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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पृष्ठ 495

अ० ५४ ] भाषाटीकासमेता । ( ४६३ )
रेत् ॥ षष्ठे च दिवसे प्राप्ते शिवा नाम कुमारिका ॥५०॥ रौति
निःश्वसिति तेन वमति कम्पते तथा ॥ स्तन्यञ्च नाहरेद्बालो
ज्वरातीसारपीडितः ॥५१॥ तस्यै बलिः प्रदेयश्च सप्तव्रीहिम-
यश्चरुः॥पायसैर्दधिदीपैश्च पूज्या सा तिलचूर्णकैः॥५२॥ गन्ध-
पुष्पाक्षतैर्धूपैःपूजयेन्मृण्मयाकृतिम्॥ऐशानीं दिशमाश्रित्याप-
राह्ने बलिमाहरेत् ॥५३॥ सप्तमेऽह्नि पूतनाया उर्ध्वकेश्याःशि-
शौ तथा॥पूर्ववद्दृश्यते चिह्नं तथैव बलिमाहरेत् ॥५४॥ अष्टमे
दिवसे प्राप्ते सेना नाम च पूतना ॥ तया गृहीतः श्वसिति
हस्तौ कम्पयते भृशम् ॥५५॥ तस्य दध्योदनं दद्यात्तिलचूर्ण-
ञ्च पोलिकाम् ॥ धूपदीपगन्धपुष्पताम्बूलान्यक्षतानि च ॥
॥ ५६ ॥ आग्नेयीं दिशमाश्रित्य प्रदोषे बलिमाहरेत् ॥ एवं
क्रमेण मासस्य वर्षस्य बलिकर्म च ॥ ५७ ॥ इत्यात्रेयभाषिते
हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने बालचिकित्सानाम चतुःपञ्चाशत्तमो-
ऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इति कौमारतन्त्रम् ॥
शून्य मकानमें और देवताओंके मंदिरमें तथा देवताओंकी मूर्त्तिके समीपमें, चौराहामें तथा
नदीके संगममें भयसे क्षुभित बालक होजावे ॥ ३१ ॥ तब हे उत्तम वैद्य ! उस बालकको
पूतना ग्रहण करलेती है ॥ ३२ ॥ और लोहिता, रेवती, ध्वांक्षी, कुमारी, शाकुनी, शिवा,
उर्ध्वकेशी, सेना, ऐसे आठ प्रकारकी पूतना होती हैं ॥ ३३ ॥ और अन्य पूतनाओंके नाम
तू अब मुझसे सुनो । रोहिणी, विजया, काली, कृत्तिका, डाकिनी, विशा ॥ ३४ ॥ भूत-
केशी, कृशांगी, ये आठ कही हैं इनके लक्षण और पूजा, बलिके क्रमको कहते हैं सुनो
॥ ३५ ॥ जन्ममात्र लियेहुए बालकके लोहिता पूतना लगती है उससे बालकमें बुरी गंध
आवे वारंवार रोवै ॥ ३६ ॥ उसकी बलिको कहेंगे इससे सुख होता है और जन्मसे
दूसरेदिन बालकको रेवती नामवाली पूतना ग्रहण करती हैं ॥ ३७ ॥ इससे रोवे और वारं-
वार कांपे तहां काली मृत्तिकाकी मूर्त्ति बनाके गंध चंदन ॥ ३८ ॥ खीचडी, रालका चूर्ण,
दीप, धूप, अक्षत, नागरपान, काला सूत इनसे पूजन कर इनको नैर्ऋत दिशामें गेर
देवे ॥ ३९ ॥ और जन्मसे तीसरे दिन बालकको वायसी नामवाली पूतना ग्रहण करती
है इससे ग्रहण होनेसे बालक रोवै चूंती नहीं पीवे ॥ ४० ॥ ज्वर हो, अतिसार हो, वारंवार
काककी तरह पुकारे उस पूतनाके वास्ते दही, चावल, जवोंकी कृशरा, पोलिका ॥ ४१ ॥