गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
DevanagariHindipublished421 पृष्ठ
पृष्ठ 34, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 34प्रस्तावना 15
प्रस्तावना 15
यूनानी विज्ञान का उच्चतम विकास होता है, पर अंकगणित और ज्योतिष ( astronomy ) वही
आदिकालीन रहते हैं ।
मिस्र में प्रचलित अंकगणित से यूनानियों ने क्या सीखा ? इस प्रश्न पर वाएर्डेन का मत है कि
यूनानियों ने मिस्र की गुणन विधि तथा भिन्नों का कलन सीखा होगा । इस प्रकार के कलन को उच्च बीज-
गणित के विकसित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता है । यूनानियों ने ज्यामिति को भी स्वतंत्र
रूप से विकसित किया । मिस्र की ज्यामिति के कुछ फल अवश्य ही प्रशंसनीय रहे हों, पर यूनानियों के
लिए वह केवल प्रयुक्त अंकगणित ही थी । रोमन युग में भी, जब कि फलित ज्योतिष का विकास हुआ,
मिस्र की गणित ज्योतिष यूनान और बेबिलन की गणित ज्योतिष से बहुत पीछे रही ।
यहां मिस्र और भारत की अभिलेखबद्ध सामग्री पर दृष्टिपात करना कहां तक उपयोगी सिद्ध
होगा, नहीं कहा जा सकता :
( १ ) न केवल मास्को पेपायरस में, वरन् रिंड पेपायरस ( सम्भवतः ईसा से १७०० वर्ष पूर्व ) में
भी परिधि और व्यास के अनुपात ( π ) का मान (१६/९)² अथवा ३·१६०५......माना गया है । *
ठीक यही मान नेमिचंद्राचार्य ने इस प्रकार उल्लिखित किया है,
“यदि किसी वृत्त की त्रिज्या त्र और उसके समाई किसी वर्ग की भुजा भ हो,
तो त्र = ९/१६ भ होता है”†‡
π का एक दूसरा मान √१० है, जो दशमलव के दो अंकों तक इसी रूप में प्राप्त होता है ।
इसे यति वृषभ ने तिलोय पण्णत्ती में दृष्टिवाद से अवतरित उल्लिखित किया है । ❂
( २ ) समलम्ब चतुर्भुज के क्षेत्रफल निकालने के सूत्रों का उपयोग तिलोय पण्णत्ती की गाथाओं,
१ - १६५, १८१ आदि में हुआ है । उपरोक्त सूत्रों से अवतरित सूत्र का उपयोग मिस्र के यंत्रियों ने
चतुर्भुज का स्थूल क्षेत्रफल निकालने के लिए किया । यह सूत्र एडफू के सूर्य मंदिर में ( सम्भवतः ईसा
से १०० वर्ष पूर्व का ) प्राप्त हुआ है । ✕
( ३ ) मिस्र में π का एक दूसरा मान बीजों की राशियों अथवा उनसे भरी जाने वाली वरिमाओं
के माप से परिगणित परिधि और व्यास का अनुपात (ratio) के रूप में ३·२ प्राप्त होता है । + व्यास
को यदि इकाई लिया जाय तो वीरसेनाचार्य द्वारा उल्लिखित सूत्र “व्यासं षोडश गुणितं......” से π का
मान ३ १/५ प्राप्त होता है । ÷
(४) रज्जु (Rope) जिनागम के विविध विषयों का निरूपण करता है । यह आयाम की एक
विश्व इकाई है जिसका सम्बन्ध सूच्यंगुल, द्वीप समुद्रों की संख्या, आदि से स्थापित किया है । ∤ केन्टर के
- J.L. Coolidge : A History of Geometrical Methods, p. 11, (1940).
† त्रिलोक सार, गाथा १८ ।
‡ विभूति भूषण दत्त, जैन सिद्धान्त भास्कर, भाग २, किरण २, पृ० ३४ ।
❂ ति. प. ४-५०, ५७ ।
✕ षट्खंडागम, पुस्तक ४, गाथा १, ३ आदि ।
- T. Health, Greek Mathematics, vol. I., p. 125, (1921).
÷ षट्खंडागम, पु. ४, पृ. ४०, गाथा १४ ।
∤ लक्ष्मीचंद्र जैन, तिलोय पण्णत्ती का गणित, शोलापुर, पृ० ९९-१०१, ( १९५९) ।