गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
8 गणितसारसंग्रह
गणना शैली का द्योतक है । इनके ग्रंथ आर्यभटीय से ज्ञात होता है कि इन्होंने सब ग्रंथों का सार
ग्रहणकर अपने समय के ज्योतिष ज्ञान को बढ़ाने में अभूतपूर्व कार्य किया । इन्होंने सूर्य तारों को स्थिर
बतलाया, पृथ्वी की परिधि निश्चित की और सूर्य, चंद्र ग्रहण के कारणों का वैज्ञानिक ढंग से स्पष्टीकरण
किया । इस ग्रंथ के गणित पाद अध्याय में अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित के बहुत से कठिन
प्रश्नों को ३० श्लोकों में भर दिया गया है । उसमें उन्होंने क्षेत्रफल, घनफल, त्रिकोणमिति, छाया
सम्बन्धी प्रश्न, वृत्त की जीवा और शरों का सम्बन्ध, दो राशियों का गुणनफल और अन्तर जान कर
राशियों को अलग करने की रीति, वर्ग समीकरण का एक उदाहरण, त्रैराशिक, भिन्नों के गुणन भाग की
रीति, कुछ कठिन समीकरणों को हल करने के नियम, दो ग्रहों का युतिकाल जानने का नियम, और
कुट्टक नियमादि का कथन किया है । ज्या का वाचक शब्द साइन, ज्या की संस्कृत पर्याय 'शिंजनी' के
रूपांतर का अपभ्रंश है ।
सातवीं सदी* में गणित का प्रशंसनीय विकास ब्रह्मगुप्त द्वारा हुआ । २१ अध्याय के ग्रंथ ब्राह्म-
स्फुट के गणिताध्याय में इन्होंने विशेषतः व्यस्त त्रैराशिक, भाण्ड प्रतिभाण्ड, मिश्रक व्यवहार, ब्याज,
श्रेणियाँ, छाया माप आदि में अंकगणित का प्रयोग किया, और कुट्टक गणित में ऋणात्मक संख्याओं के लिये
नियम निकाले, अनिर्धृत (indeterminate) समीकरणों पर कार्य किया, और सूर्य घड़ी में त्रिकोणमिति
का प्रयोग किया । अ क्ष² + १ = य², (जिसमें क्ष और य अज्ञात है) जैसे अनिर्धृत समीकरणों का
विवेचन भी ग्रंथकार ने किया । इस समीकरण का नाम भूल से पेलियन (Peleian) समीकरण पड़ गया
है । यह द्विघातीय वर्ग रूपों और वर्ग क्षेत्रों के अंकगणितीय सिद्धान्तों का मूलभूत आधार है । इनके
सिवाय क्षेत्र व्यवहार, वृत्तक्षेत्र गणित, खात व्यवहार, चिति व्यवहार, क्रकचिका व्यवहार, राशि, छाया
व्यवहार आदि का विवेचन भी किया गया है ।
- इस सदी में मुसलमानों की संस्कृति के सहसा उत्थान तथा १२ वीं सदी में उसके सहसा
पतन के सम्बन्ध में इतिहास बड़ा रोचक है । सन् ६२२ में पैगम्बर मुहम्मद साहिब के अनुयायी अपनी
यात्राओं पर हरे झंडे के नीचे संगठित होकर चल पड़े । सन् ६३५ में दमसक (Damascus) पर विजय
प्राप्त कर सन् ६३७ में जेरुसलम (यरूशलम) जीता गया । चार वर्ष पश्चात् सिकन्दरिया का पुस्तकालय
नष्ट किया गया । मिस्र को अधिकार में लेकर ६४२ ईस्वी में फारस पर आधिपत्य जमाया गया । १०० वर्ष
पश्चात् विजेतागण ७११ ईस्वी में स्पेन में पहुँचे, जहाँ उन्होंने सभ्यता को ८ शताब्दियों तक बढ़ाया ।
इसी काल में वे भारत की अंकगणित तथा ग्रीस की रेखागणित को यूरोप ले आये । पूर्व में अब्बासीद
(Abbasid) खलीफाओं के आधिपत्य में बगदाद पूर्व की सभ्यता का केन्द्र ७५० से १२५८ ईस्वी
तक रहा, और स्पेन में कारडोवा (Cordova) पश्चिम की बौद्धिक रानी (the intelle-
ctual queen of the west) बना । इस अन्तराल में विज्ञान के आदान-प्रदान के सम्बन्ध में
Encyclopaedia Britannica में निम्नलिखित उल्लेख है—“The muslim civilization, parti-
cularly as represented at Baghdad, c 800. c 1000, developed a type of mathe-
matics which combined the characteristic features of the Greek and Hindu treat-
ment of the science. Eastern faith in astrology and skill in number met with Western
faith in philosophy and skill in geometry, and the Baghdad scholars, absorbing
each, produced text books in general algebra, elementary number, astronomy
and trigonometry which, through the efforts of Latin translators, gave new life to
mathematics in Europe"-vol. 15, p 84, (1929)
प्रस्तावना 9
इसके पहिले कि हम दक्षिण में गणित की प्रगति महावीराचार्य के ग्रंथ से प्रदर्शित करें, एक और
नवीन खोज हमें आकर्षित कर लेती है । महावीराचार्य के सम्भवतः पूर्वकालीन, सुप्रसिद्ध धवलाकार
वीरसेनाचार्य ने ईसा की सम्भवतः द्वितीय सदी के उद्भट आचार्य श्री पुष्पदंत और भूतबलि द्वारा रचित
षट्खंडागम ग्रंथों की धवला नामक टीका पूर्ण करने में अपना सारा जीवन अर्पित किया । यह ग्रंथमाला गत
बीस वर्षों में ही डाक्टर हीरा लाल जैन प्रभृति विद्वानों द्वारा प्रकाश में लाई गई है । टीकाकार ने स्थान
स्थान पर किन्हीं गणित ग्रंथों से, सूत्रों को उद्धृत किया है । डा० अवधेशनारायण सिंह द्वारा इस ग्रंथ
के शांकव गणित के अतिरिक्त गणित की नवीन निम्नलिखित खोजें प्रकाश में लाई गई हैं,† जिनका
उपयोग जैन दर्शन के अध्ययन हेतु संभवतः ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में प्रचलित हो गया होगा ।
प्रथम तो बड़ी बड़ी संख्याओं का उपयोग जिनको व्यक्त करने के लिये प्रतीक संकेतना अन्य ग्रन्थों में
उपलब्ध है ।‡ जैसे, २ की तीसरी वर्गित संवर्गित राशि वह है जो २५६ में उसीका २५६ बार गुणन करने
पर प्राप्त होती है । दूसरे सलागागणन अथवा लघुगणक ( logarithm ) का बृहत् उपयोग, जिसके
आविष्कारक १७ वीं सदी के 'जान नेपियर' एवं 'जुस्त बर्गी' माने जाते हैं । तीसरे, अनन्त राशियों का
गणित, जिसके विकास के लिये १९ वीं सदी में हुए जार्ज केंटर के प्रयत्न सुप्रसिद्ध हैं। जहाँ तक
रेखागणित का सम्बन्ध है, यतिवृषभ ( ४०० ?, ६०० ? ईस्वी पश्चात् ) की तिलोय पण्णत्ती में एवं
वीरसेन की धवला टीका ( डा० हीरालाल जैन द्वारा सम्पादित, पुस्तक ४ ) में सम्भवतः ईसा पूर्व के ग्रंथ
अग्गयणिय, दिट्ठिवाद, परिकम्म, लोयविणिच्छय, लोय विभाग, लोगाइणि आदि में से उद्धृत गाथायें एवं
उल्लेख महत्वपूर्ण हैं । इन दो ग्रंथों के ऐतिहासिक महत्वपूर्ण प्रकरणों में से कुछ ये हैं : दृष्टिवाद से जम्बूद्वीप
की परिधि का माप, उपमा प्रमाण, विविध क्षेत्रों का घनफल निकालने की विधियाँ; बाण, जीवा, धनुष
पृष्ठ आदि में सम्बन्ध, धनुषक्षेत्र का क्षेत्रफल, सजातीय तथा समक्षेत्र घनफल वाली आकृतियों का रूपान्तर
एवं उनकी भुजाओं के बीच सम्बन्ध आदि ।
इस प्रकार धवलादि सिद्धान्त ग्रंथों में अलौकिक गणित का आधार लिया गया है, जिस पर अभी
कोई ग्रंथ प्रकाश में नहीं आया है । लौकिक गणित के सम्बन्ध में सर्वप्रथम महावीराचार्य का यह
गणित सारसंग्रह नामक ग्रंथ सम् ९११२ में सुप्रसिद्ध हुआ। महावीराचार्य का यह ९ अध्याय वाला
ग्रंथ ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ । इसकी खोज ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत के सुदूर
दक्षिण में भी उत्तर के विद्या केन्द्रों की तरह, विद्या के केन्द्र थे । इस सुदूर दक्षिण में, गणित के विज्ञान
को बढ़ाने में उस समय प्रयत्न किया गया, जब कि उत्तरीय भारत में ब्रह्मगुप्त और भास्कर के समय के
† इनके विस्तृत विवरण के लिये निम्नलिखित लेख देखिये—
Singh, A. N., History of Mathematics in India from Jain Sources; The Jain
Antiquary Vol. XV, No. II. ( 1949 ), pp. 46-53; Vol. XVI, No. II, ( 1950 )
pp. 54-69.
‡ देखिये—
(१) लक्ष्मीचंद्र जैन, तिलोयपण्णत्ती का गणित, प्रस्तावना लेख ( जम्बूदीवपण्णत्तीसंगहो ),
शोलापुर ( १९५८ ) ।
(२) टोडरमल, अर्थ संदृष्टि ( गोम्मटसार ), गांधी हरि भाई देवकरण जैनग्रंथमाला, कलकत्ता
( प्रकाशन वर्ष उल्लिखित नहीं )
10 गणितसारसंग्रह
बीच श्रीधराचार्य को छोड़कर कोई प्रकांड गणितज्ञ न हुआ । महावीराचार्य ने अपने समय के नृपतुंग
अमोघवर्ष के आश्रय में रहकर, पूर्ववर्ती गणितज्ञों के कार्य में कुछ सुधार किया, नवीन प्रश्न दिये, दीर्घवृत्त
(ellipse) का क्षेत्रफल निकाला तथा मूलबद्ध और द्विघातीय समीकरण आदि में सुंदर ढंग से पहुँच की ।
इनके ग्रन्थ में ब्रह्मदत्त के कुट्टक से एक और अध्याय अधिक है, पर इसके अध्यायों के विषय एकसे नहीं
हैं । सबसे पहिले, इस ग्रंथ की ४९ वीं गाथा पढ़ने से मालूम होता है कि महावीराचार्य ने शून्य के
विषय में सबसे पहिले भाग करने की क्रिया दर्शाने का साहसपूर्ण प्रयत्न किया । किसी संख्या में शून्य द्वारा
विभाजन के लिए, उन्होंने लिखा कि संख्या शून्य द्वारा विभाजित होने पर बदलती नहीं है । जिस दृष्टिकोण
को लेकर यह लिखा गया वह इसलिए ठीक है कि जब कुछ वस्तुओं को लेकर उन्हें कुछ व्यक्तियों में
बाँटा जाय तो वे वस्तुएँ विभाजित हो जावेंगी । जब उन्हें शून्य व्यक्तियों में वितरित करना हो,
अर्थात् बाँटना हो तो वस्तुएँ ज्यों की त्यों बच रहेंगी । पर, गणितीय विश्लेषण के दृष्टिकोण से
सीमा क
न → ० — = ∞
न
होती है जहां क एक परिमित ( finite ) संख्या है ।
इसके पश्चात् , गाथा ६३ से लेकर ६८ तक संकेतनात्मक स्थानों के नाम दिये गये हैं । उनके
पहिले १९ वें स्थान तक संख्या की गणना के नाम दिये जा चुके थे । उन्होंने २४ स्थान तक नाम दिये
जिसमें २४ वें स्थान का नाम महाक्षोभ लिखा है । ये २४ स्थान, सम्भवतः २४ तीर्थंकरों की संख्या
के आधार पर दिये गये होंगे । इसी तरह रत्न शब्द को “तीन” दर्शाने के लिए उपयोग किया गया,
जबकि गणितज्ञों ने उसका उपयोग “पांच” दर्शाने के लिये किया । जैन दर्शन में सम्यक्दर्शन ज्ञान चारित्र
को रत्नत्रय कहा गया है । इसी प्रकार तत्व, पन्नग, भय, कर्म आदि कई शब्दों का उपयोग जैन दर्शन के
आधार पर संख्यायें दर्शाने के लिये किया गया है । बड़ी संख्या को दर्शाने के लिए ग्रन्थकार ने स्थानार्हो
का उपयोग किया है । जैसे, ३०२१ लिखने के लिए चंद्र, अक्षि, आकाश, अग्नि लिखा है ।
ग्रंथकार ने भाग देने की एक वर्त्तमान विधि का कथन किया है । इस सुविधाजनक विधि से
उभयनिष्ठ गुणनखंडों को हटाकर विभाजन किया जाता है । किसी भी भिन्न को इकाई भिन्नों की किसी
संख्या के योग द्वारा व्यक्त करने के लिए कुछ नियम भी दिये गये हैं । ये नियम सर्वथा मौलिक हैं ।
मिश्रक व्यवहार में भी दो नये प्रकार के प्रश्नों को हल करने के लिए नियम दिये गये हैं । ब्याज निकालने
के प्रश्न में गाथा ( ३८ ) में दिये गये सूत्र से पता चलता है कि महावीराचार्य को निम्नलिखित सर्वसमिका
( identity ) ज्ञात थी :
अ स इ अ + स + इ + ...
— = — = — = ......... = —————————————— साथही, ( अ + ब )³ = अ³ + ३अ²ब
ब द फ ब + द + फ + ...
- ३ब² अ + ब³, द्वारा प्रदर्शित सूत्र उनके पूर्ववर्त्ती गणितज्ञों द्वारा दिया गया पर महावीर ने इस सूत्र
का साधारण रूप बनाकर प्रस्तुत किया, जिसके लिए नियम भी बतलाये गये हैं—
( अ + ब + स + द + ...... )³ = अ³ + ३अ² ( ब + स + द + ...... - ३अ ( ब + स + द + ......)+( ब + स + द + ...... )³, इत्यादि ।
ग्रंथकार ने कूट स्थिति द्वारा भी अध्याय ३ तथा ४ के कई प्रश्न हल किये हैं । कूट स्थिति के
नियम का उपयोग बीजगणित के विकास की पूर्वावस्था को दर्शाता है, जबकि अज्ञात के लिये कोई प्रतीक
न होता था । भारत में यह नियम केवल अंकगणित में उपयोग में लाया गया, क्योंकि बीजगणित पहिले से
प्रस्तावना 11
ही पर्याप्त प्रगति कर चुकी थी । बख्शाली हस्तलिपि में इसे यहच्छ, बाँछा या कामिका के नाम से
अभिधानित किया गया है ।
महावीर के बीजगणित तथा काल्पनिक राशि * के विषयमें उनकी प्रतिभा का परिचय देने के
सम्बन्ध में ई. टी. बेल की अभ्युक्ति है—
“The rule of signs became common in India after their restate-
ment by Mahavira in the ninth century.... The early history of comp-
plex numbers is much like that of negatives, a record of blind mani-
pulations, unrelieved by any serious attempt at interpretation or
understanding. The first clear recognition of imaginaries was Maha-
vira’s extremely intelligent remark in the ninth century that, in the
nature of things, a negative number has no square root. He had
mathematical insight enough to leave the matter there, and not to
proceed to meaningless manipulations of unintelligible symbols.” †
इसके अतिरिक्त ग्रंथकार ने व्यापकीकृत (generallized) पद्धति वाले एकघातीय समीकरणों
को हल करने के नियम दिये हैं, और अनेक अज्ञात वाले युगपत् द्विघात समीकरणों को हल किया है ।
उन्हें ज्ञात था कि वर्ग समीकरण के दो मूल होते हैं ।‡
जहाँ डाओफेन्टस ने म, न भुजाएँ लेकर समकोण त्रिभुज बनाया, वहाँ महावीर ने म, न भुजाएँ
लेकर आयत की रचना की है । अध्याय ७ की ९५½, ९७½, ११२½ वीं गाथाओ में महावीर ने दिये गये
कर्ण (अ) को लेकर सभी सम्भव समकोणों को प्राप्त करने के लिये, अर्थात् क२ + ख२ = अ२ को लेकर
हल करने के लिये तीन नियम दिये हैं । प्रथम दो नियम एक दृष्टि से ठीक नहीं हैं, क्योंकि
√(अ२ – प४) या √(अ२ – प२) परिमेय ( rational ) तब तक नहीं हो सकते, जब तक कि प को
ठीक तरह न चुना जाय । तीसरा नियम बड़े महत्व का है । यह रीति, बाद में यूरोप में, पीज़े ( Pisa )
के लेनर्डो फीबोनाट्चि ( Leonardo Fibonacci ) ने १२०२ ईस्वी में फिर से खोजी गई । इस
विधि का उद्गम शुल्व सूत्रों में है ।
ब्रह्मगुप्त और महावीर दोनों ने चतुर्भुज क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने के लिये निम्नलिखित
सूत्र दिया है:— √(सा – फा) (सा – खा) (सा – गा) (सा – घा) जहां सा, अर्धपरिमाप है और
का, खा, गा, घा भुजाओं के माप हैं । पर यह सूत्र केवल चक्रीय चतुर्भुजों के लिए ठीक उतरता है ।
इसी प्रकार, विषम त्रिभुज के क्षेत्रफल के सम्बन्ध में नियम दिये गये हैं ।
- देखिये, मूल गाथा ५२, प्रथम अध्याय ।
† Development of Mathematics,pp. 173,175 (1945)
‡ उपर्युक्त वर्णन से कहा जा सकता है कि भारतीयों ने बीजगणित के विज्ञान को दो मुख्य
भागों में विभक्त किया । एक भाग तो बीज ( विश्लेषण analysis ) का विवेचन करता है,
और दूसरा भाग ऐसे विषयों का जो बीज के लिये आवश्यक हैं । वे विषय, चिह्नों के नियम,
शून्य और अनन्ती की अंकगणित, अज्ञातों के साथ क्रियाएँ, करणी, कुट्टक और पेलियन समीकरण
( Pellian equation ) हैं ।
12 गणितसारसंग्रह
महावीराचार्य और ब्रह्मगुप्त आदि के प्रश्नों तथा अन्य प्रकरणों की भिन्नता के सम्बन्ध में डेविड
यूजीन स्मिथ का निम्नलिखित वक्तव्य द्रष्टव्य है :
“......For example, all of these writers treat of the areas of
polygons, but Mahāvīrācārya is the only one to make any point of
those that are reentrant. All of them touch.upon area of a segment
of a circle, but all give different rules. The so called janya operation
is akin to work found in Brahmagupta and yet none of the problems
is the same. The shadow problems, primitive cases of trigonometry
and gnomonics, suggest a similarity among these three great writers,
and yet those of Mahāvīrācārya are much better than the one to be
found in either Brahmgupta or Bhasker, and no question is dupli-
cated.”*
महावीराचार्य द्वारा गणितग्रंथ के सिवाय ‘ज्योतिष पटल’ ग्रंथ भी रचित किए जाने की सम्भावना
“भारतीय ज्योतिष”† के लेखक पं० नेमिचंद्र शास्त्री ने प्रकट की है। अभी तक इसके लिये पुष्ट प्रमाण
प्राप्त नहीं हो सके हैं ।
गणित इतिहास का उपर्युक्त सामान्य अवलोकन हमने मुख्यतः ई. टी. बेल के “Develop-
ment of Mathematics”, और विभूतिभूषण दत्त तथा अवधेशनारायण सिंह के, “History
of Hindu Mathematics” नामक ग्रंथों का आधार लेकर दिया है। चीन के सम्बन्ध में
अभी हमें यथेष्ट सामग्री नहीं मिल सकी है ।
गणित इतिहास का विशिष्ट अवलोकन
अब हम भारतीय गणित इतिहास के अंधतम काल में प्रवेश करने का प्रयत्न करेंगे । इस काल
में, विशेषकर यूनान और भारत में सम्भवतः बेबिलन, मिस्र और भारत की प्राचीन मृतप्रायः गणित
में अकस्मात् गति आई । गणित द्वारा अलौकिकीय विषयों को बांधने के अभूतपूर्व प्रयास होने लगे ।
इस प्रयास के चिह्न यूनान में मुख्यतः पिथोगोरस के वर्गों में और विशेष रूप से भारत में तीर्थंकर
महावीर के तीर्थ में परिलक्षित किए गये हैं। ‡ आत्मा को सत्य की ओर आकर्षित करने के लिए
केवल इन्हीं वर्गों में दर्शन, धर्म की धाराओं में गणित का प्रयोग अद्वितीय है । यह निश्चित है
कि इस काल में विश्व की प्राचीन गणित में इस प्रयोजन से बीज बोया गया, कि बीजगणित के
द्वारा प्रस्फुटित पारमार्थिक बोध, उपादेय में एकाग्रता की सिद्धि दे सके । एक ओर यूनान में
पिथोगोरस द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के साथ ही साथ संख्या सिद्धान्त से पुष्ट दर्शन जन्म मरण के चक्र
- Introduction to English Translation & Notes of गणितसार संग्रह by M. Ranga-
charya, ( 1912 ).
† भारतीय ज्ञानपीठ, काशी ।
‡ चीन में तत्सम्बन्धित प्रयासों की खोज के लिये अभी हमें उपयुक्त सामग्री प्राप्त नहीं हुई है ।
(फिर भी, जो कुछ हमें मिल सका है उसे अंत में प्रस्तुत किया है ।
प्रस्तावना १३
से विमुक्त होने का साधन प्रतीत होता है, वहां भारत में "सुखी रहें सब जीव जगत के" जैसी भावनाओं
से प्रेरित तत्वों के सामान्यकरण की सीमा
"खम्मामि सव्व जीवाणं, सव्वे जीवा खमन्तु मे ।
मेत्ती मे सव्व भूदेसु, वैरं मज्झं ण केणवि ॥"
में परिलक्षित होकर राशि सिद्धान्त की प्रयुक्ति से अनन्तत्व को प्राप्त हुई दिखाई देती है । हमारा
यह संकेत है कि यूनान और भारत के गणित की तुलना का उक्त आधार सम्भवतः उपयोगी सिद्ध
होगा । इस तुलना का अभिप्राय किसी देश की महानता आदि दिखाने का नहीं है, वरन् यह बतलाने
का है कि सत्य और अहिंसा के तत्व विश्व के गुरुता केन्द्र को शांति के प्रांगण में खींचकर ले जाते हैं,
और इस खिंचाव में जो आदान प्रदान होता है वहां सापेक्षता कृत परिवाद विश्वबंधुत्व के अंचल में
विलीन हो जाते हैं । यही कारण है कि ऐसे समय में उक्त तत्वों से अभिप्रेरित खोजों के इतिहास को
महत्व नहीं दिया जाता, जिससे इतिहास काल का मौन और अंध रहना स्वाभाविक प्रतीत होता है ।
पुनर्जागरण के इतिहास के तत्वों की खोज करने के लिए हम पिथेगोरस का भ्रमण पथ
अपनावेंगे । इस भ्रमण पथ के विषय में अभ्युक्ति प्रसिद्ध है, कि -
"Like many others of the sages in that Kingdom ( Egypt ), he
was carried captive to Babylon, where he conversed with the Persian
and Chaldean Magi; and travelled as far as India, and visited the
Gymnosophists." *
तदनुसार हम सर्व प्रथम मिस्र देश के बर्द्धमान महावीर कालीन पुनर्जागरण के इतिहास पर प्रकाश
डालेंगे । थेलीज़ ( ६४० ई. पू.) और पिथेगोरस, दोनों का भ्रमण मिस्र में सेइटिक युग (Saitic Period)
६६३-५२५ ईस्वी पूर्व में हुआ होगा । इस समय मिस्र में कूफू ( Khufu ) कालीन सिद्धान्तों की जो पुन-
र्जागृति हुई वह ( क्षितिज में उदय होने वाले 'अज्ञान अंधकार विनाशक' सूर्य—Horus em akhet के
परम्परागत प्रतीक) गीज़ा (Giza) के स्फिंक्स (Sphinx) से सहसम्बन्धित थी । कूफू के सम्बन्ध में नवीन
मत यह है कि इस पराक्रमी नृप ने ई. पूर्व २६०० के लगभग बलि प्रथा का अंत कर जनता क हित में
उन्हें विभिन्न कार्यों में संलग्न किया था । मध्यपूर्व की प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताओं वाले देशों में स्फिंक्स की
विभिन्न मुद्राएं रूढ़ि रूप से पूजा की पात्र रही हैं। जिसके मुख को छोड़ कर शेष अंग सिंह का है ऐसे स्फिंक्स
के मिस्री नाम क्रमशः समस्तावतारों में सूर्य ( Horem-akhet-Kheperi-Ra-Atum 1420-
1441 B. C. ), जीवित मूर्ति ( Seshepankh ), सिंह ( Sinuhe ), आदि रहे हैं। इस स्फिंक्स
मूर्ति में मानव वदन देकर, इतिहासकारों के मतानुसार, सिंह के आतङ्क में बुद्धि, शक्ति और दया का
सम्मिश्रण किया गया है । टालेमीय ( Ptolemaic ) कालीन लेख में इस मूर्ति को तीन मुकुट युक्त
बतलाकर मानों तीनों लोकों के नाथ की उपाधि से विभूषित किया है "And Horus of Edfu
transformed himself into lion which had the face of a man, and
which was crowned with the Triple Crown (')."† सम्भवतः २६ वे राजवंश काल
( ईस्वी पूर्व ५८८-५६९ ? ) की महत्वपूर्ण इन्वेन्टरी स्टीले ( Inventory Stela ) में अंकित लेख
- Encyclopedia Americana, vol. 23, p. 47, ( 1944 ).
† Salem Hossan : Tne sphinx, p, 80, Cairo ( 1949 )
14 गणितसारसंग्रह
अहिंसा की प्रवर्त्तना के संवाद को प्रकाश में लाता हुआ स्फिंक्स की कहानी में वर्द्धमान महावीर की
जीव दया की सदृशता प्रकट करता प्रतीत होता है :
“......The plans of the Image of Hor-em-akhet were brought
in order to bring to revision the sayings of the disposition of the
Image of the very Redoubtadle.............He came to make a tour,
in order to see the thunderbolt, which stands in the Place of the
Sycamore, so named because of a great sycamore, whose branches
were struck when the Lord of Heaven descended upon the place of
Hor-em-akhet, and also this image retracing the erasure according
to the above mentioned disposition, which is written,......of all the
animals killed at Rostaw. It is a table for the vases full of these
animals which, except for the thighs, were eaten near these 7 gods,
demanding......(The God gave) the thought in his heart, of a
written decree on the side of this Sphinx, in an hour of the night (¹).
The figure of this God, being cut in stone, is solid, and will exist to
eternity, having always its face regarding the orient.”*
उपर्युक्त लेख का मुख्य भाग पवित्र मूर्तियों एवं प्रतीकों के प्ररूपण से पूर्ण है जो कूफ़ू द्वारा प्राप्त हुईं
मानी जाती हैं। निम्नतम कोटि के जीवों के प्रति मिस्र में प्रचलित दया का उल्लेख आर्चबिशप व्हेतली
ने किया है, “In Egypt there are hospitals for superannuated cats, and
the most loathsome insects are regarded with tenderness;......,” तथा
वहाँ मांसभक्षण निषेध एवं ब्रह्मचर्य पूजा के महत्वपूर्ण लक्षण माने जाते हैं, “Chastity, abstinence
from animal food, ablutions, long and mysterious ceremonies of
preparations of initiation, were the most prominent features of
worship.........Ӡ
कूफ़ू द्वारा निर्मित महास्तूप के स्फिंक्स का स्थल सेइटिक काल ( Saitic Period ) में
जीव दया की प्रेरक पशु पूजा का केन्द्र रहा है। इसकी पुष्टि, सलीम हसन के शब्दों में यह है, “At
the time when this stela was inscribed, there was a great revival of
the worship of the Apis bull at Memphis, and that animal may also
have been venerated in the Giza district at least during the Saitic
Period and later...............”
इसके प्रायः ३०० वर्ष उपरान्त का इतिहास अंधकारमय है। यहां “इतिहास पिता” हिरोडोटस
भी मौन है । ३०० ई. पू. से लेकर ३०० ई. प. तक का काल हेलेनीय ( Hellenism ) युग है।
इस समय सिकंदरिया यूनानी कला और विज्ञान का केन्द्र रहता है। फलित ज्योतिष का उदय होता है।
- The Sphinx, pp. 222-224, ( 1949 ),
† W. E. H. Lecky, History of European Morals, Vol. I., pp 289, 325 ( 1899 ).
प्रस्तावना 15
यूनानी विज्ञान का उच्चतम विकास होता है, पर अंकगणित और ज्योतिष ( astronomy ) वही
आदिकालीन रहते हैं ।
मिस्र में प्रचलित अंकगणित से यूनानियों ने क्या सीखा ? इस प्रश्न पर वाएर्डेन का मत है कि
यूनानियों ने मिस्र की गुणन विधि तथा भिन्नों का कलन सीखा होगा । इस प्रकार के कलन को उच्च बीज-
गणित के विकसित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है । यूनानियों ने ज्यामिति को भी स्वतंत्र
रूप से विकसित किया । मिस्र की ज्यामिति के कुछ फल अवश्य ही प्रशंसनीय रहे हों, पर यूनानियों के
लिए वह केवल प्रयुक्त अंकगणित ही थी । रोमन युग में भी, जब कि फलित ज्योतिष का विकास हुआ,
मिस्र की गणित ज्योतिष यूनान और बेबिलन की गणित ज्योतिष से बहुत पीछे रही ।
यहां मिस्र और भारत की अभिलेखबद्ध सामग्री पर दृष्टिपात करना कहां तक उपयोगी सिद्ध
होगा, नहीं कहा जा सकता :
( १ ) न केवल मास्को पेपायरस में, वरन् रिंड पेपायरस ( सम्भवतः ईसा से १७०० वर्ष पूर्व ) में
भी परिधि और व्यास के अनुपात ( π ) का मान (१६/९)² अथवा ३·१६०५......माना गया है । *
ठीक यही मान नेमिचंद्राचार्य ने इस प्रकार उल्लिखित किया है,
“यदि किसी वृत्त की त्रिज्या त्र और उसके समाई किसी वर्ग की भुजा भ हो,
तो त्र = ९/१६ भ होता है”†‡
π का एक दूसरा मान √१० है, जो दशमलव के दो अंकों तक इसी रूप में प्राप्त होता है ।
इसे यति वृषभ ने तिलोय पण्णत्ती में दृष्टिवाद से अवतरित उल्लिखित किया है । ❂
( २ ) समलम्ब चतुर्भुज के क्षेत्रफल निकालने के सूत्रों का उपयोग तिलोय पण्णत्ती की गाथाओं,
१ - १६५, १८१ आदि में हुआ है । उपरोक्त सूत्रों से अवतरित सूत्र का उपयोग मिस्र के यंत्रियों ने
चतुर्भुज का स्थूल क्षेत्रफल निकालने के लिए किया । यह सूत्र एडफू के सूर्य मंदिर में ( सम्भवतः ईसा
से १०० वर्ष पूर्व का ) प्राप्त हुआ है । ✕
( ३ ) मिस्र में π का एक दूसरा मान बीजों की राशियों अथवा उनसे भरी जाने वाली वरिमाओं
के माप से परिगणित परिधि और व्यास का अनुपात (ratio) के रूप में ३·२ प्राप्त होता है । + व्यास
को यदि इकाई लिया जाय तो वीरसेनाचार्य द्वारा उल्लिखित सूत्र “व्यासं षोडश गुणितं......” से π का
मान ३ १/५ प्राप्त होता है । ÷
(४) रज्जु (Rope) जिनागम के विविध विषयों का निरूपण करता है । यह आयाम की एक
विश्व इकाई है जिसका सम्बन्ध सूच्यंगुल, द्वीप समुद्रों की संख्या, आदि से स्थापित किया है । ∤ केन्टर के
- J.L. Coolidge : A History of Geometrical Methods, p. 11, (1940).
† त्रिलोक सार, गाथा १८ ।
‡ विभूति भूषण दत्त, जैन सिद्धान्त भास्कर, भाग २, किरण २, पृ० ३४ ।
❂ ति. प. ४-५०, ५७ ।
✕ षट्खंडागम, पुस्तक ४, गाथा १, ३ आदि ।
- T. Health, Greek Mathematics, vol. I., p. 125, (1921).
÷ षट्खंडागम, पु. ४, पृ. ४०, गाथा १४ ।
∤ लक्ष्मीचंद्र जैन, तिलोय पण्णत्ती का गणित, शोलापुर, पृ० ९९-१०१, ( १९५९) ।
16 गणितसारसंग्रह
अनुसार, मिस्र के यंत्री, पिथेगोरस के साध्य का उपयोग रज्जु के द्वारा करते थे, और वे रज्जु बांधने
या खींचने वाले कहलाते थे। वाएडर्डेन का मत है कि केन्टर का यह कथन कि ये लोग ३ः ४ः ५ वाले
रज्जु का उपयोग करते थे, और उन्हें पिथेगोरस का साध्य ज्ञात था, सही नहीं है। इतना अवश्य है
कि पिरेमिड आदि के निर्माण में मिस्री बहुत शुद्ध रूप से समकोण बनाते थे। ☸
(५) मिस्र में द्विगुणित करने का परिकलन (duplatio) और अर्द्धच्छेद प्रक्रिया (mediatio)
प्राचीन काल से प्रचलित थी। † यही यूनान में नीओपिथेगोरियन वर्ग ने उपयोग में उतारा, और यही
हम षट्खंडागम‡ जैसे ग्रंथों में बिखरे हुए पाते हैं। भिन्नों के परिगणन मिस्र के इन पेपायरसों में तथा
धवला टीका में विस्तृत रूप में देखने मिलता है। इनके सिवाय 'ह' (aha) परिकलन राशि कलन की
परम्परा को सूचित करते हैं। कूट (false) स्थिति के मिस्री प्रयोग महावीराचार्य के गणितसार संग्रह में
देखने में आये हैं।
(६) वर्ग आधार वाले स्तूप (और सम्भवतः उसके समच्छिन्नकों) के घनफल निकालने में मिस्र में
शुद्ध और प्रसिद्ध सूत्रों का उल्लेख मिलता है। ✕
यहां भारत में वीरसेन द्वारा युक्ति बल से सिद्ध किया गया वर्ग आधार वाले लोकाकाश का
चित्रण, उसके तथा वातवलय की परतों के घनफल का कलन, आदि हमें मिस्र के स्तूपों के वास्तविक
भेद को जानने के लिए प्रेरित करते हैं। कूफू द्वारा निर्मित कराया गया महास्तूप मेधावी वैज्ञानिकों के
अधीक्षण में धर्म, गणित, ज्योतिष तथा अन्य महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं के संयुक्त संस्कार के फल
स्वरूप निर्मित किया गया होगा। हिरॉडोटस के अनुसार मिस्र वासी स्तूप आकार को जीवन का प्रकार
रूप (emblem) मानते थे। स्तूप का विस्तृत आधार हमारी वर्तमान दशा के अस्तित्व का प्रारम्भ एवं
उसका बिन्दु में अवसान, (सांसारिक) अस्तित्व का अन्त माना जाता था। हो सकता है कि इसी कारण
उन्होंने अपनी समाधियों में इस आकृति का उपयोग किया हो। + ईसा से प्रायः ४८४ वर्ष पूर्व हुए
हिरॉडोटस की उक्त अभ्युक्ति की पुष्टि मेम्फिस के प्रायः उत्तर में स्थित पिरेमिड युग से पूर्व के मंदिर की
परम्परा द्वारा होती है। इस मंदिर में सबसे पवित्र 'पिरेमिड के आकार का' एक पत्थर था। यह विश्वास किया
जाता था कि यह पत्थर सूर्य (अज्ञान अंधकार विनाशक) भगवान् को फीनिक्स (Gr. Phoinix) पक्षी
के रूप में प्रकट होने में आधार रूप था। ۞ प्राचीन किंवदन्ती के अनुसार यह पक्षी ५०० या ६०० वर्ष
जीवित रहने के पश्चात् अपनी चिता बनाकर स्वयं के पंखों से सुलगाता है, और अपनी ही भस्म में से निकल
कर उड़ जाता है। इस प्रकार वह अमरता का प्रतीक, अथवा सर्वोत्कृष्ट, सम्पूर्ण रूप (paragon)
भी माना जाता है। यह विवरण हमें कर्म सिद्धान्त की मान्यता का प्रारूप प्रतीत होता है, जहां कर्म
ईंधन को तपकी ज्वालाओं में विदग्ध कर मुक्ति या कैवल्य प्राप्त किया जाता है।
हिरॉडोटस ने स्तूप के विस्तृत आधार को हमारी वर्त्तमानदशा के अस्तित्व का प्रारम्भ बतलाया है।
चार महान भुजाएँ संसारी जीवन का प्ररूपण करती हैं जो सम्भवतः पिथेगोरस का Tetractys है और
जैन मान्यता का चतुर्गति चक्र (चदुचंकमण) है। इस दशा का बिन्दु रूप में प्रकट होना (और सांसारिक)
☸ B. L. van der Waerden, Science Awakening, Holland, p. 6, Eng. trans. (1945).
† Ibid, p. 18,
‡ षट्खंडागम, पृ० ४, गणित प्रस्तावना ।
✕ B. L. Waerden, Science Awakening, pp. 34,35.
☨ The Encyclopedia Americana, p. 40, vol. 23, (1944).
۞ I. E. S. Edwards, The Pyramids of Egypt, (Pelican), p. 21, (1947).
प्रस्तावना 17
अस्तित्व का अंत माना जाना, जैन मान्यता की पंचम गति, मोक्ष से समन्वय स्थापित करना प्रतीत होता
है । यह चतु चंक्रमण स्वस्तिक के अर्थ को भी स्तूप की भुजा प्ररूपणा में समन्वित करना दृष्टिगत होता है ।
कर्म सिद्धान्त की मान्यता की सदृशता कुछ अंशों में हमें निम्नलिखित उद्धरणों में भी दृष्टिगत
होती है—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गंतव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना ॥❀
पुनः यज्ञ के इस निर्वचन को लेकर यह कथन है—
गत सङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थित चेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥†
इसी अभिप्राय को निम्नलिखित श्लोक में निदर्शित किया है—
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्व कर्माणि भस्म सात्कुरुते यथा ॥‡
पिरेमिड में स्थित अन्य वस्तुओं के नाम धार्मिक महत्ता से ओतप्रोत थे । समाधि का नाम
“अनन्तत्व का दुर्ग” था, तथा साथ में रखी जानेवाली नाव सम्भवतः संसारसागर से पार ले जाने की
प्रतीक रूप थी। जो कुछ हो, इतना अवश्य है, कि मृत्यु के उपरांत आनेवाली घटनाओं की आशंका
में इसी जीवन के अंतराल में पूरी तैयारियाँ की जाती थीं, सम्भवतः न केवल राजा के लिए, वरन्
राज्यसत्ताद्वारा इस स्तूप प्रतीक प्ररूपणा के सहारे समस्त बुद्धि जीवी वर्ग के लिये भी । सबसे प्राचीन
हीलिआपोलिस के मंदिर के पिरेमिड प्रतीक को सबसे बृहत्रूप में स्थापित करने का श्रेय अहिंसाके
प्रबल समर्थक खूफू को ही है ।
इस प्रकार बने हुए स्तूपों को मिस्री में मेर m (e) r कहा जाता है, जिसका निर्वचन
'आरोहण स्थल' ( place of ascension ) किया जाता है । यह निर्वचन यद्यपि भाषा विज्ञान
विषयक नियमों के विरुद्ध नहीं है, तथापि संशयात्मक है। फिर भी, पिरेमिड ग्रंथों ( texts ) में
इस प्रकार का उल्लेख है कि “उस (राजा) के लिये स्वर्ग सोपान डाली गई है ताकि वह स्वर्गारोहण कर
सके ।”() यह विश्वास न केवल प्राचीन मिस्र में ही प्रचलित था, वरन् मेसोपोटेमिया, एसिरिया और
बेबिलन में भी प्रचलित था जहाँ आठ मंजिलों की इमारतें सम्भवतः इसी हेतु निर्मित की गई थीं। इनका
नाम ज़िगूरात था और सिपार ( Sippar ) के ऐसे भवन का नाम 'उज्ज्वल स्वर्ग का सोपान भवन'
था। इन स्तूपों का अन्य प्रचलित पिरेमिड है, जो यूनानी भाषा के पिरेमिस शब्द से उत्पन्न हुआ है ।
मिस्री गणितीय ग्रन्थ के अनुसार सम्भवतः यह एक ज्यामितीय पद है, जिसका अर्थ, “वह जो अस (us)
से (सीधा) ऊपर जाता है” बिलकुल अस्पष्ट, किन्तु पिरेमिड (स्तूप) के उत्सेध का द्योतक है । हम अभी
नहीं कह सकते कि तिलोयपण्णत्ती में वर्णित समवशरण की विधियों में निर्मित थूह क्या इन्हीं से सह-
सम्बन्धित हैं ?
❀ श्रीमद्भगवद् गीता ४-२४
† वही, ४-२३
‡ वही, ४-३७
() The Pyramids of Egypt, pp. 236, 237.
ग० सा० सं० प्र०-३
18 गणितसारसंग्रह
यूनानी गणित के बीजीय तत्वों सम्बन्ध, आजकल बेबिलन की बीज गणित से जोड़ा जाता है । इस
प्रकार ओ. न्युगोबाएर (Neugebauer), ओ. बेकेर (Becker), राइडमाइस्टर (Reidemeister)
प्रभृति विद्वानों ने यह देखकर कि बीजगणित डाओफेन्टस से प्रारम्भ न होकर प्रायः २००० वर्ष पूर्व
मेसोपोटेमिया से प्रारम्भ होती है, यह भी संभावना व्यक्त की है कि पिथेगोरस के अर्थमितिकी सिद्धान्त
को बेबिलन का अर्थमितिकी सिद्धांत कहना उचित होगा ।
इसी प्रकार बी. एल. वाएर्डेन ने भी निम्नलिखित तथ्यों को प्रमाणित करने का प्रयास
किया है*—
१– थेलीज़ और पिथेगोरस ने बेबिलन की गणित को लेकर प्रारम्भ किया परन्तु उसे बिलकुल
भिन्न, विशिष्ट रूप से यूनानी, लक्षण दिया ।
२–पिथेगोरीय वर्गों में और बाहर, गणित को उच्चतर और सतत उच्चतर रूप में विकसित किया
गया । इस प्रकार गणित धीरे धीरे दृढ़तर तर्क की जिज्ञासा का समाधान करने लगा ।
इस सम्बन्ध में वाएर्डेन का मत है कि गणित इतिहास के अध्ययन में निम्नलिखित बातों को
अनावश्यक न समझा जावे—
( १ ) संस्कृति का सामान्य इतिहास, जिसमें न केवल ज्योतिष और यांत्रिकी वरन् भवन निर्माण
विद्या ( architecture ), शिल्प ( technology ), दर्शन और यहाँ तक कि धर्म (पिथेगोरस) के
विषयों को समाविष्ट किया जावे ।
( २ ) राजनैतिक और सामाजिक दशाएँ ।
( ३ ) व्यक्तिगत चरित्र और उसका जीवन कार्य ।
गणित क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत चार क्रियाएँ होती हैं, जिनका उपयोग संकेतों द्वारा
गणित के विकास को चरम सीमा तक पहुँचाया जा सकता है । संकेतों में स्थानार्ह पद्धति तथा
दाशमिक पद्धति लाना बड़े महत्व की वस्तु है । इसके आधार पर बड़ी संख्याओं का लेखन तथा
अन्य गणनाओं को सुगम बनाया जा सकता है । इसमें संदेह नहीं कि ज्योतिष में आधुनिक
षाष्ठिक पद्धति का इतिहास सम्भवतः ४९५९ वर्ष पुराना है । बेबिलन वासियों ने षाष्ठिक पद्धति
सुमेरवासियों ( स्युमिअरिएन ) से ली और इस पद्धति को यूनानी ज्योतिषी टालेमी ( १२० ई० ) ने
अपनाया तथा उसमें शून्य प्रतीक का उपयोग कर अपने काल की दाशमिक पद्धति के समाई बनाया ।†
षाष्ठिक पद्धति में स्थिति सम्बन्धी प्रतीकों का उपयोग तो होता था, परन्तु उसमें कई दोष भी थे ।
१ और ६० के प्रतीकों, तथा १,०,३०, और १,३०, के प्रतीकों में अंतर न था ।‡
भारतीयों द्वारा यूनानी ज्योतिष के अंशदान लेने के आधार पर सम्भवतः वाएर्डेन ने फ्रायडेन्थल
( Freudenthal ) के मत का समर्थन किया है :
“Freudenthal’s hypothesis reduces therefore to the following :
Before becoming subject to the Greek influence, the Hindus had a
versified, positional system, arranged decimally and starting with
- Science Awakening, p. 5.
† Science Awakening, p. 39.
‡ चीन में भी पञ्चाङ्ग में षाष्ठिक दाशमिक पद्धति उपयोग में लाई गई थी, जिसमें ६० को
उच्चतर इकाई अथवा 'चक्र' निरूपित किया गया था । Cf. Struik. D. J., A concise History of
Mathematics, Dover, ( 1948 ).
प्रस्तावना १९
the lowest units. They had the digits 1-9 and similar symbols for, 10,
20,.... Along with Greek astronomy, the Hindus became acquainted
with the Sexagesimal system and the zero. They amalgamated this po-
sitional system with their own; to their own Brahmin digits 1-9, they
adjoined the Greek O and they adopted the Greek-Babylonian order.
It is quite possible that things went in this way. This detracts
in no way from the honour due to the Hindus; it is they who deve-
loped the most perfect notation for numbers, known to us.”*
वाएडॅेन का उक्त समर्थन, उनकी निम्नलिखित अभ्युक्ति पर भी आधारित प्रतीत होता है :
“In this manner Buddha continues through 23 stages. Accord-
ing to an arithmetic book, koti is a hundred times one hundred
thousand ( sata sata sahassa ), so that the largest number mentioned
by Buddha is 10⁷. 10⁴⁶ = 10⁵³. But in most arithmetics, these same
words ayuta and niyuta have other values, viz. 10⁴ and 10⁵.
But Buddha has not yet reached the end : This is only the
first series, he says. Beyond this there are 8 other series.
It is clear that these numerals were never used for actual
counting or for calculations. They are pure fantasies which, like
Indian towers, were constructed in stages to dazzling heightsӠ
इस सम्बन्ध में हम इन विद्वानों का ध्यान तिलोयपण्णत्ती और द्रव्य प्रमाणानुगम, षट् खंडागम
पुस्तक ३ की ओर आकर्षित करना चाहते हैं। तिलोयपण्णत्ती के ज्योतिषीय प्रकरणों को देखने से
पता चलता है कि जिन स्वतंत्र, मौलिक ग्रंथों से उसमें सामग्री ली गई है, उनमें कालगणना का
प्रत्यक्ष आधार यूनानी षाष्ठिक पद्धति नहीं है। साथ ही, द्रव्य प्रमाणानुगम के अध्ययन से प्रतीत
होता है कि ईसा के अनेक वर्ष पूर्व, सम्भवतः वर्द्धमान महावीर काल में ही अथवा बाद में,
जीवों के गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि में संख्या प्ररूपण के लिए बड़ी-बड़ी संख्याओं के लेखन,
गणन आदि की आवश्यकता पड़ी होगी। इस आवश्यकता के लिये उन्हें कोई क्रांतिकारी सरल
पद्धति को ग्रहण करना आवश्यक हो गया होगा। उस समय विश्व के या तो किसी छोर से उन्हें
शून्य के आधार पर स्थानार्हासहित दाशमिक पद्धति अपनाना पड़ी होगी, अथवा उन्हें ही शून्य को
लेकर इस पद्धति का आविष्कार करना पड़ा होगा। जैसा कि हम आगे देखेंगे कि यूनान के पिथेगोरस
के वर्ग और भारत के वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में ऐसी कई बातों में सदृशताएँ हैं कि हमें यह
सम्भावना प्रतीत होती है कि ईसा से प्रायः ५०० या ६०० वर्ष पूर्व के बीच भी यूनानियों और भारतीयों
में आदान प्रदान हुआ। न केवल स्थानार्हासहित दाशमिक पद्धति ही, वरन् जीव द्रव्य के प्रमाण की
संख्या का बोध क्षेत्र, काल आदि का आधार लेते हुए अनेक मौलिक पद्धतियों के आधार पर कराया
गया है, जो विश्व के प्राचीन गणित ग्रंथों में दिखाई नहीं देता है। कुछ ऐसे प्रकरण हैं, जैसे सलागा अर्थ
- Science Awakening, pp. 56, 57.
† Ibid, p. 52.
20 गणितसारसंग्रह
( शलाका प्रमाण, Logarithm ),* राशि सिद्धान्त आदि जिनके आविष्कार यूरोप में सत्रहवीं और
उन्नीसवीं सदी में हुए हैं । इस प्रकार "आवश्यकता, आविष्कार की जननी है", के आधार पर हम यह
सम्भावना भी व्यक्त करते हैं कि वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में उनके अनुयायियों द्वारा स्थानार्हा प्रतीक
सहित दाशमिक पद्धति के अभाव की पूर्ति करने के प्रयास अवश्य ही किये गये होंगे ।
यूनानियों द्वारा बेबिलनवासियों के अंशदान का उपयोग सम्भवतः थेलीज़ द्वारा ग्रहण काल का
बतलाया जाना पुष्ट करता है । बेबिलन में ग्रहणों के अवलोकन की तिथियाँ सम्भवतः ७४७ ई० पू०
में हुए नबोनसार नृपति के काल में निश्चित हुईं प्रतीत होती हैं । इसके पश्चात् ई० पू० ५८०
में नेब्युकडनेज़र †† ( द्वितीय ) ( Nebuchadnezzar II 605-562 B. C. ) के राज्यकाल
तक कला और विज्ञान में उन्नति तथा चंद्रमा और ग्रहों के अवलोकन के प्रमाण मिलते हैं । इसके पश्चात्
उत्तरोत्तर काल में ज्योतिष के विकास के प्रमाण मिलते हैं । नेब्युकडनेज़र के सम्बन्ध में एक दो ऐसे तथ्य हैं
जो हमें डा० प्राणनाथ विद्यालंकार द्वारा प्राप्त प्रभास पाटण के ताम्रपत्र के लेख, "बेबीलोन के नृपति
नेबुचंदनेज़ार ने रैवतगिरि के साथ नेमि के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था' ।"‡‡ की ओर
आकर्षित करता है । ये तथ्य इस प्रकार हैं :
“From his inscriptions we gather that Nebuchadrezzar was a
man of peculiarly religious character”.†
“His peaceful energies were devoted to building magnificent
palaces and temples and herein he excelled”.‡
परन्तु उपर्युक्त कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है, जिसके आधार पर हम भारत और बेबिलन का वर्द्धमान
महावीर के तीर्थ से सम्बन्धित पुनर्जागरण से सम्बन्ध बतला सकें । इसके सम्बन्ध में भारतीय शिल्प और
न्याय प्रणालीका की बेबिलन के शिल्प और न्याय प्रणाली से तुलना सम्भवतः उपयोगी सिद्ध हो । अभी
तक उपलब्ध सामग्री के आधार पर गणित सम्बन्धी तुलना आदि हम अगले पृष्ठों में देंगे ।
बेबिलन के उच्च रूप से विकसित बीजगणित की सम्भाव्यता के विषय में यह प्रमाण दिया जाता है
कि उनके पास उत्कृष्ट पाष्ठिक प्रतीक प्ररूपणा थी, जिससे संख्या और भिन्नों को दर्शाया जा सकता था, और
उनमें समानसरलतापूर्वक गणनाएँ की जा सकती थीं । इस प्रकार उन्हें एक तथा दो अज्ञात वाले रैखीय
और वर्ग समीकरणों के हल करने की रीति ज्ञात थी । इनके सिवाय (अ + ब)² जैसे बीजीय सूत्रों का
ज्यामितीय प्ररूपण, समान्तर रेखाओं से उदयभूत अनुपात के सम्बन्ध, पिथेगोरसका साध्य, त्रिभुज और
समलम्ब चतुर्भुज का क्षेत्रफल आदि का ज्ञान सम्भवतः उन्हें पूर्व प्रचलित परम्परा से था । संख्यासिद्धान्त में
श्रेणियों का संकलन भी दृष्टिगत होता है । परन्तु यह सब ज्ञान पिथेगोरस को धर्म और दर्शन में गणित के
- टोडरमल ने अर्थसंदृष्टि में अर्थ को द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का प्रमाण निरूपित किया है ।
†† अथवा नेब्युकडरेज़र Cf. Encyclopaedia Britannica, vol. 16, p. 184 ( 1956 ).
‡‡ मु. कांतिसागर, श्रमण संस्कृति और कला, पृ. ९७ ( १९५२); खंडहरों का वैभव, भारतीय
ज्ञानपीठ काशी, पृ. ११ ( १९५३ ); तथा Times of India, 19-3-1935.
† Encyclopaedia Britannica, Vol. 16, p. 185, ( 1956 ).
‡ J. B. Bury & others, The Cambridge Ancient History, P. 216, Vol. III,
1 (954 ).
प्रस्तावना 21
प्रयुक्त करने, तथा गणित में गति लाने में कहां तक प्रेरक रहा होगा, इस पर हमें अभी विचार करना
शेष है। उपर्युक्त गणित के प्रयोग हम प्राकृत ग्रंथों में देखते हैं, परन्तु विशेषरूप से दो तथ्य हमें आश्चर्य
में डाल देते हैं:—
( १ ) तिलोय-पण्णत्ती के चतुर्थ अधिकार में गाथा १८० और १८१ में दिये गये सूत्र जीवा और धनुष
का प्रमाण निकालने के लिए उद्धृत हुए हैं। गणना √१० के आधार पर इन सूत्रों की संरचना का
प्रमाण मिलता है। जीवा के विषय में बिल्कुल ऐसा ही सूत्र,
जीवा = √[ ४[ ( व्यास / २ )² - ( व्यास / २ - बाण )² ] के रूप में, बेबिलन के अभिलेखों के
आधार पर २६०० ई० पूर्व (?) उपस्थित होना आश्चर्य जनक है। जहाँ π का मान ३ होना स्वीकृत हो
चुका था वहाँ पिथेगोरस के साध्य के आधार पर इस सूत्र का होना उपयुक्त प्रतीत होता है । धनुष के
सम्बन्ध में दिया गया सूत्र, π का मान √१० लेने के आधार पर है जो बेबिलन में अप्राप्य है ।‡
( २ ) वीरसेन ने क्षेत्र प्रयोग विधिके आधार पर जो बीजीय समीकरणों का रैखिकीय निरूपण दिया
है, वह भी क्या बेबिलन अथवा यूनान से लिया गया है, अथवा पारपरिमित गणात्मक संख्याओं के
निरूपण के लिये प्रचलित अनेक विधियों में से एक यह विधि भी जैनाचार्यों की मौलिक रूप से आविष्कृत
विधि है, यह भी विचारणीय है ।*
( ३ ) षाष्टिका पद्धति का उद्गम स्थल बेबिलन माना जाता है । ६० को आधार लेने के कई
कारण प्रस्तुत किए गये हैं। यह पद्धति ज्योतिष में विशेष रूप से स्थान पाये हुए है। तिलोय पण्णत्ती में
सूर्य का एक पूर्ण परिभ्रमण ६० मुहूतों में माना है। ६०, माने हुए १०९८०० गगन खंडों का एक गुणनखंड
भी है । यह गणना भी बेबिलन और चीन से सहसम्बन्ध खोजने में सम्भवतः सहायक सिद्ध हो सकती है ।
अब हम यूनान में प्रवेश करते हैं। यहाँ, निस्संदेह, ज्योतिष गणना में राशि सिद्धान्त, १२ घंटे का
दिन, छाया माप निरूपण ( सूर्य घड़ी के रूप में Gnomon और Polos ), चन्द्र और ग्रहों की गतियों
का अवलोकन, बेबिलनीय प्रभावों से अछूता नहीं है। परन्तु यह सब प्रभाव क्या पिथेगोरस कालीन है,
अथवा पिथेगोरस पर ज्योतिष का भी प्रभाव किसी दूसरे देश का था, इस पर विचार करना है । इस में
सन्देह नहीं कि उक्त प्रभाव पिथेगोरस के बाद दृष्टिगत अवश्य होता है । परन्तु हमें पिथेगोरस के काल
का अध्ययन बड़ी सावधानी से करने की आवश्यकता है । इसके विषय में हम सर्वप्रथम कुछ किंवदंतियों
और तथ्य पाठकों के सम्मुख रखना चाहेंगे।
( १ ) यूनान के “सात ज्ञानियों” में से थेलीज़ प्रथम था, जिनके विषय में कहा जाता था,
“Sayings such as the celebrated Delphic “Know thyself” were
ascribed to themӠ
( २ ) सूर्य ग्रहण के विषय में जो फलित थेलीज़ ने घोषित किया था, उसके विषयमें वाएर्डेन का
का यह कथन है—
“Herodotus reports ( see p. 84 ) that, during the battle on the
Halys, day was suddenly turned into night and that Thales had pre-
‡ J. L. Coolidge : A History of Geometrical Methods, pp. 6, 7 ( 1940 ).
- षट् खंडागम पु., ३, पृ. ४२-४३ ।
† Science Awakening, p. 85.
22 गणितसारसंग्रह
dicted this event to the Delians for that year. According to Diogenes
Laertius, Xenophanes voiced his admiration of Thales for this pre-
diction. Thus, besides Herodotus, we have the older witness Xenopha-
nes for this accomplishment. At present it is generally agreed that
this event refers to the solar eclipse of 585 B. C.
How was it possible for Thales, who according to all our sources,
is the first Greek astronomer, to predict a solar eclipse ? Such a
feat requires the experience of more than forty years, no matter how
one proceeds. It is not possible for one man alone to gather this ex-
perience. But Thales had no Greek predecessors. The conclusion is
inescapable that he must have drawn upon the experience of Oriental
astronomers."*
( ३ ) थेलीज़ को सम्भवतः बेबिलन वासियों (?) से निम्नलिखित ज्यामितीय फल प्राप्त हुए थे,
जिनके लिए उसने उपपत्ति आदि देने का प्रयत्न किया :
( अ ) वृत्त का व्यास उसे समद्विभाजित करता है ।
( ब ) सम द्विबाहु त्रिभुज के आधारीय कोण समरूप ( similar ) होते हैं ।
( स ) युडीमस के अनुसार, उसने यह खोजा था कि दो सरल रेखाओं के प्रतिच्छेदन से
प्राप्त कोण समान होते हैं । इत्यादि ।
( ४ ) थेलीज़ के काल में मिस्र और बेबिलन का गणित मृतप्राय हो चुका था ।†
( ५ ) नीओ-प्लेटोनिस्ट ( Neo-Platonist ) प्रोक्लस ( Proclus, 412-485 A. D. ) ने
पिथेगोरस की ज्यामिति के सम्बन्ध में यह उल्लेख किया है,
Pythagorus, who came after him, transformed this science into
a free form of education; he examined this discipline from its first
principles and he endeavoured to study the propositions, without
concrete representation, by purely logical thinking. He also dis-
covered the theory of irrationals ( or of proportions ) and the con-
struction of the cosmic solids ( i. e. of the regular polyhedra )‡
उपर्युक्त विवरण से प्रतीत होता है कि ज्यामितीय और ज्योतिषीय सामग्री, यूनान में इस काल में
बाहरी देशों से लाकर, सूक्ष्मरूप से अवलोकित कर, तर्क पर आधारित गहन अध्ययन का विषय बनाई
गई । इसमें सन्देह नहीं, कि उक्त सामग्री ने इन विद्वानों को प्रभावित किया होगा, क्योंकि बिना प्रभाव
के, किसी विषय की ओर ध्यान आकृष्ट होना साधारणतः सम्भव प्रतीत नहीं होता । जो बात, बीजरूप
से प्रभावक प्रतीत होती है, वह “गणित द्वारा प्रतिपादित धर्म से आत्मा का उत्थान करना” दृष्टिगत
- Ibid. p. 86.
†·Ibid. p. 89.
‡ Ibid. p. 90.
प्रस्तावना 23
होती है। देखें कि प्रभाव का यह माध्यम पिथेगोरस के वर्ग और वर्द्धमान महावीर के तीर्थ से कहाँ तक
सदृशता रखता है ?
( १ ) ऐसा प्रतीत होता है, कि ईसा से प्रायः ( ५८२–५०० ? ) वर्ष पूर्व मिस्र में प्रबल स्वेच्छा
से रहते हुए पिथेगोरस ने जिनके संसर्ग में स्वतः को विभिन्न विज्ञानों से ( a lot of knowledge
without intellect )⁕ परिचित किया था, उनके मिशन का प्रभाव उसके नैतिक जीवन में पशु
के प्रति ( मुक्ति हेतु ), विशुद्ध दया की छाप छोड़ बैठा था,
“But this crazy crank Pythagorus had made quite a fuss when he
saw one of the prominent citizens taking a stick to his dog. “Stop
beating that dog !” he had shouted like a madman. “In his howls of
pain l recognize the voice of a friend who died in Memphis twelve
years ago. For a sin such as you are committing he is now the dog of
a harsh master. By the next turn of the Wheel of Birth, he may be
the master and you the dog. May he be more merciful to you than
you are to him. Only thus can he escape the Wheel. In the name of
Apollo my father, stop, or I shall be compelled to lay on you the
tenfold curse of the tetractys.Ӡ
( २ ) इस चदुचंक्रमण ( tetractys ), चतुर्गति बंधन ( स्वस्तिक प्ररूपणा ? ) से विमुक्ति
हेतु पिथेगोरस और आगे बढ़कर, हरे पौधों के प्रति भी, ममता प्रदर्शित करता है,
“Then, too, there was all this talk about what he ate, or rather
about what he would not eat. What could the man possibly have
against beans ? They were a staple of everyone’s diet; and here was
Pythagorus refusing to touch them because they might harbour the
souls of his dead friends……..He had even deterred a cow from
trampling a patch of beans by whispering some magic word in its
ear”‡
इसी प्रकार, ( एकेन्द्रिय जीव, बालों, से निर्मित ) ऊनी कपड़ों से सम्बन्धित अभ्युक्ति निम्न
प्रकार है,
“He also tells that the Pythagoreans did not bury their dead in
woollen clothing.² This looks more like religious ritual than like
mathematics. The Pythagoreans, who were held up to ridicule on the
stage, were presented as superstitious, as filthy vegetarians,³ but not
as mathematicians”. []
⁕ Ibid. p. 13.
† E. T. Bell, The Magic of Numbers, p. 87, ( 1946 )
‡ The Magic of Numbers pp. 91, 92.
[] Science Awakening p. 92.
24 गणितसारसंग्रह
( ३ ) पुनः, मांस भक्षण निषेध की शैली में आत्मा की नियत संख्या के रूप में गणित का प्रवेश है,
"The thought of all the souls they might have left shivering
in the void by devouring their own goats and swine made the good
Samians extremely unhappy. A few weeks more of these upsetting
suggestions, and they would all be strict vegetarians—except for beans.
Equally upsetting was the ghastly thought that some of their
own children might be malicious little monsters with no souls to
restrain their bestial instincts. For Pythagorus had assured them
that the total number of souls in the universe is constant".*
आत्माओं के पुनर्जन्म तथा आत्मा की अमरता का उपदेश देने वाले पिथोगोरस के वर्ग बन्धुत्व में,
गणित की महत्ता दर्शाने वाला उल्लेख निम्नलिखित भी है :
"The Pythagoreans thus have purification and initiation in co-
mmon with several other mystery-rites. Ascetic, monestic living, vege-
tarianism, and common ownership of goods occur also in other sects.
But, what distinguishes the Pythagoreans from all others, is the road
along which they believe the elevation of the soul and the union with
God to take place, namely by means of mathematics. Mathematics
formed a part of their religion. Their doctrine proclaims that God
has ordered the universe by means of numbers. God is unity, the
world is plurality and it consists of contrasting elements. It is har-
mony which restores unity to the contrasting parts and which moulds
them into a cosmos. Harmony is divine, it consists of numerical ratios.
Whosoever acquires full understanding of this number-harmony, he
becomes himself divine and immortal."†
अभी यह कहना कठिन है कि पिथेगोरस ने वही प्रतिपादन किया जो वर्द्धमान महावीर के तीर्थ
में परम्परा के आधार पर किया गया प्रतीत होता है । परन्तु, धवला ग्रंथों ( विशेषकर, षट्खंडागम पु. ३ )
को देखने पर यह अवश्य प्रतीत होता है कि इन दोनों वर्गों के लक्ष्य प्रायः एक से रहे हैं । इसकी पुष्टि,
पुनः, निम्नलिखित उद्धरण से होती है,
"According to Hėraclides of Pontus, Pythagorus said that,
"Beatitude is the knowledge of the perfection of the numbers of
the soul". Mathematics and number mysticism mingle fantastically
in the Pythagorean doctrine. Nevertheless, it was from this mystical
doctrine that the exact science of the later Pythagoreans deve-
loped."()
- The magic of Numbers, p. 92.
† Science Awakening p. 93.
() Ibid p. 94.
प्रस्तावना 25
( ४ ) पिथेगोरस के लिये “a lot of knowledge without intellect” से सम्बन्धित
अभ्युक्ति वाएर्डेन ने इस प्रकार दी है :
“This contemptuous remark cannot refer to a logically
constructed theory of numbers and a geometry such as we find in the
writings of the later Pythagoreans. But, if Pythagorus gathered into
one lump, all kinds of half-assimilated learning about the gods and
the stars, about musical scales, sacred numbers and geometrical
calculations, and proclaimed such an omnium-gatherum to his
followers as divine wisdom in a prophetic manner, then Heraclitus’
ridicule, as well as the veneration of mystics, such as Empedocles,
become entirely understandable”.*
इसी प्रकार, एक और ऐसा उल्लेख है जो विचारणीय है :
“What inspiration laid forceful hold on Pythagorus when he
discovered the subtle geometry of (the heavenly) spirals and comp-
ressed in a small sphere the whole of the circle which the aether
embraces.Ӡ
पिथेगोरीय वर्ग ने ग्रहों को जीवित देवताओं की मान्यता दी है । एक और महत्वपूर्ण तथ्य है,
“चन्द्र सम्बन्धी गणना में ५९ का आधार”, यथा,
“Firmly convinced of the mystic values of numbers, Pytha-
gorus determined to a base a brand new cycle on a primary founda-
tion of arithmetic. Fifty-nine was a “beautiful” number, since it
was a prime. When to this was added the undoubted fact that,
when we count the days and nights in every one of the moon’s
months, the total is always 59,......”‡
इस ५९ दिन और रात्रि प्रकरण से सम्बन्धित आधारभूत प्राकृत ग्रंथों में विशेष विस्तार से वर्णित
चंद्र सम्बन्धी गणना है । यह ज्ञात है कि सूर्य की अपेक्षा से चंद्र एक मुहूर्त में ६२ गगनखंड पीछे रह जाता
है, इसलिये १०९८०० गगनखंड अथवा एक परिभ्रमण पूर्ण करने में ५९ ३६/६२ दिन लगते हैं,
इस आधार पर चंद्र अर्द्धचक्र का synodic मास २९.५१२······दिन निकलता है । यहाँ
बतलाना आवश्यक है कि हिन्दू ज्योतिष ग्रंथों की अयन प्रवृत्ति प्राकृत ज्योतिष ग्रंथों से भिन्न है ।()
( ५ ) आगे, जहाँ परिमित, अपरिमित, एकत्व, अनेकत्व, सांत, अनन्त आदि के विषय में रुचि
लेने वाले पिथेगोरस के वर्ग ने अपरिमेय राशियों को दृश्यरूप देकर परिमेय बनाया और इस प्रकार
- Ibid. p. 95.
† Heath, Greek History of Mathematics, Vol. 1, p. 163. ( 1921 )
‡ A. T. Olmsteed, History of Persian Empire, Chicago, p. 209, ( 1948 )
() जैन-सिद्धांत-भास्कर, भाग ८, किरण २, पृ. ७७, ( १९४१ )
ग० सा० सं० प्र०-४
26 गणितसारसंग्रह
ज्यामिति पर आधारित अद्वितीय साधन को प्रकाश में लाया, उसी प्रकार यहाँ भारत में षट्खंडागम जैसे
सिद्धान्त ग्रन्थों में न केवल दर्शन और धर्म को, वरन् द्रव्यों (जीव और पुद्गल) के प्रमाणों को द्रव्य, क्षेत्र,
काल, भाव, विकल्प, अल्प बहुत्व के साधनों से दृश्य रूप दिया। इसका वृहद विवेचन यहाँ देना सम्भव
नहीं है। इसके हेतु तिलोय पण्णत्ती के गणित के सिवाय धवल ग्रन्थों में मुख्यतः पुस्तक ३ और ४, केशव
वर्णी अथवा टोडरमल की गोम्मटसार की टीका तथा गोपालदास बरैया कृत जैनसिद्धान्तदर्पण दृष्टव्य हैं।
यहाँ यह बात बतलाना आवश्यक है कि पिथेगोरीय वर्ग ने जहाँ अपरिमेयको परिमेय बनाने के
लिये ज्यामिति आकृतियों का आश्रय लिया है, वहाँ प्राकृत ग्रन्थों में परिमेय का बोध देने के पश्चात् उसे
अपरिमेय रूप में भी प्रस्तुत किया है। यहीं सामान्यकरण का बीज छिपा है। इनके प्रदर्शन के लिये प्राकृत
ग्रन्थों में जहाँ परमाणु द्वारा अवगाहित आकाश-प्रदेश (बिन्दु) को मूलभूत लिया है, वहाँ पिथेगोरस का
बिन्दु भी उल्लेखनीय है,
"Points are the primary elements of space for Pythagorus, and
a point is that which has position only. Unlike material things a
point has neither parts nor magnitude. These defects are shared
by 1 when the latter is regarded as the Monad or the generative
element of number. If Pythagorus thought of space as being made
up of points, then points generated his space. But whatever he
imagined space to be, he identified a point with 1."*
(६) १ को संख्या राशि में समन्वित न करने वाले और सम्भवतः भारतीय पगड़ी† को धारण
करने वाले पिथेगोरस का बिन्दु हमें एलिया निवासी ज़ीनो के चार असद्भासों (विरोधाभासों) की ओर
भी आकृष्ट करता है। प्लेटो ने उल्लेख किया है कि वह समझ चुका था कि किसी वस्तु को समान और
असमान, एक और अनेक, स्थिर और गतिवान् कैसे सिद्ध करना।‡
ज़ीनो के "सान्त की अनन्त विभाज्यता के खंडन" और अविभागी "समय" ( now ) अथवा
"वर्तमान काल" जैसी अवधारणाओं (concepts) में हम जिनागम प्रणीत "प्रदेश" और "समय"
सम्बन्धी मान्यताओं का स्पष्ट बिम्ब देखते हैं। इस सम्बन्ध में ऐसा प्रतीत होता है मानो स्याद्वाद पर
आधारित अनेकान्तात्मक वस्तु स्वरूप विषयक ज्ञान का ज़ीनो ने आधार लेकर सम्भवतः इन असद्भासों
आदि का संकलन केवल अपने आराध्य पारमेनिडीज़ (Parmenides, fl. 5th century B. C.)
के सिद्धान्तों की रक्षा के लिए विवादोत्सुक विद्वानों को विडम्बना में डालने के हेतु किया हो। इसकी पुष्टि
निम्नलिखित अवतरण से होती प्रतीत होती है :
"'Yes, Socrates', said Zeno; 'but though you are as keen as a
Sparton hound, you do not quite catch the motive of the piece,
which was only intended to protect Parmenides against ridicule...'"[]
- The Magic of Numbers, p. 161.
† Science Awakening, Plate 13, p. 112.
‡ T. Heath : Greek History of Mathematics, vol. (i), p. 273.
[] The Dialogues of Plato by B. Jowett, vol. II, p 634, (1953) Oxford.
परिकर्माधिकार एवं कलासवर्ण व्यवहार (अंकगणितीय संक्रियाएँ व भिन्न)
प्रस्तावना 27
इसके साथ ही सत्य के पुजारी और विष प्याले के ग्राहक सॉक्राटीज़ ( Socrates, 469-399
B. C. ) सम्बन्धी अभ्युक्ति भी विचारणीय है,
“Here we have, first of all, an unmistakable attack made by
the youthful Socrates on the paradoxes of Zeno. He perfectly under-
stands their drift, and Zeno himself is supposed of to admit this.
But they appear to him, as he says in the Philebus also to be rather
truisms than paradoxes.”*
एरिस्टाटिल के शब्दों में प्रथम दो तर्क निम्नलिखित हैं :—
( १ ) डाइकॉटोमी ( Dichotomy ) :—कोई भी गमन नहीं होता, क्योंकि जिसे गति क्रिया
रूप में परिणत किया जाता है उसे अंत में पहुँचने के पूर्व ( दूरी के ) मध्य में पहुँचना पड़ेगा' ( और
उस अर्द्ध भाग को तय करने के पूर्व अर्द्ध का अर्द्ध भाग तय करना होगा और इस प्रकार अनन्त तक ।)†
( २ ) आकिलीज़ ( The Achilles ) 'कथन है कि मन्द गतिवान् को तीव्र गतिवान् कभी
न पकड़ सकेगा; क्योंकि जिस स्थान को मंद गतिवान् ने छोड़ा है वहाँ तक तीव्र गतिवान् को पहुँचना
पड़ेगा और इसलिये मंद गतिवान् आवश्यककीय रूप से सदा कुछ दूर आगे ही रहेगा।' ‡
स्पष्ट है कि ये दो तर्क परिमित अखंड महत्ताओं की अनन्त विभाज्यता का खंडन करते हैं । जिनागम
के अनुसार अमूर्तिक आकाश द्रव्य को स्यात् अखंड और स्यात् अनन्त प्रदेशवान् माना गया है । प्रदेश
(खंड) की अवधारणा पुद्गल परमाणु की अविभाज्यता या अंत्य महत्ता के आधार पर मुख्य रूप से की गई
है । इस प्रकार अमूर्त द्रव्य में भेद (विभाजन) की कल्पना को स्थान न देकर केवल मूर्त द्रव्य पुद्गल में भेद
की सम्भावना की पुष्टि कर, और प्रदेश की परिभाषा, “जितने आकाश को एक अविभागी पुद्गल परमाणु
को व्याप्त करे” रूप में देकर, लोकाकाश में असंख्यात प्रदेशों की मुख्य रूप से कल्पना की गई है ।
यहाँ तक ही नहीं, वरन् एक सूच्यंगुल में प्रदेशों की संख्या का प्रमाण, संख्यामान और उपमामान में
समीकरण स्थापित करते हुए, वह प्रमाण बतलाया गया है जो पल्योपम काल राशि में स्थापित समयों
की संख्या के अर्द्धच्छेद प्रमाण का परस्पर गुणन करने पर प्राप्त हो । इस परम्परागत समीकरण के आधार
पर प्रथम तर्क का समाधान होता प्रतीत होता है, क्योंकि सृष्टि में परमाणु को अंत्य महत्ता प्राप्त करा
देने पर, किसी परिमित दूरी में अर्द्धच्छेदों की संख्या का प्रमाण अधिक से अधिक असंख्यात ही होने पर,
अनन्त विभाज्यता का प्रश्न उठता प्रतीत नहीं होता । असंख्यात प्रमाण मुख्यरूप कल्पना के आधार पर,
द्वितीय तर्क भी समाधानित होता प्रतीत होता है, क्योंकि परमाणु स्वरूप अंत्यमहत्ता वाली वस्तुओं के
भी गमनसम्बन्धी सद्भाव में किसी दूरी के अर्द्धच्छेद, त्र्यक्च्छेद, चतुर्थच्छेद आदि सभी की संख्या, प्रदेश
की कल्पना के आधार पर असंख्यात अथवा संख्यात ही होगी, अनन्त नहीं; और इस प्रकार “कभी
नहीं” प्रश्न भी समाधानित होता प्रतीत होता है । ऐसा प्रतीत होता है मानो ज़ीनो ने भौतिक संसार
में होने वाली घटनाओं को ही वास्तविक आधार मानकर अमूर्तिक आकाश की विभाज्यता की कल्पना
का खंडन किया है। ऐसा कहा जाता है कि ये तर्क पिथेगोरीय सिद्धान्तों के खंडन के लिये नहीं थे,
* Ibid. p. 638.
† T. Heath, Greek History of Mathmetics vol. I, p. 275, ( 1921 )
‡ Ibid. pp. 275 276.