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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

हित चौरासी • • ३३
देव लोक भूव लोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये।
सहज माधुरी अंग अंग की कहि कासौँ पटतरिये।।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुण वय बल स्याम उजागर।
जाकी भ्रू विलास बस पसुरिव दिन विथकित रस सागर।।
-हित चौरासी पद सं. ५२
जिनके तारुण्य प्रवेश काल में किये गये एक एक भृकुटि-नर्त्तन से
अत्यन्त दर्प पूर्ण महा कोदण्ड की टङ्कार मानो शनैः-शनैः विस्फारित होती
रहती है जिससे निरन्तर कोटि कोटि कन्दर्प उत्पन्न होते रहते हैं, ऐसी ऐसी
अनन्त माधुर्य्य धाराओं से चमत्कृत हैं श्रीराधा स्वामिनी।
चातुर्य की तो मानो खानि ही हैं; इसके सिवाय भ्रूनर्त्तन की चातुरी, चारु
नेत्राञ्चलों की खेलन चातुरी,नव नव क्रीड़ा कलाओं की चातुरी, सङ्केत आगम
की चातुरी, और सखि जनों में परिहासादि की चातुरी सभी इनके एक से एक
है। जिन व्रज-सुंदरियों की लीलाओं में कोटि-कोटि लक्ष्मी समूहों के विशेष
लक्षणीय लक्षण शोभा पाते हैं, उन्हीं शत-शत किशोरियों की आराध्या हैं
श्रीराधा। उज्ज्वल रस के प्रारम्भिक भाव का सिंचन करता हुआ अति मधुर
ज्योतिः स्वरूप है यह राधा तत्व। जो सदा श्यामानुराग मद से विह्वलाङ्ग बना
रहता है। आश्चर्य्य है प्रियतम के अङ्क में विराजित होने पर भी प्रेम वैचित्य वश
हा मोहन ! हा मोहन !!" इस प्रकार अकस्मात् पुकारने लगती हैं आप। ऐसी
श्रीराधा, श्याम सुन्दर के भी रति प्रवाह की बीज स्वरूपा हैं और प्रेम की प्राण
स्वरूपा, शृङ्गार लीला कलाओं की अवधि स्वरूपा हैं। इनके इस माधुर्य्य
स्वरूप के समक्ष धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, वेद कथा और नवधा भक्ति भी व्यर्थ
चर्चा है। इन्हें-इनकी चरण-रेणु को ब्रह्मा शंकर, लक्ष्मी शुक नारद ओर
सनकादि तो पा ही क्या सकेंगे, वात्सल्य और सुहृद भाव वाले, दास लोग और
ऐश्वर्य उपासक कोई भी नहीं पा सकते। यह स्वरूप तो केवल दासी भाव वालों
को ही सुलभ है। श्रीराधा चरण किंकरी का भाव सर्वोपरि है जिसके समक्ष
विषय चर्चा कोटि-कोटि नरकों जैसी वीभत्स, वेद-कथा नीरस केवल श्रम
और कैवल्य मोक्ष भय दायक प्रतीत होने लगता है और तो और परम पुरुष
श्रीकृष्ण के भजनोन्मादी शुकादि भी निष्प्रयोजनीय आभासित होने लगते हैं।