सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 275 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 43

३८ • • हित चौरासी
(३) रास में रसिक मोहन बने, भामिनी।
–हित चौरासी पद ६८;
(४) अधर पान परिरंभन अति रस आनँद मगन सहेली।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक सचु पावत देखत मधुकर केली।।
–हित चौरासी पद ६३
उक्त चारों प्रसंगों में दो बार श्रीकृष्ण के लिये, एक बार सखि ललितादिकों
के लिये और एक बार उपासक किंवा सखियों के लिये 'रसिक' शब्द का
प्रयोग किया गया है।
यों तो श्रीराधा भी रस विलास मूर्ति हैं अतः रसिक हैं, किन्तु सैद्धान्तिक
पक्ष में वे रस रूपा किंवा रस दाता रस की अधिष्ठात्री हैं। यह रसिक समाज
स्वसुख के अनुसन्धान से सर्वथा रहित है। श्रीहिताचार्य पाद ने इस ओर
खासा संकेत दिया है-
(१) अंसनि पर भुज दियें विलोकत इंदु वदन विवि ओर।
करत पान रस मत्त परस्पर लोचन त्रिषित चकोर।।
पग डगमगत चलत वन विहरत रुचिर कुंज घन खोर।
जै श्री हित हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर।।
– हित चौरासी पद ३१
(२) मुखर नूपुरनि सुभाव किंकनी विचित्र राव,
विरमि विरमि नाथ वदत वर विहार री।।
– हित चौरासी पद ७६
उक्त दोनों पद्यों में 'लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर' और "विरमि
विरमि नाथ बदत वर विहार री" पद्यांश तत्सुख भावना के ज्वलन्त उदाहरण
हैं। तत्सुख भावना और रसिकता का चोली दामन का सम्बन्ध है। विना तत्सुख
भावना के रसिकता सिद्ध ही नहीं हो सकती क्योंकि रसिक वही कहला सकता
है जो अपने को मिटा दे। रसिक की परिभाषा करते हुए भगवत रसिक जी ने
लिखा है-
जीव ईस मिलि दोइ, नाम रूप गुन परिहरै।
रसिक कहावै सोइ, ज्यौं जल घोरैं शर्करा।।

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक) · पृष्ठ 43, कुल 275 में से · SarvaKosh