हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
( ४५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
कफके मूढगर्भमें सोंठ, मिरच, पीपली, त्रिफला, कूठ, लोध, कूडाकी छाल, धायके फूल, गुड
इनका क्वाथ बना पान कराना हित है ॥ १३ ॥
अथ रक्तपित्तज मूढगर्भचिकित्सा ।
मूर्वाचिञ्चावास्तुकर्णीमञ्जिष्ठारोध्रनीलिकाः ॥ कर्कन्धुमूलं सौ-
राष्ट्री क्वाथश्च सगुडो हितः ॥ १४ ॥ रक्तपित्तविकारेषु कुक्षि-
शुद्धिश्च जायते॥मृतगर्भस्य वक्ष्यामि भेषजं भिषजांवर॥१५॥
मर्दयित्वा मानुषीञ्च ततश्चापि प्रयत्नतः ॥ निराहाराच्च म्रियते
यदिगर्भोऽन्तरे स्त्रियः ॥ १६ ॥
मरोडफली, अमली, वास्तुकर्णी, मंजीठ, लोध, नील, बेरीकी जड, फिटकिरी इनका क्वाथ
बना गुड मिला ॥ १४ ॥ रक्तपित्तके विकारोंमें कुक्षिकी शुद्धिकेवास्ते देना श्रेष्ठ है
और हे उत्तम वैद्य ! अब मृतगर्भकी औषधको कहते हैं ॥ १५ ॥ यदि निराहार लंघन
करनेसे स्त्रीके उदरमें गर्भ मरजावे तो यत्नसे स्त्रीको मर्दन करि पीछे शस्त्रक्रिया करें उसको
मुझसे सुनो ॥ १६ ॥
अथ मूढगर्भमें शस्त्रचिकित्सा ।
'तदा शस्त्रप्रतीकारं भेषजानि शृणुष्व मे ॥ नाभिबिलशयाञ्च
सुकुण्डलिकां कृत्वातुतस्योपरि मूढगर्भामुपवेश्य जानुनी प्र-
सार्य्य किञ्चित्पृष्ठभागे साधारणमवष्टभ्य उदरादधोऽवतारयेत्
योनिद्वारे प्रगलति तिलतैलेन वारिणा परिष्भ्रज्य हस्तो याति
योनिद्वारश्च तस्मात्तर्जन्याङ्गुष्ठेन गलप्रदेशेधृत्वा निःसारयेत् ॥
अथवाऽर्द्धचन्द्रेण शस्त्रेणैव मृतगर्भस्यबाहुयुगलं संछिद्य बाहू-
निःसारयेत् ॥ १७ ॥
नाभिके बिलके समान गोल और ऊंची कुंडलिका अर्थात् ईंढवीसी बनाके उसके ऊपर,
मूढगर्भवाली स्त्रीको बैठाके उसके गोडे पसराके पीठकी ओरसे साधारण कछुक दबाव और
उदरसे नीचेको गर्भको उतारे । जब योनिके द्वारपै गर्भ आजावे तब तिलोंका तेल जल इनकी
मालिस करे पीछे योनिद्वारसे बालकका हाथ निकसे तब तर्जनी अंगुली और अंगूठेको योनिके
भीतर कर उस बालकके गलेको पकडि बाहिरको खींच लेवे अथवा अर्द्धचंद्र नामवाले शस्त्रसे
उस मरेहुए बालककी दोनों बाहुओंको काटि बाहिरको निकास देवे ॥ १७ ॥
अ० ५२ ] भाषाटीकासमेता । ( ४५५ )
अथ उत्पत्तिके उपायके वास्ते मंत्र और औषध ।
लाङ्गल्या मूलेन उष्णेन वारिणा योषितां नाभिलेपेन शीघ्रं
गर्भो जायत प्रसूयते च ॥ बलामूलं सूर्यकान्तिसोमवल्लीकानि
कज्जलेन पिष्ट्वा लेपनं करोतु ॥ १८ ॥
कलहारीकी जड़को गरम जलमें पीस गर्भवती स्त्रियोंको नाभिपे लेप करनेसे शीघ्रही बालक
उत्पन्न होता है और खरेहटीकी जड,सूर्यमुखी,चांदवेल इनको कजलके संग लेप करना हित है १८
अथ सुखसे बालकहोनेका यत्न ।
भीरुभूनिम्बवार्त्ताकी मूलञ्च पिप्पलीयकम्॥यवान्यग्रवचाःपिष्ट्वा
तथा चोष्णेन वारिणा ॥ १९ ॥ नाभिदेशादधस्ताच्च प्रलेपेन
प्रसूयते॥मूलञ्च लाङ्गलिक्याश्च देवदाल्याश्च तुम्बिका ॥२०॥
कोशातक्यादिकं सर्वं लेपने परिकल्पितम् ॥ सूतिलेपाःस्त्रियो
ह्येते सुखेन सा प्रसूयते ॥ २१ ॥
शतावरी, चिरायता, वार्त्ताकी, कटेइलीका भेद, उसकी जड़, पीपली, अजवायन, वच,
इनको गरम जलके संग पीस ॥ १९ ॥ नाभिस्थानसे नीचेको लेप करनेसे बालक उत्पन्न होता
है और कलहारीकी जड़, देवताडकी जड, तुंबी ॥ २० ॥ कडवी तोरी, इनको पीस लेप
करना श्रेष्ठ है । कहे हुए ये सब लेप करनेसे स्त्री सुखसे बालकको जनती है ॥ २१ ॥
अथ मन्त्रः ।
हिमवदुत्तरे कूले सुरसा नाम राक्षसी ॥ तस्या नूपुरशब्देन
विशल्या गुर्विणी भवेत् ॥२२॥ ऐं ह्रीं भगवति!भगमालिनि !
चल चल आमय पुष्पं विकाशय विकाशय स्वाहा ॥ॐनमो
भगवते मकरकेतवे पुष्पधन्विने प्रतिचालितसकलसुरासुरचि-
त्ताय युवतिभगवासिने ह्रीं गर्भं चालय चालय स्वाहा ॥
एभिर्मन्त्रितं पयः पाययेत्तेन सुखप्रसवः ॥ २३ ॥
हिमवान् पर्वतकी दाहिनी तरफको किनारेपे सुरसा नामवाली राक्षसी रहती है उसके नूपुर
विछुवोंके शब्दसे मूढ़गर्भवाली स्त्री बालकको जनती है ॥ २२ ॥ ऐं ह्रीं भगवति भगमालिनि
चलचल,आमय पुष्पं विकाशय विकाशय स्वाहा । ॐनमो भगवते मकरकेतवे पुष्पधन्विने प्रतिचा-
लितसकलसुरासुरचित्ताय युवतिमगवासिने ह्रीं गर्भ चालय चालय स्वाहा,इन मंत्रोंसे पढ़ाहुआ दूध
पिलावे इससे सुखसे बालक होता है ॥ २३ ॥
( ४५६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
अथ यन्त्र ।
ऐं ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्रौं ह्रः ॥२४॥ इदं यन्त्रं भूर्जपत्रस्योर्ध्वभा-
गे लिखित्वा मूढगर्भायै दर्शयेच्छय्यातले च स्थापयेत्तेन
सुखेन प्रसवः ॥ २५ ॥
ऐं ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्रौं ह्रः ॥ २४ ॥ इस यंत्रको भोजपत्रके ऊपर लिखके मूढ़गर्भवाली
को दिखावे उसकी शय्याके नीचे स्थापित करदेवे इससे सुखसे बालक उत्पन्न होता हैं॥ २५॥
अथ मन्त्र ।
गङ्गातीरे वसेत्काकी चरते च हिमालये॥ तस्याः पक्षच्युतं तोयं
पाययेच्च ततः क्षणात् ॥ २६ ॥ततःप्रसूयते नारी काकरुद्रवचो
यथा ॥ अनेन दूतो व्याकुलो भवेत्तावच्च पाययेत्॥२७॥ तेन
प्रसूयते नारी गृहे काकसुखेन च ॥ २८ ॥ इत्यात्रेयभाषिते
हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने मूढगर्भचिकित्सानाम द्विपञ्चाशत्तमो-
ऽध्यायः ॥ ५२ ॥
"गंगातीरे वसेत्काकी चरते च हिमालये। तस्याः पक्षच्युतं तोयं पाययेच्च ततः क्षणात् ॥
ततः प्रसूयते नारी काकरुद्रवचो यथा"॥अर्थ-गंगाके तीरपर हिमालयपर्वतमें एक काकी विचरती
है. उसके पंखसे गिराहुआ पानी स्त्रीको पिलावे, इससे स्त्री प्रसवती है ऐसा काकरुद्रका वचन
है॥ २६ ॥ इसमंत्रको कहता हुआ दूत एक श्वाससे थकजावे तब गर्भवती स्त्रीको उस जलको
पिलादेवे ॥२७॥ फिर वह स्त्री सुखसे बालकको जनतीहै जैसे काकी अंडेको॥२८॥इति बेरी-
निवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मूढ़ग-
र्भचिकित्सानाम द्विपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५३.
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अथ सूतिकारोगकी चिकित्सा ।
आत्रेय उवाच॥प्रसूत्यनन्तरं रोध्रा र्जुनकदम्बदेवदारुबीजकाह्वं
कर्कन्धूश्चयथालाभं लौहितविशुद्धे दापयेत्॥प्रसूतिजातायोनिः
संशोध्यते ॥ तैलेनापूर्य्याभ्यज्य चोष्णेन वारिणा स्वेदयेत्॥
उपवासमेवं कृत्वा द्वितीयदिवसे गुडानागरहरीतकीश्च दापयेत्
द्वययामोर्ध्वं कुलत्थयूषं व सोष्णं पाययेत् ॥ तृतीयदिवसे
पञ्चकोलयवागूर्दापयेत् ॥ चतुर्जातकमिश्रा यवागूर्दापयेत् ॥
पञ्चमेऽहनि शालिषष्टिकौदनं भोजयेत्॥ अनेन क्रमेण दशपञ्च-
दशाहं चोपचारयेत् ॥ १ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-बालक जननेके पीछे लोध, अर्जुनवृक्ष, कदंब, देवदार, बिजौरा,
बेरी इनमें जितनी चीजें मिलें उतनी ही लहूकी शुद्धिके वास्ते काथ बनाके देवे इससे प्रसूति स्त्रीकी
योनी शुद्ध हो जाती है और तेलकी मालिस कर गरम जलसे पसीना दिलावे । पहले दिन स्त्रीको
लंघन करवावे और दूसरे दिन गुड़, सोंठ, हरडे इनको देवे फिर दोपहर पीछे कुलथीका यूष
गरम २ देवे और तीसरे दिन पञ्चकोल अर्थात् पीपली, पीपलामूल, सोंठ, चव्य, चीता इनकी
यवागू बनाके देवे और चौथे दिन इस यवागूमें चातुर्जातक अर्थात् दालचीनी, इलायची,
तेजपात, नागकेशर, ये मिलाके देवे और पांचवे दिन शालिसंज्ञक चावलोंके भातका भोजन करे
इसी क्रमके अनुसार पन्द्रह दिन पथ्य भोजनका उपचार करना चाहिये ॥ १ ॥
अथ स्त्रीके दूध बढानेके उपाय।
पिप्पली पिप्पलीमूलं नागरं घनवालुकम् ॥ कुस्तुम्बुरूणि
मञ्जिष्ठां सहक्षीरेण कल्कयेत् ॥२॥पानं क्षीरविशुद्ध्यर्थं कल्क-
मश्रात्यनन्तरम् ॥ मरीचं पिप्पलीमूलं क्षीरं क्षीरविवृद्धये ॥
॥ ३ ॥ मागधी नागरी पथ्या गुडेन सघृतं पयः ॥ पानं
जनयते क्षीरं स्त्रीणाञ्च क्षीरपादपि ॥ ४ ॥ एवं कृत्वा च
नारीणां द्वादशाहे भिषग्वरः ॥ माङ्गल्यं वाचनं कृत्वा योषा-
र्थञ्च प्रदर्शयेत् ॥ ५ ॥ जातके सुतमोक्षञ्च द्वादशाहं तथा
पुनः ॥ नामकर्मकृतौ सत्यां कर्णवेधनमेव च ॥ ६ ॥ वस्त्र-
बन्धं विवाहञ्च कारयेद्बालकस्य च ॥ ७ ॥ इत्यात्रेय भा-
षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने सूतिकोपचारो नाम त्रिपञ्चा-
शत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
पीपल, पीपलामूल, सोंठ, नागरमोथा, नेत्रवाला, धनियां, मँजीठ इनको दूधमें पीस कल्क बना
॥ २ ॥ इस कल्कको खावे और दूध पीवे ऐसे करनेसे स्त्रीके दूधकी शुद्धि हो जाती है और
मिरच, पीपलामूल, इनसे युक्त दूधके पीनेसे स्त्रियोंके दूधकी शुद्धि होती है ॥ ३ ॥ पीपल, सोंठ,
हरड़े, इनको गुड़ घृतसहित दूधमें मिला पीनेसे स्त्रियोंके दूध बढता है ॥ ४ ॥ इस प्रकारके
बारहमें दिन मंगलाचरण करवाके पीछे स्त्रियोंका (अर्थात् मंगलादिकके) दर्शन करवावे ॥ ५ ॥
जातककर्ममें सुतकी उत्पत्ति होनेका मंगल करवावे पीछे बारहमें दिन मंगल करवाके नामकर्म
करवावे पीछे कर्णवेधकर्म करवावे ॥ ६ ॥ फिर वस्त्रबन्ध, तागड़ी आदि बांधनेका कर्म और विवाह-
कर्म ये सब कर्म बालकके करवाने चाहिये ॥ ७ ॥ इति वेरोनि०दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने सूतिकोपचारो नाम त्रिपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५४.
अथ बालरोगनिदानलक्षणम् ।
आत्रेय उवाच ॥ पञ्चैव क्षीरदोषाश्च स्त्रीणाञ्च कथिता बुधैः॥
घनक्षीरोष्णक्षीराम्लक्षीरा चैव तथा परा ॥ १ ॥ अल्पक्षीरा
क्षारक्षीरा मृदुक्षीरा तथा परा ॥ मृदुक्षीरा भवेत्सौख्या पञ्चान्या
दोषकारकाः ॥ २ ॥ घनाध्माननिरोधत्वं श्वासकासादिस-
म्भवः ॥ उत्फुल्लकुक्षितैवं हि घनक्षीरस्य सेवनात् ॥ ३ ॥
अल्पसत्त्वः कृशो दीनः श्वासातीसारपीडितः॥ अल्पक्षीरस्य
दोषेण सम्भवेदृतवाक्सुतः ॥ ४ ॥ ज्वरः शोषस्तथाल्पत्व-
मुष्णक्षीरेण बालके ॥ तथैव चोष्णक्षीरेण ज्वरातीसार एव च ॥
॥ ५ ॥ सुसत्त्वं बलमाप्नोति चारोग्यं लभते शिशुः ॥ मृदुक्षीरेण
नियतं जायते रूपवानपि ॥ ६ ॥ चक्षूरोगश्च कण्डूश्च क्षतश्लेष्मा-
वस्राविता ॥ संक्लेद्युक्तं नासास्यं जायते क्षारदुग्धके ॥ ७ ॥
पण्डितजनोंने स्त्रियोंके दूधके दोष पांच कहे हैं गाढा दूध, गरम दूध, खट्टा दूध, ॥ १ ॥ थोड़ा
दूध, खारा दूध, ये पांच दोष हैं और कोमल, स्वच्छ दूधवाली स्त्री सुखसे युक्त कही और ये अन्य
सब दूषित दूधवाली हैं ॥ २ ॥ जो बालक गाढा दूध पीवे तो करड़ा अफारा हो, श्वास रोग हो,
खांसी हो और कूखि, जांघोंकी संधि ये फूली हुई रहे ॥ ३ ॥ और अल्प दूधके पीनेसे थोड़ा
बल हो, कृश हो, दीन हो, श्वास, अतिसार, इन्होंने पीड़ित हो और वाणी नष्ट हो जावे ॥ ४ ॥
ज्वर हो अल्पशोष हो अतिसार हो ये स्त्रीका गरम दूध पीनेवाले बालकके रोग हो जाते हैं
॥ ५ ॥ और कोमल स्वच्छ दूध पीनेसे बालक मोटा होता है और बल बढता है, निरन्तर आरोग्य
सुखमें प्राप्त रहता है और रूपवान् होता है ॥ ६ ॥ आंखोंमें रोग हो, खाजि हो, गुमड़े, फुंसी
अ० ५४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४५९ )
अधिक हो, कफ गिरे, जलसे युक्त नासिका और मुख रहे ये खारा दूध पीनेवाले बालकके
रोग हैं ॥ ७ ॥
अतो वक्ष्यामि भैषज्यं शृणु हारीत मे मतम् ॥ ८॥
हे हारीत ! अब इनकी औषधोंको कहेंगे तू सुन यह मेरा मत है ॥ ८ ॥
अथ उत्फुल्लरोगकी चिकित्सा ।
आध्मानात्फुल्लकुक्षिश्च श्वासदोषादिपीडितः॥ उत्फुल्लिका च
विज्ञेया बालानां दुःखकारिणी ॥ ९॥ उदरे च जलौकादि-
रक्तं चादौ विमोक्षयेत्॥उत्फुल्लिदोषे दातव्यं क्षीरदोषनिवार-
णम् ॥ १० ॥ अग्निना प्रबलः स्वेदो दहेद्वापि शलाकया ॥
जठरे बिन्दुकाकारा जायन्ते भिषगुत्तम ॥११॥ बिल्वमूलफलं
पाठा त्रिकटु बृहतीद्वयम् ॥ क्वाथश्च गुडयुक्तश्च बालानाञ्च
ज्वरे हितः ॥ १२ ॥ स्त्रीणां स्यात्पानमेतेषां बालानां
ज्वरनाशनम् ॥ १३ ॥
अफारासे कुखि फूली रहे, श्वासआदि दोषोंसे पीड़ित हो वह उत्फुल्लिकासंज्ञकरोग होता है
बालकोंको दुःख करनेवाला है ॥९॥ कुक्षि उत्फुलित रोगमें पहले जो दोष आदिकोंसे
रुधिरको निकसावे पीछे दूधके दोषको निवारण करे ॥ १० ॥ अग्निसे अति प्रबल
पसीना दिलावे, शलाकासे दग्ध करे, उदरमें बिंदुवोंसरीखे आकार होजावे ऐसा दग्ध
करे ॥ ११ ॥ बेलगिरीकी जड और फल, पाठा, त्रिकटु अर्थात् सूंठ, मिरच,
पीपल, दोनों कटेहली, इनका क्वाथ बना गुड मिला देना बालकोंको हितदायक कहा
है ॥ १२ ॥ इस क्वाथको बालककी माता स्त्रीको पिलावे तो बालकोंके ज्वरका नाश
होता है ॥ १३ ॥
अथ बालरोगचिकित्साके अन्य उपाय ।
हितः पर्पटकक्वाथः शर्करामधुयोजितः॥बालानां ज्वरनाशाय
कैरातं मधुसंयुक्तम् ॥१४॥रास्नाकर्कटकं भार्गीचूर्णं च मधुसं-
युतम् ॥ लेहो वा बालकस्यापि श्वासकासनिवारणः ॥१५ ॥
पथ्यावचानागरकं घनं कर्कटमेव च ॥ चूर्णं सगुडमेवं हि
बालानां कासनाशनम् ॥ १६ ॥पलाशभेदं त्रिफलात्रपुसीवरी-
मागधीः॥ पिष्ट्वा तण्डुलतोयेन सिताढ्यं मूत्ररोधजित् ॥१७॥
( ४६० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
नागरीमभयादन्तीगुडचूर्णं प्रदापयेत् ॥ बालानां विद्रधिश्चैव
नाशयेच्च न संशयः ॥ १८ ॥ पाठाबिल्वशिलादीनि वत्सकं
शाल्मलीत्वचम्॥दुग्धेन पानं बालानामतिसारनिवारणम् १९
अर्जुनञ्च कदम्बञ्च कुष्ठं गैरिकमेव च ॥ लेपनं त्वचि दोषाणां
वारणं बालक्रस्य च॥२०॥ रोध्रं रसाञ्जनं धात्री गैरिकं मधुना
युतम् ॥ अञ्जनं चैव बालानां नेत्ररोगनिवारणम् ॥ २१ ॥
पित्तपापडाके क्वाथमें खांड और शहद मिलाके देना हित है और बालकोंके ज्वरके
नाशकेवास्ते चिरायता, शहद इनका पिलाना हित है ॥ १४ ॥ और भारंगी, रास्ना,
काकड़ासींगी इनके चूर्णमें शहद मिला लेह बना चटानेसे बालकका श्वास, खांसी इनका
नाश होता है ॥ १५ ॥ हरड़ै, वच, सूंठ, नागरमोथा, काकड़ासींगी, इनका चूर्ण
बना बराबरका गुड़ मिला देनेसे बालकोंकी खांसीका नाश होता है ॥ १६ ॥ टेसू,
त्रिफला, खीर, शतावरी, पीपली, इनको चावलोंके धोवनेके जलमें पीस प्यानेसे बालमूत्र-
रोध दूर होता है ॥ १७ ॥ सूंठ, हरडै, जमालघोटेकी जड़, इनके चूर्णमें गुड़ मिलाके
देनेसे बालकोंके विद्रधीरोगका नाश होता है ॥ १८ ॥ पाठा, बेलगिरी, शिलाजीत,
कुड़ाकी छाल, सेमलकी छाल इनको पीसि दूधके संग प्यानेसे बालकोंके अतिसारका नाश
होता है ॥ १९ ॥ अर्जुनवृक्ष, कदंव, कूठ, गेरू, इनको शहदमें मिला अंजन करनेसे
बालकोंके नेत्ररोगका नाश होता होता है ॥ २० ॥ लोध, रसांजन, आमला, गेरू इनको
शहदके संग पीसकर अंजन करनेसे बालकोंके नेत्रका रोग नष्ट होता है ॥ २१ ॥
अथ बालकोंकी बुद्धिको बढानेवाले औषध ।
वचा ब्राह्मी च मण्डूकी घनकुष्ठं सनागरम् ॥ घृतेन प्रातर्देयञ्च
बालानां पुष्टिकारकम् ॥ २२ ॥ गुडूचिकापामार्गश्च विडङ्गं
शंखपुष्पिका॥विष्णुकान्ता वचा पथ्या नागरश्च शतावरी ॥
॥२३॥चूर्णं घृतेन संमिश्रं लिहतो धीः प्रवर्त्तते ॥ त्रिभिर्दिनैः
सहस्रकं श्लोकानामवधारयेत् ॥ २४ ॥
वच, ब्राह्मी, सूर्यफूलवेल, नागरमोथा, कूठ, इनको घृतमें मिला प्रातःकाल देनेसे बाल-
कोंकी पुष्टि होती है ॥ २२ ॥ गिलोय, ऊंगा, वायविडिंग, शंखपुष्पी, विष्णुक्रांता, वच,
हरडै, सूंठ, शतावरी ॥ २३ ॥ इनके चूर्णको घृतमें मिला चटानेसे बालककी बुद्धि बढती
है । तीन दिनमें हजार श्लोकोंको धारण कर सकता है ॥ २४ ॥
अ० ९४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६१ )
अथ बालकोंकी वाणीको करनेवाले औषध ।
त्रिकटु त्रिफला धान्या यवानी सालमूलिका॥वचा ब्राह्मी तथा
भार्ङ्गी चूर्णञ्च मधुना हितम् ॥ वाक्पटुत्वञ्च बालानां नादो
वीणासमस्वरः ॥ २५ ॥
सूंठ, मिरच, पीपली, धनियां, अजवायन, सालवृक्षकी जड़, वच, ब्राह्मी, भारंगी, इनका
चूर्ण बना शहदके संग चाटनेसे बालककी जुवान अति चपल होती है और वीनके समान
शब्दका स्वर होता है ॥ २५ ॥
अथ बालकोंके अपस्माररोगकी चिकित्सा ।
यस्य श्वासो विचित्तन्यं तन्द्रा चातीव वेपथुः॥शिरोर्तिः संज्वर-
श्चैव सचासाध्यो भिषग्वर ॥२६॥ लालाकृतिर्विचित्तन्यं तृप्त-
विश्रान्तलोचनम्॥स्तब्धाङ्गविकृतिर्यस्य चापस्मारी च उच्यते
॥ २७॥ अपस्मारे तु बालस्य शीतलानि प्रयोजयेत्॥ वचा-
सैन्धवपिप्पल्यो नस्यं हि गुडनागरः ॥ २८ ॥ रसं चागस्ति-
पत्रस्य मरिचैः प्रतियोजितम् ॥ एतेन प्रतिसौख्यं स्यात्तदा
चान्दोलनं हितम् ॥ २९ ॥ मस्तकान्ते ललाटे च दहेल्लोहश-
लाकया ॥ ३० ॥
जिसके अत्यन्त श्वास हो, चेत नहीं रहे, तंद्राहो, अत्यंत कंपनाहो, शिरमें पीडाहो, ज्वरहो
हे वैद्य ! वह असाध्य रोग होता है ॥ २६ ॥ लाल आकृतिहो, चेत नहीं हो, और फटे
हुए घूमते हुए नेत्रहों, अंग जकड़बंध बुरा वर्णवाला होजावे वह अपस्मार अर्थात् मृगीरोग
जानना ॥ २७ ॥ अपस्मार रोगमें बालकको शीतल वस्तु देनी चाहिये और वच,
सेंधानमक, पीपली, सोंठ, इनको मिला नस्य देवे ॥ २८ ॥ अथवा अगस्तिवृक्षके पत्तोंके
रसमें मिरच मिला नस्य देवे, इसप्रकार करनेसे सुख होजाये तब आंदोलन अर्थात् हिलाने
चलानेका कर्म करे ॥ २९ ॥ मस्तकके अंतमें शिरके ऊपरकी नसको शलाईसे दग्ध
करना हित है ॥ ३० ॥
अथ बालकोंके पूतनाका दोष ।
शून्यागारे देवकुले श्मशाने देवमध्यगे ॥ चत्वरे सङ्गमे नद्यो-
र्भयक्षुभितबालके ॥३१॥ संक्रामन्ति भिषक्श्रेष्ठबालकस्यापि
पूतनाः ॥३२॥ लोहिता रेवती ध्वांक्षी कुमारी शाकुनी शिवा॥
( ४६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
ऊर्ध्वकेशी तथा सेना ह्यष्टौ चैताः प्रकीर्तिताः ॥३३॥तथान्या-
साञ्च मत्तस्त्वं नामानि शृणु साम्प्रतम् ॥ रोहिणी विजया
काली कृत्तिका डाकिनी निशा॥३४॥ भूतकेशी कृशाङ्गी च
अष्टौ चैताः प्रकीर्तिताः । लक्षणञ्च प्रवक्ष्यामि शृणु पूजाबलि-
क्रमम् ॥३५ ॥ जातमात्रस्य बालस्य लोहिता नाम पूतना ॥
विस्रगन्धा लोहितश्च स रोदिति मुहुर्मुहुः ॥३६॥ बलिं तस्याः
प्रवक्ष्यामि येन सौख्यं प्रजायते ॥ द्वितीये दिवसे बालं रेवती
नाम पूतना॥३७॥गृह्णाति लक्षणं तस्य रोदति कम्पते भृशम्॥
कृष्णमृन्मयीं प्रतिमां कृत्वा गन्धानुलेपनैः॥३८॥कृशरारालचू-
र्णं च दीपधूपैस्तथाक्षतैः॥ताम्बूलैः कृष्णसूत्रैश्च रात्रौ नैर्ऋतिके
क्षिपेत् ॥३९॥ तृतीये दिवसे प्राप्ते वायसी नाम पूतना ॥ तया
गृहीतमात्रेण रोदिति न पिबेत्स्तनम् ॥४०॥ ज्वरश्चैवातिसा-
रश्च काकवद्वदति भृशम्॥ तस्या दध्योदनं पात्रे यवकृशरपो-
लिकाः ॥४१॥ ध्वजाभिः सगुडश्चैव कृष्णगन्धानुलेपनम् ॥
धूपदीपाक्षतैश्चैव मध्याह्ने बलिमाहरेत् ॥ ४२ ॥ चतुर्थे दिवसे
बालं कुमारी नाम पूतना ॥ गृह्णाति बालकस्तेन ज्वरेण परि-
तप्यते ॥ ४३ ॥ शून्यं विगाहते बालस्तन्मुखं परिशुष्यति ॥
भृशं स रोदिति तस्याः शृणु पूजाबलिक्रमम् ॥४४॥ पायसं
सघृतं खण्डं घृतस्य दीपकत्रयम् ॥ ४५ ॥ मृन्मयीं प्रतिमां
कृत्वा पुष्पधूपाक्षतैरपि ॥ कृतान्तदिशि मध्याह्ने बलिं दत्त्वा
सुखी भवेत् ॥४६॥ पञ्चमे दिवसे बालं शाकुनी नाम पूतना॥
गृह्णाति स तयाक्रान्तः स्तन्यं नाकर्षते शिशुः ॥४७॥ सज्वरो
वमति रौति कासमानोऽथ वेपते ॥४८॥ तस्याः शोभनिका
*पूजा क्रियते तिललड्डुकैः ॥ श्वेतगन्धाक्षतैर्धूपैः पूजयेन्मृ-
ण्मयाकृतिम् ॥४९॥ उत्तराशां समाश्रित्य पूर्वाह्ने बलिमाह-
अ० ५४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६३ )
रेत् ॥ षष्ठे च दिवसे प्राप्ते शिवा नाम कुमारिका ॥५०॥ रौति
निःश्वसिति तेन वमति कम्पते तथा ॥ स्तन्यञ्च नाहरेद्बालो
ज्वरातीसारपीडितः ॥५१॥ तस्यै बलिः प्रदेयश्च सप्तव्रीहिम-
यश्चरुः॥पायसैर्दधिदीपैश्च पूज्या सा तिलचूर्णकैः॥५२॥ गन्ध-
पुष्पाक्षतैर्धूपैःपूजयेन्मृण्मयाकृतिम्॥ऐशानीं दिशमाश्रित्याप-
राह्ने बलिमाहरेत् ॥५३॥ सप्तमेऽह्नि पूतनाया उर्ध्वकेश्याःशि-
शौ तथा॥पूर्ववद्दृश्यते चिह्नं तथैव बलिमाहरेत् ॥५४॥ अष्टमे
दिवसे प्राप्ते सेना नाम च पूतना ॥ तया गृहीतः श्वसिति
हस्तौ कम्पयते भृशम् ॥५५॥ तस्य दध्योदनं दद्यात्तिलचूर्ण-
ञ्च पोलिकाम् ॥ धूपदीपगन्धपुष्पताम्बूलान्यक्षतानि च ॥
॥ ५६ ॥ आग्नेयीं दिशमाश्रित्य प्रदोषे बलिमाहरेत् ॥ एवं
क्रमेण मासस्य वर्षस्य बलिकर्म च ॥ ५७ ॥ इत्यात्रेयभाषिते
हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने बालचिकित्सानाम चतुःपञ्चाशत्तमो-
ऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इति कौमारतन्त्रम् ॥
शून्य मकानमें और देवताओंके मंदिरमें तथा देवताओंकी मूर्त्तिके समीपमें, चौराहामें तथा
नदीके संगममें भयसे क्षुभित बालक होजावे ॥ ३१ ॥ तब हे उत्तम वैद्य ! उस बालकको
पूतना ग्रहण करलेती है ॥ ३२ ॥ और लोहिता, रेवती, ध्वांक्षी, कुमारी, शाकुनी, शिवा,
उर्ध्वकेशी, सेना, ऐसे आठ प्रकारकी पूतना होती हैं ॥ ३३ ॥ और अन्य पूतनाओंके नाम
तू अब मुझसे सुनो । रोहिणी, विजया, काली, कृत्तिका, डाकिनी, विशा ॥ ३४ ॥ भूत-
केशी, कृशांगी, ये आठ कही हैं इनके लक्षण और पूजा, बलिके क्रमको कहते हैं सुनो
॥ ३५ ॥ जन्ममात्र लियेहुए बालकके लोहिता पूतना लगती है उससे बालकमें बुरी गंध
आवे वारंवार रोवै ॥ ३६ ॥ उसकी बलिको कहेंगे इससे सुख होता है और जन्मसे
दूसरेदिन बालकको रेवती नामवाली पूतना ग्रहण करती हैं ॥ ३७ ॥ इससे रोवे और वारं-
वार कांपे तहां काली मृत्तिकाकी मूर्त्ति बनाके गंध चंदन ॥ ३८ ॥ खीचडी, रालका चूर्ण,
दीप, धूप, अक्षत, नागरपान, काला सूत इनसे पूजन कर इनको नैर्ऋत दिशामें गेर
देवे ॥ ३९ ॥ और जन्मसे तीसरे दिन बालकको वायसी नामवाली पूतना ग्रहण करती
है इससे ग्रहण होनेसे बालक रोवै चूंती नहीं पीवे ॥ ४० ॥ ज्वर हो, अतिसार हो, वारंवार
काककी तरह पुकारे उस पूतनाके वास्ते दही, चावल, जवोंकी कृशरा, पोलिका ॥ ४१ ॥
( ४६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
इनको पात्रमें घाल ध्वजाढांक उसमें गुड, काले पुष्प, काला चंदनआदि अनुलेप गेर, धूप,
दीप, अक्षत इनसे युक्त करि मध्याह्न समयमें इस बलिको देवे ॥४२॥ और चौथेदिन बालकको
कुमारी नामकी पूतना ग्रहण करती है इससे बालकको अति ताप होती है ॥ ४३ ॥ और
शूना रहजावे तब पीडित हो और उसका मुख सूख जावे वारंवार रोवै ऐसी इसपूतनाकी पूजा
और बलिको सुनो ॥ ४४ ॥ खीर, घृत, खांड, घृतके तीन दीप कर ॥ ४५ ॥ माटीकी
मूर्त्ति, पुष्प, धूप, अक्षत, इन सबोंको मध्याह्न समयमें दक्षिणकी दिशामें स्थापित कर देवै
ऐसे करनेसे बालक सुखी होता है ॥ ४६ ॥ और पाचवें दिन बालकको शाकुनी नामवाली
पूतना ग्रहण करती है इससे ग्रसितहुआ बालक चूंचीको नहीं लेता है ॥ ४७॥ ज्वरसे युक्त
हो वमन करे, रोवे खांसताहुआ कांपे ॥ ४८ ॥ इस पूतनाकी सुन्दर पूजा तिललड्डुओंसे करे
और सफेदगंध, अक्षत, धूप इनसे मृत्तिकाकी मूर्त्ति बनाके उसका पूजन करे ॥ ४९ ॥ उत्तर-
की दिशामें मध्याह्न समयसे पहिले इस बलिको देवे और छठे दिन शिवानामावाली पूतना बाल-
कको ग्रहण करती है ॥ ५० ॥ इससे बालक रोवे अत्यंत श्वास लेवे वमन करे कभी कांपे और
चूंची नहीं पीवे,ज्वर, अतिसार इनसे पीडीत होजावे ॥ ५१ ॥ इसकेवास्ते सातब्रीही धान्य
और खीर, दही, दीपक, इनकी बलि देवे और तिलोंके चूर्णसे उसका पूजन करे ॥ ५२ ॥
और माटीकी मूर्त्तिका गंध पुष्प धूप अक्षत इनसे पूजन करे, ऐशान्यदिशामें तीसरे पहरमें इस
बलिको देवे ॥ ५३ ॥ सातवेंदिन बालकको ऊर्ध्वकेशी नामवाली पूतना ग्रहण करती है जिसके
लक्षण पहिली कही पूतनाके समान होते हैं और पहली कहीहुई बलि देवे ॥ ५४ ॥ और आठवें
दिन सेनानामवाली पूतना ग्रहण करती है इससे ग्रसित हुआ बालक अत्यत श्वास लेवे, वारंवार
हाथ कांपे ॥ ५५ ॥ इसकेवास्ते दही, चावल, तिलोंका चूर्ण, पोलिका, इनकी बलि देवे और
धूप, दीप, अक्षत, गंध, पुष्प, नागरपान, इनसे पूजन कर ॥ ५६ ॥ अग्नि कोण दिशामें
प्रदोष समयमें इस बलिको देवे इसीप्रकारके क्रमसे महीनोंकी और वर्षोकी भी देवे ॥ ५७ ॥
इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यविद्वत्तशाख्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां
तृतीयस्थाने बालचिकित्सानाम चतुःपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५५.
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अथ भूतविद्या ।
आत्रेय उवाच ॥ शून्ये देवकुले श्मशानभुवि वा वीथीप्रतोली-
तले रथ्याकारविहारशून्यनगरे चारामके चत्वरे ॥ जायन्ते
क्षुभिते बलानि हृदये क्षुद्रग्रहाणां नरे ते चापि प्रथिता ग्रहा दश-
अ० ५५ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६५)
विधा वक्ष्याम्यतः साम्प्रतम् ॥ १ ॥ दश प्रोक्ता महाचार्यैः
कैश्चिदप्येकविंशतिः ॥ दशग्रहाणां वक्ष्यामि चिकित्सां शृणु
पुत्रक ॥ २ ॥ ऐन्द्राग्नेयौ यमश्चान्यो नैर्ऋतो वरुणो ग्रहः ॥
मरुतोऽपि कुबेरश्च ऐशान्यो ग्रहको ग्रहः ॥ ३ ॥ पैशाचिको
ग्रहश्चान्यो दशैते ग्रहनायकाः॥ आरामे च विहारे च देवस्थाने
च यो भवेत् ॥ ४ ॥ ऐन्द्रग्रहं विजानीयात्तेन हर्षति गायति ॥
सदर्पश्वासदर्पश्व उन्मादग्रस्त एव च ॥ ५ ॥ श्मशाने चत्वरे
चैव गृह्णात्याग्नेयकुग्रहः ॥ तेनैव रोदित्यत्यर्थं पश्यति
सर्वतो भयम् ॥ ६ ॥ युद्धभूमौ श्मशाने च यमश्चापि
उदीर्यते ॥ तेन विह्वलो दीनश्च प्रेतवच्चेष्टते नरः ॥ ७ ॥
वाल्मीकचत्वरे चत्ये गृह्णाति नैर्ऋतो ग्रहः ॥ तेनासौ वर्त्तते
द्वेष्टि धावति मारयत्यपि ॥ ८ ॥ ह्तनेत्रो विवर्णास्यो बलिष्ठो
दुष्टचेतनः ॥ नदीतडागतीरे च चलति वारुणग्रहः ॥ ९ ॥
तेनास्यात्स्त्रवति लाला भृशं मूत्रयति नरः॥ नेत्रप्लावश्च दृश्येत
मूकवत्प्रविलोक्यते ॥१०॥ वातमण्डलीमध्ये च गृह्णाति मारु-
तग्रहः ॥ तेनास्यं शोषयेद्दीनः रोदित्यथ च कम्पते ॥ ११ ॥
विह्वलः श्रान्तनेत्रश्च निषीदति क्षुधातुरः ॥ हर्षगर्वाभिमाने च
गृह्णाति यक्षराड् ग्रहः॥१२॥तेन गर्वोद्धतश्चैव तथालंकारसु-
प्रियः ॥ १३ ॥ देवस्थाने च रम्ये च शिवग्रहश्छलप्रदः ॥
भस्माङ्गरागं कुरुते भ्रमते च दिगम्बरः ॥१४॥ शिवध्यानरतो
नित्यं गीतवाद्यप्रियस्तु सः ॥ १५ ॥ शून्यागारे शून्यकूपे
ग्रहको ग्रहनामकः ॥ क्षुधार्त्तो न तृषार्त्तश्च कथयन्न शृणोति च
॥ १६ ॥ उच्छिष्टे वाशुचौ यस्य छलति पिशाचग्रहः ॥ तेन
नृत्यति रौति वा गायति जल्पति तथा ॥ १७ ॥ मत्तवद्भ्रमते
नग्नो लालास्रावः क्षुधादिकः॥एवं दशग्रहाणाञ्च लक्षणं कथितं
३०
( ४६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
मया ॥१८॥ वक्ष्याम्यतः प्रतीकारं शृणु पुत्र समासतः॥जल-
स्नानं सातिशयं तथा च बलिकर्म च॥१९॥पूजां यथावाच्य-
मानां तेन संलभते सुखम् ॥२०॥ एलां जातिफलं मधुकयुगलं
रास्त्रा तथा खादिरः कर्पूरामलकी जटा बहुसुता घोण्टाम्लसारा-
स्तथा ॥ सीसं पारदसारदाडिमफलं मद्यैश्च संमीलितं प्रत्येकं
दधिदुग्धलाङ्कलरसैर्युक्तं समं कलिकतम् ॥२१॥ रसेन भावितं
तस्य गुटिका च प्रकल्पिता॥जयेच्चन्द्रप्रभा नाम तीव्रान्मोहा-
दिकान्गदान् ॥२२॥शुण्ठी मधुकसारञ्च चव्यं किंशुकमेव च॥
वचाहिंगुसमायुक्तं बस्तमूत्रेण संयुतत्॥देयं ग्रहविकारघ्नं ग्रहाणां
नाशनं परम् ॥ २३ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-देवताके शून्य मंदिरमें, श्मशानभूमिमें, मार्गमें और उजड़े पड़े
हुवे शहर ग्राम आदिककी गलियों बगीचेमें चौराहेमें ॥ १ ॥ मनमें त्रास होनेसे बलवंत ग्रह
लगजाते हैं,वे बलवंत ग्रह दश प्रकारके होते हैं उनको अब कहते हैं ॥ २ ॥ बड़े
अचार्योंने दश ग्रह कहे हैं और छ इक्कीस कहते हैं हे पुत्र ! उन दश ग्रहोंकी चिकि-
त्साको कहते हैं सुनो ॥ ३ ॥ ऐंद्र, आग्नेय, धर्मराज, राक्षस, वरुण, वायु, कुबेर, ऐशान्य
ग्रहक ॥ ४ ॥ पैशाचिक ऐसे ये दश ग्रहनायक हैं जो बगीचेमें तथा क्रीडास्थानमें देवताके
मंदिरमें मालूम हुआ हो ॥ ५ ॥ वह ऐंद्रग्रह जानलेना उससे हर्ष हो, कभी गावे, कभी अभि-
मानहो, कभी नहींहो और उन्मादसे ग्रस्तहुआ रहे ॥ ६ ॥ और आग्नेयग्रह श्मशान, चौराहा,
इनस्थानोंमें ग्रहण करता है इससे अत्यंत रोवे चारों ओर भय सहित देखे ॥ ७ ॥ और
युद्धकी भूमि, श्मशान, इनमें यमग्रह लगता है इससे विह्वल होजावे दीन हो और प्रेत
सरीखी चेष्टा करै ॥ ८ ॥ बँवई चौराहा यज्ञस्थान इनमें राक्षसग्रह लगता है इससे सबसे वैर
करता हुआ रहे भाजै किसीको मारदेवै ॥ ९ ॥ और वरुणग्रहंसे ग्रसित हुआ मनुष्यके
गर्वित नेत्र रहें वर्ण और मुख बिगडा हुआ रहे, बलवान् हो, दुष्टचित्त हो, नदी तालाबके
तीरपै चलता हुआ रहे ॥ १० ॥ लाल गिरे, बहुत ज्यादै मूते और नेत्रोंमें
जल भरा रहै गूंगासरीखा दीखै ॥ ११ ॥ और जो वायुके भंभूलेमें पीड़ित होवे मरुतग्रहसे
पीडित जानना उससे मुखमें शोषहो दीनहो कांपे और रोवे ॥ १२ ॥ और विह्वल हो
नेत्रोंमें हारसी रहै, पीड़ाहो क्षुधासे पीडितहो और कुबेर ग्रहसे ग्रसित वह होता है ॥ १३ ॥
जोकि हर्ष गर्व अभिमान इनसे युक्त रहै उस पुरुषके गर्भ उठारहे और गहिने पहननेमें
प्रियरहे ॥ १४ ॥ देवताके रमणीक स्थानमें शिवग्रहकी पीड़ा होती है इससे शरीरपे
अ० ५५ ] भाषाटीकासमेता । (४६७)
भस्म लगावे और नग्नहोके भ्रमता रहै ॥ १५ ॥ नित्य शिवजीके स्थानमें रत रहै, गीत-
बाजा इनमें रत रहै ॥ १६ ॥ और सूना मकान, सूना कूंवा इनमें ग्रहकनाम ग्रह पीड
करता है और क्षुधातृषासे युक्त नहीं हो और कुटिलता करै सुने नहीं ॥ १७ ॥
और जूठाहो अथवा अशुद्धहो तब पिशाच ग्रह पीडा करता है इससे नाचै और गावै और
रोवै और शब्द करै ॥ १८ ॥ और नग्नहोके मदोन्मत्तकी तरह भ्रमै लाल गिरे क्षुधा आदि-
कोंसे पीड़ित हो इस प्रकारसे मैंने दश ग्रहोंके लक्षण कह दिये ॥ १९ ॥ अब इनकी
चिकित्साको संक्षेप मात्रसे सुनो । अत्यन्त जलमें स्नान और बलि देनेका कर्म कही हुई पूजा
ऐसे करनेसे सुख होता है ॥ २० ॥ और इलायची, जायफल, मुलहटी, महुआ, राल,
खैर, कपूर, आंवला, जटामांसी, महाशतावरी, सुपारी, बिजौरा, सीसा, पारा, चिरौंजी,
अनारदाना, मदिरा इनको समान भागले कल्क बना ॥२१॥ पीछे दही, दूध, कलहारीका रस
इनमें भावनादे तिसकी गोली बना लेवे यह चंद्रप्रभा नामवाली गोली मोह अज्ञान आदिक
तीक्ष्णरोगोंको नाशती है ॥ २२ ॥ सूंठ, मधुकसार, चव्य, केश,वच, हींग इनको बकराके
मूत्रके साथ देना इससे ग्रहोंका नाश होताहै यह ग्रहविकारनाशक उपाय है ॥ २३ ॥
अथ ग्रहदोषनाशक धूप ।
बिडालविष्ठाहिमोचनिम्बमयूरपिच्छं समराजिका च॥निर्मो-
कपिण्डीतकसर्जमोचधूपं घृताक्तं ग्रहदोषशान्त्यै॥२४॥ चेतना
नाम गुटिका तथा ब्राह्मीघृतं स्मृतम् ॥ अपस्मारे प्रयुक्तानि
तानि चात्र प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
बिलावकी विष्ठा, कपूर, मोचरस, नींव, मोरका चन्दा इन सबोंके समान राई और सांपकी
कांचली, मैनफल, राल,मोखावृक्ष इनकी धूप बना उसमें घृत मिला धूप देनेसे ग्रहदोषकी शांति
होती है ॥ २४ ॥ पहली कही हुई चेतना नामवाली गुटिका और ब्राह्मीघृत और अपस्मार
रोगमें कहे हुए अन्य औषध इन सबोंको यहां ग्रहदोषमें देवे ॥ २५॥
अथ भूतेश्वरमन्त्र ।
गुग्गुलुं समधुघृतं तेन धूपेन धूपयेत् ॥ मन्त्रेण तेन हारीत
तर्जयेद्ग्रहपीडितम् ॥२६॥ॐ नमो भगवते भूतेश्वराय कलि-
कलिनखाय रौद्रदंष्ट्राकरालवक्राय त्रिनयनधगधगितपिशङ्ग-
ललाटनेत्राय तीव्रकोपानलामिततेजसे पाशशूलखट्वाङ्गडम-
रुकधनुर्बाणमुद्गराभयदण्डत्रासमुद्राव्ययद्संयदाद्रेदण्डमण्डि-
( ४६८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
ताय कपिलजटाजूटार्द्धचन्द्रधारिणे भस्मरागरञ्जितविग्रहाय
उग्रफणिकालकूटाटोपमण्डितकण्ठदेशाय जय जय भूतनाथा-
मरातम्ने रूपं दर्शय दर्शय नृत्य नृत्य चल चल पाशेन बन्ध
बन्ध हुङ्कारेण त्रासय त्रासय वज्रदण्डेन हन हन निशितख-
ड्गेन छिन्धि छिन्धि शूलाग्रेण भिन्धि भिन्धि मुद्गरेण चूर्णय
चूर्णय सर्वग्रहाणामावेशयावेशय स्वाहा ॥ २७ ॥
गूगल, शहद, घृत इन्होंकी धूप बनाके धूपित करे और हे हारीत ! ग्रहपीडित पुरुषको इस
मन्त्रसे ताडना दे ॥ २६ ॥ ओं नमो भगवते भूतेश्वराय कलिकलिनखाय रौद्रदंष्ट्राकरालवक्राय
त्रिनयनधगधगितपिशंगललाटनेत्राय तीव्रकोपानलामत्तिततेजसे पाशशूलखड्गाय डमरुकधनुर्बाणमुद्ग-
रामयदण्डत्रासमुद्रान्यद्यदसंयदाद्र्दंदंडमंडिताय कपिलजटाजूटार्द्धचन्द्रधारिणे भस्मरागरंजितविग्रहाय
उग्रफणि कालकूटाटोपमंडितकंठदेशाय जय जय भूतनाथामरात्मने रूपं दर्शय दर्शय नृत्य नृत्य
चल चल पाशेन बन्ध बन्ध हुंकारेण त्रासय त्रासय वज्रदण्डेन हन हन,निशितखड्गेन छिन्धि छिन्धि
शूलाग्रेण भिन्धि भिन्धि मुद्ररेण चूर्णय चूर्णय सर्वग्रहाणामावेशयावेशय स्वाहा ॥ २७ ॥
अथ आवेशमन्त्र।
ग्रहाविष्टेन चेत्तस्मै दीयते बलिरुत्तमः॥ मुक्तो भवति तस्माच्च
संशयो नास्ति तत्र च॥ २८ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे
तृतीयस्थाने भूतविद्यानाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५५ ॥
जिस पुरुषमें ग्रह प्रवेश होरहाहो उसके इस मंत्रको पढ़ ताड़ना दे जो ग्रह प्रवेश मालूम होता
हो उसी ग्रहके वास्ते बलिदान देनेसे वह पुरुष ग्रहसे छूट जाता है इसमें सन्देह नहीं ॥ २८ ॥
इति बेरीनिवा० वैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारी० भाषाटीकायां तृतीयस्थाने भूतविद्यानाम
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५६.
अथ विषतन्त्र।
आत्रेय उवाच ॥ द्विविधं विषमुद्दिष्टं स्थावरं जङ्गमं भिषक् ॥
शृङ्गिको वत्सनाभश्च तथा च शार्ङ्गवैरिकः ॥ १ ॥ दारकः
कालकूटश्च शंखःस्यात्सत्सुकन्दुकः॥हालाहलश्चाष्टभिश्चतथा-
अ० ५६ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६९ )
ष्टौ विषजातयः॥२॥ शृङ्गिकःकृष्णवर्णश्च वत्सनाभश्च पीतकः
॥ शुण्ठीसमानवर्णश्च शार्ङ्गवेरः स उच्यते ॥३॥ दारको हरित्-
र्णश्च कालकूटो मधुप्रभः॥शंखश्चातिविषाभासःपीताभःसत्सु-
कन्दुकः ॥४॥ हालाहलः कृष्णवर्णश्चाष्टौ चापि विजातयः ॥
पीतं विषं नरं दृष्ट्वा सद्यो वमनमुत्तमम्॥५॥ यावत्पीतातिवि-
षञ्च तावत्तु वमयेत्सदा ॥ सिञ्चेच्छीताम्भसा वक्त्रं मन्त्रपूतेन
सत्वरम् ॥ ६ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-हे वैद्य ! स्थावर और जंगम दो प्रकारका विष कहा है। शृंगिक,
वत्सनाम, शृंगवेरक ॥ १ ॥ दारक, कालकूट, शंख, सत्सुकंदुक, हालाहल ऐसे आठ प्रकारके
विष कहे हैं ॥ २ ॥ शृंगिक विष काला वर्णवाला, वत्सनाभ विष पीला होता है और जो
सोंठके समान आकार वर्णवालाहो वह शृंगवेरक विष होता है॥३॥ दारक विष हरावर्णवाला
और कालकूट विष शहद समान वर्णवाला होता है और शंख विष अतीसके समान होता है
और सत्सुकन्दुक विष पीला होता है॥ ४॥हालाहल विष कालावर्णवाला होता है ऐसे आठ प्रकारकी
विष जाति कही हैं जहर पीये हुए मनुष्यको देखि शीघ्र ही वमन करावे ॥ ५ ॥ जबतक पिये
हुए जहरको गेरे तबतक वमन कराता ही रहे और मन्त्रसे पवित्र हुआ शीतल जलसे उसके
मुखको सींचे ॥ ६ ॥
अथ मुखसिंचन मन्त्र ।
ॐ हर हर नीलकंठ ! अमृतं प्लावय प्लावय हुंकारेण विषं ग्रस
ग्रस क्लींङ्कारेण हर हर ह्रींकारेण अमृतं प्लावय प्लावय हर
हर नास्ति विष उच्चिरे उच्चिरे ॥ ७ ॥
ॐ हर हर नीलकंठ अमृतं प्लावय प्लावय हुंकारेण विषं ग्रस ग्रस क्लींकारेण हर हर ह्रौंका-
रेण अमृतं प्लावय प्लावय नास्ति विष उच्चिरे उच्चिरे ॥ ७ ॥
अथ कानमें जपनेके वास्तै मंत्र ।
ॐ नमो हर हर नीलग्रीव श्वेताङ्गसङ्ग जटाग्रमण्डितखण्डेन्दु-
स्फूर्तमन्त्ररूपाय विषमुपसंहर उपसंहर हर ३ नास्ति विष ३
उच्चिरे ३ इति कर्णेजपमन्त्रेण वारंवारं तालुमुखं सिञ्चेच्छीत-
वारिणा ॥ ८ ॥
(४७०) हारीतसंहिता। [तृतीयस्थाने-
ॐ नमो हर हर नीलग्रीव श्वेतांगसंगजटामण्डितखण्डेन्दुस्फूर्त्तमंत्ररूपाय विषमुपसंहर उपसं-
हर हर ३ नास्तिविष ३ उच्चिरे ३ इस कर्णेजपमंत्रसे वारंवार तालुवाको और मुखको
शीतल जलसे सींचे ॥८॥
अथ विषशमन औषध ।
ताण्डुलीयकमूलानि पिष्ट्वा चोष्णेन वारिणा ॥ पीतं पीतविषं
हन्ति वमने लाघवं भवेत् ॥९॥ काकजङ्घा सहचरीमूलं चैड-
गजस्य च ॥ कदरं कार्मुकञ्चापि त्वचं पीतोष्णवारिणा ॥ पीतं
तच्च विषं घोरं नाशयत्याश्वसंशयः ॥१०॥ खदिरस्य च मूलञ्च
तथा निम्बफलानि च ॥ उष्णोदकेन पीतानि जयेयुस्तत्क्षणाद्वि-
षम् ॥११॥ वत्साह्वञ्चाश्वगन्धाञ्च पीत्वा चोष्णेन वारिणा ॥
प्रपीतञ्च विषं पाति चाशु नरस्य वेदवाक् ॥१२॥ अथ प्रधान-
रक्तस्य क्षते रक्तं विषस्य च ॥ तस्य वक्ष्यामि भेषज्यं येन
सम्पद्यते सुखम् ॥१३॥ मर्मस्थाने मर्मगतं तदसाध्यं भवेन्म-
तम् ॥ साध्यञ्च तत्त्वग्रक्तस्थं मांसस्थं कष्टसाध्यकम् ॥१४॥
असाध्यं धातुसंप्राप्तं सखे वक्ष्यामि भेषजम् ॥ विषलिप्तं नरं
ज्ञात्वा ततः कुर्य्यात्प्रतिक्रियाम् ॥१५॥ रजनीयुग्ममम्लकेन
काञ्जिकेन तु पेषितम् ॥ लेपेन च विषं हन्ति प्रलिप्तं नात्र
संशयः ॥१६॥ मातुलुङ्गरसेनापि धावनं काञ्जिकेन वा ॥
अतिशीतेन तोयेन प्रलिप्तं नात्र संशयः ॥१७॥
चौलाईकी जड़को गरम जलके संग पिसि पीनेसे पीया हुआ विषका नाश होता : है और
वमन होके हलका होता है ॥९॥ कावली, पीला, कोरंटा, पुवाड़की जड़, सफेद खैरकी छाल
इनको गरम जलके संग पीनेसे घोर विषका नाश होता है ॥१०॥ खैरकी जड, नींवके फल,
निंबोली, इनको गरम जलके संग पीनेसे शीघ्र ही विषका नाश होता है ॥११॥ कूडाकी छाल,
असगंध इनको गरम जलके संग पीनेसे पीया हुआ विष दूर होता है ॥१२॥ इससे अनंतर
जो रक्तमें प्रधान उस विषके वास्ते उसकी औषधोंको कहेंगे उससे सुख होता है ॥१३॥ जो
मर्मस्थानमें विष प्राप्त हो जावे तब असाध्य जानना और त्वचा रक्त इनमें स्थित हुआ विष
कष्टसाध्य होता है ॥१४॥ और धातुमें प्राप्त हुआ विष असाध्य होता है, हे प्रिय ! उनकी
अ० ५६] भाषाटीकासमेता। (४७१)
औषधोंको कहते हैं विषसे लिये हुए मनुष्यको जानके पीछे उसकी चिकित्सा करे ॥ १५ ॥
दोनों हलदियोंको विजौराके रसमें और कांजीमें पीस लेप करनेसे शरीरके लिपा हुआ विषका
नाश होता है ॥ १६ ॥ विजौराके रससे अथवा कांजीसे तथा शीतल जलसे धोनेसे शरीरके
लिपा हुआ विषका नाश होता है ॥ १७ ॥
अथ जंगमविषकी चिकित्सा।
विषं जङ्गममित्युक्तमष्टधा भिषगुत्तम । दव्वीकरा मण्डलिनो
राजिमन्तश्च गुण्डसाः ॥ १८ ॥ वृश्चिको गोरकश्चापि तथा च
खण्डबिन्दुकः ॥ अलर्कमूषमार्जारविषं प्रोक्तमनेकधा ॥ १९ ॥
दव्वीकराणां सर्वेषामुत्तं वातात्मकं विषम् ॥ मण्डलीनाञ्च
सर्वेषां पैत्तिकं विषमुच्यते ॥ २० ॥ राजिमन्तश्च ये प्रोक्तास्तेऽपि
कफात्मका विषाः ॥ विचित्रगमनं मूर्द्धः पीडनं चातिदुर्भर्म् ॥
॥ २१ ॥ हृदये व्यथनं यस्य तमसाध्यं वदन्ति च ॥ नासारक्त-
स्रुतिर्यस्य नेत्रे प्लावश्च दृश्यते ॥ २२ ॥ जडा च जायते जिह्वा
तमसाध्यं विदुर्बुधाः ॥ यस्य लोमानि शीर्य्यन्ते पीताभं शरीरं
भवेत् ॥ २३ ॥ न स्थिरं मस्तकं यस्य तमसाध्यं भिषग्वर ॥
एभिर्विरहितं दृष्ट्वा कुर्य्यात्तस्य प्रतिक्रियाम् ॥ २४ ॥
हे उत्तम वैद्य ! जंगम विष आठ प्रकारका होता है। दर्वीकर सर्प, मंडलि, राजिमंत सर्प,
गुंडस ॥ १८ ॥ वृश्चिक, गोरक, खंडविंदुक, ऐसे इन सर्पोंके विष कहे हैं और कुत्ता, मूसा,
बिलाव इत्यादिकोंके अनेक विष कहे हैं ॥ १९ ॥ दर्वीकर अर्थात् करछी सरीखे फणवाले
सब सर्पोंका वातवाला विष होता है, मंडलवाले सर्पोंका पित्तवाला विष होता है ॥ २० ॥
और जो राजिमंत अर्थात् रेखावाले सर्प कहे हैं उनका कफवाला विष होता है और जिस
पुरुषका विचित्र गमन हो और मस्तकमें अत्यंत दुर्भर पीडा हो ॥ २१ ॥ जिसके
हृदामें पीड़ाहो विषवाले उस मनुष्यको असाध्य जाने और जिसकी नासिकासे रक्त झिरे
नेत्रोंमें पानी भरा रहे ॥ २२ ॥ जिह्वा जड होजावे उसको वैद्यजन असाध्य कहते हैं और
जिसके रोम विखर जावें और शरीर पीला होजावे ॥ २३ ॥ मस्तक स्थिर नहीं हो हे उत्तम-
वैद्य ! उसको असाध्य जाने और जो पुरुष इन लक्षणोंसे रहित हो उसका इलाज करे ॥२४॥
अथ विषबंधनमंत्रः ।
ॐ नमो भगवते सुग्रीवाय सकलविषोपद्रवशमनाय उग्रकाल-
( ४७२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
कूटविषक्वलिने विषं बन्ध बन्ध हर हर भगवतोनीलकण्ठस्या-
ज्ञा ॥ ॐ नमो हर हर विषं संहर संहर अमृतं प्लावय प्लावय
नासि अरेरे विष नीलपर्वतं गच्छ गच्छ नास्ति विषम् ॐ
हाहा ऊचिरे ३॥ अनेन मंत्रेण मुखमुदकेन त्रासयेत् ॥ ॐ नमो-
ऽरेरे हंस अमृतं पश्य पश्य ॥ २६ ॥
ॐ नमो भगवते सुग्रीवाय सकलविषोपद्रवशमनाय उग्रकालकूटविषक्वलिने विषं बंध २
हर २ भगवतो नीलकंठस्याज्ञा । ॐ नमो हरहर विषं संहर संहर अमृतं प्लावय प्लावय नासि
अरेरे विष ! नीलपर्वतं गच्छ गच्छ नास्ति विषम् ॐ हाहा ऊचिरे ३ ॥ इस मंत्रको तीनवार
पढ मुखपे जलके छिड़के मारे ॐ नमो अरेरे हंस ! अमृतं पश्य पश्य ॥ २६ ॥ इति मंत्रः ॥
अथ लेप ।
जयकूटं वचाकुष्ठं सैन्धवं मगधा निशा ॥ लेपो दष्टव्रणे प्रोक्तो
विषं हन्ति सुदारुणम् ॥ २६ ॥ सुरसा रजनी व्योषं यवानी
पारिभद्रकम् ॥ सर्पदष्टव्रणे प्रोक्तं लेपनं विषशान्तये ॥ २७ ॥
कुष्ठं मुस्ता अजाजी च विडङ्गं मधुयष्टिका ॥ गुञ्जामूलं शीततो-
यैर्लेपो मण्डलिना हितः ॥२८॥ राजिमन्तो विषा यस्य गृह-
धूमं वचा घनम् ॥ सर्षपाश्च यवानी च पिचुमन्दफलत्रयम् ॥
लेपनं राजिमताञ्चैव व्रणतैलेन संयुतम् ॥ २९ ॥
इति राजिमतां लेपः ।
लोहाका चूर्ण, वच, कूठ, सैंधानमक, पीपल, हलदी, इनका लेप दष्टव्रणमें कहा है यह
दारुण विषको नाशता है ॥ २६॥ और ब्राह्मी, हलदी, सोंठ, मिरच, पीपली, अजवायन, नींव
इनका लेप सर्पसे उपजा दष्टव्रणपे करना हित कहा है विषकी शांति होती है ॥ २७ ॥
कूठ, नागरमोथा, जीरा, वायविडंग, मुलहटी, चिरभटीकी जड इनको शीतल जलमें पीसि
लेप करनेसे मंडलवाले सर्पोंके विषका नाश होता है ॥ २८ ॥ रेखावाले सर्पोंके विषके
नाशकेवास्ते घरका धूँधा, वच, नागरमोथा, शिरसम, अजवायन, नींव, त्रिफला इनको व्रणमें
कहेहुए तेलमें पीसि लेप करे ॥ २९ ॥
सटीकिरातं सकटुत्रयं च वचाविशालापिचुमन्दकञ्च॥पथ्याय-
वानीरजनीद्वयञ्च दष्टव्रणे लेपनमेव शस्तम् ॥ ३० ॥ स्थावरं
अ० ५७ ] भाषाटीकासमेता । ( ५७३ )
जङ्गमं वापि विषं जग्धं भिषग्वर ॥ शीघ्रं दद्याद्व्यथां गुर्वी
प्रोक्तञ्च नरसत्तमैः ॥ ३१ ॥
कचूर, चिरायता, सोंठ, मिरच, पीपली, वच, इंद्रायण, नींव, हरड़ै, अजवायन, दोनों
हलदी इनका लेप दष्टव्रणमें करना श्रेष्ठ है ॥ ३० ॥ हे उत्तमः वैद्य ! स्थावर
अथवा जंगम भक्षण कियाहुआ विष शीघ्रही अत्यंत पीड़ा करता है ऐसा श्रेष्ठ मनुष्यों ने
कहा है ॥ ३१ ॥
अथ मंत्र ।
ॐ नमो भगवते शिरसिशिखराय अमृतधाराधौतसकलविग्र-
हाय अमृतकुम्भपरितोऽमृतं प्लावय प्लावय स्वाहा ॥ ३२ ॥
इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने विषतन्त्रं नाम षट्-
पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
ॐ नमो भगवते शिरसिशिखराय अमृतधाराधौतसकलविग्रहाय अमृतकुंभपरितोऽमृतं प्लावय
प्लावय स्वाहा ॥ ३२ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिता-
भाषाटीकायां तृतीयस्थाने विषतंत्रनाम षट्पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५७.
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अथ भिन्न अर्थात् शस्त्रआदिसे टूटेहुएकी चिकित्सा ।
आत्रेय उवाच ॥ छिन्नं भिन्नं तथा भग्नं घृष्टं पिष्टं तथैव च ॥
आस्फालितं सम्प्रहारः संघातः कथ्यते बुधैः ॥१॥ शस्त्रभिन्नं
नरं दृष्ट्वा कर्त्तव्या च प्रतिक्रिया ॥ २ ॥ अस्थिस्र्थं विद्यते
मांसमस्थि संच्छिद्यते यदि॥ शाखाप्रशाखयोर्वापि छिन्नं तच्च
निगद्यते॥३॥असन्धौ परिसंच्छिन्नं तदसाध्यं विनिर्दिशेत् ॥
खड्गार्द्धचन्द्रपरशुच्छिन्नं तु कथितं सदा॥४॥तस्यादौ चारणा-
लेपधावनं परिकीर्त्तितम् ॥ पिचुना तिलतैलेन शीघ्रं संस्वेदना-
न्वितम् ॥५॥यावद्वै स्रवती रक्तं तावत्तैलेन चाभ्यजेत्॥रक्ते वै
विक्रतिं प्राप्ते तैलेनाभ्यञ्जनं मतम् ॥६॥शोफाद्याश्च प्रजायन्ते