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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 499

अ० ५५ ] भाषाटीकासमेता । (४६७)
भस्म लगावे और नग्नहोके भ्रमता रहै ॥ १५ ॥ नित्य शिवजीके स्थानमें रत रहै, गीत-
बाजा इनमें रत रहै ॥ १६ ॥ और सूना मकान, सूना कूंवा इनमें ग्रहकनाम ग्रह पीड
करता है और क्षुधातृषासे युक्त नहीं हो और कुटिलता करै सुने नहीं ॥ १७ ॥
और जूठाहो अथवा अशुद्धहो तब पिशाच ग्रह पीडा करता है इससे नाचै और गावै और
रोवै और शब्द करै ॥ १८ ॥ और नग्नहोके मदोन्मत्तकी तरह भ्रमै लाल गिरे क्षुधा आदि-
कोंसे पीड़ित हो इस प्रकारसे मैंने दश ग्रहोंके लक्षण कह दिये ॥ १९ ॥ अब इनकी
चिकित्साको संक्षेप मात्रसे सुनो । अत्यन्त जलमें स्नान और बलि देनेका कर्म कही हुई पूजा
ऐसे करनेसे सुख होता है ॥ २० ॥ और इलायची, जायफल, मुलहटी, महुआ, राल,
खैर, कपूर, आंवला, जटामांसी, महाशतावरी, सुपारी, बिजौरा, सीसा, पारा, चिरौंजी,
अनारदाना, मदिरा इनको समान भागले कल्क बना ॥२१॥ पीछे दही, दूध, कलहारीका रस
इनमें भावनादे तिसकी गोली बना लेवे यह चंद्रप्रभा नामवाली गोली मोह अज्ञान आदिक
तीक्ष्णरोगोंको नाशती है ॥ २२ ॥ सूंठ, मधुकसार, चव्य, केश,वच, हींग इनको बकराके
मूत्रके साथ देना इससे ग्रहोंका नाश होताहै यह ग्रहविकारनाशक उपाय है ॥ २३ ॥
अथ ग्रहदोषनाशक धूप ।
बिडालविष्ठाहिमोचनिम्बमयूरपिच्छं समराजिका च॥निर्मो-
कपिण्डीतकसर्जमोचधूपं घृताक्तं ग्रहदोषशान्त्यै॥२४॥ चेतना
नाम गुटिका तथा ब्राह्मीघृतं स्मृतम् ॥ अपस्मारे प्रयुक्तानि
तानि चात्र प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
बिलावकी विष्ठा, कपूर, मोचरस, नींव, मोरका चन्दा इन सबोंके समान राई और सांपकी
कांचली, मैनफल, राल,मोखावृक्ष इनकी धूप बना उसमें घृत मिला धूप देनेसे ग्रहदोषकी शांति
होती है ॥ २४ ॥ पहली कही हुई चेतना नामवाली गुटिका और ब्राह्मीघृत और अपस्मार
रोगमें कहे हुए अन्य औषध इन सबोंको यहां ग्रहदोषमें देवे ॥ २५॥
अथ भूतेश्वरमन्त्र ।
गुग्गुलुं समधुघृतं तेन धूपेन धूपयेत् ॥ मन्त्रेण तेन हारीत
तर्जयेद्ग्रहपीडितम् ॥२६॥ॐ नमो भगवते भूतेश्वराय कलि-
कलिनखाय रौद्रदंष्ट्राकरालवक्राय त्रिनयनधगधगितपिशङ्ग-
ललाटनेत्राय तीव्रकोपानलामिततेजसे पाशशूलखट्वाङ्गडम-
रुकधनुर्बाणमुद्गराभयदण्डत्रासमुद्राव्ययद्‌संयदाद्रेदण्डमण्डि-