हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
मया ॥१८॥ वक्ष्याम्यतः प्रतीकारं शृणु पुत्र समासतः॥जल-
स्नानं सातिशयं तथा च बलिकर्म च॥१९॥पूजां यथावाच्य-
मानां तेन संलभते सुखम् ॥२०॥ एलां जातिफलं मधुकयुगलं
रास्त्रा तथा खादिरः कर्पूरामलकी जटा बहुसुता घोण्टाम्लसारा-
स्तथा ॥ सीसं पारदसारदाडिमफलं मद्यैश्च संमीलितं प्रत्येकं
दधिदुग्धलाङ्कलरसैर्युक्तं समं कलिकतम् ॥२१॥ रसेन भावितं
तस्य गुटिका च प्रकल्पिता॥जयेच्चन्द्रप्रभा नाम तीव्रान्मोहा-
दिकान्गदान् ॥२२॥शुण्ठी मधुकसारञ्च चव्यं किंशुकमेव च॥
वचाहिंगुसमायुक्तं बस्तमूत्रेण संयुतत्॥देयं ग्रहविकारघ्नं ग्रहाणां
नाशनं परम् ॥ २३ ॥
आत्रेयजी कहते हैं-देवताके शून्य मंदिरमें, श्मशानभूमिमें, मार्गमें और उजड़े पड़े
हुवे शहर ग्राम आदिककी गलियों बगीचेमें चौराहेमें ॥ १ ॥ मनमें त्रास होनेसे बलवंत ग्रह
लगजाते हैं,वे बलवंत ग्रह दश प्रकारके होते हैं उनको अब कहते हैं ॥ २ ॥ बड़े
अचार्योंने दश ग्रह कहे हैं और छ इक्कीस कहते हैं हे पुत्र ! उन दश ग्रहोंकी चिकि-
त्साको कहते हैं सुनो ॥ ३ ॥ ऐंद्र, आग्नेय, धर्मराज, राक्षस, वरुण, वायु, कुबेर, ऐशान्य
ग्रहक ॥ ४ ॥ पैशाचिक ऐसे ये दश ग्रहनायक हैं जो बगीचेमें तथा क्रीडास्थानमें देवताके
मंदिरमें मालूम हुआ हो ॥ ५ ॥ वह ऐंद्रग्रह जानलेना उससे हर्ष हो, कभी गावे, कभी अभि-
मानहो, कभी नहींहो और उन्मादसे ग्रस्तहुआ रहे ॥ ६ ॥ और आग्नेयग्रह श्मशान, चौराहा,
इनस्थानोंमें ग्रहण करता है इससे अत्यंत रोवे चारों ओर भय सहित देखे ॥ ७ ॥ और
युद्धकी भूमि, श्मशान, इनमें यमग्रह लगता है इससे विह्वल होजावे दीन हो और प्रेत
सरीखी चेष्टा करै ॥ ८ ॥ बँवई चौराहा यज्ञस्थान इनमें राक्षसग्रह लगता है इससे सबसे वैर
करता हुआ रहे भाजै किसीको मारदेवै ॥ ९ ॥ और वरुणग्रहंसे ग्रसित हुआ मनुष्यके
गर्वित नेत्र रहें वर्ण और मुख बिगडा हुआ रहे, बलवान् हो, दुष्टचित्त हो, नदी तालाबके
तीरपै चलता हुआ रहे ॥ १० ॥ लाल गिरे, बहुत ज्यादै मूते और नेत्रोंमें
जल भरा रहै गूंगासरीखा दीखै ॥ ११ ॥ और जो वायुके भंभूलेमें पीड़ित होवे मरुतग्रहसे
पीडित जानना उससे मुखमें शोषहो दीनहो कांपे और रोवे ॥ १२ ॥ और विह्वल हो
नेत्रोंमें हारसी रहै, पीड़ाहो क्षुधासे पीडितहो और कुबेर ग्रहसे ग्रसित वह होता है ॥ १३ ॥
जोकि हर्ष गर्व अभिमान इनसे युक्त रहै उस पुरुषके गर्भ उठारहे और गहिने पहननेमें
प्रियरहे ॥ १४ ॥ देवताके रमणीक स्थानमें शिवग्रहकी पीड़ा होती है इससे शरीरपे