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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

मुक्ति लीला ८१
अजर अमर बिनसै नहीं, सुख सागर में बास ।
केवल नाम कबीर है, गावै धनि धर्मदास ॥२०॥
॥ मुक्ति लीला ॥
हीरा जन्म न बारम्बार, समुझि मन चेत हो ॥ टेक ॥
जैसे कीट पतंग पषान, भये पसु पच्छी ।
जल तरंग जल माहिँ, रहे कच्छा औ मच्छी ॥
अंग उघारे रहे सदा, कबहुँ न पावै सुक्ख ।
सत्य नाम जाने बिना, जन्म जन्म बड़ दुक्ख ॥ १ ॥
सीतल पासा ढारि, दाव खेलो संम्हारी ।
जीतौ पक्की सार, आव जनि जैहौ हारी ॥
रामै राम पुकारि के, लीन्हो नरक निवास ।
मूड़ गड़ाय रहे जिव, गर्भ माहिँ दस मास ॥ २ ॥
गर्भ दुक्ख तैं काढ़ि, प्रगट प्रभु बाहर कीन्हो ।
भक्ति अंग को छापि, अंक दस्तक लिखि दीन्हो ॥
वा को नाम बिसरि गयो, जिन पठयो संसार ।
रंचक सुख के कारने, बिसरि गयो निज सार ॥ ३ ॥
नहिँ जाने केहि पुन्य, प्रगट भे मानुष देही ।
मन बच कर्म सुभाव, नाम से कर ले नेही ॥
लख चौरासी भर्मि के, पायो मानुष देह ।
सो मिथ्या कस खोवते, झूठी प्रीति सनेह ॥ ४ ॥
बालक बुद्धि अजान, कछू मन में नहिँ आने ।
खेले सहज सुभाव, जहाँ आपन मन माने ॥
अधर कलोले होइ रह्यो, ना काहू को मान ।
भली बुरी ना चित धरै, बारह बरस समान ॥ ५ ॥
११

८२ मुक्ति लीला
जोबन रूप अनूप, मसी मुख ऊपर छाई ।
अंग सुगन्ध लगाय, सीस पगिया लटकाई ॥
अंध भये सूझै नहीं, फूटि गई है चार¹।
भटके पड़े पतंग ज्यौँ, देखि बिरानी नार ॥ ६ ॥
जोबन जोर झकोर, नदी उर अंतर बाढ़ी ।
संतो हो हुसियार, कियो न बाँहू गाढ़ी ॥
दे गजगीरी प्रेम की, मूँदो दसो दुवार ।
वो साँईँ के मिलन में, तुम जनि लावो बार ॥ ७ ॥
बृद्ध भये पछिताय, जबै तीनौँ पन हारे ।
भई पुरानी प्रीति, बोल अब लागत प्यारे ॥
लच कच दुनियाँ है रही, केस भये सब सेत ।
बोलत बोल न आवई, लूटि लिये जम खेत ॥ ८ ॥
माया रंग कुसुम्म, महा देखन को नीको ।
मीठो दिन दुइ चार, अंत लागत है फीको ॥
कोटिन जतन रह्यो नहीं, एक अंग निज मूल ।
ज्यौँ पतंग उड़ि जायगो, ज्यौँ माया काफूर ॥ ६ ॥
नाम रंग मंजीठ, लगे छूटे नहिँ भाई ।
लच पच रहो समाय, सार ता मेँ अधिकाई ।
केती बार धुलाइये, देदे करड़ा धोय ।
ज्यौँ ज्यौँ भट्टी पर दिये, त्यौँ त्यौँ उज्ज्वल होय ॥१०॥
निकट जमन के जात, तबै हैगो मुख कारो ।
बोले बोल न आय, तबै तोहि करिहैं गारो² ॥
काल छली तिहुँ लोक में, नहिँ काहू की मान ।
राजा राना मारिया, सबहीँ कीन्ह दिवान³ ॥११॥
(१) दो अन्तर की दो भीतर की आँखें । (२) कारागार या जेलखाना । (३) दिवाना ।

मुक्ति लीला ८३
देऊँ सुमति बिचार, सीख जो मेरी मानो।
चलो सुमारग चाल, भलो जो अपनो जानो॥
तिरिया निकट बुलाइ के, दे गइ माथे हाथ।
लेगइ रंग निचोइ के, ज्योँ तेली कै काथ१॥१२॥
जो मरि भाखा बोल, बोलि कामिन चित चोरयो।
छिनहीँ प्रीति बढ़ाय, नाम से नाता तोरयो॥
रस बस कीन्हो आइ के, गयो ठगौरी मेल।
जीव लोभ बस भ्रमि रहे, करि केवल सुख केल ॥१३॥
सोवत हो केहि नीँद, मूढ़ मूरख अज्ञानी।
भोर भये परभात, अबहिँ तुम करो पयानी॥
अब हम साँची कहत हैं, उड़ियो पंख पसार।
छुटि जैहो या दुख तैँ, तन सरवर के पार ॥१४॥
नाव भाँझरी साजि, बाँधि बैठो बैपारी।
बोझ लद्यो पाषान, मोहिँ डर लागै भारी॥
माँझ धार भव तखत मेँ, आइ परैगी भोर।
एक नाम केवटिया करि ले, सोई लगावै तीर ॥१५॥
सौ भइया की बाँह, तपै दुर्जोधन२ राना।
परे नरायन बीच, भूमि देते गरबाना३॥
जुद्ध रच्यो कुरुछेत्र मेँ, बानन बरसे मेँह।
तिनहीँ के अभिमान तैँ, गिधहुँ न खायो देँह ॥१६॥
छत्रपती भूपाल रहत, देखा नहिँ कोई।
दिन दस गये बजाइ, गर्द माँ मिलिगे सोई॥
(१) तरछट। (२) दुर्योधन कौरवों के राजा के सौ भाई थे, जो सब महाभारत
में मारे गये। (३) राजा युधिष्ठिर को थोड़ी जमीन श्रीकृष्ण ने दिलाना चाहा था पर
दुर्योधन ने शेखी से इनकार किया।

८४
मुक्ति लीला

परिहौ नरक अघोर मेँ, अब किन चेतो अंध।
सत्त नाम जाने बिना, परो काल के फंद ॥१७॥
हुई सलीता संग, बहुत हाथी औ घोरा।
मरन की बेरिया संग, चले नहिँ एको डोरा ॥
कंचन महल धरे रहे, और सुंदरी नारि।
ज्योँ करि आये त्योँ गये, चले दोऊ कर झारि ॥१८॥
जोधा आगे उलट पुलट, यह पुहमी१ करते।
बस नहिँ रहते सोय, छिने इक मेँ बल होते ॥
सौ जोजन मरजाद सिंध कै, करते एकै फाल२।
हाथन पर्वत तौलते, तिन धरि खायो काल ॥१९॥
ऐसा यह संसार, जैसी रहटे की घरिया।
इक रीते फिरि जाय, एक आवै फिरि भरिया ॥
उपजि उपजि बिनसन कर, फिरि फिरि जमे गिरास।
यही तमासा देखि के, मनुवा भयो उदास ॥२०॥
जैसे कलपि कलपि के, भये हैं गुड़ की माखी।
[L

··· उक्त पुस्तको का सूचीपत्र
[ हर महात्मा का जीवन-चरित्र उनकी बानी के आदि में दिया है ]
कबीर साहिब का अनुराग सागर ... ... १|-)
कबीर साहिब का बीजक ... ... १)
कबीर साहिब का साखी-संग्रह ... ... १||)
कबीर साहिब की शब्दावली, पहला भाग ... ... १)
कबीर साहिब की शब्दावली, दूसरा भाग ... ... १)
कबीर साहिब की शब्दावली, तीसरा भाग ... ... ||)
कबीर साहिब की शब्दावली, चौथा भाग ... ... |)
कबीर साहिब की ज्ञान-गुदड़ी, रेखते और झूलने ... ... ||)
कबीर साहिब की अखरावती ... ... |)
नी धरमदास जी की शब्दावली ... ... |||)
तुलसी साहिब (हाथरस वाले) की शब्दावली भाग १ ... ... १||)
तुलसी साहिब दूसरा भाग पद्मासागर ग्रंथ सहित ... ... १||)
तुलसी साहिब का रत्नसागर ... ... १|||)
तुलसी साहिब का घट रामायण पहला भाग ... ... २)
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