुज दरसति मुसकनि बदन विकास।
हा हरिवंश ! अनीति रीत हित कत डारति तन त्रास।।
-हित चौरासी, पद सं० ५३,
नित्य नव कैशोर से उल्लसित श्रीराधा समस्त व्रज सुंदरियों की चूड़ामणि
हैं। अपने श्रीमुख की ज्योत्सना से आप मानो शरत् कालीन अनन्त चन्द्रमाओं
का प्रकाश विस्तार करती रहती हैं। श्रीराधा ने अपनी चञ्चल भ्रूभङ्गी के लेश
मात्र से ही व्रज मणि श्रीकृष्ण को अपना वशवर्त्ती कर रखा है। श्रीहिताचार्य
पाद कहते हैं-
देखौ माई सुंदरता की सीवाँ।
ब्रज नव तरुनि कदंब नागरीं निरखि करतिं अध ग्रीवाँ।।
जो कोउ कोटि कलप लगि जीवै रसना कोटिक पावै।
तऊ रुचिर वदनारविंद की सोभा कहत न आवै।।

हित चौरासी • • ३३
देव लोक भूव लोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये।
सहज माधुरी अंग अंग की कहि कासौँ पटतरिये।।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुण वय बल स्याम उजागर।
जाकी भ्रू विलास बस पसुरिव दिन विथकित रस सागर।।
-हित चौरासी पद सं. ५२
जिनके तारुण्य प्रवेश काल में किये गये एक एक भृकुटि-नर्त्तन से
अत्यन्त दर्प पूर्ण महा कोदण्ड की टङ्कार मानो शनैः-शनैः विस्फारित होती
रहती है जिससे निरन्तर कोटि कोटि कन्दर्प उत्पन्न होते रहते हैं, ऐसी ऐसी
अनन्त माधुर्य्य धाराओं से चमत्कृत हैं श्रीराधा स्वामिनी।
चातुर्य की तो मानो खानि ही हैं; इसके सिवाय भ्रूनर्त्तन की चातुरी, चारु
नेत्राञ्चलों की खेलन चातुरी,नव नव क्रीड़ा कलाओं की चातुरी, सङ्केत आगम
की चातुरी, और सखि जनों में परिहासादि की चातुरी सभी इनके एक से एक
है। जिन व्रज-सुंदरियों की लीलाओं में कोटि-कोटि लक्ष्मी समूहों के विशेष
लक्षणीय लक्षण शोभा पाते हैं, उन्हीं शत-शत किशोरियों की आराध्या हैं
श्रीराधा। उज्ज्वल रस के प्रारम्भिक भाव का सिंचन करता हुआ अति मधुर
ज्योतिः स्वरूप है यह राधा तत्व। जो सदा श्यामानुराग मद से विह्वलाङ्ग बना
रहता है। आश्चर्य्य है प्रियतम के अङ्क में विराजित होने पर भी प्रेम वैचित्य वश
हा मोहन ! हा मोहन !!" इस प्रकार अकस्मात् पुकारने लगती हैं आप। ऐसी
श्रीराधा, श्याम सुन्दर के भी रति प्रवाह की बीज स्वरूपा हैं और प्रेम की प्राण
स्वरूपा, शृङ्गार लीला कलाओं की अवधि स्वरूपा हैं। इनके इस माधुर्य्य
स्वरूप के समक्ष धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, वेद कथा और नवधा भक्ति भी व्यर्थ
चर्चा है। इन्हें-इनकी चरण-रेणु को ब्रह्मा शंकर, लक्ष्मी शुक नारद ओर
सनकादि तो पा ही क्या सकेंगे, वात्सल्य और सुहृद भाव वाले, दास लोग और
ऐश्वर्य उपासक कोई भी नहीं पा सकते। यह स्वरूप तो केवल दासी भाव वालों
को ही सुलभ है। श्रीराधा चरण किंकरी का भाव सर्वोपरि है जिसके समक्ष
विषय चर्चा कोटि-कोटि नरकों जैसी वीभत्स, वेद-कथा नीरस केवल श्रम
और कैवल्य मोक्ष भय दायक प्रतीत होने लगता है और तो और परम पुरुष
श्रीकृष्ण के भजनोन्मादी शुकादि भी निष्प्रयोजनीय आभासित होने लगते हैं।

३४ • • हित चौरासी
यह वे राधा हैं, जिनके नाम का एक बार भी उच्चारण कर लेने पर
सबका आकर्षण करने वाले श्रीकृष्ण भी राधा नाम जापक के पास अपने आप
आकर्षित हुए चले आते हैं। तब फिर उस साधक को समस्त पुरुषार्थों में
तुच्छता का स्फुरण होने लगता है। श्रीकृष्ण स्वयं भी इस नाम का जप करते हैं,
सखि जनों के मुख से इस राधा नाम का गान सुना करते हैं, वे कभी कालिन्दी
के तट पर बैठ कर योगीन्द्रों की भाँति इसका ध्यान करते और प्रेमाश्रु पूर्ण हो
जाया करते हैं तो कभी अति रसानन्द के कारण आनन्द मग्न हो जाया करते
हैं। यह राधा नाम देवताओं भक्तों, मुक्तों और श्रीकृष्ण सुहृदों से भी अत्यन्त दूर
है। इस राधा नाम की महिमा अनिर्वचनीय है। इस नाम के प्रताप से राधा नाम
का गान-स्मरण करने वाले को प्रियतम श्रीकृष्ण अदेय वस्तु देकर भी उसके
ऋणी हो जाया करते हैं और उसके अनन्त एवं लेखा न कर सकने लायक
अपराधों को तत्काल ही क्षमा करके उसे अपना बना लेते हैं। श्रीहिताचार्य
पाद कहते हैं-
अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति
र्महाप्रेमाविष्टस्तव परम देयं विमृशति।
तवैकं श्रीराधे गृणत इह नामामृत रसं
महिम्नः कः सीमां स्पृशति तव दास्यैक मनसाम्।।
श्रीराधा सुधा निधि श्लो. १५४
अस्तु; श्रीराधा एक अद्भुत रस तत्व है। जो लावण्य की परम अद्भुतता
से परिपूर्ण है, जिसमें लीला गति दृग्भङ्गी, हास आदि की अद्भुतता विराजमान
है। जब अद्भुत प्रणय-कोप से आकुल होती हैं तब महा रसिक-मौलि श्रीलालजी
सभय कौतुक दृष्टि से देखते ही रह जाते हैं। आपका सौन्दर्य्य भी अत्यद्भुत है।
श्रीमुख के अनुपम रसानन्द कन्द चन्द्र की चन्द्रिका के कला-अणु मात्र से ही
पूर्णिमा का चन्द्र तुच्छ हो जाता है। अरे ! एक चन्द्र की तो बात ही क्या ? यदि
अनेक अनेक राकाशशि एक साथ उदित होकर अपनी प्रेमामृतमयी ज्योति
तरङ्गों से अगणित कोटि ब्रह्माण्डों को आपूरित कर दें, तो शायद इन विचित्र
चन्द्र समूहों की श्रीराधा मुखचन्द्र की एक किरण से उपमा दी जा सकेगी।

हित चौरासी • • ३५
ऐसी परम सुन्दरी श्रीराधा कालिन्दी-कूल वर्त्ती कल्पद्रुम तल भवन में
होने वाली केलि-विलास-कला की मूल स्वरूपा हैं। ये एकान्त सहचरी
ललितादिकों के भी भावों से परम अगम्य हैं तथा घनीभूत आनन्द की मूर्त्ति तो
हैं ही पूर्ण एवं अभिनव प्रेम लक्ष्मी भी हैं। ये प्रेम-लक्ष्मी श्रीराधा श्रीकृष्ण के
अधर रस का पान करके सदा उन्मत्त बनी रहती हैं। इनकी पद नखच्छटा का
लव मात्र ही समस्त श्यामा-रमणी मण्डल का जीवन है। केलि विभव पूर्ण
विलास मूर्त्ति होने के साथ-साथ अधिकाधिक उन्मीलित महामाधुरी के प्रवाह
सम्पतन को धारण करने में पूर्ण समर्थ हैं। अतएव माधुर्य्य साम्राज्य की एक
मात्र भूमि और रस की एक मात्र सीमा है। इनके अंग-अंग से उज्ज्वल प्रेम रस,
लावण्य, महानतम कृपापूर्ण वात्सल्य सार की धाराम्बुधियाँ प्रवाहित होती रहती
हैं श्रीराधा वेदों की हृदय-धन-वह संगुप्त निधि हैं कि जिनकी किंचित
चरण-कृपा से समस्त श्रुत-अश्रुत विभव तुच्छ होकर मुक्ति भी तुच्छ प्रतीत
होने लगती है।
इन्होंने अपने किञ्चित-केलि-विलास पूर्ण कटाक्ष से वृन्दा-विपिन
कलभेन्द्र श्रीश्यामसुन्दर को अपना आज्ञा वशवर्त्ती जड़ीभूत क्रीड़ामृग सा बना
रखा है; इसीसे आप गोपेन्द्र-कुमार श्रीकृष्ण की सम्मोहन विद्या हैं क्योंकि
इनके नेत्र प्रान्त से माधुरी सार का मानो प्रवाह निरन्तर प्रवाहित होता रहता है।
ये मद-अरुण विलोचना श्रीराधा सदा ही प्रणय-माधुरी के रस विलास के
लिये उल्लास पूर्ण रही आती हैं और सदा नवीन वयः श्री एवं ललित भाव
भङ्गिमा को धारण किये रहते हैं। श्रीराधा के श्रीसम्पन्न अधरों से नव नव सुधा
माधुरी के कोटि-कोटि प्रवाह प्रवाहित होते रहते हैं। नेत्र कोणों से पुष्प-धन्वा
कामदेव के कोटि कोटि प्रचण्ड शर बिखरते रहते हैं। श्रीवक्षोज से अति प्रमत्त
रति-कला का सार सर्वस्व भी शोभा प्राप्त किया करता है। और श्रीचरणों से
कोटि-कोटि प्रेम पीयूष प्रवाह निरवधि रूप से प्रवाहिंत होते रहते हैं। श्रीराधा के
लास्य गति पूर्ण इन श्रीचरणों में श्रीहरि के कर कमलों से अलक्तक रस रंजित
किया जाता है। ये श्रीचरण अनेक विदग्धा गोप रमणियों द्वारा और श्रीहरि के
द्वारा वन्दित हैं। महाप्रेम मयी, एवं उन्मद मदन रसमयी श्रीराधा के
श्रीचरण-नखच्छटा-प्रवाह में स्नान कर लेने पर भक्त एवं रसिक-हृदयों में

३६ • • हित चौरासी
किसी अनिर्वचनीय सरसा एवं परम चमत्कारिणी भक्ति-प्रेम लक्षणा का उदय
हो जाता है।
अस्तु, इस प्रकार रसिकानन्य नृपति चक्र चूड़ामणि गोस्वामी श्रीहित
हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद की आराधनीया स्वामिनि श्रीराधा श्रुति शास्त्रों से
परे, बुधजन अलक्षित एवं श्रीकृष्ण की भी वन्दनीया हैं, इसलिये सर्वापेक्षा
विलक्षण हैं। इसीलिये आचार्य्यपाद ने कहा है-
सुनि मेरौ वचन छबीली राधा।
तैं पायौ रस सिंधु अगाधा।।
तू बृषभानु गोप की बेटी।
मोहन लाल रसिक हँसि भेटी।।
जाहि विरंचि उमापति नाये।
तापैं तैं बन फूल बिनाये।।
जो रस नेति-नेति श्रुति भाख्यौ।
ताकौ तैं अधर सुधा रस चाख्यौ।।
तेरौ रूप कहत नहिं आवै।
(जै श्री) हित हरिवंश कछुक जस गावै।।

  • हित चौरासी पद सं० १८
    अस्तु; अब यह देखना है कि उक्त कथित श्रीराधा की उपासना करने का
    भाव क्या है और ऐसे उपासकों का स्वरूप क्या है ? अतः नीचे श्रीहित हरिवंश
    के उपासना सम्बन्धी सखी भाव का किंचित निर्देश किया जाता है-
    श्रीहिताचार्य्य पाद का उपासना भाव-
    श्रीकृष्णोपासना सम्बन्धी पाँच भाव क्रमशः शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य
    एवं माधुर्य्य जिनमें मधुर सबसे श्रेष्ठ है। यह भाव शृङ्गार उपासना का ही भाव
    है अतः रस की चरम अवधि है ऐसा श्रीकृष्ण शृङ्गारोपासना के समस्त आचार्यों
    ने स्वीकार किया है। इसमें शृङ्गार के आलम्बन हैं श्रीकृष्ण अर्थात् वे आश्रय
    तत्व हैं और गोपीजन एवं श्रीराधा विषय अर्थात् उपासक हैं। इसे कान्त या
    जार भाव के रूपों में स्वकीया एवं परकीया भाव के नाम से तत्तत् आचार्यों ने

हित चौरासी • • ३७
स्वीकार किया है क्योंकि श्रीकृष्ण शृङ्गारोपासना इन्हीं सम्बन्धों में बन भी
सकती है। इनके सिवाय उसकी और कोई गति भी नहीं है।
किन्तु श्रीहिताचार्य पाद का रसोपासना सिद्धान्त उक्त दोनों-स्वकीया-
परकीया सिद्धान्तों से सर्वथा भिन्न है। जहाँ उक्त भावों के आचार्य गण श्रीकृष्ण
को आश्रय मानते हैं वहाँ ये श्रीराधा को आश्रय मानते हैं और श्रीकृष्ण एवं
सखि जनों को विषय अर्थात् रसोपासक। जैसा कि उनके वचनों में स्पष्ट है-
प्रेम्णः सन् मधुरोज्वलस्य हृदयं शृङ्गार लीला कला,
वैचित्री परमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता।
ईशानी च शची महासुख तनुः शक्तिः स्वतंत्रा परा,
श्रीवृन्दावन नाथ पट्ट महिषी राधैव सेव्या मम।।
अर्थात् "जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण रूपा, शृङ्गार लीला कलाओं
की विचित्र अवधि भगवान श्रीकृष्ण की भी आराधनीया और अनिर्वचनीय
शासन कर्त्री हैं। जो ईश्वर रूप श्रीकृष्ण की शची तथा परम सुखमय वपु
धारिणी परा और स्वतंत्रा शक्ति हैं। श्रीवृन्दावन नाथ श्रीकृष्ण की पट्टरानी
श्रीराधा ही मेरी-अर्थात् सखि समुदाय की सेव्या-आराधनीया हैं।"
उपरोक्त कथन में "भगवतः पूज्यैव" और "राधैव सेव्या मम" विचारणीय
है। स्पष्ट है कि श्रीराधा केवल सखियों की ही नहीं वरं श्रीकृष्ण भगवान् की भी
आराधनीया हैं अतः यहाँ आश्रय तत्व श्रीराधा और विषय-आराधक तत्व
श्रीकृष्ण एवं सखिजन अपने आप बन जाते हैं। इन रस मूर्ति श्रीराधा की
आराधना करने के ही कारण श्रीकृष्ण एवं सखिजन रसिक कहे जाते हैं। इस
'रसिक' शब्द का प्रयोग आपने अपने सम्पूर्ण ग्रन्थों में राधा के लिये कहीं भी
न करके श्रीकृष्ण एवं सखिजन के ही लिये किया है; देखिये-
(१) खेलत रास रसिक व्रज मण्डन।
हित चौरासी प. १९
(२) जै श्री हित हरिवंश रसिक ललितादिक,
लता भवन रंधनि अवलोकत,
हित चौरासी प. ७२

३८ • • हित चौरासी
(३) रास में रसिक मोहन बने, भामिनी।
–हित चौरासी पद ६८;
(४) अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक सचु पावत देखत मधुकर केली।।
–हित चौरासी पद ६३
उक्त चारों प्रसंगों में दो बार श्रीकृष्ण के लिये, एक बार सखि ललितादिकों
के लिये और एक बार उपासक किंवा सखियों के लिये 'रसिक' शब्द का
प्रयोग किया गया है।
यों तो श्रीराधा भी रस विलास मूर्ति हैं अतः रसिक हैं, किन्तु सैद्धान्तिक
पक्ष में वे रस रूपा किंवा रस दाता रस की अधिष्ठात्री हैं। यह रसिक समाज
स्वसुख के अनुसन्धान से सर्वथा रहित है। श्रीहिताचार्य पाद ने इस ओर
खासा संकेत दिया है-
(१) अंसनि पर भुज दियें विलोकत इंदु वदन विवि ओर।
करत पान रस मत्त परस्पर लोचन त्रिषित चकोर।।
पग डगमगत चलत वन विहरत रुचिर कुंज घन खोर।
जै श्री हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर।।
– हित चौरासी पद ३१
(२) मुखर नूपुरनि सुभाव किंकनी विचित्र राव,
विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री।।
– हित चौरासी पद ७६
उक्त दोनों पद्यों में 'लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर' और "विरमि
विरमि नाथ बदत वर विहार री" पद्यांश तत्सुख भावना के ज्वलन्त उदाहरण
हैं। तत्सुख भावना और रसिकता का चोली दामन का सम्बन्ध है। विना तत्सुख
भावना के रसिकता सिद्ध ही नहीं हो सकती क्योंकि रसिक वही कहला सकता
है जो अपने को मिटा दे। रसिक की परिभाषा करते हुए भगवत रसिक जी ने
लिखा है-
जीव ईस मिलि दोइ, नाम रूप गुन परिहरै।
रसिक कहावै सोइ, ज्यौं जल घोरैं शर्करा।।

हित चौरासी • • ३६
दिया कहै सब कोइ, तेल तूल पावक मिलै।
तमहिं नसावै सोइ, वस्तु मिलैं भगवत रसिक।।
इसीलिये श्री सेवक जी तत्सुख भावना पूर्ण सखी भाव के उपासकों के
सिवाय किसी अन्य भाव वालों को रसिक स्वीकार ही नहीं करते। यहाँ तक कि
स्वकीया एवं परकीया सम्बन्ध से गोपी भाव की उपासना करने वाले भी रसिक
नहीं कहे जा सकते, क्योंकि उनमें श्रीकृष्ण से रमण आदि स्वसुख भाव का
पूर्ण अनुसन्धान है-
रसिक बिनु कहें सबही जु मानत बुरौ,
रसिकई कहौ कैसे जु जानी।
आप आपनी ठौर जेई तहाँ।
आपनी बुद्धि के होत मानी।।
निपट करि रसिक जो होहु तैसी कहौ
अब जु सुनौ यह मेरी कहानी।
जौऽरु तुम रसिक रस रीति के चाड़िले,
तौऽरु मन देहु हरिवंश बानी।।
– सेवक वाणी, वाणी प्रताप प्रकरण
अस्तु, इस रसिक समाज में से श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण का सम्बन्ध रस
सम तुल्यता का है, यथा-
आजु बन क्रीड़त स्यामा स्याम।
सुभग बनी निशि शरद चाँदनी रुचिर कुंज अभिराम।।
खंडन अधर करत परिरंभन ऐंचत जघन दुकूल।
उर नख पात तिरीछी चितवन दंपति रस सम तूल।।
हित चौरासी पद ३२
रसिकाचार्य श्रीहित जू के मत से रस सम तुल्य दम्पति के विहार की
सम्पन्नता सखियों के हाथ में है; मानो वही विहार यंत्र की संचालिका हैं।
पारस्परिक तत्सुख भाव के विचार से यों भी कहा जा सकता है कि युगल
किशोर सखियों के सुख के लिये ही इस विहार की रचना करते हैं क्योंकि
सखियाँ भी तो दोनों में विहार सम्पन्न होता देख कर हर्षित होती हैं; उनके तन

४० • • हित चौरासी
मन एवं प्राण सुख से भर जाते हैं। इन सखियों की यही तो विलक्षणता है कि
ये गोपियों की भाँति परस्पर में ईर्ष्या, डाह और मत्सर नहीं करती जैसा कि
ब्रज के विहार में देखा जाता है। अब आचार्य्य पाद के एक पद में युगल केलि
के समय सखियों की तत्सुख पूर्ण दशा का दर्शन कीजिये-
सुंदर पुलिन सुभग सुख दाइक।
नव नव घन अनुराग परस्पर खेलत कुँवर नागरी नाइक।।
सीतल हंस सुता रस बीचिनु परसि पवन पुलिन सीकर मृदु बरषत।
वर मंदार कमल चंपक कुल सौरभ सरस मिथुन मन हरषत।।
सकल सुधंग विलास परावधि नाचत नवल मिले सुर गावत।
मृगज मयूर मराल भ्रमर पिक अद्भुत कोटि मदन सिर नावत।।
निर्मित कुसुम सैन मधु पूरित भाजन कनक निकुंज विराजत।
रजनी मुख सुख राशि परस्पर सुरत समर दोऊ दल साजत।।
विट कुल नृपति किसोरी कर धृत बुधि बल नीबी बंधन मोचत।
नेति नेति वचनामृत बोलत प्रनय कोप प्रीतम नहिं सोचत।।
जै श्री हित हरिवंश रसिक ललितादिक लता भवन रंध्रनि अवलोकत।
अनुपम सुख भर भरित विवस असु आनँद वारि कंठ दृग रोकत।।
-हित चौरासी प० ७२
यह निस्वार्थता, यह तत्सुखिता, कान्ता किंवा जारिणी गोपियों में कहाँ ?
क्योंकि जहाँ भोक्ता भोग्य भाव विद्यमान है वहाँ शुद्ध रति का उदय नहीं हो
सकता। इसी से आचार्य्य पाद ने सखी का स्वरूप भोक्ता भोग्य से दूर
रति-केवल रति ही माना है। इसी रति' को दूसरे शब्दों में सखी, सहचरि,
सहेली, दासी, किङ्करी, और युगल की सन्धि सहेली, भी कहा गया है। बहुत
स्पष्ट है कि बिना रति के प्रीति पूर्ण विलास-विहार की सम्पन्नता नहीं हो
सकती, इसीलिये श्रीध्रुवदास जी ने कहा है-
करवावत सब ख्याल इच्छा शक्ति सखी तहाँ।
और
सखी उभय संगम सरस पिवत नैन पुट झेलि।।
व्यालीस लीला

हित चौरासी • • ४१
अस्तु; ये सन्धि रूपा सखियाँ केवल विहार की ही सम्पन्नता नहीं सिद्ध
कराती वरं सब प्रकार की सेवाओं में भी नित्य तत्पर हैं। वे श्रीवृषभानु नन्दिनी
के कुञ्ज केलि प्राङ्गण की मार्जनी होने में भी अपना परम सौभाग्य मानती हैं
क्योंकि इसी सेवा के कारण उन्हें युगल किशोर के एकान्त विहारावसर में
'नहिं नहिं' मधुर वचनामृत सुनने को मिलते हैं।
कभी हास परिहास में वे अपनी नागर वचन रचना से श्रीस्वामिनी जी को
प्रसन्न करने की चेष्टा करतीं और फिर रसद केलि का उल्लास छलका देती
हैं। कभी रात भर की सुरत केलि उनींदी श्रीराधा को प्रातः स्नान कराके,
सुस्वादु भोजन कराके चरण सम्वाहन का सुख लेती हैं। श्रीवृषभानु किशोरी
राधा अपनी रसच्छटा से हमें सींचती रहें, हमें अपने प्रेम पूर्ण शीतल आलिंगन
से कृतार्थ कर दें। हम उनके सप्रेम सिंधु की अजस्र धारा का प्रवाह करने वाले
श्रीचरण-कमलों को अपने सिर पर धारण करें, ऐसी इच्छा करती रहती हैं।
सखियाँ सुरत भवन चलिता राधा का समयोचित सामग्री लेकर अनुगमन
करतीं और कुञ्ज रन्ध्रों से केलि का दर्शन करके अपने तन, मन एवं प्राणों को
परितृप्त करती हैं। कभी सुन्दर मुकुट, नवीन चन्द्रिका, गुञ्जाहार आदि भूषण
निर्माण कर युगल को धारण करातीं तो कभी सङ्केत कुञ्ज में पल्लव आस्तरण
रचकर श्याम के निकट श्यामा को पहुँचाती हैं। और इसके फल में चाहती हैं,
केवल राधा कृपा कटाक्ष।
नव सङ्गम के समय लज्जावती श्रीराधा को प्रियतम के समीप पहुँचाकर
माला, कर्पूर और ताम्बूल बीटिका आदि पहुँचाना उनके सहचरी भाव की
सार्थकता है। इतना करके वे दूर खड़ी रहकर युगल के मधुर संलाप से
उच्छलित अनङ्ग-तरङ्ग माला रूप प्रत्येक शब्द को सुनतीं और रति विहारावसर
जनित कङ्कण किङ्किणि एवं नूपूरों की झंकार सुनकर वे रस समुद्र में डूब जाती
हैं। फिर सुरत विरत श्रीराधा की कुन्तल केश माला को अपनी कोमल
कराङ्गुलियों से सुलझातीं, उनकी कुच तटी में कंचुकि धारण करातीं, चरणों में
नूपुर मणि मंजीर पहनातीं और तलवों में अलक्तक रस का लेपन कर अपने
को सुखी करती हैं।

४२ • • हित चौरासी.
इन सखियों का जिस सुरत केलि अवलोकन तक अधिकार है वहाँ
श्रीकृष्ण के शान्त, दास्य एवं वात्सल्य भाव वाले भक्तों का प्रवेश तो होगा कहाँ
से, सख्य और मधुर भाव के भक्तों का भी अधिकार नहीं है। आचार्यपाद ने
बताया है-
दूरे सृष्ट्यादि वार्त्ता न कलयति मनाङ् नारदादीन् स्वभक्तान्।
श्रीदामाद्यैर्सुहृद्भिः न मिलति हरति स्नेह वृद्धिं स्वपित्रोः॥
और-
गोविन्द प्रियवर्ग दुर्गम सखी वृन्दैरनालक्षिता,

  • श्रीराधा सुधा निधि
    इन सखियों की चाटुकारी वृन्दाटवी कन्दर्प श्रीलालजी भी करते हैं,
    क्योंकि इन्हीं सखियों की कृपा से उन्हें श्रीप्रिया के प्रसादोत्सव की प्राप्ति होती
    है।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि ये सखियाँ एकान्त केलि दर्शन, विविध
    परिचर्या, हास-परिहास आदि प्रत्येक सेवा सख्यत्व की अधिकारिणी हैं। इनके
    सेवक-सेव्य भाव का प्रेमाधिक्य के कारण उच्छेद हो चुका है फिर भी वह
    सेवा-परायणा है प्रेमाविष्ट होने के कारण।
    युगल की विविध वन क्रीड़ाओं में इन सखियों का सहयोग है। वे रास-नृत्य
    में नृत्य करतीं, वाद्य बजातीं, भाव निदर्शन करतीं एवं समस्त आयोजन करती
    हैं। ये सखियाँ समस्त संगीत कलाओं में विदग्ध हैं। श्रीस्वामिनि जी विना रास
    कदापि सम्भव नहीं है। अतः उन्हें आगे कर ये रास क्रीड़ा में आनन्द लेती हैं।
    यदि मानिनि राधा रास में उपस्थित न होना चाहें तो ये लाखों युक्तियों द्वारा
    उन्हें प्रसन्न करके रास में लावेंगी और तब रास क्रीड़ा विस्तार होगी। इनकी
    युक्ति-पूर्ण मधुर वचनावली कितनी मधुर होती है, देखिये-
    (१) तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्धन धर लालहिं।
    कनक लता सी क्यों न विराजति अरुझी स्याम तमालहिं॥
    गौरी गान सुतान ताल गहि रिझवत क्यों न गुपालहिं ?
    यह जोवन कंचन तन ग्वालिनि। सफल होत इहिं कालहिं॥