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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 421 में से

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पृष्ठ 115

-३. ११७ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ६१
द्वित्र्यंशाशं रूपं त्रिपादभक्तं द्विकं द्वयं चापि। द्वित्र्यंशोद्भूतमेकं नवकात्संशोध्य वद शेषम् ॥११२॥
इति प्रभागभागभागजाती।
भागानुबन्धजातौ सूत्रम्—
हरहवरूपेष्वंशान् संक्षिप भागानुबन्धजातिविधौ। गुणयांश्रांशच्छेदावंशयुतच्छेदहाराभ्याम् ॥११३॥
रूपभागानुबन्ध उद्देशकः
²द्वित्रिष्टकाष्टनिष्काणि द्वादशाष्टषडंशकैः। पञ्चाष्टमैः समेतानि विंशतेः शोधय प्रिय ॥११४॥
सार्धेनैकेन पङ्कजं साष्टांशैर्दशभिर्हिमम्। सार्धाभ्यां कुङ्कुमं द्वाभ्यां क्रीतं योगे कियद्भवेत्³ ॥११५॥
⁴साष्टमाष्टौ षडंशान् षड्द्वादशांशायुतं द्वयम्। त्रयं पञ्चाष्टमोपेतं विंशतेः शोधय प्रिय ॥११६॥
सप्ताष्टौ नवदशमाषकान् सपादान् दत्त्वा ना जिननिलये चकार पूजाम्।
उन्मीलत्कुरवककुन्दजातिमल्लीमालाभिर्गणक वदाशु तान् समस्य ॥११७॥
१ B में गुणयेदग्रांशहरौ सहितांश्छेद°, पाठ है। ३ M द्वदेत्
२ यह श्लोक P में अप्राप्य है। ४ यह श्लोक केवल P में प्राप्य है।
॥ १११ ॥ ९ में से १/(२/३), २/(३/४) और २/(३/४) तथा १/(२/३) घटाने पर क्या शेष रहेगा ? ॥ ११२ ॥
इस प्रकार, कलासवर्ण षड्जाति में, प्रभागजाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ।
भागानुबंध जाति [ संयव भिन्न ]
भागानुबंध भिन्नों के सरलीकरण के सम्बन्ध में नियम—
भागानुबंध भिन्न को सरल करने के लिये अंश को संयवित पूर्णसंख्या ( associated whole
number ) और हर के गुणनफल में जोड़ देते हैं। यदि सम्बन्धित संख्या पूर्णांक न होकर भिन्नीय
हो तो प्रथम भिन्न के अंश और हर को दूसरे भिन्न के क्रमशः अंशसहित हर तथा हर से गुणित
करो ॥११३॥
रूपभागानुबंध ( संयक्ति पूर्णांक वाले भागानुबंध भिन्न ) पर उदाहरणार्थ प्रश्न
निष्क क्रमशः २, ३, ६ और ८ हैं और वे १/१२, १/८, १/६ और ५/८ से संयवित हैं। हे मित्र इनके
योग को २० में से घटाओ ॥ ११४ ॥ १ १/२ निष्क के कमल, १० १/८ निष्क का कपूर और २ १/२ निष्क की
सौंफ खरीदी गई । योग करनेपर उनका कुल मान बतलाओ ? ॥ ११५ ॥ हे मित्र २० में से निम्न-
लिखित को घटाओ—८ १/८, ६ १/६, २ १/१२ और ३ ५/८ ॥११६॥ एक व्यक्ति जिन मंदिर में पूजन हेतु ७ १/४, ८ १/४,
९ १/४ और १० १/४ माषों के खिले हुए कुरवक, कुन्द, जाति और मल्लिका ( जूही ) फूलों के हार भेंट करता
है । हे गणितज्ञ ! मुझे शीघ्र बताओ कि उन माषों को जोड़ने के बाद क्या प्राप्त होगा ? ॥ ११७ ॥
(११३) भागानुबंध का शाब्दिक अर्थ संयवित भिन्न है। यह नियम दो प्रकार के संयवित भिन्नों
में प्रयोज्य होता है। प्रथम मिश्र संख्या है अर्थात् पूर्णांक से संयवित भिन्न है, और दूसरा प्रकार वह है
जिसमें भिन्न से संयवित भिन्न रहते हैं। जैसे १/३ से संयवित १/२ ; स्व के १/३ से संयवित १/२ और इस
संयवित राशि के १/२ से संयवित १/२ । “१/३ से संयवित १/२” का अर्थ होता है १/२ + १/२ का १/३ ; दूसरे उदाहरण
का अर्थ है : १/२ + १/२ का १/३ + १/२ का ( १/२ + १/२ का १/३ ) इस प्रकार के संयवन को “योजित अनुगमन”
( additive consecution ) कहते हैं ।