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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

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पृष्ठ 41

३६ • • हित चौरासी
किसी अनिर्वचनीय सरसा एवं परम चमत्कारिणी भक्ति-प्रेम लक्षणा का उदय
हो जाता है।
अस्तु, इस प्रकार रसिकानन्य नृपति चक्र चूड़ामणि गोस्वामी श्रीहित
हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद की आराधनीया स्वामिनि श्रीराधा श्रुति शास्त्रों से
परे, बुधजन अलक्षित एवं श्रीकृष्ण की भी वन्दनीया हैं, इसलिये सर्वापेक्षा
विलक्षण हैं। इसीलिये आचार्य्यपाद ने कहा है-
सुनि मेरौ वचन छबीली राधा।
तैं पायौ रस सिंधु अगाधा।।
तू बृषभानु गोप की बेटी।
मोहन लाल रसिक हँसि भेटी।।
जाहि विरंचि उमापति नाये।
तापैं तैं बन फूल बिनाये।।
जो रस नेति-नेति श्रुति भाख्यौ।
ताकौ तैं अधर सुधा रस चाख्यौ।।
तेरौ रूप कहत नहिं आवै।
(जै श्री) हित हरिवंश कछुक जस गावै।।

  • हित चौरासी पद सं० १८
    अस्तु; अब यह देखना है कि उक्त कथित श्रीराधा की उपासना करने का
    भाव क्या है और ऐसे उपासकों का स्वरूप क्या है ? अतः नीचे श्रीहित हरिवंश
    के उपासना सम्बन्धी सखी भाव का किंचित निर्देश किया जाता है-
    श्रीहिताचार्य्य पाद का उपासना भाव-
    श्रीकृष्णोपासना सम्बन्धी पाँच भाव क्रमशः शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य
    एवं माधुर्य्य जिनमें मधुर सबसे श्रेष्ठ है। यह भाव शृङ्गार उपासना का ही भाव
    है अतः रस की चरम अवधि है ऐसा श्रीकृष्ण शृङ्गारोपासना के समस्त आचार्यों
    ने स्वीकार किया है। इसमें शृङ्गार के आलम्बन हैं श्रीकृष्ण अर्थात् वे आश्रय
    तत्व हैं और गोपीजन एवं श्रीराधा विषय अर्थात् उपासक हैं। इसे कान्त या
    जार भाव के रूपों में स्वकीया एवं परकीया भाव के नाम से तत्तत् आचार्यों ने