गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना 11
ही पर्याप्त प्रगति कर चुकी थी । बख्शाली हस्तलिपि में इसे यहच्छ, बाँछा या कामिका के नाम से
अभिधानित किया गया है ।
महावीर के बीजगणित तथा काल्पनिक राशि * के विषयमें उनकी प्रतिभा का परिचय देने के
सम्बन्ध में ई. टी. बेल की अभ्युक्ति है—
“The rule of signs became common in India after their restate-
ment by Mahavira in the ninth century.... The early history of comp-
plex numbers is much like that of negatives, a record of blind mani-
pulations, unrelieved by any serious attempt at interpretation or
understanding. The first clear recognition of imaginaries was Maha-
vira’s extremely intelligent remark in the ninth century that, in the
nature of things, a negative number has no square root. He had
mathematical insight enough to leave the matter there, and not to
proceed to meaningless manipulations of unintelligible symbols.” †
इसके अतिरिक्त ग्रंथकार ने व्यापकीकृत (generallized) पद्धति वाले एकघातीय समीकरणों
को हल करने के नियम दिये हैं, और अनेक अज्ञात वाले युगपत् द्विघात समीकरणों को हल किया है ।
उन्हें ज्ञात था कि वर्ग समीकरण के दो मूल होते हैं ।‡
जहाँ डाओफेन्टस ने म, न भुजाएँ लेकर समकोण त्रिभुज बनाया, वहाँ महावीर ने म, न भुजाएँ
लेकर आयत की रचना की है । अध्याय ७ की ९५½, ९७½, ११२½ वीं गाथाओ में महावीर ने दिये गये
कर्ण (अ) को लेकर सभी सम्भव समकोणों को प्राप्त करने के लिये, अर्थात् क२ + ख२ = अ२ को लेकर
हल करने के लिये तीन नियम दिये हैं । प्रथम दो नियम एक दृष्टि से ठीक नहीं हैं, क्योंकि
√(अ२ – प४) या √(अ२ – प२) परिमेय ( rational ) तब तक नहीं हो सकते, जब तक कि प को
ठीक तरह न चुना जाय । तीसरा नियम बड़े महत्व का है । यह रीति, बाद में यूरोप में, पीज़े ( Pisa )
के लेनर्डो फीबोनाट्चि ( Leonardo Fibonacci ) ने १२०२ ईस्वी में फिर से खोजी गई । इस
विधि का उद्गम शुल्व सूत्रों में है ।
ब्रह्मगुप्त और महावीर दोनों ने चतुर्भुज क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने के लिये निम्नलिखित
सूत्र दिया है:— √(सा – फा) (सा – खा) (सा – गा) (सा – घा) जहां सा, अर्धपरिमाप है और
का, खा, गा, घा भुजाओं के माप हैं । पर यह सूत्र केवल चक्रीय चतुर्भुजों के लिए ठीक उतरता है ।
इसी प्रकार, विषम त्रिभुज के क्षेत्रफल के सम्बन्ध में नियम दिये गये हैं ।
- देखिये, मूल गाथा ५२, प्रथम अध्याय ।
† Development of Mathematics,pp. 173,175 (1945)
‡ उपर्युक्त वर्णन से कहा जा सकता है कि भारतीयों ने बीजगणित के विज्ञान को दो मुख्य
भागों में विभक्त किया । एक भाग तो बीज ( विश्लेषण analysis ) का विवेचन करता है,
और दूसरा भाग ऐसे विषयों का जो बीज के लिये आवश्यक हैं । वे विषय, चिह्नों के नियम,
शून्य और अनन्ती की अंकगणित, अज्ञातों के साथ क्रियाएँ, करणी, कुट्टक और पेलियन समीकरण
( Pellian equation ) हैं ।