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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 275 में से

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पृष्ठ 44

हित चौरासी • • ३६
दिया कहै सब कोइ, तेल तूल पावक मिलै।
तमहिं नसावै सोइ, वस्तु मिलैं भगवत रसिक।।
इसीलिये श्री सेवक जी तत्सुख भावना पूर्ण सखी भाव के उपासकों के
सिवाय किसी अन्य भाव वालों को रसिक स्वीकार ही नहीं करते। यहाँ तक कि
स्वकीया एवं परकीया सम्बन्ध से गोपी भाव की उपासना करने वाले भी रसिक
नहीं कहे जा सकते, क्योंकि उनमें श्रीकृष्ण से रमण आदि स्वसुख भाव का
पूर्ण अनुसन्धान है-
रसिक बिनु कहें सबही जु मानत बुरौ,
रसिकई कहौ कैसे जु जानी।
आप आपनी ठौर जेई तहाँ।
आपनी बुद्धि के होत मानी।।
निपट करि रसिक जो होहु तैसी कहौ
अब जु सुनौ यह मेरी कहानी।
जौऽरु तुम रसिक रस रीति के चाड़िले,
तौऽरु मन देहु हरिवंश बानी।।
– सेवक वाणी, वाणी प्रताप प्रकरण
अस्तु, इस रसिक समाज में से श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण का सम्बन्ध रस
सम तुल्यता का है, यथा-
आजु बन क्रीड़त स्यामा स्याम।
सुभग बनी निशि शरद चाँदनी रुचिर कुंज अभिराम।।
खंडन अधर करत परिरंभन ऐंचत जघन दुकूल।
उर नख पात तिरीछी चितवन दंपति रस सम तूल।।
हित चौरासी पद ३२
रसिकाचार्य श्रीहित जू के मत से रस सम तुल्य दम्पति के विहार की
सम्पन्नता सखियों के हाथ में है; मानो वही विहार यंत्र की संचालिका हैं।
पारस्परिक तत्सुख भाव के विचार से यों भी कहा जा सकता है कि युगल
किशोर सखियों के सुख के लिये ही इस विहार की रचना करते हैं क्योंकि
सखियाँ भी तो दोनों में विहार सम्पन्न होता देख कर हर्षित होती हैं; उनके तन