हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४७२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
कूटविषक्वलिने विषं बन्ध बन्ध हर हर भगवतोनीलकण्ठस्या-
ज्ञा ॥ ॐ नमो हर हर विषं संहर संहर अमृतं प्लावय प्लावय
नासि अरेरे विष नीलपर्वतं गच्छ गच्छ नास्ति विषम् ॐ
हाहा ऊचिरे ३॥ अनेन मंत्रेण मुखमुदकेन त्रासयेत् ॥ ॐ नमो-
ऽरेरे हंस अमृतं पश्य पश्य ॥ २६ ॥
ॐ नमो भगवते सुग्रीवाय सकलविषोपद्रवशमनाय उग्रकालकूटविषक्वलिने विषं बंध २
हर २ भगवतो नीलकंठस्याज्ञा । ॐ नमो हरहर विषं संहर संहर अमृतं प्लावय प्लावय नासि
अरेरे विष ! नीलपर्वतं गच्छ गच्छ नास्ति विषम् ॐ हाहा ऊचिरे ३ ॥ इस मंत्रको तीनवार
पढ मुखपे जलके छिड़के मारे ॐ नमो अरेरे हंस ! अमृतं पश्य पश्य ॥ २६ ॥ इति मंत्रः ॥
अथ लेप ।
जयकूटं वचाकुष्ठं सैन्धवं मगधा निशा ॥ लेपो दष्टव्रणे प्रोक्तो
विषं हन्ति सुदारुणम् ॥ २६ ॥ सुरसा रजनी व्योषं यवानी
पारिभद्रकम् ॥ सर्पदष्टव्रणे प्रोक्तं लेपनं विषशान्तये ॥ २७ ॥
कुष्ठं मुस्ता अजाजी च विडङ्गं मधुयष्टिका ॥ गुञ्जामूलं शीततो-
यैर्लेपो मण्डलिना हितः ॥२८॥ राजिमन्तो विषा यस्य गृह-
धूमं वचा घनम् ॥ सर्षपाश्च यवानी च पिचुमन्दफलत्रयम् ॥
लेपनं राजिमताञ्चैव व्रणतैलेन संयुतम् ॥ २९ ॥
इति राजिमतां लेपः ।
लोहाका चूर्ण, वच, कूठ, सैंधानमक, पीपल, हलदी, इनका लेप दष्टव्रणमें कहा है यह
दारुण विषको नाशता है ॥ २६॥ और ब्राह्मी, हलदी, सोंठ, मिरच, पीपली, अजवायन, नींव
इनका लेप सर्पसे उपजा दष्टव्रणपे करना हित कहा है विषकी शांति होती है ॥ २७ ॥
कूठ, नागरमोथा, जीरा, वायविडंग, मुलहटी, चिरभटीकी जड इनको शीतल जलमें पीसि
लेप करनेसे मंडलवाले सर्पोंके विषका नाश होता है ॥ २८ ॥ रेखावाले सर्पोंके विषके
नाशकेवास्ते घरका धूँधा, वच, नागरमोथा, शिरसम, अजवायन, नींव, त्रिफला इनको व्रणमें
कहेहुए तेलमें पीसि लेप करे ॥ २९ ॥
सटीकिरातं सकटुत्रयं च वचाविशालापिचुमन्दकञ्च॥पथ्याय-
वानीरजनीद्वयञ्च दष्टव्रणे लेपनमेव शस्तम् ॥ ३० ॥ स्थावरं