गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
४८ ] गणितसारसंग्रहः [ ३: ५४-
कलासवर्णषड्जातिः
इतः परं कलासवर्णे षड्जातिमुदाहरिष्यामः—
भागप्रभागावथ भागभागो भागानुबन्धः परिकीर्तितोऽतः ।
भागापवाहः सह भागमात्रा षड्जातयो ऽमुत्र फलासवर्णे ॥५४॥
भागजातिः
तत्र भागजातौ करणसूत्रं यथा—
सदृशहृतच्छेदहतौ मिथोऽशहारौ समच्छिदावंशौ ।
लुप्तैकहरौ योज्यौ त्याज्यौ वा भागजातिविधौ ॥५५॥
कलासवर्ण षड्जाति ( छः प्रकार के भिन्न )
अब हम छः प्रकार के भिन्नों का प्रतिपादन करेंगे—
भाग ( साधारण भिन्न ), प्रभाग ( भिन्नों के भिन्न ), भागभाग ( जटिल या संकर भिन्न
complex fractions ), भागानुबंध ( संयव भिन्न fractions in association ), भागा-
पवाह ( वियवन भिन्न fractions in dissociation ) और भाग मात्र ( भिन्न जिनमें ऊपर
कथित भिन्नों में से दो या अधिक भिन्न सम्मिलित हों ); ये भिन्नों के छः भेद कहलाते हैं ॥५४॥
भागजाति [ साधारण भिन्नों का जोड़ और घटाना ]
साधारण भिन्नों का क्रिया ( करण ) सम्बन्धी नियम—
दिये गये दो साधारण भिन्नों सम्बन्धी क्रियाओं में प्रत्येक के अंश और हर को, उभय साधारण
गुणनखंड द्वारा हरों को विभाजित करने से प्राप्त भजनफलों द्वारा एकान्तर से गुणित करते हैं । वे भिन्न
इस तरह प्रह्रासित होकर समान हर वाले हो जाते हैं । तब इनमें से कोई एक हर अलग कर, अंशों को
जोड़ते अथवा घटाते हैं [ ताकि दूसरे समान हर के सम्बन्ध में परिणामी राशि अंश हो ] ॥५५॥
(५५) भिन्नों को साधारण हरों में प्रह्रासित करने का नियम केवल भिन्न युग्म के लिये प्रयोज्य है ।
निम्नलिखित उदाहरण से यह नियम स्पष्ट हो जावेगा—
अ ब
• —— + —— को हल करने के लिये यहाँ, “अ” और “कख” को “ग” से गुणित करते हैं जोकि
कख ख ग
दूसरे भिन्न के हर “खग” को हरों के साधारण गुणनखण्ड ख द्वारा विभाजित करने पर भजनफल “ग”
के रूप में प्राप्त होता है । इसी प्रकार दूसरें भिन्न में “ब” और “खग” को “क” से गुणित करते हैं जो
प्रथम भिन्न के हर “कख” को हरों के साधारण गुणनखण्ड “ख” द्वारा विभाजित करने पर “क”
के रूप में प्राप्त होता है । इस तरह हमें क्रमशः अग और बक प्राप्त होते हैं । इस तरह
—— ——
कखग कखग
अग बक अग + बक
—— + —— = ———— -
कखग कखग कखग
-३. ६० ] कलासवर्णव्यवहारः [ ४९
प्रकारान्तरेण समानच्छेदमुद्भावयितुमुत्तरसूत्रम्—
छेदापवर्तकानां लब्धानां चाहतौ निरुद्धः स्यात् । हरहृतनिरुद्धगुणिते हारांशगुणे समो हारः ॥५६॥
अत्रोद्देशकः
जम्बूजम्बीरनारङ्गचोचमोचाम्रदाडिमम् । अक्रीषीद्दल्पषड्भागद्वादशांशकविंशकैः ॥५७॥
हेम्नस्त्रिंशच्चतुर्विंशेनाष्टमेन यथा क्रमम् । श्रावको जिनपूजायै तयोगे किं फलं वद ॥५८॥
अष्टपञ्चदशं विंशं सप्तषट्त्रिंशदंशकम् । एकादशत्रिषष्ट्यंशमेकविंशं च सङ्क्षिप ॥५९॥
ऐकद्विकत्रिकायैकोत्तरनवदशकषोडशान्त्यहराः ।
निजनिजमुखप्रमांशाः स्वपरायभ्यस्ताश्च किं फलं तेषाम् ॥६०॥
१ यह और अनुगामी श्लोक M में अप्राप्य हैं ।
२ P में ५७ और ५८ श्लोक छूट गये हैं ।
३ यह श्लोक केवल K और B में प्राप्य है ।
साधारण ( common ) हर को दूसरी विधि द्वारा निकालने का नियम—
हरों के सभी संभव गुणनखंडों और उनके सभी अन्तिम ( ultimate ) भजन फलों के
सन्तत गुणन से निरुद्ध ( लघुत्तम समापवर्त्य ) प्राप्त होता है । निरुद्ध को हरों द्वारा भाजित करने से
प्राप्त भजन फलों में हरों और अंशों का गुणन करते हैं । इस प्रकार से प्राप्त हरों और अंशों सम्बन्धी
अपवर्त्यो के हर समान होते हैं ॥५६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक श्रावक ने जिन पूजा के लिए जम्बूफल, नीबू, नारंगी, नारियल, केले, आम और अनार
क्रमशः १/२, १/६, १/१२, १/२०, १/३०, १/२४ और १/८ स्वर्ण मुद्राओं के खरीदे; मुझे बतलाओ कि जब इन भिन्नों
का योग किया जाय तो क्या परिणाम होगा ? ॥५७-५८॥ ८/१५, १/२०, ७/३६, ११/६३ और १/२१ को जोड़ो ॥५९॥
भिन्नों के ३ समूह हैं, जहाँ हर १, २, और ३ से क्रमशः आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते
चले जाते हैं जब तक कि ऐसे हरों में अंतिम ९, १० और १६ ( क्रमशः विभिन्न समूह में ) नहीं हो
जाते । इन भिन्नों के समूह में अंश, हरों के समूह की प्रथम संख्या के तुल्य हैं, और इन ऊपर कथित
प्रत्येक समूह वालों का प्रत्येक हर उत्तरवर्ती द्वारा गुणित किया जाता है । अंतिम हर, प्रत्येक दशा में
अपरिवर्तित रहता है क्योंकि उसके उत्तरवर्ती हर का अभाव रहता है )। बतलाओ कि अंतमें इन
परिणामी भिन्नों के प्रत्येक समूह का योग क्या होगा ? ॥६०॥ भिन्नों के चार कुलक ( sets ) हैं । हर
१, २, ३ और ४ से क्रमशः आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते चले जाते हैं जब तक कि
अंतिम हर भिन्न २ कुलकों में क्रमवार २०, ४२, २५ और ३६ नहीं हो जाते । इन भिन्नों के कुलकों के
अंश इन हरों के कुलकों की प्रथम संख्या के बराबर हैं । हरों के कुलक का प्रत्येक भिन्न उत्तरवर्ती द्वारा
गुणित किया जाता है ( अंतिम हर प्रत्येक दशा में अपरिवर्तित रहता है ।) अंत में, परिणामी भिन्नों में
( ६० ) परिणामी प्रश्न ये हैं:—मान बतलाओ—
१ १ १ १ १
(i) ───── + ───── + ───── + ・・・・・・ + ───── + ─ ,
१ × २ २ × ३ ३ × ४ ८ × ९ ९
ग० सा० सं०-७
५० ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ६१-
एकद्विकत्रिकाद्याश्चतुराद्याश्चैकवृद्धिका हाराः ।
निजनिजमुखप्रमांशाः स्वासन्नपराहताः क्रमशः ॥६१॥
विंशत्यन्ताः षड्गुणसप्तान्ताः पञ्चवर्गपश्चिमकाः । षट्त्रिंशत्पाञ्चात्याः सङ्क्षेपे किं फलं तेषां ॥६२॥
चन्दनघनसारानगरुकुङ्कुममक्रैष्ट जिनमहाय नरः ।
चरणदलविंशपञ्चमभागैः कनकस्य किं शेषम् ॥६३॥
पादं पञ्चांशमर्धं त्रिगुणितदशमं सप्तविंशांशकं च
स्वर्णद्वन्द्वं प्रदाय स्मितसितकमलं स्त्यानदध्याज्यदुग्धम् ।
श्रीखण्डं त्वं गृहीत्वानय जिनसदनप्रार्चनायान्नवीन्मा-
मित्यञ्च श्रावकार्यो भण गणक कियच्छेषमंशान्विशोध्य ॥६४॥
अष्टपञ्चमुखौ हारावुभयेऽप्येकवृद्धिकाः । त्रिंशदन्ताः पराभ्यस्ताश्चतुर्गुणितपश्चिमाः ॥६५॥
स्वस्ववक्त्रप्रमाणांशा रूपात्संशोध्य तद्द्वयम् । शेषं सखे समाचक्ष्व प्रोत्तीर्णगणितार्णव ॥६६॥
एकोनविंशतिरंथ क्रमात् त्रयोविंशतिर्द्विषष्टिश्च । रूपविहीना त्रिंशत्तत्त्रयोविंशतिशतं स्यात् ॥६७॥
पञ्चत्रिंशत्तस्मादष्टाशीतिकशतं विनिर्दिष्टम् । सप्तत्रिंशदमुष्मादष्टानवतिस्त्रिकोनपञ्चाशत् ॥६८॥
चत्वारिंशच्छतिका सैका च पुनः शतं सषोडशकम् । एकत्रिशदतः स्याद्द्वानवतिः सप्तपञ्चाशत् ॥६९
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१ ६३ और ६४ श्लोक K और B में प्राप्य हैं ।
२ M मुहु
३ यह श्लोक M में छूट गया है । ४ B विंशत्य ।
५ यह श्लोक M में अप्राप्य है । ६ K और B भागजात्यन्धिपारग ।
——————————————————————————————————————————
कुलकों को जोड़ने पर क्या योग प्राप्त होगा ? ॥६१-६२॥ एक मनुष्य ने जिन उत्सव पर संदल (चंदन)
लकड़ी, कपूर, अगर और सौंफ (कुंकुममक्रेष्ट) क्रमशः १/४, १/२, १/२० और १/५ स्वर्ण मुद्रा के, १
स्वर्ण मुद्रा में से, खरीदे । बतलाओ क्या शेष है ? ॥६३॥ एक योग्य श्रावक ने मुझे दो स्वर्ण मुद्राएं
देते हुए कहा कि जिन मंदिर में पूजा के लिये १/४, १/५, १/२, ३/१० और १/२७ स्वर्ण मुद्रा के क्रमशः विकसित
श्वेत कमल, गाढ़ा दही, घृत, दुग्ध और चंदन लकड़ी लाओ । हे मित्र ! मुझे बतलाओ कि इतने खर्च
के पश्चात् मेरे पास स्वर्ण मुद्रा का कितना भाग बचा ? ॥६४॥ भिन्नों के दो कुलक हैं । हर क्रमशः ८
और ५ से आरम्भ होते हैं और दोनों दशाओं में उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते जाते हैं जब तक कि दोनों
दशाओं में अंतिम हर ३० नहीं हो जाता । इन कुलकों के अंश दोनों कुलकों के हर के प्रथम पद के तुल्य
हैं । प्रत्येक कुलक के हरों में से प्रत्येक अपने उत्तरवर्ती द्वारा गुणित होता है । अंतिम हर दोनों दशाओं
में ४ द्वारा गुणित किया जाता है । भिन्नों के दोनों परिणामी कुलकों को जोड़ने से प्राप्त दोनों योगों में
प्रत्येक में से एक घटाने के पश्चात्, हे साधारण भिन्न महासागर के पार उतरने वाले मित्र, मुझे बतलाओ
कि क्या शेष रहेगा ? ॥६५-६६॥ कुछ दिये हुए भिन्नों के हर क्रमशः १९, २३, ६२, २९, १२३, ३५,
१८८, ३७, ९८, ४७, १४०, ४१, ११६, ३१, ९२, ५७, ७३, ५५, ११०, ४९, ७४, २१९ हैं; और,
——————————————————————————————————————————
(ii) २/(२ × ३) + २/(३ × ४) + २/(४ × ५) + ⋯⋯ + २/(९ × १०) + २/१० ,
(iii) ३/(३ × ४) + ३/(४ × ५) + ३/(५ × ६) + ⋯⋯ + ३/(१५ × १६) + ३/१६ ,
-३. ७३ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५१
त्र्यधिका सप्ततिरस्मात्सपञ्चपञ्चाशदपि च सा द्विगुणा ।
सप्तकृतिः सचतुष्का सप्ततिरेकोनविंशतिद्विशतम् ॥७०॥
हारा निरूपिता अंशा एकाद्येकोत्तरा अमून् । प्रक्षिप्य फलमाचक्ष्व भोगजात्यब्धिपारग ॥७१॥
अत्रांशोत्पत्तौ सूत्रम्—
एकं परिकल्प्यांशं तैरिष्टैः समहरांशकान् हन्यात् ।
यद्गुणितांशसमासः फलसदृशोंऽशास्त एवेष्टा ॥७२॥
ऐकांशवृद्धोनां राशीनां युतावंशाद्धारस्याधिक्ये सत्यंशोत्पादक सूत्रम्—
समहारैकांशकयुतिहृतयुत्यंशोऽश एकवृद्धीनाम् ।
शेषमितरांशयुतिहृतमन्यांशोऽस्त्येवमा चरमात् ॥७३॥
१ B प्रोत्तीर्णगणिताणर्व ।
२ B सदृशवृद्ध्यंशराशीनां अंशोत्पादक सूत्रम् ।
अंश १ से आरम्भ होकर उत्तरोत्तर क्रमवार १ द्वारा बढ़ते चले जाते हैं । इस सब भिन्नों को जोड़कर,
हे भिन्न रूपी महासागर के उसपार पहुँचनेवाले, योगफल को बतलाओ ॥६७-७१॥
जब भिन्नों के हर तथा योग दिये गये हों तो अंश निकालने के लिये नियम—
सब दिये गये हरों के सम्बन्ध में अंश को 'एक' बनाओ; तब किसी भी तरह चुनी हुई संख्याओं
द्वारा साधारण हरों में लाये गये अंशों को गुणित करो । यहां वे संख्यायें चाहे हुए अंशों में बदल जाती
हैं, जिनका योग संबंधित भिन्नों के योग के बराबर होता है ॥७२॥
जब भिन्नों के योग का हर अंश से बड़ा हो और अंश उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते चले जाते
हों, तो ऐसे भिन्नों के सम्बन्ध में अंशों के निकालने के लिये नियम—
सम्बन्धित भिन्नों के दिये गये योग को तथा जिनके अंश 'एक' होते हैं ऐसे भिन्नों को साधारण
हरों में प्रहासित कर लिया जाता है । भिन्नों के दिये गये योग को ऐसे भिन्नों के योग द्वारा भाजित
करने से प्राप्त भजनफल उन अंशों में से प्रथम चाहा हुआ अंश बन जाता है । इसके पश्चात् के इष्ट
अंश उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते चले जाते हैं और जिन्हें निकाला जा सकता है । इस भाग में प्राप्त
शेषफल को समान हर वाले अन्य अंशों द्वारा विभाजित करने पर, परिणामी भजनफल दूसरा चाहा
हुआ अंश बन जाता है जब कि वह प्रथम में जो कि पहिले ही प्राप्त हो चुका है, जोड़ दिया जाय ।
इस तरह अंत तक प्रश्न का साधन करना पड़ता है ॥७३॥
(७२) सूत्र ७४ के प्रश्न को हल करने से यह नियम स्पष्ट हो जावेगा । यहाँ प्रत्येक दिये गये हर
के सम्बन्ध मेंअंश एक मान लिया जाता है; इस तरह हमें १/९, १/१०, १/१४ प्राप्त होते हैं जो एक से हरों में
प्रहासित किये जाने पर ७०/६३०, ६३/६३०, ४५/६३० हो जाते हैं । जब अंशों को क्रमवार २, ३ और ४ से गुणित
करते हैं तो इस तरह प्राप्त गुणनफलों का योग दिये गये योग का अंश ( ५०९ ) हो जाता है ।
इसलिये, २, ३, और ४ चाहे हुए अंश हैं । आलोचनीय है, कि इस दिये गये योग का हर उतना है
जितना कि भिन्नों का साधारण हर है ।
( ७३ ) इस नियम के अनुसार ७४ वीं गाथा का प्रश्न इस प्रकार साधित होता है—
५२ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ७४-
अत्रोद्देशकः
नवकदशैकादशहृतराशीनां नवतिनवशतीभक्ता । त्र्यूनाशीत्यष्टशती संयोगः केंऽशकाः कथय ॥७४॥
छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
रूपांशकराशीनां रूपाद्यास्त्रिगुणिता हराः क्रमशः ।
द्वित्र्यंशाभ्यस्तावादिमचरमौ फले रूपे ॥७५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
९, १० और ११ द्वारा क्रमशः विभाजित की गई कुछ संख्याओं का योग ८७७ भाजित ९९०
है । बतलाओ कि भिन्नों को जोड़ने की इस क्रिया में अंश क्या क्या हैं ? ॥७४॥
चाहे हुए हरों को निकालने के लिये नियम—
‘एक’ अंश वाली विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग जब ‘एक’ हो, तब चाहे हुए हर एक से
आरम्भ होकर क्रमवार, उत्तरोत्तर ३ से गुणित किये जाते हैं, इस तरह प्राप्त प्रथम और अंतिम हर फिर
से क्रमशः २ और २/३ द्वारा गुणित किये जाते हैं ॥७५॥
प्रत्येक दिये गये हरों के सम्बन्ध में अंश को एक मानकर तथा भिन्नों को
-३. ७७ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५३
अत्रोद्देशकः
पञ्चानां राशीनां रूपांशानां युतिर्भवेद्रूपम् ।
षण्णां सप्तानां वा के हाराः कथय गणितज्ञ ॥७६॥
विषमस्थानां छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
एकांशकराशीनां द्व्याद्या रूपोत्तरा भवन्ति हराः । स्वासन्नपराभ्यस्ताः सर्वे दलिताः फले रूपे ॥७७॥
एकांशानामनेकांशानां चैकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनमें प्रत्येक का अंश एक है ऐसी पांच या छः अथवा सात विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग
प्रत्येक दशा में १ है । हे गणितज्ञ ! चाहे हुए हरों को निकालो ॥७६॥
भिन्नों की अयुग्म संख्या लेने पर हरों को निकालने के लिये नियम—
जिनके प्रत्येक अंश १ हों ऐसी विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग १ हो, तो चाहे हुए हर २ से
आरम्भ होकर, उत्तरोत्तर मान में १ द्वारा बढ़ते चले जाते हैं । प्रत्येक ऐसा हर उस संख्या से गुणित
किया जाता है जो मान में तत्काल उत्तरवर्ती के बराबर होता है और तब उसे आधा किया
जाता है ॥७७॥
कुछ इष्ट भिन्नों के विषय में चाहे हुए हरों को निकालने के लिए नियम जबकि उनके अंशों में
प्रत्येक १ अथवा १ से अन्य हो और जब उनके भिन्नीय योग का अंश भी १ हो—
गुणोत्तर श्रेढि में जिसका प्रथम पद १/अ है और साधारण निष्पत्ति १/अ है अ की सभी पूर्णांक धनात्मक
अर्हाओं (मानों) के लिये योग १/(अ - १) से { १/((अ - १)/अ) × श्रेढि का (न + १) वां पद } न्यून होता
है । इसलिये, यदि हम गुणोत्तर श्रेढि के योग में इस गाथा के नियम के अनुसार अन्तिम भिन्न
{ १/((अ - १)/अ) × (न - १) वां पद } जोड़ते हैं तो हमें १/(अ - १) प्राप्त होगा । इस १/(अ - १) से योग १ प्राप्त करने
के लिये उसमें (अ - २)/(अ - १) जोड़ना पड़ता है । इस (अ - २)/(अ - १) को नियम में प्रथम भिन्न कहा गया है और
इसका मान ३ चुना गया है क्योंकि सभी भिन्नों का अंश १ होना चाहिए ।
(७७) यहाँ १/(२ × ३ × १/२) + १/(३ × ४ × १/२) + १/(४ × ५ × १/२) + ...... + १/((न - १) न × १/२)
- १/(न × १/२)
= २ [ १/(२ × ३) + १/(३ × ४) + १/(४ × ५) + ...... + १/((न - १) न) + १/न ]
= २ [ (१/२ - १/३) + (१/३ - १/४) + ...... + (१/(न - १) - १/न) + १/न ]
= २ × १/२ = १
५४ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ७८-
लब्धहरः प्रथमस्यच्छेदः सस्वांशकोऽयमपरस्य । प्राक् स्वपरेण हतोऽन्त्यः स्वांशेनैकांशके योगे ॥७८॥
अत्रोद्देशकः
सप्तकनवकत्रितयत्रयोदशांशप्रयुक्तराशीनाम् । रूपं पादः षष्ठः संयोगाः के हराः कथय ॥७९॥
एकांशकानामेकांशेऽनेकांशे च फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
सेष्टो हारो भक्तः स्वांशेन निरग्रमादिमांशहरः । तद्युतिहाराप्तष्टः शेषोऽस्मादित्थमितरेषाम् ॥८०॥
जब कुछ इष्ट भिन्नों के योग का अंश १ हो, तब उनके चाहे हुए हरों को निकालने के लिये
योग के हर को प्रथम राशि का हर मान लो और इस हर को अपने अंश से संयुक्त कर उसे उत्तरवर्ती
राशि का हर मान लो, और ऐसे प्रत्येक हर को क्रमवार तत्काल उत्तरवर्ती के द्वारा गुणित करते चले
जाओ । अन्तिम हर को उसी के अंश द्वारा गुणित करो ॥७८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनके अंश क्रमशः ७, ९, ३ और १३ हैं ऐसे भिन्नों के योग १, १/४, १/६ हैं । बतलाओ कि
उन भिन्नीय राशियों के हर क्या हैं ॥७९॥
जिनका अंश १ है ऐसे कुछ इच्छित भिन्नों के हर निकालने के लिये नियम जब कि उन भिन्नों
के योग का अंश १ अथवा और कोई दूसरी राशि हो –
दिये गये योग के हर को जब कोई चुनी हुई राशि में मिलाते हैं और ताकि कुछ भी शेष न
बचे इस तरह उसे उस योग के अंश द्वारा विभाजित करते हैं तो वह भिन्नों की चाही हुई श्रेढि के
प्रथम अंश के सम्बन्ध में हर बन जाता है । ऊपर चुनी हुई राशि जब प्रथम भिन्न के हर द्वारा विभा-
जित की जाती है और दिये गये योग के हर द्वारा भी विभाजित की जाती है तब वह इष्ट श्रेढि के शेष
भिन्नों के योग को उत्पन्न करती है । इष्ट श्रेढि के शेष भिन्नों के इस ज्ञात योग से इसी तरह अन्य
हरों को निकालते हैं ॥८०॥
( ७८ ) बीजीय रूप से यदि योग १/न हो, और अ, ब, स तथा द दिये गये अंश हों तो भिन्नों
को निम्न रीति से जोड़ते हैं—
योग = अ / [न (न + अ)] + ब / [(न + अ) (न + अ + ब)] + स / [(न + अ + ब) (न + अ + ब + स)]
- द / [द (न + अ + ब + स)]
= [अ (न + अ + ब) + ब न] / [न (न + अ) (न + अ + ब)] + [स + न + अ + ब] / [(न + अ + ब) (न + अ + ब + स)]
= [(न + अ) (अ + ब)] / [न (न + अ) (न + अ + ब)] + १ / [न + अ + ब] = [अ + ब + न] / [न (न + अ + ब)]
= १ / न
( ८० ) बीजीय रूप से, यदि अ/न योग है तो प्रथम भिन्न १ / [(न + प)/अ] होता है; और नियम
-३. ८४ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५५
अत्रोद्देशकः
त्रयाणां रूपकांशानां राशीनां के हरा वद् । फलं चतुर्थभागः स्याच्चतुर्णां च त्रिसप्तमम् ।।८१।।
एकांशानामनेकांशानां चानेकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
इष्टहता दृष्टांशाः फलांशसदृशो यथा हि तद्योगः । निजगुणहृतफलहारस्तद्धारो भवति निर्दिष्टः॥८२॥
अत्रोद्देशकः
एकांशांशेन राशीनां त्रयाणां के हरा वद । द्वादशाप्ता त्रयोविंशत्यशंका च युतिर्भवेत् ।।८३।।
त्रिसप्तकनवांशानां त्रयाणां के हरा वद । द्वयूनपञ्चाशदाप्ता त्रिसप्तत्यंशा युतिर्भवेत् ।।८४।।
एकांशकयो राश्योरेकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
१ ८३ और ८४ श्लोक B में छूट गये हैं ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग १/४ है, तथा उनमें से प्रत्येक का अंश १ है । ऐसी
चार अन्य राशियों का योग ३/७ है । बतलाओ कि हर क्या हैं ? ॥८१॥
जिनका अंश एक अथवा कोई और संख्या हो ऐसे कुछ इच्छित भिन्नों के हर निकालने के लिये
नियम जब कि उन भिन्नों के योग का अंश १ की अपेक्षा अन्य संख्या हो—
ज्ञात अंश कुछ चुनी हुई राशियों द्वारा गुणित किये जाते हैं, ताकि इन गुणनफलों का योग
इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के अंश के बराबर हो जावे । यदि इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के हर
को उसी गुणक से विभाजित किया जाय ( जिससे कि दिया गया अंश गुणित किया गया है ) तो वह
अंश सम्बन्धी चाहे हुए हर को उत्पन्न करता है ॥८२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन भिन्नीय राशियों में, प्रत्येक का अंश १ है । उनके हरों का मान निकालो जब कि उन
राशियों का योग २३/१२ हो ॥८३॥ क्रमशः ३, ७ और ९ अंशवाली तीन भिन्नीय राशियों के हरों का
मान बतलाओ जब कि उन राशियों का योग ७३/४८ हो ॥८४॥
१ अंशवाली दो भिन्नीय राशियों के हरों का मान निकालने के लिये नियम जब कि उन
भिन्नीय राशियों के योग का अंश १ हो—
दिये गये योग के हर को चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित करने पर किसी एक इष्ट भिन्नीय राशि
का हर प्राप्त होता है । यह हर, एक कम ( पिछली ) चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित किया जाने पर
में शेष भिन्नों का योग [ प / { ((न + प)/अ) · न } ] कथित है, जहां 'प' चुनी हुई राशि है । यह [ प / { ((न + प)/अ) · न } ] स्पष्ट रूप
से [ अ/न - १ / { (न + प)/अ } ] को हल करने से प्राप्त होती है । यहां प को इस तरह चुनना चाहिये कि (न + प)
में अ का पूरा पूरा भाग जा सके ।
५६ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ८५-
वाञ्छाहतयुतिहारश्छेदः स व्येकवाञ्छयाप्तोऽन्यः ।
फलहारहारलब्धे स्वयोगगुणिते हरौ वा स्तः ॥८५॥
अत्रोद्देशकः
राश्योरेकांशयोश्छेदौ कौ भवेतां तयोर्युतिः ।
षडंशो दशभागो वा ब्रूहि त्वं गणितार्थवित् ॥८६॥
एकांशकयोरनेकांशयोश्च एकांशेऽनेकांशेऽपि फले छेदोत्पत्तौ प्रथमसूत्रम्—
इष्टगुणांशोऽन्यांशप्रयुतः शुद्धं हतः फलांशेन । इष्टाप्तयुतिहरघ्नो हरः परस्य तु तदिष्टहतिः ॥८७॥
१ P और B में यह पाठान्तर जुड़ा है:—
शुद्धं फलांशभक्तः स्वान्यांशयुतो निजेष्टगुणितांशः ।
दूसरे इष्ट अंश को उत्पन्न करता है । अथवा, दिये गये योग के हर के सम्बन्ध में किसी चुने हुए
भाजक और प्राप्त भजनफल में से प्रत्येक को उनके योग द्वारा गुणित करने पर दो इष्ट हरों की उत्पत्ति
होती है ॥८५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे अंकगणित के सिद्धान्तों के ज्ञाता ! दो इष्ट भिन्नीय राशियों के हर निकालो जब कि उनका
योग या तो १/६ अथवा १/१० हो ॥८६॥
जिनका अंश १ अथवा कोई और संख्या है ऐसे दो इष्ट भिन्नों के हरों को निकालने के लिये
नियम जब कि उन भिन्नों के योग का अंश १ अथवा कोई और संख्या हो—
कोई भी एक (either) अंश चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित होकर, तब अन्य अंश द्वारा मिलाया
जाकर, तब इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के अंश द्वारा विभाजित होकर (ताकि कुछ भी शेष न रहे, )
और तब ऊपर की चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित होकर तथा इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा
गुणित होकर, चाहे हुए हर को उत्पन्न करता है । अन्य भिन्न का हर इस हर को ऊपर की चुनी हुई राशि
द्वारा गुणित कर प्राप्त कर सकते हैं ॥८७॥
( ८५ ) बीजीय रूप से, जब दो इष्ट भिन्नों का योग १/न है, तो इस नियम के अनुसार भिन्न
क्रमशः १/पन तथा १/((प न)/(प-१)) होते हैं, जहां प कोई भी चुनी हुई राशि है । यह शीघ्र देखने में
आवेगा कि इन दोनों भिन्नों का योग १/न है ।
अथवा, जब योग १/(अ ब) हो, तब भिन्नों को १/(अ (अ + ब)) और १/(ब (अ + ब)) लिया जा सकता है ।
( ८७ ) बीजीय रूप से, यदि अ और ब अंश वाले दो इष्ट भिन्नों का योग म/न है तो वे भिन्न
अ / [((अप + ब)/म) × (न/प)] और ब / [((अप + ब)/म) × (न/प) × प] होंगे, जहाँ 'प' कोई भी संख्या इस तरह चुनी गई है कि
अप + ब को म द्वारा विभाजित किया जा सके । इन भिन्नों का योग म/न प्राप्त होगा ।
-३. ९३ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५७
अत्रोद्देशकः
रूपांशकयो राश्योः कौ स्यातां हारकौ युतिः पादः ।
पञ्चांशो वा द्विहतः सप्तकनवकांशयोश्च वद ॥८८॥
द्वितीयसूत्रम्—
फलहारताडितांशः परांशसहितः फलांशकेन हृतः ।
स्यादेकस्य च्छेदः फलहरगुणितोऽयमन्यस्य ॥८९॥
अत्रोद्देशकः
राशिद्वयस्य कौ हारावेकांशस्यास्य संयुतिः । द्विसप्तांशो भवेद्ब्रूहि षडष्टांशस्य च प्रिय ॥९०॥
अर्धेत्र्यंशदशांशकपञ्चदशांशकयुतिर्भवेद्रूपम् । त्यक्ते पञ्चदशांशे रूपांशावत्र कौ योज्यौ ॥९१॥
दलपादपञ्चमांशकविंशानां भवति संयुती रूपम् । सप्तैकादशकांशौ कौ योज्याविह विना विंशम् ॥९२
युग्मान्याश्रित्य च्छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
युग्मप्रमितान् भागानेकैकांशान् प्रकल्प्य फलराशेः ।
तेभ्यः फलात्मकेभ्यो द्विराशिविधिना हराः साध्याः ॥९३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो इष्ट भिन्नीय राशियों में प्रत्येक का अंश १ है । इनके हरों को निकालो जब कि उन राशियों
का योग या तो १/४ अथवा २/५ हों । साथ ही, उन दो अन्य भिन्नीय राशियों के हर निकालो जिनके अंश
क्रमशः ७ और ९ हैं ॥८८॥
दूसरा नियम निम्नलिखित है :—
इष्ट भिन्नों में किसी एक के अंश को इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा गुणित कर दूसरे अंश में
मिलाते हैं । प्राप्त फल को इष्ट भिन्नों के योग के अंश द्वारा विभाजित करते हैं तो इष्ट भिन्नों में से
एक भिन्न का हर उत्पन्न होता है । इस हर को जब इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा गुणित करते हैं तब
वह दूसरे भिन्न का हर हो जाता है ॥८९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे मित्र ! मुझे बतलाओ कि दो भिन्नीय राशियों के (जिनमें प्रत्येक के अंश १, १ हैं) हर
क्या होंगे जब कि उन इष्ट भिन्नों का योग २/७ है । दो अन्य इष्ट भिन्नों के भी हर क्या होंगे जिनके अंश
क्रमशः ६ और ८ हों ॥९०॥ १/२, १/३, १/१० और १/१५ का योग १ है । यदि १/१५ छोड़ दिया जावे तो दो
ऐसे १ अंश वाले भिन्न बतलाओ जिनको शेष भिन्नों में जोड़ने पर योग पुनः कुल के तुल्य हो जावे ॥९१॥
१/२, १/४, १/५ और १/२० का योग १ है । यदि १/२० छोड़ दिया जाय तो क्रमशः ७ और ११ हर वाले ऐसे दो
भिन्न कौन से होंगे जिनको शेष में जोड़ने पर उनका योग कुल योग के तुल्य हो जावे ॥९२॥
कुछ इष्ट भिन्नों को युग्मों (pairs) में लेकर उनके हरों को निकालने के लिये नियम—
सब इष्ट भिन्नों के योग को दिये गये अंशों के युग्मों की संख्या के तुल्य भागों में विपाटित
करने के बाद, (इस तरह कि प्रत्येक के अंश १, १ हों), इन भागों को युग्मों के योग में अलग-अलग
(८९) गाथा ८७ में दिये गये नियम की यह विशेष स्थिति है क्योंकि इष्ट भिन्नों के हर का
आदेशन (substitution) इस नियम में, पिछले नियम में चुनी गई राशि के स्थान में करते हैं।
ग० सा० सं०-८
५८ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ९४-
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकत्रयोदशसप्तनवैकादशांशराशीनाम् । के हाराः फलमेकं पञ्चांशो वा चतुर्गुणितः ॥९४॥
एकसूत्रोत्पन्नरूपांशहारैः सूत्रान्तरतोत्पन्नरूपांशहारैश्च फले रूपे छेदोत्पत्तौ नष्टभागानयनेच
सूत्रम्—
वाञ्छितसूत्रजहारा हरा भवन्त्यन्यसूत्रजहरघ्नाः । दृष्टांशैक्योनं फलमभीष्टनष्टांशमानं स्यात् ॥९५॥
अत्रोद्देशकः
परहतिदलनविधानात्त्रयोदश स्वपरसंगुणविधानात् ।
भागाश्चत्वारोऽतः कति भागाः स्युः फले रूपे ॥९६॥
प्राक्स्वपरहूतविधानात्सप्तस्वाासन्नपरगुणार्धविधानात् ।
भागास्त्रितयञ्चातः कति भागाः स्युः फले रूपे ॥९७॥
रूपांशका द्विषट्द्वादशविंशतिहरा विनष्टोऽत्र । पञ्चमराशी रूपं सर्वसमासः स राशिः कः ॥९८॥
इति भागजातिः ।
लेते हैं । उनमें से चाहे हुए हरों को, दो घटक भिन्नीय राशियों के सम्बन्ध में बतलाये गये नियम
द्वारा निकालते हैं ॥९३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
उन इष्ट भिन्नों के हर क्या होंगे जिनके अंश क्रमशः ३, ५, १३, ७, ९ और ११ हैं, जब कि
उन भिन्नीय राशियों का योग १ अथवा दै है ? ॥९४॥
जिनका संवादी अंश १ है और जो उपर्युक्त नियमों द्वारा प्राप्त किये गये हैं ऐसे हरों की
सहायता से कुछ हरों को निकालने के लिये ( नियम ); तथा जिनका संवादी अंश १ है और जिनके
इष्ट भिन्नों का योग एक है तथा जो उपर्युक्त अन्य नियमों द्वारा प्राप्त किये गये हैं ऐसे भिन्नों की
सहायता से हरों को निकालने के लिये ( नियम ) और नष्ट भाग का मान निकालने के लिये नियम—
किसी भी चुने हुए नियम के अनुसार प्राप्त हरों को दूसरे नियम से प्राप्त हरों द्वारा गुणित करने
पर चाहे हुए हर प्राप्त होते हैं । इन भिन्नों का योग, विशिष्ट भाग के योग द्वारा हासित किये जाने
पर छोड़े हुए नष्ट भाग का मान होता है ॥९५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
नियम ७७ द्वारा प्राप्त भिन्नों की संख्या १३ है और नियम क्रम ७८ द्वारा प्राप्त भिन्नों की
संख्या ४ है । इन नियमों की सहायता से प्राप्त भिन्नों का योग १ है, तो बतलाओ कि विघटक भिन्न
कितने हैं ? ॥९६॥ गाथा ७८ के नियम द्वारा प्राप्त भिन्नों की संख्या ७ है और नियम ७७ गाथानुसार
प्राप्त संख्या ३ है । यदि इन नियमों द्वारा प्राप्त भिन्नों का योग १ हो तो बतलाओ विघटक भिन्न कितने
हैं ? ॥९७॥ जिनके अंश १, १ हैं ऐसे कुछ भिन्नों के हर क्रमशः २, ६, १२ और २० हैं । यहां
पांचवीं भिन्नीय राशि छोड़ दी गई है । इन पाँचों भिन्नों का योग १ है, बतलाओ कि वह छोड़ी
गई भिन्नीय राशि क्या है ? ॥९८॥
इस प्रकार, कलासवर्ण षड्जाति में भाग जाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
( ९३ ) दो भिन्नीय राशियों के सम्बन्ध में गाथा ८५, ८७ और ८९ में नियम दे दिये गये हैं ।
? Wait, look at L30: ५/१८ का ४/१३, १/८ काThen L31:९,-> wait, after९,what is next? Look at L31:१/९ का ४/१३! Wait, look at the fraction: top is १, bottom is ९. Then का. Then top is ४, bottom is १३! Wait, look at the denominator of ४/१३: it is १३? No, look at ४/१३: it has ४on top, and१३below. Wait, thenऔर! Then १/५ का ३/४ का १/२! Wait, verse 106 says: "पञ्चांशात् त्रिपादार्धम्" = 1/5 of 3/4 of 1/2! Yes! १/५ का ३/४ का १/२! Look at L31: १/५ का ३/४ का १/२ ॥१०५-१०६॥Yes! Top १, bottom ५, thenका, top ३, bottom ४, then का`, top १, bottom २. That matches "पञ्चांशात् त्रिपादार्धम्" perfectly!
Now let's check standard transcription practice:
Can we write fractions inline like १/२, `१/३ का
६० ] गणितसारसंग्रहः [ ३. १०७-
अत्रैकाव्यक्तस्यानयनसूत्रम्—
रूपं न्यस्यान्यक्ते प्राग्विधिना यत्फलं भवेत्तेन । भक्तं परिदृष्टफलं प्रभागजातौ तदज्ञातम् ॥१०७॥
अत्रोद्देशकः
राशेः कुतश्चिदष्टांशस्त्र्यंशपादोऽर्धपञ्चमः । षष्ठत्रिपादपञ्चांशः किमव्यक्तं फलं दलम् ॥१०८॥
अनेकाव्यक्तानयनसूत्रम्—
कृत्वाज्ञातनिष्ठान् फलसदृशो तद्युतिर्यथा भवति ।
विभजेत पृथग्व्यक्तैरविदितराशिप्रमाणानि ॥१०९॥
अत्रोद्देशकः
राशेः कुतश्चिदधं कुतश्चिदष्टांशकस्त्रिपञ्चांशः । कस्माद्द्वित्र्यंशाधं फलमधं के स्युरज्ञाताः ॥११०॥
भागभागजातावुद्देशकः
षट्सप्तभागभागस्त्र्यष्टांशांशश्चतुर्नवांशांशः । त्रिचतुर्थभागभागः किं फलमेतद्युतौ ब्रूहि ॥१११॥
[
-३. ११७ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६१
द्वित्र्यंशाशं रूपं त्रिपादभक्तं द्विकं द्वयं चापि। द्वित्र्यंशोद्भूतमेकं नवकात्संशोध्य वद शेषम् ॥११२॥
इति प्रभागभागभागजाती।
भागानुबन्धजातौ सूत्रम्—
हरहवरूपेष्वंशान् संक्षिप भागानुबन्धजातिविधौ। गुणयांश्रांशच्छेदावंशयुतच्छेदहाराभ्याम् ॥११३॥
रूपभागानुबन्ध उद्देशकः
²द्वित्रिष्टकाष्टनिष्काणि द्वादशाष्टषडंशकैः। पञ्चाष्टमैः समेतानि विंशतेः शोधय प्रिय ॥११४॥
सार्धेनैकेन पङ्कजं साष्टांशैर्दशभिर्हिमम्। सार्धाभ्यां कुङ्कुमं द्वाभ्यां क्रीतं योगे कियद्भवेत्³ ॥११५॥
⁴साष्टमाष्टौ षडंशान् षड्द्वादशांशायुतं द्वयम्। त्रयं पञ्चाष्टमोपेतं विंशतेः शोधय प्रिय ॥११६॥
सप्ताष्टौ नवदशमाषकान् सपादान् दत्त्वा ना जिननिलये चकार पूजाम्।
उन्मीलत्कुरवककुन्दजातिमल्लीमालाभिर्गणक वदाशु तान् समस्य ॥११७॥
१ B में गुणयेदग्रांशहरौ सहितांश्छेद°, पाठ है। ३ M द्वदेत्
२ यह श्लोक P में अप्राप्य है। ४ यह श्लोक केवल P में प्राप्य है।
॥ १११ ॥ ९ में से १/(२/३), २/(३/४) और २/(३/४) तथा १/(२/३) घटाने पर क्या शेष रहेगा ? ॥ ११२ ॥
इस प्रकार, कलासवर्ण षड्जाति में, प्रभागजाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ।
भागानुबंध जाति [ संयव भिन्न ]
भागानुबंध भिन्नों के सरलीकरण के सम्बन्ध में नियम—
भागानुबंध भिन्न को सरल करने के लिये अंश को संयवित पूर्णसंख्या ( associated whole
number ) और हर के गुणनफल में जोड़ देते हैं। यदि सम्बन्धित संख्या पूर्णांक न होकर भिन्नीय
हो तो प्रथम भिन्न के अंश और हर को दूसरे भिन्न के क्रमशः अंशसहित हर तथा हर से गुणित
करो ॥११३॥
रूपभागानुबंध ( संयक्ति पूर्णांक वाले भागानुबंध भिन्न ) पर उदाहरणार्थ प्रश्न
निष्क क्रमशः २, ३, ६ और ८ हैं और वे १/१२, १/८, १/६ और ५/८ से संयवित हैं। हे मित्र इनके
योग को २० में से घटाओ ॥ ११४ ॥ १ १/२ निष्क के कमल, १० १/८ निष्क का कपूर और २ १/२ निष्क की
सौंफ खरीदी गई । योग करनेपर उनका कुल मान बतलाओ ? ॥ ११५ ॥ हे मित्र २० में से निम्न-
लिखित को घटाओ—८ १/८, ६ १/६, २ १/१२ और ३ ५/८ ॥११६॥ एक व्यक्ति जिन मंदिर में पूजन हेतु ७ १/४, ८ १/४,
९ १/४ और १० १/४ माषों के खिले हुए कुरवक, कुन्द, जाति और मल्लिका ( जूही ) फूलों के हार भेंट करता
है । हे गणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बताओ कि उन माषों को जोड़ने के बाद क्या प्राप्त होगा ? ॥ ११७ ॥
(११३) भागानुबंध का शाब्दिक अर्थ संयवित भिन्न है। यह नियम दो प्रकार के संयवित भिन्नों
में प्रयोज्य होता है। प्रथम मिश्र संख्या है अर्थात् पूर्णांक से संयवित भिन्न है, और दूसरा प्रकार वह है
जिसमें भिन्न से संयवित भिन्न रहते हैं। जैसे १/३ से संयवित १/२ ; स्व के १/३ से संयवित १/२ और इस
संयवित राशि के १/२ से संयवित १/२ । “१/३ से संयवित १/२” का अर्थ होता है १/२ + १/२ का १/३ ; दूसरे उदाहरण
का अर्थ है : १/२ + १/२ का १/३ + १/२ का ( १/२ + १/२ का १/३ ) इस प्रकार के संयवन को “योजित अनुगमन”
( additive consecution ) कहते हैं ।
६२ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ११८-
भागानुबन्ध उद्देशकः
स्वत्र्यंशपादसंयुक्तं दलं पञ्चांशकोऽपि च । त्र्यंशः स्वकीयषष्ठार्धसहितस्तद्युतौ कियत् ॥११८॥
त्र्यंशाद्यंशकसप्तमांशचरमैः स्वैरन्वितादर्धतः पुष्पाण्यर्धतुरीयपञ्चनवमैः स्वीयैर्युतात्सप्तमात् ।
गन्धं पञ्चमभागतो¹ऽर्धचरणत्र्यंशांशकैर्मिश्रिताद् धूपं चार्चयितुं नरो जिनवरान्राष्टौ किं तद्युतौ ॥
स्वदलसहितं पादं स्वत्र्यंशकेन समन्वितद्विगुणनवमं स्वाष्टांशत्र्यंशकार्धविमिश्रितम् ।
नवममपि च स्वाष्टांशाद्यर्धपश्चिमसंयुक्तं निजदलयुतं त्र्यंशं संशोध्य त्रितयात्प्रिय ॥१२०॥
स्वदलसहितपादं सस्वपादं दशांशं निजदलयुतषष्ठं सस्वकत्र्यंशमर्धम् ।
चरणमपि समेतस्वत्रिभागं समस्य प्रिय कथय समग्रप्रज्ञ भागानुबन्धे ॥१
-३. १२६ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६३
अत्रोद्देशकः
कश्चित्स्वगैरर्धतृतीयपादैरंशोऽपरः पञ्चचतुर्नवांशैः ।
अन्यस्त्रिपञ्चांशनवांशकार्धैर्युतो युती रूपमिहांशकाः के ॥१२३॥
कोऽप्यंशः स्वार्धपञ्चांशत्रिपादनवमैर्युतः । अर्धं प्रजायते शीघ्रं वदान्यक्तप्रमां प्रिय ॥१२४॥
शेषेष्टस्थानाव्यक्तभागानयनसूत्रम्—
लब्धात्कल्पितभागाः सवर्णितैर्व्यक्तरािशभिर्भक्ताः ।
क्रमशॊ रूपविहीनाः स्वेष्टपदेष्वविदितांशाः स्युः ॥१२५॥
इति भागानुबन्धजातिः ।
अथ भागापवाहजातौ सूत्रम्—
हरहतरूपेष्वंशानपनय भागापवाहजातिविधौ । गुणयाग्रांशच्छेदावंशोनच्छेदहाराभ्याम् ॥१२६॥
१ B गुणयेदग्रांशहरौ रहितांशच्छेदहाराभ्याम् ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
[L
] वियुत भिन्नों वाले भागापवाह भिन्नों पर प्रश्न`
क्रमशः १/६, १/४, १/४, १/३ और १/२ द्वारा हासित २/५, २/९, १/३, १/८ और २/७ को क्रमवार जोड़ो और तबयोगफल बतलाओ ॥ १२९ ॥ दिये गये ६/७ पण में, अनुगामी स्व की १/६, १/८, १/९ और १/१० राशियों कोहासित करो, पुनः स्व की १/४, १/३ और १/५ राशियों द्वारा ५/१२ को हासित करो, इसी तरह स्व की २/३, २/५और १/२ राशियों द्वारा ५/६ को हासित करो और अन्य राशि २/३ को स्व की ५/८ संख्या द्वारा हासित करो । इनसभी परिणामों को जोड़कर फल बतलाओ ॥ १३० ॥ भागापवाह भिन्न के सम्बन्ध में, हे मित्र, यदितुमने कष्ट किया है तो बतलाओ कि १/२ में से निम्नलिखित राशियाँ घटाने पर क्या शेष रहेगा ? स्व के- `३/८, १/४ और १/९ भागों द्वारा हासित १/२ ; इसी तरह स्व
-३. १३६ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६५
अत्रोद्देशकः
कश्चित्स्व कैश्चरणपञ्चमभागषष्ठैः कोऽप्यंशको दलषडंशकपञ्चमांशैः ।
हीनोऽपरो द्विगुणपञ्चमपादषष्ठैः तत्संयुतिर्दलमिहाविदितांशकाः के ॥१३३॥
कोऽप्यंशस्स्वार्धषड्भागपञ्चमाष्टमसप्तमैः । १ विहीनो जोयते षष्ठः स कोऽशो गणितार्थवित् ॥१३४॥
शेषेष्टस्थानाव्यक्तभागानयनसूत्रम्—
लब्धात्कल्पितभागाः सवर्णितैर्य्यक्तराशिभिर्भक्ताः ।
रूपात्पृथगपनीताः स्वेष्टपदेष्वविदितांशाः स्युः ॥१३५॥
इति भागापवाहजातिः ।
भागानुबन्धभागापवाहजात्योः सर्व्व व्यक्तभागानयनसूत्रम्—
त्यक्त्वैकं स्वेष्टांशान् प्रकल्पयेदविदितेषु सर्वेषु ।
एतैस्तं पुनरंशं प्रागुक्तेरानयेत्सूत्रैः ॥१३६॥
१ P, K और B में जायते के लिए तद्युतिः ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई भिन्न निज की १/४, १/५ और १/६ राशियों द्वाराअनुगमन में ( in consecution ) ह्रासित
किया जाता है । दूसरा भिन्न भी इसी तरह निज के १/२, १/६, और १/५ भागों द्वारा ह्रासित किया
जाता है । तीसरा भिन्न भी इसी तरह निज के २/५, १/४ और १/६ भागों द्वारा ह्रासित किया जाता है ।
इन तीनों ह्रासित राशियों का योग १/२ है । बतलाओ कि वे अज्ञात भिन्न कौन-कौन हैं ? ॥१३३॥
कोई भिन्न निज के १/२, १/६, १/५ तथा १/८ और १/७ भागों द्वारा अनुगमन में ह्रासित किया जाता है और इस
तरह १/६ हो जाता है । हे अंकगणित सिद्धान्त वेत्ता ! बतलाओ कि वह अज्ञात क्या है ? ॥१३४॥
अन्य चाहे हुए स्थानों वाला कोई अज्ञात भिन्न निकालने के नियम—
दिये गये योग से प्राप्त मन से चुने हुए विपाटित भाग क्रमशः इष्ट भागापवाह भिन्नों वाली
सरलीकृत ज्ञात राशियों द्वारा विभाजित होकर और तब १ में से अलग अलग घटाये जाकर, चाहे हुए
स्थानों की भिन्नीय राशियाँ हो जाते हैं ॥१३५॥
इस प्रकार कलासवर्ण षड्जाति में भागापवाह जाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
भागानुबन्ध अथवा भागापवाह प्रकार के भिन्नों के सम्बन्ध में अंतिममान ज्ञात होने पर
(सर्व स्थान वाले) अज्ञात भिन्नों को निकालने के लिये नियम—
मन से, इच्छानुसार, केवल एक स्थान छोड़कर सब अज्ञात स्थानों सम्बन्धी भिन्न चुनो । तब
ऊपर लिखे हुए नियमों द्वारा, उस अज्ञात भिन्न को, इन मन से चुनी हुई भिन्नीय राशियों की सहायता
से प्राप्त करो ॥१३६॥
(१३५) गाथा १२५ में दिये गये नियम के समान यह भी है ।
(१३६) १२२, १२५, १३२ और १३५ गाथाओं में दिये गये नियमानुसार यह भी है ।
ग० सा० सं०-९
६६ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. १३७-
अत्रोद्देशकः
कश्चिदंशोऽशकैः कैश्चित्पञ्चभिः स्वैर्युतो दलम् ।
वियुक्तो वा भवेत्पादस्तानंशान् कथय प्रिय ॥१३७॥
भागमातृजातौ सूत्रम्—
भागादिमजातीनां स्वस्वविधिर्भागमातृजातौ स्यात् ।
सा षड्विंशतिभेदा रूपं छेदोऽच्छिदो राशेः ॥१३८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक भिन्न निज के पाँच अन्य भिन्नों से मिलाया जाने पर १/२ हो जाता है; और, एक अन्य
भिन्न निज के पाँच अन्य भिन्नों द्वारा ह्रासित होकर १/४ हो जाता है । हे मित्र ! उन सब अज्ञात भिन्नों
का मान निकालो ॥१३७॥
भागमातृ जाति [ दो या अधिक प्रकार के भिन्नों से संयुक्त भिन्न ]
ऊपर वर्णित सभी प्रकार के भिन्नों का जिसमें समावेश है ऐसे भागमातृ प्रकार के भिन्न सरल
करने के लिये नियम—
भागमातृ भिन्नों में, सरल भिन्नों को आदि लेकर विभिन्न प्रकार के भिन्नों सम्बन्धी नियम
प्रयोज्य होते हैं । भागमातृ भिन्न के २६ प्रकार होते हैं । जिस राशि का हर नहीं होता उस राशि का
[L
-३. १४० ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६७
अत्रोद्देशकः
ड्यंशः पादोऽर्धोर्धं पञ्चमषष्ठत्रिपादहृतमेकम् ।
पञ्चार्धहृतं रूपं सषष्ठमेकं सपञ्चमं रूपम् ॥१३९॥
स्वीयतृतीययुग्दलम्तो निजषष्ठयुतो द्विसप्तमो
हीननवांशमेकमपनीतदशांशकरूपमष्टमः ।
स्वेन नवांशकेन रहितश्चरणः स्वकपञ्चमोज्झितो
ब्रूहि समस्य तान् प्रिय कलासमकोत्पलमालिकाविधौ ॥१४०॥
इति भागमातृजातिः ।
इति सारसङ्ग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ कलासवर्णो नाम द्वितीयव्यवहारस्समाप्तः ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दिया गया है कि भिन्न २/३, १/४, १/२ का १/२, १/५ का १/६; १ / (३/४) , १ / (५/२) ; १ १/६, १ १/५; १/२ अपने १/३ भाग
से संयुक्त है; पुनः