अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार द्वारा
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नेता थे, अतः दल के सारे पैसों को अपने पास रखते थे, ताकि उनका अप-
व्यय न हो। वैसे ही दल के पास सदा पैसे की कमी बनी रहती थी। अतः
आजाद एक-एक पैसे को बहुत सोच-समझकर खर्च करते थे। इस विषय
में वीरेन्द्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं—
"अपने खर्चों के विषय में भी आजाद बहुत सचेत थे। उनका दृष्टि-
कोण यह था कि जो भी रुपया मिलता है, वह लोग उन्हें इसलिए देते हैं
कि यह क्रान्तिकारी युवक अपना सारा समय देश के लिए लगाते हैं और
कोई काम नहीं कर सकते। इसलिए उनके गुजारे के लिए इधर-उधर से
रुपया मिल जाता है। यह किसी प्रकार की फिजूलखर्ची पर नहीं लगाना
चाहिए। चूँकि आजाद पार्टी के नेता थे। अतः रुपया भी वह अपने पास
ही रखते थे। स्वयं ही अपने साथियों में बाँटते थे। आज के हालात तो
कुछ और हैं। कोई जमाना था, विशेषतः जिन दिनों लाहौर में साण्डर्स की
हत्या हुई थी या विधान सभा में बम फेंका गया था, उन दिनों आजाद हर
साथी को चार आने प्रतिदिन दिया करते थे। किन्तु उनके कुछ साथी ऐसे
भी थे यशपालसिंह जैसे, जिन्हें सिनेमा देखने का शौक था। वह आजाद से
पैसे माँगते तो आजाद उन्हें साफ इन्कार कर देते। कह देते जो कुछ रुपया
तुम्हें देते हैं इसे तुम्हें अपने खून से वापस करना होगा। सिनेमा की
बर्बादी एक क्रान्तिकारी के लिए उचित नहीं है।
एक नेता के लिए इस प्रकार का आदर्श दलीय अनुशासन आवश्यक
भी है। इसलिए वह सदा अपने मित्र साथियों को सुरा, सुन्दरी एवं धूम्र-
पान से दूर रहने की सलाह देते थे। और स्वयं इन सबसे पूर्णतया दूर
रहते थे।
यह सच है कि आजाद एक निर्धन परिवार में उत्पन्न हुए थे और
उन्होंने कोई समुचित शिक्षा भी प्राप्त नहीं की थी, किन्तु उनमें नेतृत्व की
एक जन्मजात प्रतिभा थी। उनके इसी गुण के कारण उनके दल में कभी
उनके विरुद्ध आवाज नहीं उठाई गई तथा दल आदर्श रूप से निरन्तर
कार्य करता रहा। उनके इस कुशल नेतृत्व की प्रशंसा तथा उनके दृढ़ व्यक्तित्व
पर प्रकाश डालते हुए इस दल के सदस्य रह चुके श्री सत्यभक्त ने
लिखा है—
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"आजाद के साथियों यानी उनके नेतृत्व में काम करने वालों में शायद
ही किसी को उनसे कम स्कूली शिक्षा मिली होगी। शायद ही कोई उनसे
अधिक गरीबी की हालत में उत्पन्न हुआ होगा। उनके साथ उनके पिता,
भाई या अन्य किसी सम्बन्धी की देशभक्ति, त्याग और तपस्या या अन्य
किसी प्रकार के बड़प्पन की छाया भी नहीं लगी हुई थी। अमर शहीद
भगतसिंह आदि अपने साथियों में उन्होंने नेता का पद पुस्तकीय ज्ञान पर
आधारित थोथे बड़प्पन पर ही नहीं, व्यावहारिक सूझ-बूझ, अदम्य साहस
और सर्वोपरि अपने साथियों की सुख-सुविधा की हार्दिक स्नेहपूर्ण चिन्ता
रखकर और गाढ़े समय में कुशल नेतृत्व प्रदान करके ही पाया। अपने
साथियों और सम्पर्क में आने वालों के जीवन में केवल एक राजनीतिक
मुख्य के रूप में ही नहीं, एक व्यक्तिगत भावमुख्य के रूप में घर कर लेने
के अपने गुण विशेष में ही आजाद की सफलता निहित थी। उनके अकृत्रिम
स्नेहपूर्ण व्यक्तिगत व्यवहार ने ही उन्हें साथियों का प्रिय नेता बना दिया
और उनके हृदय में अपने लिए ऐसा विश्वास उत्पन्न कर दिया कि वे
उनके संकेत मात्र पर प्राण देने के लिए तैयार रहा करते थे। दल में
आजाद के नेतृत्व को स्वीकार करने के सम्बन्ध में कभी कोई झंझट या
झगड़ा नहीं हुआ। यह बात आजाद की प्रशंसा की तो है ही साथ ही उन
साथियों की सच्चाई, लगन, निरभिमानता को भी यह भली-भाँति व्यक्त
करती है, जो विद्या, बुद्धि, त्याग और बलिदान कर सकने की अपनी
तत्परता में किसी प्रकार भी कम न थे।"
वस्तुतः आजाद के ही कुशल नेतृत्व का यह परिणाम था कि दल के
अन्य सभी सदस्य उनसे अधिक शिक्षित एवं अपने घरों से अच्छी आर्थिक
स्थिति वाले होने पर भी दल में एकता के सूत्र में बँधे हुए थे।
वन में शेर का कोई भी संस्कार या राज्याभिषेक नहीं किया जाता
फिर भी वह अपने स्वयं के विक्रम से वन का राजा बन जाता है और
मृगेन्द्र कहा जाता है, इसी प्रकार पारिवारिक अथवा अन्य किसी प्रकार
की पृष्ठभूमि न होने पर आजाद अपनी योग्यता के बल पर क्रान्तिकारियों
के दल के नेता बने और क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास में उन्होंने एक
सर्वथा नवीन अध्याय की रचना की।
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को जब वह माँ से मिलने गए थे और सोए हुए थे, तो पुलिस पहुँच गई
थी। इस बार पुलिस का सामना गोलियों से किया गया। गोलियाँ समाप्त
हो जाने पर वह अपने मित्र के साथ छत पर चले गए और छत पर रखी
ईंटों से पुलिस की गोलियों का सामना करने लगे। उनका साथी मारा
गया, किन्तु आजाद स्वयं एक से दूसरी छत पर कूदते हुए पुलिस के चक्र-
व्यूह से बाहर निकल गए।
काकोरी काण्ड के बाद उनके विरुद्ध प्रमाण जुटाने के लिए एक पुलिस
अधिकारी विशेष रूप से लगाया गया था। वह सदा उनका पीछा किया
करता था। आजाद उनसे तंग आ गए। तब एक दिन वह किसी बात की
परवाह किए बिना सीधे उसके पास जा धमके और उसके सीने से रिवाल्वर
सटा दिया। उनके इस साहस को देखकर पुलिस अधिकारी के हाथों के
तोते उड़ गए, उसने फिर उनका पीछा न करने की कसम खाई और तब
आजाद ने उसे छोड़ दिया।
कई बार वह भेष बदलकर पुलिस एवं गुप्तचरों के जाल से निकले।
भगतसिंह की गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल से छुड़ाने की योजना भी
उन्होंने बनाई थी, जो दुर्भाग्य से सफल न हो सकी और 1929 में
वाइसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयत्न किया था, जो सफल न हो
सका।
समग्र प्रकार आजाद का इन जीवन ही साहसिक कार्यों से भरा हुआ
था और अन्त में साहस के साथ पुलिस का सामना करते हुए वीरगति को
प्राप्त हुए। उनमें साहस की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वस्तुतः
वह सचमुच आजाद थे, मृत्यु का भय तो उन्हें छू भी नहीं गया था। वह
सदा मृत्यु का सामना करने को तत्पर रहते थे। उनका यही कहना था कि
बंदूक की गोलियों का सामना करने को तैयार रहते थे, वह आजाद थे,
आजादी न रहने पर विकल्प में मृत्यु ही उन्हें अभीष्ट थी। उनके इस
अदम्य साहस की ओर संकेत करते हुए मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं—
"...सोलह सत्रह वर्षों से साम्राज्यप्रसाद सबक युद्ध, अजीब-अजीब
परिस्थितियों में भी, कहना चाहिए बिल्कुल प्रतिकूल परिस्थितियों में—
करते जा रहे थे। इस आठ वर्षों से उन्होंने क्रान्ति का कार्य अपना रक्त
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ध्यान रखना।"
इन मर्मस्पर्शी शब्दों में आजाद का एक नया रूप—एक भावुक मित्र
का रूप—हमारे सामने आता है। वास्तव में दुनियादारी का निर्वाह करने
के लिए महान आत्माएँ चाहे बाहर से वज्र के समान कठोर क्यों न लगें,
किन्तु उनका हृदय फूल से भी कोमल होता है। यही उक्ति हमारे चरित्र-
नायक चन्द्रशेखर आजाद पर भी चरितार्थ होती है।
उनके मित्र-प्रेम की एक ऐसी ही घटना का उल्लेख श्री वीरेन्द्र ने
किया है। यह घटना असेम्बली में बम विस्फोट के एक-दो दिन बाद की
है। इसके बाद समाचार-पत्रों में भगतसिंह का चित्र छपा था, जिसे देख-
कर आजाद का मित्र-प्रेम आँखों से बह निकला था। श्री वीरेन्द्र के ही
शब्दों में—
"भगतसिंह के लिए आजाद के मन में कितना प्रेम था इसका अनुमान
एक और घटना से लगाया जा सकता है। जिस दिन भगतसिंह ने असेम्बली
में बम फेंका था आजाद उस दिन आगरा में थे। जब उन्होंने समाचार-
पत्रों में भगतसिंह का चित्र देखा तो उसे सामने रखकर देर तक उसकी
ओर देखते रहे और फिर उनकी आँखों में आँसुओं की धारा बहने लगी।
यह पहला अवसर था जब किसी ने उनकी आँखों में आँसू देखे। परन्तु
आजाद अनुभव करते थे कि भगतसिंह ने भारी बलिदान दिया है। अब
वह वापस नहीं आयेगा और आजाद की और उसकी मुलाकात शायद
इस जीवन में न हो सके। इस विचार ने उन्हें कुछ परेशान कर दिया और
वह व्यक्ति जिसके सम्बन्ध में यह समझा जाता था कि उसका दिल पत्थर
का है, अन्ततः पिघल गया। परन्तु यह कोई दुर्बलता नहीं थी —
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आजाद भी एक बूटा की ओट में हो गए। दोनों ओर से गोलियां चलने
लगीं। इतने में आजाद ने मुझे आदेश दिया कि मैं यहाँ से चला जाऊँ।
वह स्वयं लड़ते-लड़ते वहीं शहीद हो गए। किन्तु उन्होंने अपने एक साथी
की जान बचा ली।"
स्वयं मिटकर भी मित्र की प्राणरक्षा करने का यह उदाहरण निश्चय
ही अपने-आपमें एक आदर्श है, जिसकी सामान्य व्यक्तियों से आशा करना
केवल कल्पना ही होगी।
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल तथा भगतसिंह को जेलों से मुक्त कराने
के प्रयास भी उनके मित्र-प्रेम के ही परिचायक हैं। इस प्रकार चन्द्रशेखर
आजाद जहाँ एक ओर एक अद्वितीय क्रान्तिकारी, अदम्य साहसी, श्रेष्ठ
नेतृत्व-शक्ति से युक्त, चरित्रबल के प्रतीक तथा प्रगतिशील विचारों वाले
राजनीतिक चिन्तक हैं, वहीं दूसरी ओर वह एक आदर्श मित्र के रूप में
हमारे सामने आते हैं।
देश-प्रेम के पर्याय :
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असहयोग आन्दोलन की समाप्ति पर वह क्रान्तिकारी संगठन 'हिन्दुस्तान
रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गए। यहीं से उनके हृदय में
अंकुरित देश-प्रेम के नन्हे पौधे को पल्लवित होकर विशाल वृक्ष बनने का
अवसर प्राप्त हुआ।
अब उनके सामने एक ही लक्ष्य था, देश को विदेशियों के बन्धन से
मुक्त कराना। उन्होंने जो भी कार्य किया—चाहे वह डकैती हो, ठगी हो,
हिंसा हो या क्रान्तिकारी दलों का संगठन हो सब कुछ अपने इसी लक्ष्य को
ध्यान में रखकर किया। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने जीवन
के सभी सुखों को तिलाञ्जलि दे दी और दुःखों का आलिंगन किया।
अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग में वह संसार के अन्य सुखों को
बाधक समझते थे। इसीलिए वह अपने अन्य साथियों को भी इनसे दूर
रहने का परामर्श देते थे। उनका स्पष्ट उद्घोष था—
"देश से प्रेम करना है, तो इसके लिए सब कुछ बलिदान करना
पड़ेगा। इसमें किसी दूसरे से प्रेम करने के लिए तनिक भी स्थान नहीं
है।"
'देश-प्रेम के लिए सर्वस्व बलिदान करने का यह उद्घोष उनके जीवन
का सैद्धान्तिक पहलू मात्र नहीं था, अपितु, उनके जीवन का क्रिया-
व्यवहार था। उदाहरणस्वरूप उनके जीवन की एक घटना को लिया
सकता है। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी जी ने उन्हें दो सौ रुपये दिये थे, त
वह इस पैसे को अपने माता-पिता के लिए भिजवा दें, क्योंकि उन
हालत इतनी दयनीय हो गई थी कि भूखों मर रहे थे। किन्तु आजा-
वह रुपया दल के सदस्यों पर खर्च कर दिया। "क्या वह पैसा तुमने अ
घर भिजवा दिया?" विद्यार्थी जी द्वारा पूछे जाने पर आजाद ने उत्तर
दिया—
"मेरे माता-पिता को तो फिर भी कभी-न-कभी कुछ खाने को मि
जाता है, किन्तु मेरी पार्टी के कई ऐसे युवक हैं, जिन्हें कई बार बिल्कुल ही
भूखे रहना पड़ता है। मेरे माता-पिता वृद्ध हैं। मर भी गए तो देश क
कोई हानि नहीं होगी किन्तु मेरी पार्टी का कोई युवक भूख से तड़पकर मर
गया तो यह हमारे लिए बहुत शर्म की बात होगी और देश को इससे
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बहुत बड़ी हानि होगी।"
अपने देश के लिए इस प्रकार की अलौकिक एवं अद्वितीय न्यौछावर
कर देने की भावना—इससे बढ़कर देश-प्रेम की परिभाषा और क्या
हो सकती है। अपने इन शब्दों को उन्होंने अक्षरशः चरितार्थ करते हुए अपने
प्राणों को भी बलिदान करके सिद्ध किया, वास्तव में चन्द्रशेखर 'आजाद'
देश-प्रेम के पर्याय बन गए हैं।
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