अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद (हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातन्त्र सेना के प्रधान सेनापति का शौर्य इतिहास)
Amar Shaheed Chandrashekhar Azad
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असहयोग आन्दोलन की समाप्ति पर वह क्रान्तिकारी संगठन 'हिन्दुस्तान
रिपब्लिकन एसोसिएशन' के सदस्य बन गए। यहीं से उनके हृदय में
अंकुरित देश-प्रेम के नन्हे पौधे को पल्लवित होकर विशाल वृक्ष बनने का
अवसर प्राप्त हुआ।
अब उनके सामने एक ही लक्ष्य था, देश को विदेशियों के बन्धन से
मुक्त कराना। उन्होंने जो भी कार्य किया—चाहे वह डकैती हो, ठगी हो,
हिंसा हो या क्रान्तिकारी दलों का संगठन हो सब कुछ अपने इसी लक्ष्य को
ध्यान में रखकर किया। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने जीवन
के सभी सुखों को तिलाञ्जलि दे दी और दुःखों का आलिंगन किया।
अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग में वह संसार के अन्य सुखों को
बाधक समझते थे। इसीलिए वह अपने अन्य साथियों को भी इनसे दूर
रहने का परामर्श देते थे। उनका स्पष्ट उद्घोष था—
"देश से प्रेम करना है, तो इसके लिए सब कुछ बलिदान करना
पड़ेगा। इसमें किसी दूसरे से प्रेम करने के लिए तनिक भी स्थान नहीं
है।"
'देश-प्रेम के लिए सर्वस्व बलिदान करने का यह उद्घोष उनके जीवन
का सैद्धान्तिक पहलू मात्र नहीं था, अपितु, उनके जीवन का क्रिया-
व्यवहार था। उदाहरणस्वरूप उनके जीवन की एक घटना को लिया
सकता है। श्री गणेशशंकर विद्यार्थी जी ने उन्हें दो सौ रुपये दिये थे, त
वह इस पैसे को अपने माता-पिता के लिए भिजवा दें, क्योंकि उन
हालत इतनी दयनीय हो गई थी कि भूखों मर रहे थे। किन्तु आजा-
वह रुपया दल के सदस्यों पर खर्च कर दिया। "क्या वह पैसा तुमने अ
घर भिजवा दिया?" विद्यार्थी जी द्वारा पूछे जाने पर आजाद ने उत्तर
दिया—
"मेरे माता-पिता को तो फिर भी कभी-न-कभी कुछ खाने को मि
जाता है, किन्तु मेरी पार्टी के कई ऐसे युवक हैं, जिन्हें कई बार बिल्कुल ही
भूखे रहना पड़ता है। मेरे माता-पिता वृद्ध हैं। मर भी गए तो देश क
कोई हानि नहीं होगी किन्तु मेरी पार्टी का कोई युवक भूख से तड़पकर मर
गया तो यह हमारे लिए बहुत शर्म की बात होगी और देश को इससे