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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

अ० ५२ ] भाषाटीकासमेता । ( ४५५ )
अथ उत्पत्तिके उपायके वास्ते मंत्र और औषध ।
लाङ्गल्या मूलेन उष्णेन वारिणा योषितां नाभिलेपेन शीघ्रं
गर्भो जायत प्रसूयते च ॥ बलामूलं सूर्यकान्तिसोमवल्लीकानि
कज्जलेन पिष्ट्वा लेपनं करोतु ॥ १८ ॥
कलहारीकी जड़को गरम जलमें पीस गर्भवती स्त्रियोंको नाभिपे लेप करनेसे शीघ्रही बालक
उत्पन्न होता है और खरेहटीकी जड,सूर्यमुखी,चांदवेल इनको कजलके संग लेप करना हित है १८
अथ सुखसे बालकहोनेका यत्न ।
भीरुभूनिम्बवार्त्ताकी मूलञ्च पिप्पलीयकम्॥यवान्यग्रवचाःपिष्ट्वा
तथा चोष्णेन वारिणा ॥ १९ ॥ नाभिदेशादधस्ताच्च प्रलेपेन
प्रसूयते॥मूलञ्च लाङ्गलिक्याश्च देवदाल्याश्च तुम्बिका ॥२०॥
कोशातक्यादिकं सर्वं लेपने परिकल्पितम् ॥ सूतिलेपाःस्त्रियो
ह्येते सुखेन सा प्रसूयते ॥ २१ ॥
शतावरी, चिरायता, वार्त्ताकी, कटेइलीका भेद, उसकी जड़, पीपली, अजवायन, वच,
इनको गरम जलके संग पीस ॥ १९ ॥ नाभिस्थानसे नीचेको लेप करनेसे बालक उत्पन्न होता
है और कलहारीकी जड़, देवताडकी जड, तुंबी ॥ २० ॥ कडवी तोरी, इनको पीस लेप
करना श्रेष्ठ है । कहे हुए ये सब लेप करनेसे स्त्री सुखसे बालकको जनती है ॥ २१ ॥
अथ मन्त्रः ।
हिमवदुत्तरे कूले सुरसा नाम राक्षसी ॥ तस्या नूपुरशब्देन
विशल्या गुर्विणी भवेत् ॥२२॥ ऐं ह्रीं भगवति!भगमालिनि !
चल चल आमय पुष्पं विकाशय विकाशय स्वाहा ॥ॐनमो
भगवते मकरकेतवे पुष्पधन्विने प्रतिचालितसकलसुरासुरचि-
त्ताय युवतिभगवासिने ह्रीं गर्भं चालय चालय स्वाहा ॥
एभिर्मन्त्रितं पयः पाययेत्तेन सुखप्रसवः ॥ २३ ॥
हिमवान् पर्वतकी दाहिनी तरफको किनारेपे सुरसा नामवाली राक्षसी रहती है उसके नूपुर
विछुवोंके शब्दसे मूढ़गर्भवाली स्त्री बालकको जनती है ॥ २२ ॥ ऐं ह्रीं भगवति भगमालिनि
चलचल,आमय पुष्पं विकाशय विकाशय स्वाहा । ॐनमो भगवते मकरकेतवे पुष्पधन्विने प्रतिचा-
लितसकलसुरासुरचित्ताय युवतिमगवासिने ह्रीं गर्भ चालय चालय स्वाहा,इन मंत्रोंसे पढ़ाहुआ दूध
पिलावे इससे सुखसे बालक होता है ॥ २३ ॥