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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 421 में से

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पृष्ठ 36

प्रस्तावना 17
अस्तित्व का अंत माना जाना, जैन मान्यता की पंचम गति, मोक्ष से समन्वय स्थापित करना प्रतीत होता
है । यह चतु चंक्रमण स्वस्तिक के अर्थ को भी स्तूप की भुजा प्ररूपणा में समन्वित करना दृष्टिगत होता है ।
कर्म सिद्धान्त की मान्यता की सदृशता कुछ अंशों में हमें निम्नलिखित उद्धरणों में भी दृष्टिगत
होती है—
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गंतव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना ॥❀
पुनः यज्ञ के इस निर्वचन को लेकर यह कथन है—
गत सङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थित चेतसः ।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥†
इसी अभिप्राय को निम्नलिखित श्लोक में निदर्शित किया है—
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्व कर्माणि भस्म सात्कुरुते यथा ॥‡
पिरेमिड में स्थित अन्य वस्तुओं के नाम धार्मिक महत्ता से ओतप्रोत थे । समाधि का नाम
“अनन्तत्व का दुर्ग” था, तथा साथ में रखी जानेवाली नाव सम्भवतः संसारसागर से पार ले जाने की
प्रतीक रूप थी। जो कुछ हो, इतना अवश्य है, कि मृत्यु के उपरांत आनेवाली घटनाओं की आशंका
में इसी जीवन के अंतराल में पूरी तैयारियाँ की जाती थीं, सम्भवतः न केवल राजा के लिए, वरन्
राज्यसत्ताद्वारा इस स्तूप प्रतीक प्ररूपणा के सहारे समस्त बुद्धि जीवी वर्ग के लिये भी । सबसे प्राचीन
हीलिआपोलिस के मंदिर के पिरेमिड प्रतीक को सबसे बृहत्रूप में स्थापित करने का श्रेय अहिंसाके
प्रबल समर्थक खूफू को ही है ।
इस प्रकार बने हुए स्तूपों को मिस्री में मेर m (e) r कहा जाता है, जिसका निर्वचन
'आरोहण स्थल' ( place of ascension ) किया जाता है । यह निर्वचन यद्यपि भाषा विज्ञान
विषयक नियमों के विरुद्ध नहीं है, तथापि संशयात्मक है। फिर भी, पिरेमिड ग्रंथों ( texts ) में
इस प्रकार का उल्लेख है कि “उस (राजा) के लिये स्वर्ग सोपान डाली गई है ताकि वह स्वर्गारोहण कर
सके ।”() यह विश्वास न केवल प्राचीन मिस्र में ही प्रचलित था, वरन् मेसोपोटेमिया, एसिरिया और
बेबिलन में भी प्रचलित था जहाँ आठ मंजिलों की इमारतें सम्भवतः इसी हेतु निर्मित की गई थीं। इनका
नाम ज़िगूरात था और सिपार ( Sippar ) के ऐसे भवन का नाम 'उज्ज्वल स्वर्ग का सोपान भवन'
था। इन स्तूपों का अन्य प्रचलित पिरेमिड है, जो यूनानी भाषा के पिरेमिस शब्द से उत्पन्न हुआ है ।
मिस्री गणितीय ग्रन्थ के अनुसार सम्भवतः यह एक ज्यामितीय पद है, जिसका अर्थ, “वह जो अस (us)
से (सीधा) ऊपर जाता है” बिलकुल अस्पष्ट, किन्तु पिरेमिड (स्तूप) के उत्सेध का द्योतक है । हम अभी
नहीं कह सकते कि तिलोयपण्णत्ती में वर्णित समवशरण की विधियों में निर्मित थूह क्या इन्हीं से सह-
सम्बन्धित हैं ?
❀ श्रीमद्भगवद् गीता ४-२४
† वही, ४-२३
‡ वही, ४-३७
() The Pyramids of Egypt, pp. 236, 237.
ग० सा० सं० प्र०-३