बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
यहाँ दी गई पृष्ठ-प्रतिमा का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
खिड़की की बगल के सहारे सोई हुई दूसरी स्त्री, जिसकी देह धनुष के समान झुकी हुई थी और जिसके
सुन्दर हार लटक रहे थे, इस प्रकार विराजी जैसे तोरण पर बनी कठपुतली हो ॥52॥
मणिकुण्डलदष्टपत्रलेखं मुखपद्मं विनतं तथापरस्याः ।
शतपत्रमिवार्धवकनाडं स्थितकारणडवघट्टितं चकाशे ॥५.५३
उसी प्रकार दूसरी का झुका हुआ मुख-पद्म, जिसके पत्रलेख (= कपोल आदि पर बने चित्र) को रत्न-
कुण्डल मिटा रहे थे, (उस) कमल के समान शोभित हुआ जिसका नाल आधा झुका हो और जो कारण्डव
पक्षी के बैठने से हिल रहा हो ॥53॥
अपराः शयिता यथोपविष्टाः स्तनभारैरवनम्यमानगात्राः ।
उपगृह्य परस्परं विरेजुर्गजपाशैस्तपनीयहारिहार्यैः ॥५.५४
दूसरी बैठी-बैठी ही सो गईं, उनके गात्र स्तनों के भार से झुके हुए थे। वे सुवर्ण-वलय युक्त बाहु-लताओं
से एक दूसरे का आलिङ्गन किये शोभ रही थीं ॥54॥
महतीं परिवादिनीं च काचिद्दयितालिङ्गय सखीमिव प्रसुप्ता ।
विजुघूर्ण चलत्सुवर्णसूत्रां वदनेनाकुलयोक्तकेण ॥५.५५
और, कोई वनिता एक बड़ी सात तारवाली वीणा का सखी के समान आलिङ्गन कर सोई हुई थी। हिलते
सुवर्ण-सूत्रोंवाली वह स्त्री अस्त-व्यस्त योक्त्र (= सूत्र ?) वाले मुख से घूम (= चक्कर खा) रही थी ॥55॥
पणवं युवतिर्भुजांसदेशादवविस्रंसितचारुपाशमन्या ।
सविलासरतान्ततान्तमूर्वोरविवरे कान्तमिवाभिनीय शिश्ये ॥५.५६
दूसरी स्त्री पणव (बाजे) को, जिसकी सुन्दर डोरी काँख से गिर गई थी, सविलास सम्भोग के अन्त में
थके प्रियतम के समान, दोनों जाँघों के बीच लाकर सोई ॥56॥
अपरा बभूर्निमीलिताक्ष्यो विपुलाक्ष्योऽपि शुभभ्रुवोऽपि सत्यः ।
प्रतिसङ्कुचितारविन्दकोशाः सवितर्यस्तमिते यथा नलिन्यः ॥५.५७
सुन्दर भौंहोंवाली व बड़ी-बड़ी आँखोंवाली होनेपर भी दूसरी (स्त्रियों) की आँखें बन्द हो गईं, जैसे सूर्यास्त
होनेपर कमलिनियों के कमल-कोश बन्द हो जाते हैं ॥57॥
शिथिलाकुलमूर्धजा तथान्या जघनस्त्रस्तविभूषणांशुफान्ता ।
अशयिष्ट विकीर्णकण्ठसूत्रा गजभग्ना प्रतियातनाङ्गनेव ॥५.५८
उसी प्रकार दूसरी (स्त्रियाँ), जिनके केश शिथिल व अस्त-व्यस्त थे और जाँघों से जिनके गहने व कपड़े के
छोर गिर गये थे, और जिनके कण्ठ-सूत्र बिखरे हुए थे, इस तरह (बेहोश होकर) सोईं, जैसे हाथी द्वारा
तोड़ी गई स्त्री की प्रतिमा (पड़ी हो) ॥58॥
अपरास्त्ववशा हिया वियुक्ता धृतिमत्योऽपि वपुर्गुणैरुपेताः ।
विनिशश्वसुरुल्बणं शयाना विकृताः क्षिप्तभुजा जजृम्भिरे च ॥५.५९
दूसरी (स्त्रियाँ) अत्यन्त रूपवती तथा धीर होनेपर भी विवशता के कारण लाज-रहित हो असभ्य ढङ्ग से
सोती हुई, जोरों से साँसें छोड़ रही थीं; वे विकृत थीं, भुजाएँ फेंक रही थीं और जँभाई ले रही थीं ॥59॥
व्यपविद्धविभूषणस्रजोऽन्या विसृताग्रन्थनवाससो विसञ्ज्ञाः ।
अनिमीलितशुक्लनिश्शलाक्ष्यो न विरेजुः शयिता गतासुकल्पाः ॥५.६०
दूसरी, जिनके गहने व मालाएँ अलग फेंकी हुई थीं और जिनके वस्त्रों की ग्रन्थियाँ खुली हुई थीं, बेहोश
पड़ी थीं। उनकी निश्चल आँखों की सफेदी दिखाई पड़ती थी। मुर्दों के समान सोई हुई वे शोभित नहीं
हुईं ॥60॥
विवृतास्यपुटा विवृद्धगात्री प्रपतद्वक्त्रजला प्रकाशगुह्या ।
अपरा मदघूर्णितेव शिश्ये न बभाषे विकृतं वपुः पुपोष ॥५.६१
दूसरी मदमाती की भाँति सोई। उसका मुख-पुट खुला था, गात्र फैले हुए थे, (अतः क्रमशः) उसके मुख
से जल गिर रहा था और गुह्य भाग प्रकाशित हो रहे थे। वह शोभित नहीं हुई उसने विकृत रूप धारण
किया ॥61॥
इति सत्त्वकुलान्वयानुरूप विविधं स प्रमदाजनः शयानः ।
सरसः सदृशं बभार रूपं पवनावर्जितरुग्नपुष्करस्य ॥५.६२
स्वभाव, कुल, एवं अन्वय के अनुसार भाँति-भाँति से सोये हुए उस प्रमदावृन्द ने उस सरोवर के सदृश रूप
धारण किया, जिसके कमल हवा में झुकाये और टेढ़े किये गये हों ॥62॥
समवेक्ष्य तथा तथा शयाना विकृतास्ता युवतीरधीरचेष्टाः ।
गुणवद्वपुषोऽपि वल्गुभाषा नृपसूनुः स विगहर्यांबभूव ॥५.६३
उस उस प्रकार से सोती हुई चञ्चल चेष्टाओंवाली युवतियों को, यद्यपि उनके शरीर रूपवान् और वचन
मनोहर थे, वीभत्स देखकर उस राजकुमार ने यों निन्दा की:- ॥63॥
अशुचिर्विकृतश्च जीवलोके वनितानामयमीदृशः स्वभावः ।
वसनाभरणैस्तु वञ्च्यमानः पुरुषः स्त्रीविषयेषु रागमेति ॥५.६४
"जीव-लोक में वनिताओं का यह ऐसा स्वभाव वीभत्स और अपवित्र है; किन्तु वस्त्रों और आभूषणों से
ठगा जाता पुरुष स्त्रियों से अनुराग करता है ॥64॥
विमृशेद्यदि योषितां मनुष्यः प्रकृतिं स्वप्नविकारमीदृशं च ।
ध्रुवमत्र न वर्धयेत्प्रमादं गुणसङ्कल्पहतस्तु रागमेति ॥५.६५
यदि मनुष्य स्त्रियों के स्वभाव तथा स्वाभावस्था के ऐसे विकार का विचार करे, तो अवश्य ही उसमें वह
अपनी असावधानी न बढ़ावे; किन्तु, स्त्री में गुण हैं, इस विचार से अभिभूत होकर वह उनसे अनुराग
करता है" ॥65॥
इति तस्य तदन्तरं विदित्वा निशि निश्चिक्रमिषा समुद्बभूव ।
अवगम्य मनस्ततोऽस्य देवैर्भवनद्वारमपावृतं बभूव ॥५.६६
30 अश्वघोष
यह अन्तर जानकर रात को निष्क्रमण करने की उसकी इच्छा हुई। तब उसका मन जानकर देवों द्वारा
गृहद्वार खोल दिया गया ॥66॥
अथ सोऽवततार हर्म्यपृष्ठाद्युवतीस्ताः शयिता विगर्हमाणः।
अवतीर्य ततश्च निर्विशङ्को गृहकक्ष्यां प्रथमां विनिर्जगाम ॥५.६७
तब सोई हुई उन युवतियों की निन्दा करते हुआ वह प्रासाद पर से उतरा। और वहाँ से उतरकर, निश्शङ्क
हो घर की पहली कक्ष्या (आङ्गन) में गया ॥67॥
तुरगावचरं स बोधयित्वा जविनं छन्दकमित्थमित्युवाच।
हयमानय कन्थकं त्वरावानमृतं प्राप्तुमितोऽद्य मे यियासा ॥५.६८
वेगवान् छन्दक नामक अश्व-रक्षक को जगाकर, उसने इस प्रकार कहाः- “शीघ्रता से कन्थक घोड़े को
लाओ, आज यहाँ से अमरत्व प्राप्त करने के लिए मेरी जाने की इच्छा है ॥68॥
हृदि या मम तुष्टिरद्य जाता व्यवसायश्च यथा मतौ निविष्टः।
विजनेऽपि च नाथवानिवास्मि ध्रुवमर्थोऽभिमुखः समेत इष्टः ॥५.६९
आज मेरे हृदय में जो सन्तोष हुआ है, और बुद्धि जिस प्रकार निश्चयात्मक हुई है और विजन में भी जिस
प्रकार नाथवान् के समान हूँ, निश्चय ही इष्ट लक्ष्य सामने आ गया है ॥69॥
ह्रियमेव च सन्नतिं च हित्वा शयिता मत्प्रमुखे यथा युवत्यः।
विवृते च यथा स्वयं कपाटे नियतं यातुमतो ममाद्य कालः ॥५.७०
लाज व विनय को छोड़कर युवतियों जिस प्रकार मेरे सामने सोई हुई हैं, और किवाड़ जिस प्रकार स्वयं
खुल गये हैं, निश्चय ही आज यहाँ से जाने का मेरा समय है” ॥70॥
प्रतिगृह्य ततः स भर्तुराज्ञां विदिथार्थोऽपि नरेन्द्रशासनस्य।
मनसीव परेण चोद्यमानस्तुरगस्यानयने मतिं चकार ॥५.७१
तब राजा के आदेश का अर्थ जानते हुए भी उसने स्वामी की आज्ञा मान ली। और, मन में मानो दूसरे से
प्रेरित होते हुए उसने घोड़ा लाने का विचार किया ॥71॥
अथ हेमखलीनपूर्णवक्त्रं लघुशय्यास्तरणोपगूढपृष्ठम्।
बलसत्त्वजवान्वयोपपन्नं स वराश्वं तमुपानिनाय भर्त्रे ॥५.७२
तब स्वामी के लिए वह उस श्रेष्ठ घोड़े को ले आया, जिसका मुँह सोने की लगाम से भरा हुआ था,
जिसकी पीठ हल्की पलान व झूले से आलिङ्गित (=ढँकी) थी, जो बल, सत्त्व, वेग व वंश से युक्त
था ॥72॥
प्रततत्रिकपुच्छमूलपार्ष्णिं निभृतह्रस्वतनूनजपुच्छकर्णम्।
विनतोन्नतपृष्ठकुक्षिपार्श्वं विपुलप्रोथललाटकट्युरस्कम् ॥५.७३
जिसके त्रिक (=रीढ़ का निचला भाग), पुच्छ-मूल व पार्ष्णि (ऐँड़ी, पाँव का पिछला भाग) विस्तीर्ण थे,
जिसके बाल पुच्छ व कान छोटे तथा निश्चल थे, जिसकी पीठ व बगल दबे हुए और उठे हुए थे, जिसकी
नाक, ललाट, कमर व छाती विशाल थी ॥73॥
उपगृह्य स तं विशालवक्षाः कमलाभेन च सान्त्वयन् करेण।
मधुराक्षरया गिरा शशास ध्वजिनीमध्यमिव प्रवेष्टुकामः ॥५.७४
उस विशाल वक्षःस्थलवाले कमल के समान कान्तिमान् हाथ से उसे छूकर सान्त्वना देते हुए मधुर अक्षरों-
भरी वाणी में ऐसे आदेश दिया, जैसे (विपक्षी) सेना के बीच प्रवेश करने की इच्छा (तैयारी) कर रहा
होः- ॥74॥
बहुशः किल शत्रवो निरस्ताः समरे त्वामधिरुह्य पार्थिवेन।
अहमप्यमृतं पदं यथावत्तुरगश्रेष्ठ लभेय तत्कुरुष्व ॥५.७५
“तुझपर चढ़कर राजा ने युद्ध में शत्रुओं को अनेक बार परास्त किया। हे तुरगश्रेष्ठ, मैं भी उस अमर पद
को जिस प्रकार पाऊँ वैसा करो ॥75॥
सुलभाः खलु संयुगे सहाया विषयावाप्तसुखे धनार्जने वा।
पुरुषस्य तु दुर्लभाः सहायाः पतितस्यापदि धर्मसंश्रये वा ॥५.७६
युद्ध में, विषयों से प्राप्त होनेवाले सुख में, या धन-अर्जन में साथी सुलभ होते हैं; किन्तु आपत्ति में पड़ने पर
या धर्म का आश्रय लेने में पुरुष के साथी दुर्लभ हैं ॥76॥
इह चैव भवन्ति ये सहायाः कलुषे धर्मणि धर्मसंश्रये वा।
अवगच्छति मे यथान्तरात्मा नियतं तेऽपि जनास्तदंशभाजः ॥५.७७
और, इस संसार में पाप-कर्म में या धर्म का आश्रय लेने में जो साथी होते हैं, मेरी अन्तरात्मा जैसा
समझती है, अवश्य ही वे लोग भी उस कर्म-फल के हिस्सेदार होते हैं ॥77॥
तदिदं परिगम्य धर्मयुक्तं मम निर्याणमितो जगद्धिताय।
तुरगोत्तम वेगविक्रमाभ्यां प्रयतस्वात्महिते जगद्धिते च ॥५.७८
तब यहाँ से जगत् के हित के लिए मेरे इस निष्क्रमण को धर्म-युक्त जानकर, हे तुरग-श्रेष्ठ, आत्म-हित व
जगत्-हित के लिए वेग और पराक्रमपूर्वक प्रयत्न करो।” ॥78॥
इति सुहृदमिवानुशिष्य कृत्ये तुरगवरं नृवरो वनं यियासुः।
सितमसितगतिद्युतिर्वपुष्मान् रविरिव शारदमभ्रममारुरोह ॥५.७९
वन जाने के इच्छुक उस नर-श्रेष्ठ ने उस उत्तम घोड़े को कर्तव्य करने के लिए ऐसे आदेश दिया, जैसे कि
वह उसका मित्र हो; अग्नि के समान कान्तिमान् वह रूपवान् राजकुमार उजले घोड़े पर इस प्रकार चढ़ा,
जैसे शरत्कालीन मेघ पर सूर्य ॥79॥
अथ स परिहरन्न्रिशीथचण्डं परिजनबोधकरं ध्वनिं सदश्वः।
विगतहनुरवः प्रशान्तह्रेषश्चकितविमुक्तपदक्रमो जगाम ॥५.८०
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तब वह अच्छा घोड़ा रात्रिकाल की प्रचण्ड तथा परिजनों को जगानेवाली ध्वनि को रोकता हुआ चला;
उसके जबड़े निःशब्द थे, उसकी हिनहिनाहट शान्त थी, और उसके पग निर्भय थे ॥80 ॥
कनकवलयभूषितप्रकोष्ठैः कमलनिभैः कमलानि प्रविध्य।
अवनततनवस्ततोऽस्य यक्षाश्चकितगतैर्दधिरे खुरान् कराग्रैः ॥५.८१
देह झुकाकर यक्षों ने अपने पुलकित हाथों के अग्रभागों से इसके खुर पकड़ लिये; और कमल-सदृश
हाथों से, जिनके प्रकोष्ठ सुवर्ण-कङ्कणों से भूषित थे, वे मानो कमल बिखेर रहे थे ॥81 ॥
गुरुपरिघकपाटसंवृता या न सुखमपि द्विरदैरपाव्रियन्ते।
व्रजति नृपसुते गतस्वनास्ताः स्वयमभवन्विवृताः पुरः प्रतोल्यः ॥५.८२
फाटक के भारी किवाड़ों से बन्द जो नगर-द्वार हाथियों से भी सुखपूर्वक नहीं खुलते थे, वे राजा के पुत्र
के जानेपर स्वयं निःशब्द खुल गये ॥82 ॥
पितरमभिमुखं सुतं च बालं जनमनुरक्तमनुत्तमां च लक्ष्मीम्।
कृतमतिरपहाय निर्व्यपेक्षः पितृनगरात्स ततो विनिर्जगाम ॥५.८३
तब वह कृतनिश्चय निरपेक्ष होकर स्नेही पिता को, बालपुत्र को, अनुरक्त लोगों को, और अनुपम लक्ष्मी
को छोड़कर, पितृ नगर से निकल गया ॥83 ॥
अथ स विमलपङ्कजायताक्षः पुरमवलोक्य ननाद सिंहनादम्।
जननमरणयोरदृष्टपारो न पुनरहं कपिलाह्वयं प्रवेष्टा ॥५.८४
तब विमल कमलों के समान विशाल आँखोंवाले उस कुमार ने नगर को देखकर सिंहनाद किया:-“जन्म
व मृत्यु को पार देखे बिना कपिल नाम के इस नगर में फिर प्रवेश न करूँगा।” ॥84 ॥
इति वचनमिदं निशम्य तस्य द्रविणपतेः परिषद्गणा ननन्दुः।
प्रमुदितमनसश्च देवसङ्घा व्यवसितपारमणांशंसिरेऽस्मै ॥५.८५
उसका यह वचन सुनकर, द्रविण-पति (=कुबेर) की परिषद् के गण आनन्दित हुए; और प्रसन्नचित्त देव-
सङ्घों ने उसकी निश्चय-पूर्ति की इच्छा की ॥85 ॥
हुतवहवपुषो दिवौकसोऽन्ये व्यवसितमस्य सुदुष्करं विदित्वा।
अकृषत तुहिने पथि प्रकाशं घनविवरप्रसृता इवेन्दुपादाः ॥५.८६
उसके अति दुष्कर निश्चय को जानकर अग्नि के समान रूपवान् अन्य देवों ने, जैसे बादलों के बीच फैली
चन्द्र-किरणों ने, उसके बर्फीले रास्ते में प्रकाश किया ॥86 ॥
हरितुरगतुरङ्गवत्तुरङ्गः स तु विचरन्मनसीव चोद्यमानः।
अरुणपरुषतारमन्तरीक्षं स च सुबहूनि जगाम योजनानि ॥५.८७
सूर्य के घोड़े के समान वह घोड़ा, जो मानो मन में प्रेरित होता हुआ चल रहा था, और वह कुमार, उषा
के आगमन से आसमान के तारों के फीके होने से पहले ही बहुत योजन चले गये ॥87 ॥
इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽभिनिष्क्रमणो नाम पञ्चमः सर्गः ॥५ ॥
षष्ठ सर्ग
छन्दक-विसर्जन
ततो मुहूर्ताभ्युदिते जगच्चक्षुषि भास्करे।
भार्गवस्याश्रमपदं स ददर्श नृणां वरः ॥६.१
तब एक मुहूर्त में जगत्-चक्षु सूर्य के उगनेपर उस नर-श्रेष्ठ ने भार्गव का आश्रम देखा ॥1 ॥
सुसंविश्वस्तहरिणं स्वस्थस्थितविहङ्गमम्।
विश्रान्त इव यद्दृष्ट्वा कृतार्थ इव चाभवत् ॥६.२
जहाँ विश्वस्त (=निर्भय) होकर हरिण सोये हुए थे और स्वस्थ (=शान्त) होकर पक्षी बैठे हुए थे, जिस
(आश्रम) को देखकर उसकी थकावट मानो चली गई और वह मानो कृतार्थ हुआ ॥2 ॥
स विस्मयनिवृत्त्यर्थं तपःपूजार्थमेव च।
स्वां चानुवर्तितां रक्षन्नश्वपृष्ठादवातरत् ॥६.३
औद्धत्य छोड़ने के लिए और तपस्या के सम्मान के लिए अपने आचरण की रक्षा करता हुआ वह घोड़े की
पीठ से उतरा गया ॥3 ॥
अवतीर्य च पस्पर्श निस्तीर्णमिति वाजिनम्।
छन्दकं चाब्रवीत्प्रीतः स्नापयन्निव चक्षुषा ॥६.४
और, उतरकर “पार लगाया” यह कहते हुए घोड़े को स्पर्श किया। और, प्रसन्न होकर छन्दक को आँखों
से मानो नहवाते हुए कहा:- ॥4 ॥
इमं तार्क्ष्योपमजवं तुरङ्गमनुगच्छता।
दर्शिता सौम्य मद्भक्तिर्विक्रमश्चात्मनः ॥६.५
“गरुड के समान वेगवान् इस घोड़े का अनुसरण करते हुए, हे सौम्य, तुमने मेरे प्रति भक्ति और अपना
पराक्रम दिखाये ॥5 ॥
सर्वथास्म्यन्यकार्योऽपि गृहीतो भवता हृदि।
भर्तृस्नेहश्च यस्यायमीदृशः शक्तिरेव च ॥६.६
यद्यपि सब प्रकार से अन्य कार्यों में लगा (अन्यमनस्क) हूँ, तथापि तुमने इस स्वामि-स्नेह और शक्ति के
द्वारा मेरा हृदय हरण कर लिया है ॥6 ॥
अस्निग्धोऽपि समर्थोऽस्ति निःसामर्थ्योऽपि भक्तिमान्।
भक्तिमांश्चैव शक्तश्च दुर्लभस्त्वद्विधो भुवि ॥६.७
स्नेह-हीन होनेपर भी आदमी समर्थ होता है; सामर्थ्य-हीन होनेपर भी भक्तिमान् होता है। तुम्हारे-जैसा
भक्तिमान् और शक्तिमान् पुरुष पृथ्वी पर दुर्लभ है ॥7 ॥
32 अश्वघोष
तत्प्रीतोऽस्मि तवानेन महाभागेन कर्मणा ।
यस्य ते मयि भावोऽयं फलेभ्योऽपि पराङ्मुखः ॥६.८
इसलिए तुम्हारे इस उत्तम कर्म से प्रसन्न हूँ। मेरे प्रति तुम्हारा यह भाव निस्वार्थ और निष्काम है ॥8॥
को जनस्य फलस्थस्य न स्यादभिमुखो जनः ।
जनीभवति भूयिष्ठं स्वजनोऽपि विपर्यये ॥६.९
फल में स्थित (= फल देनेवाले व्यक्ति के) अनुकूल कौन नही होगा? विपरीत में (अर्थात् फल न मिलने
की आशा नही रहनेपर) स्वजन भी प्रायः पराया हो जाता है ॥9॥
कुलार्थं धार्यते पुत्रः पोषार्थं सेव्यते पिता ।
आशयाश्लेष्यति जगन्नास्ति निष्कारणा स्वता ॥६.१०
वंश-वृद्धि के लिए पुत्र का पालन किया जाता है और पोषण के लिए पिता की सेवा की जाती है।
आशय से ही जगत् मेल करता है, बिना कारण के अपनापन नही होता है ॥10॥
किमुक्त्वा बहु सङ्क्षेपात्कृतं मे सुमहत्प्रियम् ।
निवर्तस्वाश्वमादाय सम्प्राप्तोऽस्मीप्सितं पदम् ॥६.११
बहुत कहने से क्या? संक्षेप में, तुमने मेरा बड़ा प्रिय किया। घोड़े को लेकर लौट जाओ। मैं इच्छित
स्थान को पहुँच गया हूँ।” ॥11॥
इत्युक्त्वा स महाबाहुरनुशंसचिकीर्षया ।
भूषणान्यवमुच्यास्मै सन्तप्तमनसे ददौ ॥६.१२
इतना कहकर प्रिय (उपकार) करने की इच्छा से, उस महाबाहु ने अपने आभूषण खोलकर उस संतप्त-
चित्त को दिये ॥12॥
मुकुटाद्दीपकर्माणं मणिमादाय भास्वरम् ।
ब्रुवन्वाक्यमिदं तस्थौ सादित्य इव मन्दरः ॥६.१३
दीए का काम करनेवाली चमकीली मणि को मुकुट से लेकर, मन्दराचल के समान जिसके ऊपर सूर्य
स्थित हो, शोभित होते हुए, उसने ये वचन कहे:- ॥13॥
अनेन मणिना छन्द प्रणम्य बहुशो नृपः ।
विज्ञाप्योऽमुक्तविश्रम्भं सन्तापविनिवृत्तये ॥६.१४
“इस मणि से, हे छन्दक, राजा का बार-बार प्रणाम कर उनका सन्ताप दूर करने के लिए विश्वासपूर्वक
(यह सन्देश) निवेदन करना:- ॥14॥
जन्ममरणनाशार्थं प्रविष्टोऽस्मि तपोवनम् ।
न खलु स्वर्गसर्गेण नास्नेहेन न मन्युना ॥६.१५
जरा और मरण का विनाश करने के लिए मैंने तपोवन में प्रवेश किया है, अवश्य ही स्वर्ग की तृष्णा से
नही, स्नेह के अभाव से नही, क्रोध से नही ॥15॥
तदेवमभिनिष्क्रान्तं न मां शोचितुमर्हसि ।
भूत्वापि हि चिरं श्लेषः कालेन न भविष्यति ॥६.१६
अतः इस तरह मुझे निकले हुए के लिए आपको शोक नही करना चाहिए; क्योंकि संयोग (= मिलन)
चिरकाल तक होकर भी समय पाकर नही रहेगा ॥16॥
ध्रुवो यस्माच्च विश्लेषस्तस्मान्मोक्षाय मे मतिः ।
विप्रयोगः कथं न स्याद्भूयोऽपि स्वजनादिति ॥६.१७
और, क्योंकि वियोग निश्चित है, इसलिए मोक्ष (पाने) के लिए मेरा विचार है, जिसमें फिर भी स्वजन से
वियोग न हो ॥17॥
शोकत्यागाय निष्क्रान्तं न मां शोचितुमर्हसि ।
शोकहेतुषु कामेषु सक्ताः शोच्यास्तु रागिणः ॥६.१८
शोक-त्याग के मुझे निकले हुए के लिए आपको शोक नही करना चाहिए। शोक के हेतु-स्वरूप काम
भोगों में आसक्त रागी व्यक्तियों के लिए शोक करना चाहिए ॥18॥
अयं च किल पूर्वेषामस्माकं निश्चयः स्थिरः ।
इति दायाद्यभूतेन न शोच्योऽस्मि पथा व्रजन् ॥६.१९
और, यह तो हमारे पूर्वपुरुषों का दृढ़ निश्चय था; (इस) पैतृक (= पूर्वजों के) मार्गपर चल रहा हूँ, अतः
मेरे लिए शोक नही किया जाना चाहिए ॥19॥
भवन्ति ह्यर्थदायादाः पुरुषस्य विपर्यये ।
पृथिव्यां धर्मदायादा दुर्लभास्तु न सन्ति वा ॥६.२०
उलट-पुलट (= मृत्यु) होनेपर पुरुष के धन के दायाद होते हैं; किन्तु पृथिवी पर धर्म के दायाद दुर्लभ हैं
या हैं ही नहीं ॥20॥
यदपि स्यादसमये यातो वनमसाविति ।
अकालो नास्ति धर्मस्य जीविते चञ्चले सति ॥६.२१
यह कि वह (कुमार) असमय में वन गया है, तो (कहूँगा कि) जीवन चञ्चल होने के कारण धर्म के लिए
असमय नही है ॥21॥
तस्मादद्यैव मे श्रेयश्चेतव्यमिति निश्चयः ।
जीविते को हि विश्रम्भो मृत्यौ प्रत्यर्थिनि स्थिते ॥६.२२
इसलिए कल्याण का चयन (= अर्जन) मैं आज ही करूँगा, यही निश्चय है; क्योंकि मृत्युरूप शत्रु के
रहनेपर जीवन में क्या विश्वास? ॥22॥
एवमादि त्वया सौम्य विज्ञाप्यो वसुधाधिपः ।
प्रयतेथास्तथा चैव यथा मां न स्मरेदपि ॥६.२३
बुद्धचरित 33
इस प्रकार, हे सौम्य, तुम्हें राजा से निवेदन करना चाहिए और वैसा ही प्रयत्न करो जिससे वह मुझे
स्मरण भी न करें ॥23 ॥
अपि नैर्गुण्यमस्माकं वाच्यं नरपतौ त्वया ।
नैर्गुण्यात्त्यज्यते स्नेहः स्नेहत्यागान्न शोच्यते ॥६.२४
तुम्हें नरपति से हमारी निर्गुणता (=दोष) भी कहना चाहिए। निर्गुणता के कारण स्नेह छोड़ते हैं, स्नेह
छोड़ने से शोक नहीं होता है।" ॥24 ॥
इति वाक्यमिदं श्रुत्वा छन्दः सन्तापविक्लवः ।
बाष्पग्रथितया वाचा प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ॥६.२५
यह वाक्य सुनकर सन्ताप से विकल छन्दक ने हाथ जोड़कर बाष्प-ग्रथित वाणी में रोकर उत्तर दियाः-
॥25 ॥
अनेन तव भावेन बान्धवायासदायिना ।
भर्तः सीदति मे चेतो नदीपङ्क इव द्विपः ॥६.२६
“बान्धवों को कष्ट देनेवाले आपके इस मनोभाव से, हे स्वामिन, मेरा चित्त नदी-पङ्क में (फँसे) हाथी के
समान दुख रहा है ॥26 ॥
कस्य नोत्पादयेद्वाष्पं निश्चयस्तेऽयमीदृशः ।
अयोमयेऽपि हृदये किं पुनः स्नेहविक्लवे ॥६.२७
आपका यह ऐसा निश्चय किसके लोहे से भी बने हृदय को द्रवीभूत नहीं करेगा, फिर स्नेह-विकल (हृदय)
का क्या कहना? ॥27 ॥
विमानशयनाहं हि सौकुमार्यमिदं क्व च ।
खरदर्भाङ्कुरवती तपोवनमही क्व च ॥६.२८
कहाँ प्रासाद की शय्या के योग्य यह सुकुमारता और कहाँ तीक्ष्ण तृण-अङ्कुरों से युक्त तपोवन की
भूमि! ॥28 ॥
श्रुत्वा तु व्यवसायं ते यदश्वोऽयं मयाहृतः ।
बलात्कारेण तन्नाथ दैवेनैवास्मि कारितः ॥६.२९
आपका निश्चय सुनकर मैं घोड़ा जो ले आया, हे नाथ, वह तो दैव ने मुझसे बलात् कराया ॥29 ॥
कथं ह्यात्मवशो जानन् व्यवसायमिमं तव ।
उपानयेयं तुरगं शोकं कपिलवास्तुनः ॥६.३०
यदि मैं अपने वश में होता तो आपका यह निश्चय जानकर मैं कपिलवस्तु का शोक-(यह) घोड़ा-
(आपके समीप) कैसे लाता? ॥30 ॥
तन्नार्हसि महाबाहो विहातुं पुत्रलालसम् ।
स्निग्धं वृद्धं च राजानं सद्धर्ममिव नास्तिकः ॥६.३१
इसलिए, हे महाबाहो, पुत्र के लिए उत्सुक स्नेही और वृद्ध राजा को, जैसे सद्धर्म को नास्तिक (छोड़ता
है), आपको न छोड़ना चाहिए ॥31 ॥
संवर्धनपरिश्रान्तां द्वितीयां तां च मातरम् ।
देवीं नार्हसि विस्मर्तुं कृतघ्न इव सत्क्रियाम् ॥६.३२
और, पालन-पोषण करने में थकी उस दूसरी माता रानी को, जैसे सत्क्रिया को कृतघ्न (भूलता है),
आपको न भूलना चाहिए ॥32 ॥
बालपुत्रां गुणवतीं कुलश्लाघ्यां पतिव्रताम् ।
देवीमर्हसि न त्यक्तुं क्लीबः प्राप्तामिव श्रियम् ॥६.३३
बाल-पुत्रवाली, गुणवती, तथा श्लाघ्य कुलवाली पतिव्रता देवी (=पत्नी) को, जैसे क्लीब आई हुई लक्ष्मी
को (छोड़ता है), आपको न छोड़ना चाहिए ॥33 ॥
पुत्रं यशोधरं श्लाघ्यं यशोधर्मभृतां वरम् ।
बालमर्हसि न त्यक्तुं व्यसनीवोत्तमं यशः ॥६.३४
यशोधरा के बालपुत्र को, जो प्रशंसा के योग्य है और जो यश एवं धर्म धारण करनेवालों में श्रेष्ठ है, जैसे
उत्तम यश को व्यसनी (छोड़ता है), आपको न छोड़ना चाहिए ॥34 ॥
अथ बन्धुं च राज्यं च त्यक्तुमेव कृता मतिः ।
मां नार्हसि विभो त्यक्तुं त्वत्पादौ हि गतिर्मम ॥६.३५
अथवा यदि बन्धु एवं राज्य को छोड़ने का ही विचार है, तो हे विभो, आपको मुझे न छोड़ना चाहिए;
क्योंकि मेरी गति तो आपके ही चरणों में है ॥35 ॥
नास्मि यातुं पुरं शक्तो दह्यमानेन चेतसा ।
त्वामरण्ये परित्यज्य सुमन्त्र इव राघवम् ॥६.३६
आपको जङ्गल में, जैसे सुमन्त्र ने राघव को (छोड़ा था), छोड़कर जलते चित्त से मैं नगर को नहीं जा
सकता हूँ ॥36 ॥
किं हि वक्ष्यति मां राजा त्वदृते नगरं गतम् ।
वक्ष्याम्युचितदर्शित्वात्किं त्वन्तःपुराणि वा ॥६.३७
आपके बिना नगर में जानेपर राजा मुझसे क्या कहेंगे? या उचित (=शुभ) के दर्शन का अभ्यास होने के
कारण अन्तःपुर में मैं क्या कहूँगा? ॥37 ॥
यदप्यात्थापि नैर्गुण्यं वाच्यं नरपताविति ।
किं तद्वक्ष्याम्यभूतं ते निर्दोषस्य मुनेरिव ॥६.३८
यह जो कहा है कि "राजा से मेरी निर्गुणता कहना; तो क्या मुनि के समान आप निर्दोष के बारे में
असत्य कहूँगा? ॥38 ॥
34 अश्वघोष
हृदयेन सलज्जेन जिह्वया सज्जमानया ।
अहं यद्यपि वा ब्रूयां कस्तच्छ्रद्घातुमर्हति ॥६.३९
लज्जा-युक्त हृदय से और (किसी किसी तरह) सजित (= उद्यत) होती जीभ से यदि मैं कहूँ भी, तो कौन
विश्वास करेगा? ॥39॥
यो हि चन्द्रमसस्तैक्ष्ण्यं कथयेच्छ्रद्दधीत वा ।
स दोषांस्तव दोषज्ञ कथयेच्छ्रद्दधीत वा ॥६.४०
जो चन्द्रमा की तीक्ष्णता कहेगा या उसपर विश्वास करेगा, हे दोषज्ञ, वही आपके दोष कहे या उसपर
विश्वास करे ॥40॥
सानुक्रोशस्य सततं नित्यं करुणवेदिनः ।
स्निग्धत्यागो न सदृशो निवर्तस्व प्रसीद मे ॥६.४१
जो सदा दयावान् है, नित्य करुणा अनुभव करता है, उसके लिए स्नेही का त्याग योग्य नही। लौटिये,
मुझपर प्रसन्न होइये" ॥41॥
इति शोकाभिभूतस्य श्रुत्वा छन्दस्य भाषितम् ।
स्वस्थः परमया धृत्या जगाद वदतां वरः ॥६.४२
शोक से अभिभूत छन्द (= छन्दक) का वचन सुनकर, वक्ताश्रेष्ठ ने स्वस्थ (=शान्त) होकर अत्यन्त
धैर्यपूर्वक कहाः- ॥42॥
मद्वियोगं प्रति च्छन्द सन्तापस्त्यज्यतामयम् ।
नानाभावो हि नियतं पृथग्जातिषु देहिषु ॥६.४३
“मेरे वियोग के प्रति, हे छन्दक, यह सन्ताप छोड़ो; देह-धारियों का पृथक् होना नियत है, क्योंकि (मृत्यु
के बाद) उनका पृथक् जन्म होता है ॥43॥
स्वजनं यद्यपि स्नेहान्न त्यजेयमहं स्वयम् ।
मृत्युरन्योन्यमवशानस्मान् सन्त्याजयिष्यति ॥६.४४
यदि स्नेह के कारण स्वजन को मैं स्वयं न भी छोड़ूँ, तो मृत्यु हम विवशों से एक दूसरे को त्याग
करावेगी ॥44॥
महत्या तृष्णया दुःखैर्गर्भेणास्मि यया धृतः ।
तस्या निष्फलयत्नायाः क्वाहं मातुः क्व सा मम ॥६.४५
बड़ी तृष्णा से कष्ट-पूर्वक जिसके द्वारा मैं गर्भ में धारण किया गया, उस निष्फल-यत्ना माता का मैं कहाँ,
मेरी वह कहाँ? ॥45॥
वासवृक्षे समागम्य विगच्छन्ति यथाण्डजाः ।
नियतं विप्रयोगान्तस्तथा भूतसमागमः ॥६.४६
जिस प्रकार वास-वृक्षपर समागम होने के बाद पक्षी पृथक्-पृथक् दिशा में चले जाते हैं, अवश्य ही उसी
प्रकार प्राणियों के समागम का अन्त वियोग है ॥46॥
समेत्य च यथा भूयो व्यपयान्ति बलाहकाः ।
संयोगो विप्रयोगश्च तथा मे प्राणिनां मतः ॥६.४७
और, जिस प्रकार बादल एकत्र होकर, फिर अलग हो जाते हैं, उसी प्रकार प्राणियों का संयोग और
वियोग है, (ऐसा) मैं समझता हूँ ॥47॥
यस्माद्याति च लोकोऽयं विप्रलभ्य परस्परम् ।
ममत्वं न क्षमं तस्मात्स्वप्नभूते समागमे ॥६.४८
और, क्योकि लोग एक-दूसरे को ठगकर चले जाते हैं, इसलिए स्वप्न-सदृश समागम में ममता उचित
नही ॥48॥
सहजेन वियुज्यन्ते पर्णरागेन पादपाः ।
अन्येनान्यस्य विश्लेषः किं पुनर्न भविष्यति ॥६.४९
साथ पैदा होनेवाली पत्तों की लाली से पोधों का वियोग होता है, फिर क्या दूसरे से दूसरे का वियोग न
होगा? ॥49॥
तदेवं सति सन्तापं मा कार्षीः सौम्य गम्यताम् ।
लम्बते यदि तु स्नेहो गत्वापि पुनराव्रज ॥६.५०
तब ऐसा होनेपर, हे सौम्य, सन्ताप मत करो, जाओ। यदि स्नेह बना ही रहे तो जाकर भी फिर
आओ ॥50॥
ब्रूयाश्चास्मत्कृतापेक्षं जनं कपिलवस्तुनि ।
त्यज्यतां तद्गतः स्नेहः श्रूयतां चास्य निश्चयः ॥६.५१
कपिलवस्तु में मेरी आशा (=प्रतीक्षा) करनेवाले लोगों से कहना—उसके प्रति स्नेह छोड़िये और उसका
निश्चय सुनिये ॥51॥
क्षिप्रेमष्यति वा कृत्वा जन्ममृत्युक्षयं किल ।
अकृतार्थो निरारम्भो निधनं यास्यतीति वा ॥६.५२
जन्म और मृत्यु का क्षय करके या तो वह शीघ्र ही आवेगा, या प्रयत्नहीन और असफल होकर मृत्यु को
प्राप्त होगा” ॥52॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा कन्थकस्तुरगोत्तमः ।
जिह्वया लिलिहे पादौ बाष्पमुष्णं मुमोच च ॥६.५३
उसका वचन सुनकर, तुरग-श्रेष्ठ कन्थक ने जीभ से उसके पाँव चाटे और गर्म आँसू बहाये ॥53॥
जालिना स्वस्तिकाङ्केन चक्रमध्येन पाणिना ।
आममर्श कुमारस्तं बभाषे च वयस्यवत् ॥६.५४
बुद्धचरित 35
(रेखा-) जाल-युक्त और स्वस्तिक-चिह्न-युक्त हाथ से, जिसके बीच चक्र (का चिह्न) था, कुमार ने उसे स्पर्श
किया और समवयस्क के समान कहाः- ॥54॥
मुञ्च कन्थक मा बाष्पं दर्शितैयं सदश्वता ।
मृष्यतां सफलः शीघ्रं श्रमस्तेऽयं भविष्यति ॥६.५५
“हे कन्थक आँसू मत बहाओ, तुमने यह सदश्वता (= अच्छे घोड़े का गुण) दिखाई। धैर्य रखो, शीघ्र ही
तुम्हारा यह श्रम सफल होगा” ॥55॥
मणित्सरुं छन्दकहस्तसंस्थं ततः स धीरो निशितं गृहीत्वा ।
कोशादसिं काञ्चनभक्तिचित्रं बिलादिवाशीविषमुद्बबर्ह ॥६.५६
तब उस धीर (कुमार) ने मणियों की बेंटवाली, सोने से मढ़ी तेज तलवार, जो छन्दक के हाथों में थी,
(अपने हाथ में) ले ली और उसे म्यान से ऐसे निकाला जैसे बिल से साँप को (निकाल रहा हो) ॥56॥
निष्कास्य तं चोत्पलपत्रनीलं चिच्छेद चित्रं मुकुटं सकेशम् ।
विकीर्यमाणांशुकमन्तरीक्षे चिक्षेप चैनं सरसीव हंसम् ॥६.५७
और, उत्पल के पत्तों के समान नीलवर्ण उस (तलवार) को निकालकर, केश-सहित चित्र-विचित्र मुकुट
को काटा; और फैलती किरणों के साथ उसे आकाश में फेंका, जैसे हंस को सरोवर में (फेंक रहा
हो) ॥57॥
पूजामिलाषेण च बाहुमान्याद्दिवौकसस्तं जगृहुः प्रविद्धम् ।
यथावदेनं दिवि देवसङ्घा दिव्यैर्विशेषैर्महयां च चक्रुः ॥६.५८
और, देवताओं ने उस फेंके हुए (मुकुट) को सम्मान के कारण पूजा (करने) की अभिलाषा से ले लिया
और स्वर्ग में देव-सङ्घों ने दिव्य विशेषताओं के साथ उसकी यथावत् पूजा की ॥58॥
मुक्त्वा त्वलङ्कारकलत्रवत्सां श्रीविप्रवासं शिरसश्च कृत्वा ।
दृष्ट्वांशुकं काञ्चनहंसचिह्नं वन्यं स धीरोऽभिचकाङ्क्ष वासः ॥६.५९
अलङ्काररूप कलत्र का स्वामित्व छोड़कर और शिर की शोभा को निर्वासित कर, सुवर्ण-हंसों से चित्रित
अपने अंशुक को देखकर, उस धीर ने तपोवन के योग्य वस्त्र की आकाङ्क्षा की ॥59॥
ततो मृगव्याधवपुर्दिवौका भावं विदित्वास्य विशुद्धभावः ।
काषायवस्त्रोऽभिययौ समीपं तं शाक्यराजप्रभवोऽभ्युवाच ॥६.६०
तब उसका भाव जानकर, विशुद्धभाव देवता मृगों के व्याध के रूप में काषाय वस्त्र पहने हुए उसके
समीप गया; शाक्यराज के पुत्र ने उसे कहाः- ॥60॥
शिवं च काषायमृषिध्वजस्ते न युज्यते हिंस्रमिदं धनुश्च ।
तत्सौम्य यद्यस्ति न सक्तिरत्र मह्यं प्रयच्छेदमिदं गृहाण ॥६.६१
“इस हिंसक धनुष के साथ तुम्हारा यह मङ्गलमय काषाय वस्त्र, जो ऋषियों का चिह्न है, मेल नहीं खाता।
इसलिए, हे सौम्य, यदि इसमें आसक्ति नहीं है, तो मुझे यह (अपना) दो, और यह (मेरा) लो।” ॥61॥
व्याधोऽब्रवीत्कामद काममारादनेन विश्वास्य मृगान्हिनस्मि ।
अर्थस्तु शक्रोपन यद्यनेन हन्त प्रतीच्छानय शुक्रमैतत् ॥६.६२
व्याध ने कहा- “हे कामनाओं की पूर्ति करनेवाले, समीप से इसके द्वारा विश्वास पैदाकर मृगों को मारता
हूँ। किन्तु, हे इन्द्र-तुल्य, यदि इससे प्रयोजन हो, तो लो और यह श्वेत (वस्त्र) लाओ” ॥62॥
परेण हर्षेण ततः स वन्यं जग्राह वासोंऽशुकमुत्ससर्ज ।
व्याधस्तु दिव्यं वपुरेव बिभ्रत्तच्छुक्लमादाय दिवं जगाम ॥६.६३
तब परम हर्ष से उसने वन-योग्य वस्त्र ग्रहण किया और अंशुक को छोड़ दिया। व्याध दिव्य शरीर धारण
कर, श्वेत (वस्त्र) ले, स्वर्ग को चला गया ॥63॥
ततः कुमारश्च स चाश्वगोपस्तस्मिंस्तथा याति विसिस्मिताये ।
आरण्यके वाससि चैव भूयस्तस्मिन्नकार्षां बहुमानमाशु ॥६.६४
तब उसके उस प्रकार जानेपर, कुमार और वह अश्व-रक्षक विस्मित हुए और उन्होंने वन-योग्य वस्त्र के
प्रति (मन में) बड़ा सम्मान किया ॥64॥
छन्दं ततः साश्रुमुखं विसृज्य काषायसंभृद्धतिकीर्तिभृत्सः ।
येनाश्रमस्तेन ययौ महात्मा सन्ध्याभ्रसंवीत इवोडुराजः ॥६.६५
तब अश्रुमुख छन्द को विदाकर, काषाय-धारी धृतिमान् कीर्तिमान् वह महात्मा, सन्ध्या-कालीन मेघों से
आवृत चन्द्रमा के समान, जहाँ आश्रम था वहाँ गया ॥65॥
ततस्तथा भर्तरि राज्यनिःस्पृहे तपोवनं याति विवर्णवाससि ।
भुजौ समुत्क्षिप्य ततः स वाजिभृद्भृशं विचुक्रोश पपात च क्षितौ ॥६.६६
राज्य (-भोग की) इच्छा से मुक्त हुआ उसका स्वामी जब विवर्ण वस्त्र पहनकर वहाँ से तपोवन की ओर
गया, तब भुजाओं को फैलाकर रोते-रोते वह अश्व-रक्षक पृथ्वी पर गिर पड़ा ॥66॥
विलोक्य भूयश्च रुरोद सस्वरं हयं भुजाभ्यामुपगृह्य कन्थकम् ।
ततो निराशो विलपन्मुहुर्मुहुर्ययौ शरीरेण पुरं न चेतसा ॥६.६७
फिर (पीछे) देखकर, भुजाओं से कन्थक घोड़े को पकड़कर जोर-जोर से रोया। तब निराश होकर बार-
बार रोता हुआ वह, शरीर से, न कि चित्त से, नगर की ओर गया ॥67॥
क्वचित्प्रदध्यौ विललाप च क्वचित् क्वचित्प्रचस्खाल पपात च क्वचित् ।
अतो व्रजन् भक्तिवशेन दुःखितश्चचार बह्वीरवशः$^{३५}$ पथि क्रियाः ॥६.६८
कहीं ध्यान किया और कहीं विलाप, कहीं फिसला और कहीं गिरा। अतः भक्ति-वश दुःखी होकर जाते
हुए, उस बेबस ने मार्ग में बहुत-सी क्रियाएँ कीं ॥68॥
इति बुद्धचरिते महाकाव्ये छन्दकनिवर्तनं नाम षष्ठः सर्गः ॥६॥
$^{३५-}$ चतुर्थ पाद में “अवसः” की जगह “अवशः” रक्खा गया है।
36 अश्वघोष
सप्तम सर्ग
तपोवन-प्रवेश
ततो विसृज्याश्रुमुखं रुदन्तं छन्दं वनच्छन्दतया निरास्थः।
सर्वार्थसिद्धो वपुषाभिभूय तमाश्रमं सिद्ध इव प्रपेदे ॥७.१
तब वन (जाने) की इच्छा के कारण आसक्तियों से मुक्त होकर, अश्रुमुख रोते छन्द को विदा कर, सिद्ध
के समान अपने रूप से उस आश्रम को अभिभूत करता हुआ सर्वार्थसिद्ध (= सिद्धार्थ) वहाँ गया ॥1॥
स राजसूनुर्मृगराजगामी मृगाजिरं तन्मृगवत्प्रविष्टः।
लक्ष्मीवियुक्तोऽपि शरीरलक्ष्म्या चक्षूंषि सर्वाश्रमिणां जहार ॥७.२
मृगराजगामी उस नृपात्मज ने मृगों के उस आङ्गन में मृग के समान प्रवेश किया। (वस्त्राभूषणों की) लक्ष्मी
(=शोभा) से रहित होनेपर भी शरीर की लक्ष्मी से उसने सब आश्रमवासियों की आँखें हर लीं ॥2॥
स्थिता हि हस्तस्थयुगास्तथैव कौतूहलाच्चक्रधराः सदाराः।
तमिन्द्रकल्पं ददृशुर्न जग्मुर्धुर्या इवार्धावनतैः शिरोभिः ॥७.३
चक्रधर तपस्वी पत्नियों के साथ कुतूहल-वश उसी प्रकार हाथों में जुए रखकर (भार-वाहक) बैलों के
समान आधे-झुके शिरों से उस इन्द्र-तुल्य को देखते रहे, (वहाँ से) गये नहीं ॥3॥³⁶
विप्राश्च गत्वा बहिरिन्ध्रहेतोः प्राप्ताः समित्पुष्पपवित्रहस्ताः।
तपःप्रधानाः कृतबुद्धयोऽपि तं द्रष्टुमीयुर्न मठानभीयुः ॥७.४
होम की लकड़ी के लिए बाहर गये विप्र लौट चुके थे, समिधा और फूलों से उनके हाथ पवित्र थे।
महातपस्वी एवं बुद्धिमान् होनेपर भी वे देखने के लिए गये, मठों में नहीं गये ॥4॥
हृष्टाश्च केका मुमुचुर्मयूरा दृष्ट्वाम्बुदं नीलमिवोन्नमन्तम्।
शष्पाणि हित्वाभिमुखाश्च तस्थुर्मृगाश्चलाक्षा मृगचारिणश्च ॥७.५
प्रसन्न होकर उठते हुए मोर वैसे ही बोलने लगे, जैसे नीले बादल को देखकर। तृण छोड़कर चञ्चल
आँखोंवाले मृग व मृगों के समान (तृण) चरनेवाले तपस्वी सामने खड़े हुए ॥5॥
दृष्ट्वा तमिक्ष्वाकुकुलप्रदीपं ज्वलन्तमुद्यन्तमिवांशुमन्तम्।
कृतेऽपि दोहे जनितप्रमोदाः प्रसुस्रुवुर्होमदुहश्च गावः ॥७.६
उदय होते हुए सूर्य के समान प्रज्वलित होते उस इक्ष्वाकु-कुल-प्रदीप को देखकर, प्रसन्न हुई गाएँ जो होम
के लिए दूही जाती थीं, दूही जानेपर भी (फिर) प्रस्रवित हुईं (उनके थनों से दूध चूने लगा) ॥6॥
कश्चिद्वसूनामयमष्टमः स्यात्स्यादश्विनोरन्यतरश्च्युतो वा।
उच्चैरुच्चैरिति तत्र वाचस्तद्दर्शनाद्विस्मयजा मुनीनाम् ॥७.७
“क्या यह वसुओं में से अष्टम है या अश्विनों में से गिरा हुआ एक?” उसके दर्शन से मुनियों के ऐसे ही
विस्मय-जनक वचन वहाँ जोर जोर से उच्चारित हुए ॥7॥
लेखर्षभस्येव वपुर्द्वितीयं धामेव लोकस्य चराचरस्य।
स द्योतयामास वनं हि कृत्स्नं यदृच्छया सूर्य इवावतीर्णः ॥७.८
इन्द्र के दूसरे शरीर के समान, चराचर संसार की ज्योति के समान, उसने समस्त वन को भासित किया,
जैसे स्वेच्छा से उतरा हुआ सूर्य ॥8॥
ततः स तैराश्रमिभिर्यथावदभ्यर्चितश्चोपनिमन्त्रितश्च।
प्रत्यर्चयां धर्मभृतो बभूव स्वरेण साम्भोऽम्बुधरोपमेन ॥७.९
तब उस आश्रम-वासियों द्वारा यथावत् पूजित और निमन्त्रित होनेपर, उसने सजल जल के समान स्वर से
उन धार्मिकों की प्रतिपूजा की ॥9॥
कीर्णं तथा पुण्यकृता जनेन स्वर्गामिकामेन विमोक्षकामः।
तमाश्रमं सोऽनुचचार धीरस्तपांसि चित्राणि निरीक्षमाणः ॥७.१०
पुण्य (अर्जन) करनेवाले स्वर्गाभिलाषी लोगों से भरे उस आश्रम में मोक्ष के इच्छुक उस धीर ने, विविध
तपस्याओं को देखते हुए, विचरण किया ॥10॥
तपःप्रकारांश्च निरीक्ष्य सौम्यस्तपोवने तत्र तपोधनानाम्।
तपस्विनं कञ्चिदनुव्रजन्तं तत्त्वं विजिज्ञासुरिदं बभाषे ॥७.११³⁷
वहाँ तपोवन में तपस्वियों की विविध तपस्याएँ देखकर, उस सौम्य ने पीछे-पीछे जाते हुए किसी तपस्वी
से, तत्त्व जानने की इच्छा से, यह कहा— ॥11॥
तत्पूर्वमद्याश्रमदर्शनं मे यस्मादिमं धर्मविधिं न जाने।
तस्माद्भवानर्हति भाषितुं मे यो निश्चयो यत्प्रति वः प्रवृत्तः ॥७.१२
“मेरा यह प्रथम आश्रम-दर्शन है, जिस कारण मैं इस धर्म-विधि को नही जानता हूँ। इसलिए आप मुझे
कहें कि आप लोगों का निश्चय क्या है, (और) किसके प्रति (यह निश्चय) प्रवृत्त है।” ॥12॥
ततो द्विजातिः स तपोविहारः शाक्यर्षभायर्षभविक्रमाय।
क्रमेण तस्मै कथयाञ्चकार तपोविशेषांस्तपसः फलं च ॥७.१३
तब उस तपस्वी द्विज ने उत्तम पराक्रमवाले उस शाक्य-श्रेष्ठ से क्रमशः तपस्या की विशेषताएँ और तपस्या
का फल बतायेः— ॥13॥
अग्राम्यमन्नं सलिले प्ररूढं पर्णानि तोयं फलमूलमेव।
यथागमं वृत्तिरियं मुनीनां भिन्नास्तु ते ते तपसां विकल्पाः ॥७.१४
³⁶_ चक्रधर तपस्वी हाथों में जुए रखकर हल चलाते होंगे।
³⁷_ “तपोविकारांश्च” की जगह “तपःप्रकारांश्च” रक्खा गया है।
बुद्धचरित 37
“जल में उत्पन्न अग्राम्य (= जङ्गली) अन्न, पत्ते, जल, फल और मूल, जैसा कि शास्त्र कहता है, यही
मुनियों की वृत्ति (= आहार) है; तपस्याओं के भिन्न-भिन्न बहुत से प्रकार हैं ॥14॥
उञ्छेन जीवन्ति खगा इवान्ये तृणानि केचिन्मृगवच्चरन्ति ।
केचिद्भुजङ्गैः सह वर्तयन्ति वल्मीकभूता वनमारुतेन ॥७.१५
दूसरे (तपस्वी) चिड़ियों की तरह चुने हुए (अन्न) पर जीते हैं, (तो) कुछ मृगों के समान तृण चरते हैं।
वल्मीक (मिट्टी के ढेर) हुए कुछ (तपस्वी) साँपों के साथ जङ्गली हवा पर रहते हैं ॥15॥
अश्मप्रयत्नार्जितवृत्तयोऽन्ये केचित्स्वदन्तापहतान्नभक्षाः ।
कृत्वा परार्थं श्रपणं तथान्ये कुर्वन्ति कार्यं यदि शेषमस्ति ॥७.१६
दूसरे पत्थरों से कूटकर जीविका चलाते हैं, कोई अपने दाँतों से छिले अन्न खाते हैं। तथा दूसरे दूसरों के
लिए पाक करते हैं और यदि शेष रहता है, तो (अपना) कार्य (= भोजन आदि) करते हैं ॥16॥
केचिज्जलक्लिन्नजटाकलापा द्विः पावकं जुह्वति मन्त्रपूर्वम् ।
मीनैः समं केचिदपो विगाह्य वसन्ति कूर्मोल्लिखितैः शरीरैः ॥७.१७
कोई जल से जटा-कलाप भिंगोकर दो बार मन्त्रपूर्वक अग्नि में हवन करते हैं। कोई जल में प्रवेश कर
मछलियों के साथ रहते हैं, कछुओं से उनके शरीर विद्ध होते रहते हैं ॥17॥
एवंविधैः कालचितैस्तपोभिः परैर्दिवं यान्त्यपरैर्नृलोकम् ।
दुःखेन मार्गेण सुखं ह्युपैति सुखं हि धर्मस्य वदन्ति मूलम् ॥७.१८
(उचित) काल में अर्जित ऐसी उत्तम तपस्याओं से वे स्वर्ग जाते हैं और निकृष्ट तपस्याओं से मर्त्यलोक।
दुःख के मार्ग में सुख प्राप्त होता है; (लोग) सुख को ही धर्म का मूल (= उद्देश्य) कहते हैं” ॥18॥
इत्येवमादि द्विपदेन्द्रवत्सः श्रुत्वा वचस्तस्य तपोधनस्य ।
अदृष्टतत्त्वोऽपि न सन्तुतोष शनैरिदं चात्मगतं बभाषे ॥७.१९
उस तपस्वी का ऐसा वचन सुनकर, राज-कुमार को, यद्यपि उसने तत्त्व को नही देखा था, सन्तोष नही
हुआ और उसने धीरे-धीरे अपने को यों कहा:- ॥19॥
दुःखात्मकं नैकविधं तपश्च स्वर्गप्रधानं तपसः फलं च ।
लोकाश्च सर्वे परिणामवन्तः स्वल्पे श्रमः खल्वयमाश्रमाणाम् ॥७.२०
“अनेक प्रकार की तपस्याएँ दुःखात्मक हैं, और तपस्या का प्रधान फल स्वर्ग है, और सब लोक
विकारवान् (परिवर्तनशील) है; (तब) आश्रमों (= आश्रमवासियों) का यह श्रम निश्चय ही स्वल्प (उद्देश्य)
के लिए है ॥20॥
श्रियांश्च बन्धून्विषयांश्च हित्वा ये स्वर्गहेतोर्नियमं चरन्ति ।
ते विप्रयुक्ताः खलु गन्तुकामा महत्तरं बन्धनमेव भूयः ॥७.२१
जो प्रिय बन्धुओं और विषयों को छोड़कर स्वर्ग प्राप्त करने के लिए नियम का पालन करते हैं; वे उससे
बिछुड़कर फिर भी बड़े बन्धन में जाना चाहते हैं ॥21॥
कायक्लमैर्येश्च तपोऽभिधानैः प्रवृत्तिकामाङ्क्षति कामहेतोः ।
संसारदोषानपरीक्षमाणो दुःखेन सोऽन्विच्छति दुःखमेव ॥७.२२
जो तप नामक शरीरिक क्लेशों से कामोपभोग के हेतु प्रवृत्ति (जीवन) की आकाङ्क्षा करता है, वह भव-चक्र
के दोषों को नही देखता हुआ (तपरूप) दुःख से (जीवनरूप) दुःख की ही इच्छा करता है ॥22॥
त्रासश्च नित्यं मरणात्प्रजानां यत्नेन चेच्छन्ति पुनःप्रसूतिम् ।
सत्यां प्रवृत्तौ नियतश्च मृत्युस्तत्रैव मग्नो यत एव भीताः ॥७.२३
मृत्यु से जीव बराबर डरते हैं और यत्नपूर्वक पुनर्जन्म चाहते हैं। प्रवृत्ति होनेपर मृत्यु निश्चित है। अतः वे
जिससे डरते हैं उसी मे डूबते हैं ॥23॥
इहार्थमेके प्रविशन्ति खेदं स्वर्गार्थमन्ये श्रमाप्नुवन्ति ।
सुखार्थमाशाकृपणोऽकृतार्थः पतत्यनर्थे खलु जीवलोकः ॥७.२४
कोई इस लोक के लिए कष्ट करते हैं, दूसरे स्वर्ग के लिए श्रम करते हैं। निश्चय ही सुख की आशा से
दीन प्राणि-जगत् अकृतार्थ होकर विपत्ति में पड़ता है ॥24॥
न खल्वयं गर्हित एव यत्नो यो हीनमुत्सृज्य विशेषगामी ।
प्राज्ञैः समानेन परिश्रमेण कार्यं तु तद्यत्र पुनर्न कार्यम् ॥७.२५
अवश्य ही यह यत्न निन्दित नही जो हीन को छोड़कर विशेष (= उत्तम) की ओर जाता है। बुद्धिमानों
को समान परिश्रम से वह करना चाहिए जिसमें फिर उन्हें (कुछ) न करना पड़े ॥25॥
शरीरपीडा तु यदीह धर्मः सुखं शरीरस्य भवत्यधर्मः ।
धर्मेण चाप्नोति सुखं परत्र तस्मादधर्मं फलतीह धर्मः ॥७.२६
यदि इस लोक में शरीर-पीड़ा (क्लेश, तप) धर्म है, तो शरीर का सुख अधर्म। धर्म से पर-लोक में (जीव)
सुख प्राप्त करता है, इसलिए धर्म, इस लोक में, अधर्म को फल धारण करता है ॥26॥
यतः शरीरं मनसो वशेन प्रवर्तते चापि निवर्तते च ।
युक्तो दमश्चेतस एव तस्माच्चित्तादृते काष्ठसमं शरीरम् ॥७.२७
क्योंकि मन की प्रभुता से शरीर (कर्म में) प्रवृत्त और (कर्म से) निवृत्त होता है; इसलिए चित्त का ही
दमन उचित है, चित्त के बिना शरीर काठ के समान है ॥27॥
आहारशुद्ध्या यदि पुण्यमिष्टं तस्मान्मृगाणामपि पुण्यमस्ति ।
ये चापि बाह्याः पुरुषाः फलेभ्यो भाग्यापराधेन पराङ्मुखार्थाः ॥७.२८
आहार की शुद्धि से यदि अभिलषित पुण्य हो, तब मृगों को भी पुण्य होता है और उन लोगों को भी, जो
(धर्म के) फल (= सुख) से रहित हैं और भाग्य-दोष से धन जिनसे विमुख है (क्योंकि ऐसे दुःखी तथा
निर्धन मनुष्य तपस्वी ही आहार करते हैं) ॥28॥
दुःखेऽभिसन्धित्वथ पुण्यहेतुः सुखेऽपि कार्यो ननु सोऽभिसन्धिः ।
अथ प्रमाणं न सुखेऽभिसन्धिर्दुःखे प्रमाणं ननु नाभिसन्धिः ॥७.२९
38 अश्वघोष
दुःख (तपस्या) में यदि सङ्कल्प पुण्य का कारण है तो सुख में भी वह सङ्कल्प करना चाहिए (जो कि-पुण्य
का कारण है)। यदि सुख में सङ्कल्प प्रमाण नहीं है, तो दुःख में भी सङ्कल्प प्रमाण नहीं है ॥२9 ॥$^{३८}$
तथैव ये कर्मविशुद्धिहेतोः स्पृशन्त्यपस्तीर्थमिति प्रवृत्ताः ।
तत्रापि तोषो हृदि केवलोऽयं न पावयिष्यन्ति हि पापमापः ॥७.३०
उसी प्रकार कर्म की शुद्धि के लिए जो लोग जल को तीर्थ समझकर स्पर्श करते हैं, उनके हृदय में यह
केवल सन्तोष ही है; क्योंकि पानी पाप को पवित्र नहीं कर सकता ॥३० ॥
स्पृष्टं हि यद्गुणवद्भिरम्भस्तत्तत्पृथिव्यां यदि तीर्थमिष्टम् ।
तस्माद्गुणानेव परैमि तीर्थमापस्तु निःसंशयमाप एव ॥७.३१
गुणवान् जिस-जिस जल का स्पर्श करते हैं यदि पृथिवी पर वही इष्ट तीर्थ है, तब गुणों को ही मैं तीर्थ
समझता हूँ, पानी तो निस्सन्देह पानी ही है" ॥३१ ॥
इति स्म तत्तद्बहुयुक्तियुक्तं जगाद चास्तं च ययौ विवस्वान् ।
ततो हविर्धूमविवर्णवृक्षं तपःप्रशान्तं स वनं विवेश ॥७.३२
इस तरह उसने युक्ति-युक्त बहुत कुछ कहा और तब सूर्य अस्त हुआ। उसके बाद उसने वन में प्रवेश
किया, जिसके वृक्ष होम के धुएँ से विवर्ण थे और तपस्या की शान्ति थी ॥३२ ॥
अभ्युद्धृतप्रज्वलिताग्निहोत्रं कृताभिषेकर्षि जनावकीर्णम् ।
जाप्यस्वनाकूजितदेवकोष्ठं धर्मस्य कर्मान्तमिव प्रवृत्तम् ॥७.३३
यहाँ प्रज्वलित अग्निहोत्र उठाये जा रहे थे, स्नान किये ऋषियों से वह वन भर रहा था, जप के शब्द से
देव-मन्दिर कूजित थे, मानो वह वन धर्म का कर्मान्त हो गया था ॥३३ ॥$^{३९}$
काश्चिन्निशास्तत्र निशाकराभः परीक्षमाणश्च तपांस्युवास ।
सर्वं परीक्ष्य तपश्च मत्वा तस्मात्तपःक्षेत्रतलाज्जगाम ॥७.३४
वह चन्द्रोपम तपों की परीक्षा करता हुआ कई रातों तक वहाँ रहा। चारों ओर से सब तप को समझकर,
वह उस तपोभूमि से चला गया ॥३४ ॥
अन्वव्रजन्नाश्रमिनस्तस्तं तद्रूपमाहात्म्यगतैर्मनोभिः ।
देशादनायैरभिभूयमानान्महर्षयो धर्ममिवापयानन्तम् ॥७.३५
उसके रूप तथा माहात्म्य से आकृष्टचित्त आश्रम-वासी उसके पीछे-पीछे गये, जैसे अनार्यों से जीते जाते
देश से हटते धर्म के पीछे-पीछे महर्षिगण जा रहे हों ॥३५ ॥
ततो जटावल्कलचीरखेलांस्तपोधनांश्चैव स तान्ददर्श ।
तपांसि चैषामनुरुध्यमानस्तस्थौ शिवे श्रीमत्ति वृक्षमूले ॥७.३६
तब उसने जटा-वल्कल-चीर-वस्त्र-धारी उन तपस्वियों को आते देखा और उनके तपों का सम्मान करता
हुआ वह मङ्गलमय सुन्दर वृक्ष के नीचे ठहर गया ॥३६ ॥
अथोपसृत्याश्रमवासिनस्तं मनुष्यवर्यं परिवार्य तस्थुः ।
वृद्धश्च तेषां बहुमानपूर्वं कलेन साम्ना गिरमित्युवाच ॥७.३७
तब समीप जाकर, आश्रम-वासी उस नर-श्रेष्ठ को घेरकर खड़े हो गये और उनमें से वृद्ध ने अति
सम्मानपूर्वक मधुरता एवं सान्त्वना से यह वचन कहाः- ॥३७ ॥
त्वय्यागते पूर्ण इवाश्रमोऽभूत्सम्पद्यते शून्य इव प्रयाते ।
तस्मादिमं नार्हसि तात हातुं जिजीविषोर्देहमिवेष्टमायुः ॥७.३८
"आपके आनेपर आश्रम मानो पूर्ण हो गया था, जानेपर मानो शून्य हो रहा है। इसलिए, हे तात, आपको
इसे न छोड़ना चाहिए, जैसे जीने की इच्छा करनेवाले की देह को अभिलषित आयु (न छोड़े) ॥३८ ॥
ब्रह्मर्षिराजर्षिसुरर्षिजुष्टः पुण्यः समीपे हिमवान् हि शैलः ।
तपांसि तान्येव तपोधनानां यत्सन्निकर्षाद्बहुलीभवन्ति ॥७.३९
ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों और देवर्षियों से सेवित पवित्र हिमवान् पर्वत समीप में है, जिसकी निकटता से
तपस्वियों की ये तपस्याएँ (प्रभाव में) बढ़ जाती हैं ॥३९ ॥
तीर्थानि पुण्यान्यभितस्तथैव सोपानभूतानि नभस्तलस्य ।
जुष्टानि धर्मात्मभिरात्मवद्भिर्देवर्षिमिश्रैश्च महर्षिमिश्रै ॥७.४०
उसी प्रकार स्वर्ग के सोपान-स्वरूप ये पवित्र तीर्थ चारों ओर हैं, जो धर्मात्मा तथा आत्मवान् देवर्षियों और
महर्षियों से सेवित हैं ॥४० ॥
इतश्च भूयः क्षममुत्तरैव दिक्सेवितुं धर्मविशेषहेतोः ।
न तु क्षमं दक्षिणतो बुधेन पदं भवेदेकमपि प्रयातुम् ॥७.४१
और, यहाँ से फिर विशेष धर्म के हेतु उत्तर दिशा का ही सेवन करना उचित है, बुद्धिमान् के लिए दक्षिण
की ओर एक पग भी जाना उचित नहीं होगा ॥४१ ॥
तपोवनेऽस्मिन्नथ निष्क्रियो वा सङ्कीर्णधर्मापतितोऽशुचिर्वा ।
दृष्टस्त्वया येन न ते विवत्सा तद्ब्रूहि यावद्रुचितोऽस्तु वासः ॥७.४२
यदि आपने इस तपोवन में (किसी को) निष्क्रिय, या सङ्कीर्ण धर्म में गिरा हुआ अपवित्र देखा है, जिससे
आपकी यहाँ रहने की इच्छा नहीं, तो वैसा कहिये, और तबतक आप यहाँ रहें ॥४२ ॥
$^{३८}$ - इस श्लोक की व्याख्या यह होगी:- “तपस्या करते हुए जो पुण्य प्राप्त होता है उसका कारण यदि मानसिक
संकल्प (intention) है, तो सुखोपभोग करते हुए भी वही संकल्प करना चाहिए जिससे पुण्य प्राप्त हो। यदि
सुखोपभोग करते हुए संकल्प करने से पुण्य नहीं मिल सकता है तो तपस्या करते हुए भी संकल्प करने से पुण्य
नहीं मिलना चाहिए।”
$^{३९}$ - कर्मान्त = खलिहान, कारखाना, स्थली।
बुद्धचरित 39
इमे हि वाञ्छन्ति तपःसहायं तपोनिधानप्रतिमं भवन्तम्।
वास्तव्यता हीन्द्रसमेन सार्धं बृहस्पतेरभ्युदयावहः स्यात् ॥७.४३
क्योंकि ये (तपस्वी) आप तप-निधान सदृश को तप का साथी (बनाना) चाहते हैं, क्योंकि इन्द्र-तुल्य
आपके साथ निवास करना बृहस्पति के लिए भी उदयप्रद होगा।” ॥43 ॥
इत्येवमुक्ते स तपस्विमध्ये तपस्विमुख्येन मनीषिमुख्यः ।
भवप्रणाशाय कृतप्रतिज्ञः स्वं भावमन्तर्गतमाचचक्षे ॥७.४४
तपस्वियों के बीच उस प्रकार तपस्वी द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस श्रेष्ठ मनीषी ने, जिसने जन्म-
विनाश के लिए प्रतीक्षा की थी, अपना आन्तरिक भाव बतायाः- ॥44 ॥
ऋज्वात्मनां धर्मभृतां मुनीनामियातिथित्वान्स्वजनोपमानाम्।
एवंविधैर्मां प्रति भावजातैः प्रीतिः परा मे जनितश्च मानः ॥७.४५
“सरल तथा धर्मपालक मुनि अपनी आतिथ्य प्रियता के कारण स्वजनों के समान है, मेरे प्रति उनके ऐसे
भावों से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई और मैं सम्मानित हुआ ॥45 ॥
स्निग्धाभिराभिर्हृदयङ्गमाभिः समासतः स्नात इवास्मि वाग्भिः ।
रतिश्च मे धर्मनवग्रहस्य विस्पन्दिता सम्प्रति भूय एव ॥७.४६
संक्षेप में, स्नेह-भरे हृदय-स्पर्शी इन वचनों से मैंने मानो स्नान किया; और हाल में ही धर्म को ग्रहण
करनेपर भी (धर्म के प्रति) मेरा आनन्द इस समय फिर बढ़ रहा है ॥46 ॥
एवं प्रवृत्तान् भवतः शरण्यानतीव सन्दशितपक्षपातान् ।
यास्यामि हित्वेति ममापि दुःखं यथैव बन्धूंस्त्यजतस्तथैव ॥७.४७
इस प्रकार (तपस्या में) लगे हुए आप लोगों को, जो आश्रय देनेवाले हैं और जिन्होंने मेरे प्रति अत्यन्त
पक्षपात (ममत्व) दिखाया है, छोड़कर जाऊँगा-इससे मुझे भी वैसा ही दुःख है जैसा कि बन्धुओं को
छोड़ते समय मुझे (हुआ था) ॥47 ॥
स्वर्गाय युष्माकमयं तु धर्मो ममाभिलाषस्त्वपुनर्भवाय ।
अस्मिन्वने येन न मे विवत्सा भिन्नः प्रवृत्त्या हि निवृत्तिधर्मः ॥७.४८
आप लोगों का यह धर्म स्वर्ग के लिए है, मेरी अभिलाषा पुनर्जन्म के अभाव के लिए (=पुनर्जन्म न हो,
इसके लिए) है, इसी कारण इस वन में मेरी रहने की इच्छा नहीं; क्योंकि निवृत्ति-धर्म प्रवृत्ति से भिन्न
है ॥48 ॥
तन्नारतिर्मे न परापचारो वनादितो येन परिव्रजामि ।
धर्मे स्थिताः पूर्वयुगानुरूपे सर्वे भवन्तो हि महर्षिकल्पाः ॥७.४९
यह न मेरी अरुचि है न दूसरों की आचार-हीनता, जिससे मैं इस वन से जा रहा हूँ; क्योंकि महर्षि-तुल्य
आप सब पूर्व युग के अनुरूप धर्म में स्थित हैं।” ॥49 ॥
ततो वचः सूनृतमर्थवच्च सुश्लक्ष्णमोजस्वि च गर्वितं च।
श्रुत्वा कुमारस्य तपस्विनस्ते विशेषयुक्तं बहुमानमीयुः ॥७.५०
तब कुमार का प्रिय, अर्थ-पूर्ण, स्निग्ध, ओजस्वी तथा गौरव-पूर्ण वचन सुनकर वे तपस्वी अत्यन्त सम्मानित
हुए ॥50 ॥
कश्चिद्विज्रस्तत्र तु भस्मशायी प्रांशुः शिखी दारवचीरवासाः।
आपिङ्गलाक्षस्तनुदीर्घघोणः कुण्डैकहस्तो गिरमित्युवाच ॥७.५१
वहाँ राख में सोनेवाले, लम्बा शरीरवाले, शिखावाले, वल्कल वस्त्रवाले, पीली आँखोंवाले, पतली व लम्बी
नाकवाले, किसी द्विज ने, जिसके हाथ में पात्र था, यह वचन कहाः- ॥51 ॥
धीमन्नुदारः खलु निश्चयस्ते यस्त्वं युवा जन्मनि दृष्टदोषः ।
स्वर्गापवर्गों हि विचार्य सम्यग्यस्यापवर्गे मतिरस्ति सोऽस्ति ॥७.५२
“हे मेधाविन्, आपका निश्चय उदार (उत्तम) है, आपने युवा होकर जन्म में दोष देखा है; क्योंकि स्वर्ग व
अपवर्ग का सम्यक् विचार कर अपवर्ग में जिसकी बुद्धि है, (वास्तव में) वही है ॥52 ॥
यज्ञैस्तपोभिर्नियमैश्च तैस्तैः स्वर्गं यियासन्ति हि रागवन्तः ।
रागेण सार्धं रिपुणेव युद्धा मोक्षं परीप्सन्ति तु सत्त्ववन्तः ॥७.५३
रागी (पुरुष) उन उन यज्ञों, तपों और नियमों से स्वर्ग जाने की इच्छा करते हैं; किन्तु सत्त्ववान् (पुरुष)
राग के साथ, शत्रु के समान, युद्ध कर मोक्ष पाने की इच्छा करते हैं ॥53 ॥
तद्बुद्धिरेषा यदि निश्चिता ते तूर्णं भवान् गच्छतु विन्ध्यकोष्ठम्।
असौ मुनिस्तत्र वसत्यराडो यो नैष्ठिके श्रेयसि लब्धचक्षुः ॥७.५४
इसलिए यदि आपकी यह निश्चित बुद्धि है, तो शीघ्र ही आप विन्ध्यकोष्ठ जाइये। वहाँ वह मुनि अराड
रहता है जिसने नैष्ठिक कल्याण में दृष्टि पाई है ॥54 ॥
तस्माद्भवाञ्छ्रोष्यति तत्त्वमार्गं सत्यां रुचौ सम्प्रतिपत्स्यते च ।
यथा तु पश्यामि मतिस्तथैषा तस्यापि यास्यत्यवधूय बुद्धिम् ॥७.५५
उससे आप तत्त्व-मार्ग सुनेंगे और रुचि होनेपर स्वीकार करेंगे; किन्तु जैसा मैं देखता हूँ आपकी यह बुद्धि
ऐसी है कि उसकी भी बुद्धि का तिरस्कार कर आप चले जायेंग ॥55 ॥
स्पष्टोच्छ्रघोणं विपुलायताक्षं ताम्राधरौष्ठं सिततीक्ष्णदंष्ट्रम्।
इदं हि वक्त्रं तनुरक्तजिह्वं ज्ञेयार्णवं पास्यति कृत्स्नमेव ॥७.५६
स्पष्ट व ऊँची नाकवाला, बड़ी व लम्बी आँखोंवाला, लाल ओठवाला, सफेद व तेज दाँतोंवाला, पतली व
लाल जीभवाला (आपका) यह मुख सम्पूर्ण ही ज्ञान-सागर का पान करेगा ॥56 ॥
गम्भीरता या भवतस्त्वगाधा या दीप्तता यानि च लक्षणानि ।
आचार्यकं प्राप्स्यसि तत्पृथिव्यां यन्नर्षिभिः पूर्वयुगेऽप्यवाप्तम् ॥७.५७
40 अश्वघोष
आपकी जो अगाध गम्भीरता है, जो दीप्ति है, और जो लक्षण हैं (इनसे प्रकट है कि) आप पृथिवी पर वह
आचार्य-पद प्राप्त करेंगे, जो ऋषियों ने पूर्व युग में भी नही पाया" ॥57 ॥
परममिति ततो नृपात्मजस्तमृषिजनं प्रतिनन्द्य निर्ययौ ।
विविधवदनुविधाय तेऽपि तं प्रविविशुराश्रममस्तपोवनम् ॥७.५८
तब “अच्छा" कह और उन ऋषियों को प्रणाम कर, राजा का पुत्र चला गया । उन आश्रम-वासियों ने भी
उसका विधिवत् सम्मान कर तपोवन में प्रवेश किया ॥58 ॥
इति बुद्धचरिते महाकाव्ये तपोवनप्रवेशो नाम सप्तमः सर्गः ॥७ ॥
अष्टम सर्ग
अन्तःपुर-विलाप
ततस्तुरङ्गावचरः स दुर्मनास्तथा वनं भर्तरि निर्ममे गते ।
चकार यत्नं पथि शोकनिग्रहे तथापि चैवाश्रु न तस्य चिक्षिये ॥८.१
तब निर्मम स्वामी के उस प्रकार वन चले जानेपर उस उदास अश्व-रक्षक ने रास्ते में अपने शोक-निग्रह
का यत्न किया; तो भी उसका आँसू क्षीण नही हुआ ॥1 ॥
यमेकरात्रेण तु भर्तुराज्ञया जगाम मार्गं सह तेन वाजिना ।
इयाय भर्तुर्विरहं विचिन्तयंस्तमेव पन्थानमहोभिरष्टभिः ॥८.२
स्वामी की आज्ञा से उस घोड़े के साथ जिस मार्ग से वह एक दिन में गया था, स्वामि-वियोग की चिन्ता
करता हुआ उसी रास्ते से वह आठ दिनों में आया ॥2 ॥
हयश्च सौजा विचचार कन्थकस्तताम भावेन बभूव निर्मदः ।
अलङ्कृतश्चापि तथैव भूषणैर्बभूवतश्रीरिव तेन वर्जितः ॥८.३
ओजस्वी घोड़ा कन्थक चला, (दुःख के) भाव से थक गया, मद-रहित हो गया । भूषणों से उसी प्रकार
अलङ्कृत होनेपर भी अपने स्वामी के बिना वह मानो श्री-हीन था ॥3 ॥
निवृत्य चैवाभिमुखस्तपोवनं भृशं जिहेषे करुणं मुहुर्मुहुः ।
क्षुधान्वितोऽप्यध्वनि शष्पमम्बु वा यथा पुरा नाभिननन्द नाददे ॥८.४
और, तपोवन की ओर मुड़कर वह दुःख के साथ बार-बार खूब हिनहिनाया । रास्ते में भूख लगनेपर भी
वह तृण या जल से पहले की तरह न आनन्दित हुआ न उसे ग्रहण किया ॥4 ॥
ततो विहीनं कपिलाह्वयं पुरं महात्मना तेन जगद्धितात्मना ।
क्रमेण तौ शून्यमिवोपजग्मतुर्दिवाकरेणेव विनाकॄतं नभः ॥८.५
तब वे दोनों, जगत् के हित में ही जिसकी आत्मा थी, उस महात्मा से रहित कपिल नामक नगर के
समीप क्रम से गये, जो (नगर) सूर्य-रहित आकाश के समान सूना-सा था ॥5 ॥
सपुण्डरीकेरपि शोभितं जलैरलङ्कृतं पुष्पधरैर्नगैरपि ।
तदेव तस्योपवनं वनोपमं गतप्रहर्षैर्न रराज नागरैः ॥८.६
कमल-युक्त जलाशयों से शोभित होनेपर भी, पुष्पयुक्त वृक्षों से अलङ्कृत रहनेपर भी उसका वही उपवन
जङ्गल के समान जान पड़ा; आनन्द-रहित नगर-निवासियों से वह दीप्त नही हुआ ॥6 ॥
ततो भ्रमद्भिर्दिशि दीनममानसैरनुज्ज्वलैर्बाष्पहितेक्षणैर्नरैः ।
निवार्यमाणाविव तावुभौ पुरं शनैरपस्नातमिवाभिजग्मतुः ॥८.७
तब चारों ओर घूमते हुए उदास लोगों से, जिनके चित्त दुःखी थे और आँखें आँसू से आकुल थीं, मानो
मना किये जानेपर भी वे दोनों धीरे-धीरे उस नगर में गये जो मृत-स्नात (= किसी के मरनेपर स्नान किये
हुए पुरुष) के समान था ॥7 ॥
निशम्य च स्रस्तशरीरगामिनौ विनागतौ शाक्यकुलर्षभेण तौ ।
मुमोच बाष्पं पथि नागरो जनः पुरा रथे दाशरथेरिवागते ॥८.८
शिथिल शरीर से जानेवाले वे दोनों शाक्य-कुल के बिना ही आये, यह देखकर नगर की जनता ने मार्ग में
आँसू बहाये, जैसे प्राचीन काल में राम का रथ (वन से खाली लौट) आनेपर (आँसू बहाये थे) ॥8 ॥
अथ ब्रुवन्तः समुपेतमन्यवो जनाः पथि च्छन्दकमागतश्रवः ।
क्व राजपुत्रः पुराग्रनन्दनो हतस्त्वयासाविति पृष्टतोऽन्वयुः ॥८.९
तब शोकित लोग, जिन्हें आँसू आ गये थे, रास्ते में छन्दक से कहने लगे—"नगर व राष्ट्र को आनन्दित
करनेवाला राज-पुत्र कहाँ है? तुमने उसका हरण किया है।" इस तरह कहते हुए वे उसके पीछे-पीछे
चले ॥9 ॥
ततः स तान् भक्तिमतोऽब्रवीज्जनान्नरेन्द्रपुत्रं न परित्यजाम्यहम् ।
रुदन्नहं तेन तु निर्जने वने गृहस्थवेशश्च विसर्जिताविति ॥८.१०
तब उसने उन भक्त लोगों से कहा—"मैंने राजा के पुत्र को नही छोड़ा, किन्तु निर्जन वन में उसने ही
मुझे रोते हुए को और अपने गृहस्थ वेश को विसर्जित किया" ॥10 ॥
इदं वचस्तस्य निशम्य ते जनाः सुदुष्करं खल्विति निश्चयं ययुः ।
पतद्भि जहुः सलिलं न नेत्रजं मनो निनिन्दुश्च फलोत्थमात्मनः ॥८.११
उसका यह वचन सुनकर, उन लोगों ने विचारा—"निश्चय ही (राजकुमार का) यह दुष्कर काम है।" वे
अपने आँसू न रोक सके और फलासक्ति (स्वार्थपरता) से उत्पन्न अपनी मानसिक स्थिति की उन्होंने निन्दा
की ॥11 ॥
अथोचुरद्यैव विशाम तद्वनं गतः स यत्र द्विपराजविक्रमः ।
जिजीविषा नास्ति हि तेन नो विना यथेन्द्रियाणां विगमे शरीरिणाम् ॥८.१२
बुद्धचरित 41
तब वे बोले—“आज ही हम उस वन में जा रहे हैं, जहाँ गजराज के समान पराक्रमी वह (राजकुमार) गया
है। उसके बिना हमारी जीने की इच्छा नहीं है, जैसे इन्द्रियों (की शक्ति) के नष्ट होनेपर देह-धारियों की
(जीने की इच्छा नहीं होती) ॥12॥
इदं पुरं तेन विवर्जितं वनं वनं च तत्तेन समन्वितं पुरम्।
न शोभते तेन हि नो विना पुरं मरुत्वता वृत्रवधे यथा दिवम् ॥८.१३
उससे रहित यह नगर वन है और उससे युक्त वह वन नगर है; क्योंकि उसके बिना हमारा नगर उसी
प्रकार शोभा-हीन है, जिस प्रकार वृत्र-वध के समय इन्द्र के बिना स्वर्ग” ॥13॥
पुनः कुमारो विनिवृत्त इत्यथो गवाक्षमालाः प्रतिपेदिरेऽङ्गनाः।
विविक्तपृष्ठं च निशम्य वाजिनं पुनर्गवाक्षाणि पिधाय चुक्रुशुः ॥८.१४
“कुमार फिर लौट आये हैं” यह सोचकर स्त्रियाँ खिड़कियों के सामने आ गईं; और घोड़े की पीठ खाली
देखकर फिर खिड़कियों को बन्द कर के रोने लगीं ॥14॥
प्रविष्टदीक्षस्तु सुतोपलब्धये व्रतेन शोकेन च खिन्नमानसः।
जजाप देवायतने नराधिपश्चकार तास्ताश्च यथाशयाः क्रियाः ॥८.१५
पुत्र की प्राप्ति के लिए दीक्षा ग्रहण कर, व्रत व शोक से खिन्नचित्त राजा ने देव-मन्दिर में जप किया और
अपने आशय के अनुरूप भाँति-भाँति की क्रियाएँ कीं ॥15॥
ततः स बाष्पप्रतिपूर्णलोचनस्तुरङ्गमादाय तुरङ्गमानुसः।
विवेश शोकाभिहतो नृपक्षयं युधापिनीते रिपुणेव भर्तरि ॥८.१६
तब आँसू-भरी आँखों से उस अश्वरक्षक ने घोड़े को लिवाते हुए कातर होकर राज-महल में प्रवेश किया,
जैसे योद्धा शत्रु के द्वारा उसके स्वामी का अपहरण कर लिया गया हो ॥16॥
विगाहमानश्च नरेन्द्रमन्दिरं विलोकयन्नश्रुवहेन चक्षुषा।
स्वरेण पुष्टेन रुराव कन्थको जनाय दुःखं प्रतिवेदयन्निव ॥८.१७
राज-महल में प्रवेश करता हुआ, आँसू-भरी आँखों से देखता हुआ कन्थक जोर से हिनहिनाया, मानो लोगों
से वह (अपना) दुःख निवेदन कर रहा हो ॥17॥
ततः खगाश्च क्षयमध्यगोचराः समीपबद्धास्तुरगाश्च सत्कृताः।
हयस्य तस्य प्रतिसस्वनुः स्वनं नरेन्द्रसूनोरुपयानशङ्किनः ॥८.१८
तब महल के बीच रहनेवाले पक्षियों ने और समीप में बँधे हुए सत्कृत (=प्रिय) घोड़ों ने उस घोड़े के
हिनहिनाने के प्रति शब्द किया, यह जानकर कि शायद राजकुमार आ रहा है ॥18॥
जनाश्च हर्षातिशयेन वञ्चिता जनाधिपान्तःपुरसन्मिकर्षगाः।
यथा हयः कन्थक एष हेषते ध्रुवं कुमारो विशतीति मेनिरे ॥८.१९
“यह कन्थक घोड़ा जिस प्रकार से हिनहिना रहा है, इससे यह प्रकट है कि कुमार निश्चय ही प्रवेश कर
रहा है”—ऐसा मानकर राजा के अन्तःपुर के समीप जानेवाले लोग अतिशय हर्ष से उछलने लगे ॥19॥
अतिप्रहर्षादथ शोकमूर्च्छिताः कुमारसन्दर्शनलोललोचनाः।
गृहाद्विनिश्चक्रमुरशया स्त्रियः शरदपयोदादिव विद्युतश्चलाः ॥८.२०
स्त्रियाँ, जो शोक से मूर्च्छित थीं, अति आनन्दित हुईं। कुमार को देखने की लालसा से उनकी आँखें चञ्चल
हो उठीं, आशा के साथ वे घर से निकल आईं, जैसे शरत्काल के बादल से चपल बिजली (निकल
आवे) ॥20॥
विलम्बवेश्यो मलिनांशुकाम्बरा निरञ्जनैर्बाष्पहतेक्षणैर्मुखैः।
स्त्रियो न रेजुर्मृजया विनाकृता दिवीव तारा रजनीक्षयारुणाः ॥८.२१
उनके केशपाश लटक रहे थे, बारीक कपड़े मलिन थे, मुखों में अंजन नहीं था, आँखें आँसुओं से आकुल
थीं; सिङ्गार किये बिना स्त्रियाँ शोभित नहीं हुईं, जैसे रात बीतनेपर आकाश में फीके तारे ॥21॥
अरक्ताम्रैश्चरणैरनूपुरैर्मुखैरजकुण्डलैरवज्रकुण्डलैश्चरैर्मुखैः।
स्वभावपीनैर्जघनैरमेखलैर्हरहारयोक्तैर्मुषितैरिव स्तनैः ॥८.२२
उनके पाँव महावर से रङ्गे नहीं थे, उनके नूपुर भी नहीं थे, मुख (कानों के) कुण्डलों से रहित थे, गले
अनलङ्कृत थे, स्वभाव से मोटी जाँघें मेखला रहित थीं, हार व योक्त (=सूत्र ?) से रहित स्तन लुटे-से
थे ॥22॥
निरीक्ष्य ता बाष्परीतलोचना निराश्रयं छन्दकमश्वमेव च।
विषण्णवक्त्रा रुरुदुर्वरस्त्रियः वनान्तरे गाव इवर्षभोझिताः ॥८.२३
अश्रु-पूर्ण आँखों से छन्दक और घोड़े को स्वामी के बिना देखकर वे उत्तम स्त्रियाँ विषण्णवदन होकर रोईं,
जैसे वन के भीतर साँड़ से परित्यक्त गाएँ ॥23॥
ततः सबाष्पा महिषी महीपतेः प्रनष्टवत्सा महिषीव वत्सला।
प्रगृह्य बाहू निपपात गौतमी विलोलपर्णा कदलीव काञ्चनी ॥८.२४
तब रोती हुई राजा की पटरानी गौतमी, जो उस महिषी के समान (अपने पुत्र के लिए) वत्सल थी
जिसका बछड़ा नष्ट हो गया हो, भुजाएँ फेंककर, हिलते पत्तेवाली सोने की कदली के समान गिर
पड़ी ॥24॥
हतात्विषोऽन्याः शिथिलांसबाहवः स्त्रियो विषादेन विचेतना इव।
न चुक्रुशुर्नाश्रु जहुर्न शश्वसुर्न चेलुरासूर्लिखिता इव स्थिताः ॥८.२५
अन्य निष्प्रभ स्त्रियों ने, जिनके कन्धे व भुजाएँ शिथिल थीं, विषाद से मानो बेहोश होकर न विलाप किया,
न आँसू बहाये, न साँसें लीं, और न हिली-डुलीं ही; केवल चित्रित-सी खड़ी रहीं ॥25॥
अधीरमन्याः पतिशोकमूर्च्छिता विलोचनप्रस्रवणैर्मुखैः स्त्रियः।
सिषिञ्चिरे प्रोषितचन्दनान् स्तनान्धराधरः प्रस्रवणैरिवोपलान् ॥८.२६
दूसरी स्त्रियों ने, जो अधीर होकर पति के शोक से मूर्च्छित थीं, नेत्र-निर्झर मुखों से चन्दन-शून्य स्तनों को
सींचा, जैसे पर्वत अपने झरनों से शिलाओं को (सींचता है) ॥26॥
42 अश्वघोष
मुखैश्च तासां नयनाम्बुताडितैः रराज तद्राजनिवेशनं तदा ।
नवाम्बुकालेऽम्बुदवृष्टिताडितैः स्रवज्जलैस्तामरसैर्यथा सरः ॥८.२७
तब उनके अश्रुपूर्ण मुखों से वह राज-भवन वैसे ही शोभित हुआ, जैसे कि सरोवर, जो वर्षा के आरम्भ में
वृष्टि-जल से ताड़ित हुए जल-स्रावी कमलों से भरा हो ॥27 ॥
सुवृत्तपीनाङ्गुलिभिर्निरन्तरैरभूषणैर्गूढसिरैर्वराङ्गनाः ।
उरांसि जघ्नुः कमलोपमैः करैः स्वपल्लवैर्वातचला लता इव ॥८.२८
उत्तम स्त्रियों ने गोल, मोटी व सटी अङ्गुलियोंवाले कमलोपम करों से, जो भूषण-रहित थे और जिनकी
सिराएँ (= धमनियों) छिपी हुई थीं, छाती पीटी, जैसे हवा से हिलती लताएँ अपने पल्लवों से (अपने को
ही पीटती हैं) ॥28 ॥
करप्रहारप्रचलैश्च ता बभुस्तथापि नार्यः सहितोन्नतैः स्तनैः ।
वनानिलाघूर्णितपद्मकम्पितै रथाङ्गनाम्नां मिथुनैरिवापगाः ॥८.२९
हाथों की चोटों से हिलते हुए कठोर व उन्नत स्तनोंवाली वे स्त्रियाँ उन नदियों के समान शोभित हुईं
जिनके चक्रवाक-युगल जङ्गल की हवा से हिलाये गये कमलों से काँप रहे हों ॥29 ॥
यथा च वक्षांसि करैरपीडयंस्तथैव वक्षोभिरपीडयन् करान् ।
अकारयंस्तत् परस्परं व्यथाः कराग्रवक्षांस्यबला दयालसाः ॥८.३०
और, जैसे हाथों से छातियों को पीड़ित किया, वैसे ही छातियों से भी हाथों को पीड़ित किया। निर्दय
होकर अबलाओं ने हाथों व छातियों द्वारा एक दूसरे को व्यथित कराया ॥30 ॥
ततस्तु रोषप्रविरक्तलोचना विषादसम्बन्धिकषायगद्गदम् ।
उवाच निश्वासचलत्पयोधरा विगाढशोकाश्रुधरा यशोधरा ॥८.३१
तब रोष से लाल आँखोंवाली, साँसों से हिलते स्तनोंवाली गाढ़ शोक से आँसू बहानेवाली यशोधरा ने
विषाद-सम्बन्धी कसैलेपन (= कटुता से) गद्गद होकर कहा:— ॥31 ॥
निशि प्रसुप्तामवशां विहाय मां गतः क्व स च्छन्दक मन्मनोरथः ।
उपागते च त्वयि कन्थके च मे समं गतेषु त्रिषु कम्पते मनः ॥८.३२
“रात को सोई हुई मुझ विवश को छोड़कर, हे छन्दक, मेरा वह मनोरथ (= प्रियतम) कहाँ गया? तीनों
साथ गये थे, और कन्थक व तुम आ गये, मेरा मन काँप रहा है ॥32 ॥
अनार्यमस्निग्धममित्रकर्म मे नृशंस कृत्वा किमिहाद्य रोदिषि ।
नियच्छ बाष्पं भव तुष्टमानसो न संवदत्यश्रु च तच्च कर्म ते ॥८.३३
मेरे लिए अनार्य, अस्निग्ध और शत्रुतापूर्ण काम करके, हे क्रूर, क्यों आज यहाँ रो रहे हो? आँसू रोको,
सन्तुष्टचित्त होओ, आँसू और तुम्हारा वह काम (परस्पर) मेल नहीं खाते ॥33 ॥
प्रियेण वश्येन हितेन साधुना त्वया सहायेन यथार्थकारिणा ।
गतोऽर्यपुत्रो ह्यपुनर्निवृत्तये रमस्व दिष्ट्या सफलः श्रमस्तव ॥८.३४
प्रिय, वशवर्ती, हित, साधु और यथार्थकारी तुझ साथी के साथ आर्यपुत्र गये, फिर लौटने के लिए नही।
आनन्द करो, सौभाग्य से तुम्हारा श्रम सफल (हुआ) ॥34 ॥
वरं मनुष्यस्य विचक्षणो रिपुर्न मित्रमप्राज्ञमयोगपेशलम् ।
सुहृद्ब्रुवेण ह्यविपश्चिता त्वया कृतः कुलस्यास्य महानुपप्लवः ॥८.३५
मनुष्य का चतुर शत्रु अच्छा है, न कि मूर्ख मित्र जो वियोग (कराने) में निपुण होता है। मित्र कहे
जानेवाले तुझ मूर्ख ने इस कुल का बड़ा ही अनर्थ किया ॥35 ॥⁴⁰
इमा हि शोच्या व्यवमुक्तभूषणाः प्रसक्तबाष्पाविलरक्तलोचनाः ।
स्थितेऽपि पत्यौ हिमवन्महीसमे प्रनष्टशोभा विधवा इव स्त्रियः ॥८.३६
हिमालय और पृथिवी के समान (धैर्यशाली) स्वामी के रहनेपर भी, विधवाओं के सदृश शोभा-हीन हुई ये
स्त्रियाँ दयनीय हैं, जिन्होंने गहने फेंक दिये हैं और जिनकी आँखें निरन्तर बहते अश्रु-जल से मलिन और
लाल हैं ॥36 ॥
इमाश्च विक्षिप्तविटङ्कबाहवः प्रसक्तपारावतदीर्घनिस्वनाः ।
विनाकृतास्तेन सहावरोधनैर्भृशं रुदन्तीव विमानपङ्क्तयः ॥८.३७
और कपोत-पालिका भुजाएँ फैलाये हुए ये प्रासाद-पङ्क्तियाँ, जो आसक्त कपोतों से लम्बी साँसे ले रही हैं
रनिवासों के साथ उनके वियोग में मानो खूब रो रही हैं ॥37 ॥
अनर्थकामोऽस्य जनस्य सर्वथा तुरङ्गमोऽपि ध्रुवमेष कन्थकः ।
जहार सर्वस्वमितस्तथा हि मे जने प्रसुप्ते निशि रत्नचौरवत् ॥८.३८
निश्चय ही यह कन्थक घोड़ा भी इस व्यक्ति के अनर्थ का सर्वथा इच्छुक था; क्योंकि लोगों के सोये
रहनेपर रात में रत्न-चोर के समान इसने मेरे सर्वस्व का यहाँ से उस प्रकार हरण किया है ॥38 ॥
यदा समर्थः खलु सोढुमागतानिषुप्रहारानपि किं पुनः कशाः ।
गतः कशापातभयात्कथं न्वयं श्रियं गृहीत्वा हृदयं च मे समम् ॥८.३९
जब तीरों के आये हुए प्रहार सहने में वह समर्थ है, कोड़ों का क्या कहना, तब कोड़े के भय से यह मेरे
हृदय और सौभाग्य को साथ लेकर कैसे गया? ॥39 ॥
अनार्यकर्मा भृशमद्य हेषते नरेन्द्रधिष्ण्यं प्रतिपूरयन्निव ।
यदा तु निर्वाहयति स्म मे प्रियं तदा हि मूकस्तुरगाधमोऽभवत् ॥८.४०
(यह) अनार्यकर्मा आज खूब हिनहिना रहा है, मानो राज-भवन को भर रहा हो। किन्तु जब मेरे प्रियतम
को ले जा रहा था, तब यह अधम अश्व गूँगा हो गया था ॥40 ॥
यदि ह्यहेषिष्यत बोधयन् जनं खुरैः क्षितौ वाप्यकरिष्यत ध्वनिम् ।
हनुस्वनं वाजनिष्यदुत्तमं न चाभविष्यन्मम दुःखमीदृशम् ॥८.४१
⁴⁰ - "अयोग-पेशल" का दूसरा अर्थ होगा—"अनुचित करने में निपुण" ।
बुद्धचरित 43
यदि हिनहिनाकर लोगों को जगाता, या खुरों से पृथिवी पर शब्द करता, या जबड़ों से जोरों का शब्द
करता, तो मुझे ऐसा दुःख न होता" ॥41 ॥
इतीह देव्याः परिदेविताश्रयं निशम्य बाष्पग्रथिताक्षरं वचः ।
अधोमुखः साश्रुकलः कृताञ्जलिः शनैरिदं छन्दक उत्तरं जगौ ॥८.४२
देवी का यह शोक-मूलक वचन, जिसके अक्षर आँसुओं से ग्रथित थे, सुनकर अधोमुख छन्दक ने, रोते
हुए, हाथ जोड़कर, धीरे-धीरे यह उत्तर दिया:- ॥42 ॥
विगर्हितुं नार्हसि देवि कन्थकं न चापि रोषं मयि कर्तुमर्हसि ।
अनागसौ स्वः समवेहि सर्वशो गतो नृदेवः स हि देवि देववत् ॥८.४३
“हे देवि, आपको न कन्थक की निन्दा करनी चाहिए और न मुझपर ही रोष करना चाहिए। हम दोनों
को सर्वथा निर्दोष समझिये, हे देवि, वह नरदेव देवता के समान गये ॥43 ॥
अहं हि जानन्नपि राजशासनं बलात्कृतः कैरपि दैववतैरिव ।
उपानयं तूर्णमिमं तुरङ्गमं तथान्वगच्छं विगतश्रमोऽध्वनि ॥८.४४
यद्यपि मैं राजा की आज्ञा को जानता था, तो भी मानो किन्हीं देवताओं ने मुझसे बलात् कराया। जल्दी
से मैं इस घोड़े का समीप ले आया। मार्ग में बिना थके ही उस प्रकार उसके पीछे-पीछे गया ॥44 ॥
व्रजन्नयं वाजिवरोऽपि नास्पृशन्महीं खुराग्रैर्विधृतैरिवान्तरा ।
तथैव दैवादिव संयताननो हनुस्वनं नाकृत नाप्यहेषत ॥८.४५
जाते हुए इस अश्व-श्रेष्ठ ने भी खुरों के अग्रभाग से, जो मानो बीच में ही (किसी के द्वारा) पकड़े हुए थे,
धरती का स्पर्श नही किया। उसी प्रकार मानो दैव-वंश संयत-मुख होकर न जबड़ों से शब्द किया और न
हिनहिनाया ॥45 ॥
यतो बहिर्गच्छति पार्थिवात्मजे तदाभवद्द्वारमपावृतं स्वयम् ।
तमश्च नैशं रविणेव पाटितं ततोऽपि दैवो विधिरेष गृह्यताम् ॥८.४६
क्योंकि जब राजा का पुत्र बाहर जा रहा था, तब द्वार आप ही आप खुल गया और रात्रि का अन्धकार
दूर हो गया, जैसे सूर्य द्वारा विदीर्ण हुआ हो, इससे भी इसे दैव-विधान ही समझना चाहिए ॥46 ॥
यदप्रमत्तोऽपि नरेन्द्रशासनाद्गृहे पुरे चैव सहस्रशो जनः ।
तदा स नाबुध्यत निद्रया हृतस्ततोऽपि दैवो विधिरेष गृह्यताम् ॥८.४७
क्योंकि राजा की आज्ञा से सावधान रहनेपर भी महल और नगर में हजार-हजार लोग नहीं जागे, नींद से
अभिभूत थे, इससे भी इसे दैव-विधान ही समझना चाहिए ॥47 ॥
यतश्च वासो वनवाससम्मतं निसृष्टमस्मै समये दिवौकसा ।
दिवि प्रविद्धं मुकुटं च तद्धृतं ततोऽपि दैवो विधिरेष गृह्यताम् ॥८.४८
और, क्योंकि वन-वास-योग्य वस्त्र देवता ने उन्हें समय पर दिया और आकाश में फेंका गया वह मुकुट
पकड़ा गया, इससे भी इसे दैव-विधान ही समझना चाहिए ॥48 ॥
तदेवमावां नरदेवि दोषतो न तत्प्रयातं प्रति गन्तुमर्हसि ।
न कामकारो मम नास्य वाजिनः कृतानुयात्रः स हि दैववैर्गतः ॥८.४९
इसलिए, हे नर-देवि, इनके जाने के बारे में आपको हमें दोषी नहीं समझना चाहिए। न मेरी इच्छा से
(कुछ) हुआ और न इस घोड़े की इच्छा से ही। देवों से अनुसूत होकर वह गये” ॥49 ॥
इति प्रयाणं बहुदेवमद्भुतं निशम्य तास्तस्य महात्मनः स्त्रियः ।
प्रनष्टशोका इव विस्मयं ययुर्मनोज्वरं प्रव्रजनात्तु लेभिरे ॥८.५०
इस तरह उस महात्मा का अनेक देवों से युक्त अद्भुत प्रयाण सुनकर वे स्त्रियाँ विस्मित हुईं, जैसे उनका
शोक नष्ट हो गया हो; किन्तु उसके प्रव्रज्या ग्रहण करने से उन्हें मानसिक ताप हुआ ॥50 ॥
विषादपारिप्लवलोचना ततः प्रनष्टपोता कुररीव दुःखिता ।
विहाय धैर्यं विरराव गौतमी तताम चैवाश्रुमुखी जगाद च ॥८.५१
तब विषाद से चंचल आँखोंवाली गौतमी, उस कुररी के समान जिसके बच्चे खो गये हों, दुःखी और अधीर
होकर रोईं। वह मूर्च्छित हुईं और रोती हुई बोली:- ॥51 ॥
महॉर्मिमन्तौ मृदवोऽसिताः शुभाः पृथक्पृथक्स्थूलरुहाः समुद्गताः ।
प्रवेरितास्ते भुवि तस्य मूर्धजा नरेन्द्रमौलिपरिवेष्टनक्षमाः ॥८.५२
“क्या उसके वे अत्यन्त तरङ्गित कोमल काले और मङ्गलमय केश, जो पृथक्-पृथक् मूल से उत्पन्न होकर
ऊपर उठे थे और जो राजमुकुट के परिवेष्टन के योग्य थे, पृथिवी पर गिराये गये? ॥52 ॥
प्रलम्बबाहुर्मृगराजविक्रमो महर्षभाक्षः कनकोज्ज्वलद्युतिः ।
विशालवक्षा घनदुन्दुभिस्वनस्तथाविधोऽप्याश्रमवासमर्हति ॥८.५३
उसकी भुजाएँ लम्बी हैं, मृगराज की-सी गति है, महा वृषभ की-सी आँखें हैं। सोने की-सी उज्जवल द्युति
है, वक्षःस्थल विशाल है, मेघरूपी दुन्दुभी की-सी ध्वनि है; क्या ऐसा (कुमार) भी आश्रम-वास के योग्य
है? ॥53 ॥
अभागिनी नूनमियं वसुन्धरा तमार्ककर्माणमनुत्तमं पतिम् ।
गतस्ततोऽसौ गुणवान् हि तादृशो नृपः प्रजाभाग्यगुणैः प्रसूयते ॥८.५४
निश्चय ही वह आर्यकर्मा अद्वितीय पति इस वसुन्धरा के भाग्य में नहीं है, इसीलिए तो वह चला गया।
ऐसा गुणवान् राजा प्रजा के सौभाग्य से ही जन्म लेता है ॥54 ॥
सुजातजालावतताङ्गुली मृदू निगूढगुल्फौ बिषपुष्पकोमलौ ।
वनान्तभूमिं कठिनां कथं नु तौ सचक्रमध्यौ चरणौ गमिष्यतः ॥८.५५
वे मृदु चरण-जिनकी अङ्गुलियों पर सुन्दर (रेखा-) जाल बिछा हुआ है, जिनकी पाद-ग्रन्थियाँ छिपी हुई
हैं, जो कमल-तन्तु या फूल के समान कोमल हैं, जिनके मध्य भाग में चक्र हैं-वन की कठिन भूमि पर
कैसे चलेंगे? ॥55 ॥
44 अश्वघोष
विमानपृष्ठे शयनासनोचितं महार्हवस्त्रागुरुचन्दनाचितम् ।
कथं नु शीतोष्णजलागमेषु तच्छरीरमोजस्वि वने भविष्यति ॥८.५६
महल की छतपर के शयन और आसन से परिचित वह ओजस्वी शरीर, जो बहुमूल्य वस्त्र, अगुरु और
चन्दन से पूजित (=अलङ्कृत) हुआ है, जाड़े गर्मी व वर्षा में वन में कैसे रहेगा? ॥५६ ॥
कुलेन सत्त्वेन बलेन वर्चसा श्रुतेन लक्ष्म्या वयसा च गर्वितः ।
प्रदातुमेवाभ्युचितो न याचितुं कथं स भिक्षां परतश्चरिष्यति ॥८.५७
कुल, सत्त्व, बल, रूप, विद्या, लक्ष्मी और वयस (=यौवन) से गौरवान्वित के लिए देना ही उचित है न
कि माँगना; कैसे वह दूसरों से भिक्षा माँगेगा? ॥५७ ॥
शुचौ शयित्वा शयने हिरण्मये प्रबोध्यमानो निशि तूर्यनिस्वनैः ।
कथं बत स्वप्स्यति सोऽद्य मे व्रती पटैकदेशान्तरिते महीतले ॥८.५८
वह सोने की पवित्र शय्यापर सोता था और रात के अन्त में तूर्य की ध्वनि से जगाया जाता था; मेरा वह
व्रती कपड़े के एक छोर से ढकी धरती पर आज कैसे सोयेगा?'' ॥५८ ॥
इमं प्रलापं करुणं निशम्य ता भुजैः परिष्वज्य परस्परं स्त्रियः ।
विलोचनेभ्यः सलिलानि तत्यजुर्मधूनि पुष्पेभ्य इवेरिता लताः ॥८.५९
यह करुण प्रलाप सुनकर, उन स्त्रियों ने भुजाओं से एक दूसरे का आलिङ्गन कर आँखों से आँसू बहाये,
जैसे कम्पित लताएँ (अपने) फूलों से मधु (बहायें) ॥५९ ॥
ततो धरायामपतद्यशोधरा विचक्रवाकेव रथाङ्गसाह्वया ।
शनैश्च तत्तद्विललाप विक्लवा मुहुर्मुहुर्गद्गदरुद्धया गिरा ॥८.६०
तब चक्रवाक से वियुक्त चक्रवाकी के समान यशोधरा धरती पर गिरी और विकल होकर बाष्प से बार-
बार रुकती वाणी में धीरे-धीरे भाँति-भाँति से विलाप किया:- ॥६० ॥
स मामनाथां सहधर्मचारिणीमपास्य धर्मं यदि कर्तुमिच्छति ।
कुतोऽस्य धर्मः सहधर्मचारिणीं विना तपो यः परिभोक्तुमिच्छति ॥८.६१
“मुझ अनाथा सहधर्मचारिणी को छोड़कर यदि वह धर्म करना चाहते हैं, तो कहाँ से इन्हें धर्म होगा जो
सहधर्मचारिणी के बिना ही तपस्या करना चाहते हैं? ॥६१ ॥
शृणोति नूनं स न पूर्वपार्थिवान्महासुदर्शप्रभृतीन् पितामहान् ।
वनानि पत्नीसहितानुपेयुषस्तथा हि धर्मं महते चिकीर्षति ॥८.६२
अवश्य ही उन्होंने प्राचीन राजाओं, महासुदर्श-आदि अपने पितामहों, के बारे में नही सुना है, जो पत्नी-
सहित वन गये थे; क्योंकि वह मेरे बिना इसी प्रकार धर्म करना चाहते हैं ॥६२ ॥
मखेषु वा वेदविधानसंस्कृतौ न दम्पती पश्यति दीक्षितावुभौ ।
समं बुभुक्षू परतोऽपि तत्फलं ततोऽस्य जातो मयि धर्मत्सरः ॥८.६३
या यज्ञों में वेद-विधान के अनुसार संस्कृत या दीक्षित उभय दम्पती को नहीं देख रहे हैं, जो परलोक में
भी यज्ञ-फल का साथ ही उपभोग करना चाहते हैं; अतः मेरे धर्म से इन्हें द्वेष हो गया है ॥६३ ॥
ध्रुवं स जानन्मम धर्मवल्लभो मनः प्रियेर्ष्याकलहं मुहुर्मिथः ।
सुखं बिभीर्मामपहाय रोषणां महेन्द्रलोकेऽप्सरसो जिघृक्षति ॥८.६४
निश्चय ही वह धर्म-वल्लभ मेरे मन को एकान्त में बार-बार ईर्ष्यालु और कलह-प्रिय जानकर सुख (न होने
के) डर से मुझ कोपशीला को छोड़कर इन्द्र-लोक में अप्सराओं को पाना चाहते हैं ॥६४ ॥
इयं तु चिन्ता मम कीदृशं नु ता वपुर्गुणं बिभ्रति तत्र योषितः ।
वने यदर्थं स तपांसि तप्यते श्रियं च हित्वा मम भक्तिमेव च ॥८.६५
मेरी यह चिन्ता है कि वहाँ वह स्त्रियाँ कैसा उत्तम रूप धारण करती हैं, जिसके लिए लक्ष्मी और मेरी
भक्ति को छोड़कर, वह वन में तप कर रहे हैं ॥६५ ॥
न खल्वियं स्वर्गसुखाय मे स्पृहा न तज्जनस्यात्मवतोऽपि दुर्लभम् ।
स तु प्रियो मामिह वा परत्र वा कथं न जह्यादिति मे मनोरथः ॥८.६६
निश्चय ही स्वर्ग-सुख के लिए मेरी यह इच्छा नहीं है, वह सुख आत्मवान् व्यक्ति (संयतात्मा के) लिए
दुर्लभ नही, किन्तु वह प्रिय इस लोक या परलोक में मुझे कैसे न छोड़ें, यही मेरा मनोरथ है ॥६६ ॥
अभागिनी यद्यहमायतेक्षणं शुचिस्मितं भर्तुरुदीक्षितुं मुखम् ।
न मन्दभाग्योऽर्हति राहुलोऽप्ययं कदाचिदङ्के परिवर्तितुं पितुः ॥८.६७
यदि लम्बी आँखोंवाले पवित्र मुसकानवाले स्वामि-मुख को देखना मेरे भाग में नहीं है, तो क्या मन्दभाग्य
यह राहुल भी पिता को गोद में कदाचित् लोटने योग्य नही? ॥६७ ॥
अहो नृशंसं सुकुमारवर्चसः सुदारुणं तस्य मनस्विनो मनः ।
कलप्रलापं द्विषतोऽपि हर्षणं शिशुं सुतं यस्त्यजतीदृशं बतः ॥८.६८
अहो! सुकुमार रूपवाले उस मनस्वी का मन कठोर और अतिदारुण है, जो शत्रुओं को भी हरसानेवाले
तुतलाये हुए ऐसे बाल-सुत को छोड़ रहे हैं ॥६८ ॥
ममापि कामं हृदयं सुदारुणं शिलामयं वाप्ययसोपि वा कृतम् ।
अनाथवच्छ्रीरहिते सुखोचिते वनं गते भर्तरि यन्न दीर्यते ॥८.६९
मेरा भी हृदय अतिदारुण है, पत्थर का बना है या लोहे का भी, जो, सुख से परिचित स्वामी के श्री रहित
होकर अनाथ के समान वन जानेपर, विदीर्ण नही हो रहा है" ॥६९ ॥
इतीह देवी पतिशोकमूर्च्छिता रुरोद दध्यौ विललाप चासकृत् ।
स्वभावधीरापि हि सा सती शुचा धृतिं न सस्मार चकार नो ह्रियम् ॥८.७०
इस तरह पति के शोक से मूर्छित होकर, देवी रोई, चिन्तित हुई, और बार-बार विलाप किया। स्वभाव से
धीर होनेपर भी शोक के कारण वह धैर्य भूल गई और लाज नहीं की ॥७० ॥
बुद्धचरित 45
२. चतुर्थ-षष्ठ सर्ग: स्त्री-विघात, अभिनिष्क्रमण (महात्याग) एवं छन्दक-निवर्तन
ततस्तथा शोकविलापविह्वलां यशोधरां प्रेक्ष्य वसुन्धरांगताम्।
महारविन्दैरिव वृष्टिताडितैर्मुखैः सबाष्पैर्व्रनिता विचक्रुशुः ॥८.७१
तब उस प्रकार शोक व विलाप से विह्वल यशोधरा को वसुन्धरा पर आई देखकर, वृष्टि-ताड़ित बड़े-बड़े
कमलों के समान साश्रु मुखों से वनिताओं ने क्रदन किया ॥71 ॥
समाप्तजाप्यः कृतहोममङ्गलो नृपस्तु देवायतनाद्विनिर्ययौ।
जनस्य तेनार्तरवेण चाहतश्चचाल वज्रध्वनिनेव वारणः ॥८.७२
जप समाप्त कर, मङ्गलमय हवन-कर्म करके, राजा देव-मन्दिर से बाहर आया और लोगों की उस आर्त
ध्वनि से आहत होकर वैसे ही काँप उठा, जैसे वज्र के शब्द से हाथी ॥72 ॥
निशम्य च च्छन्दकन्थकावुभौ सुतस्य संश्रुत्य च निश्चयं स्थिरम्।
पपात शोकाभिहतो महीपतिः शचीपतेर्वृत्त इवोत्सवे ध्वजः ॥८.७३
छन्दक व कन्थक दोनों को देखकर और पुत्र का दृढ़ निश्चय सुनकर, शोक से अभिभूत हो, राजा वैसे ही
गिर पड़ा, जैसे उत्सव समाप्त होनेपर इन्द्र की ध्वजा ॥73 ॥
ततो मुहूर्तं सुतशोकमोहितो जनेन तुल्याभिजनेन धारितः।
निरीक्ष्य दृष्ट्या जलपूर्णया हयं महीतलस्थो विललाप पार्थिवः ॥८.७४
तब मुहूर्तभर पुत्र के शोक से वह मूर्च्छित रहा, तुल्य कुल के लोगों ने उसे धारण; जलपूर्ण दृष्टि से घोड़े
को देखकर, पृथिवी पर पड़े हुए राजा ने विलाप किया:— ॥74 ॥
बहूनि कृत्वा समरे प्रियाणि मे महत्त्वया कन्थक विप्रियं कृतम्।
गुणप्रियो येन वने स मे प्रियः प्रियोऽपि सन्नप्रियवत्प्रवेरितः ॥८.७५
“युद्ध में मेरे बहुतेरे प्रिय (काम) करके, हे कन्थक, तुमने यह बड़ा अप्रिय (कर्म) किया, मेरे उस गुण-प्रिय
पुत्र को प्रिय होनेपर भी अप्रिय के समान वन में फेंक दिया ॥75 ॥
तदद्य मां वा नय तत्र यत्र स व्रज द्रुतं वा पुनरेनमानय।
ऋते हि तस्मान्मम नास्ति जीवितं विगाढरोगस्य सदौषधादिव ॥८.७६
अतः आज मुझे वहाँ ले चलो जहाँ वह है; या जल्दी जाओ, फिर उसे ले आओ क्योंकि उसके बिना मैं
जीवित नही रहूँगा, जैसे अच्छी ओषधी के बिना रोग-ग्रस्त व्यक्ति (जीवित नही रह सकता) ॥76 ॥
सुवर्णनिष्ठीविनि मृत्युना हते सुदुष्करं यन्न ममार सञ्जयः।
अहं पुनर्धर्मरतौ सुते गते मुमुक्षुरात्मानमनात्मवानिव ॥८.७७
सुवर्णनिष्ठीवी का मृत्यु द्वारा हरण होनेपर सञ्जय (=सृञ्जय) नही मरा, यह अति दुष्कर हुआ; किन्तु मैं,
धर्म-रत पुत्र के चले जानेपर, असंयतात्मा के समान आत्मा (=प्राण) छोड़ने की इच्छा कर रहा
हूँ ॥77 ॥
विभोर्दशक्षत्रकृतः प्रजापतेः परापरज्ञस्य विवस्वदात्मनः।
प्रियेण पुत्रेण सता विनाकृतं कथं न मुह्येद्धि मनो मनोरपि ॥८.७८
दस राज्यों के स्रष्टा, प्रभु, प्रजापति, पर व अपर को जाननेवाले, विवस्वान् के पुत्र, मनु का भी मन, अच्छे
प्रिय पुत्र से वियुक्त होकर, कैसे मूर्छित न हो? ॥78 ॥
अजस्य राज्ञस्तनयाय धीमते नराधिपायेन्द्रसखाय मे स्पृहा।
गते वनं यस्तनये दिवं गतो न मोघबाष्पः कृपणं जिजीव ह ॥८.७९
राजा अज के बुद्धिमान पुत्र, इन्द्र के मित्र, नराधिप (दशरथ) से मुझे ईर्ष्या है जो पुत्र के वन जानेपर स्वर्ग
चले गये, व्यर्थ आँसू बहाते हुए दीन होकर जीवित नही रहे ॥79 ॥
प्रचक्ष्व मे भद्र तदाश्रमाजिरं हतस्त्वया यत्र स मे जलाञ्जलिः।
इमे परीप्सन्ति हि तं पिपासवो ममासवः प्रेतगतिं यियासवः ॥८.८०
हे भद्र, मुझे वह आश्रम-स्थान बताओ जहाँ तुम मेरी उस जलाञ्जलि (=जलाञ्जलि देनेवाले) को ले गये
हो; क्योंकि प्रेत गति को जाने की (=मरने की) इच्छा करनेवाले मेरे ये प्यासे प्राण उसे पाना चाहते
हैं।” ॥80 ॥
इति तनयवियोगजातदुःखं क्षितिसदृशं सहजं विहाय धैर्यम्।
दशरथ इव रामशोकवश्यो बहु विललाप नृपो विसञ्ज्ञकल्पः ॥८.८१
इस तरह पुत्र के वियोग से दुःखी होकर धरती की-सी स्वाभाविक धीरता को छोड़कर, राम के शोक से
परतन्त्र दशरथ के समान, राजा ने मानो अचेत होकर बहुत विलाप किया ॥81 ॥
श्रुतविनयगुणान्वितस्तस्तं मतिसचिवः प्रवयाः पुरोहितश्च।
समधृतमिदमूचतुर्यथावन्न च परितप्तमुखौ न चाप्यशोकौ ॥८.८२
तब विद्या, विनय व गुण से युक्त मन्त्री तथा प्रौढ़ पुरोहित ने, न संतप्त मुख होकर और न शोक-रहित
होकर, तुल्य जन से धारण किये गये राजा को ठीक-ठीक यों कहा:— ॥82 ॥
त्यज नरवर शोकमोहि धैर्यं बुधृतिरिर्वाहसि धीर नाश्रु मोक्तुम्।
स्रजमिव मृदितामपास्य लक्ष्मीं भुवि बहवो नृपा वनान्यतीयुः ॥८.८३
“हे नर-श्रेष्ठ शोक छोड़िए, धैर्य धारण कीजिए। हे धीर, अधीर के समान आपको आँसू न बहाना चाहिए।
रौंदी गई माला के समान लक्ष्मी को छोड़कर (इस) पृथ्वी पर बहुत से राजा वन चले गये ॥83 ॥
अपि च नियत एष तस्य भावः स्मर वचनं तपसः पुरासितस्य।
न हि स दिवि न चक्रवर्तिराज्ये क्षणमपि वासयितुं सुखेन शक्यः ॥८.८४
और भी, उसका यह भाव तो नियत ही था; पूर्व के असित ऋषि का वह वचन स्मरण कीजिए। न स्वर्ग
में, न चक्रवर्ति-राज्य में क्षणभर के लिए भी वह सुख से रखा जा सकता है ॥84 ॥
यदि तु नृवर कार्य एव यत्नस्त्वरितमुदाहर यावदत्र यावः।
बहुविधिमिह युद्धमस्तु तावत्तव तनयस्य विधेश्च तस्य तस्य ॥८.८५
हे नर-श्रेष्ठ, यदि यत्न करना ही है, तो तुरन्त कहिए, और हम वहाँ जायें। तब आपके पुत्र के और तरह-
तरह के उपाय के बीच भाँति-भाँति का युद्ध हो” ॥85 ॥
46 अश्वघोष
Here is the line-by-line transcription of the text from the image into clean Markdown in Unicode Devanagari:
**** नरपतिरथ तौ शशास तस्माद्द्रुतमित एव युवामभिप्रयातम् ।
**** न हि मम हृदयं प्रयाति शान्तिं वनशकुनेरिव पुत्रलालसस्य ॥८.८६
**** इसलिए तब राजा ने उन्हें आज्ञा दी— "यहाँ से आप दोनों शीघ्र चले जायें। क्योंकि, मेरा हृदय, पुत्र के
**** लिए उत्सुक वन-पक्षी के हृदय के समान, शान्ति नहीं पा रहा है" ॥८६॥
**** परममिति नरेन्द्रशासनात्तौ ययतुर्मात्यपुरोहितौ वनं तत् ।
**** कृतमिति सवधूजनः सदारो नृपतिरपि प्रचकार शेषकार्यम् ॥८.८७
**** “अच्छा” कहकर राजा की आज्ञा से मन्त्री और पुरोहित दोनों ही उस वन को चले गये। “अच्छा ही
**** किया गया”, ऐसा समझकर (पुत्र-) वधुओं और पत्नियों के साथ राजा ने भी शेष कार्य किया ॥८७॥
**** इति बुद्धचरिते महाकाव्येऽन्तःपुरविलापो नामाष्टमः सर्गः ॥८॥
**** नवम सर्ग
**** कुमार-अन्वेषण
**** ततस्तदा मन्त्रिपुरोहितौ तौ बाष्पप्रतोदामिहतौ नृपेण ।
**** विद्धौ सदश्वाविव सर्वयत्नात्सौहार्दशीघ्रं ययतुर्वनं तत् ॥९.१
**** तब उस समय मन्त्री और पुरोहित दोनों, राजा के द्वारा अश्रुरूप अङ्कुश से आहत होकर, विद्ध हुए अच्छे
**** घोड़े के समान समस्त यत्न से, सौहार्द के कारण वेग से उस वन को चले ॥१॥
**** तमाश्रमं जातपरिश्रमौ तावुपैत्य काले सदशानुयात्रौ ।
**** राजर्द्धिमत्सृज्य विनीतचेष्टावुपैयतुर्भार्गवधिष्ण्यमेव ॥९.२
**** समय पर योग्य अनुयायियों के साथ उस आश्रम के पास वे थके हुए पहुँचे। राज-ऋद्धि को छोड़, विनीत-
**** चेष्ट हो, वे भार्गव के स्थान पर गये ॥२॥
**** तौ न्यायतस्तं प्रतिपूज्य विप्रं तेनार्चितौ तावपि चानुरूपम् ।
**** कृतासनौ भार्गवमासनस्थं छित्त्वा कथामूचतुरात्मकृत्यम् ॥९.३
**** उन दोनों ने उस विप्र की उचित पूजा की और उसने उन दोनों की भी योग्य पूजा की। आसन ग्रहण
**** कर, दोनों ने आसनपर स्थित भार्गव से कथा काटकर (= सङ्क्षिप्त कर) अपना काम कहा:- ॥३॥
**** शुद्धौजसः शुद्धविशालकीर्तेरिक्ष्वाकुवंशप्रभवस्य राज्ञः ।
**** इमं जनं वेत्तु भवानधीतं श्रुतग्रहे मन्त्रपरिग्रहे च ॥९.४
**** “शुद्ध ओजवाले, शुद्ध व विशाल कीर्तिवाले, इक्ष्वाकु-वंश-प्रसूत राजा के इस व्यक्ति को (= हम दोनों
**** को) आप शास्त्र और मन्त्रणा में निपुण (= पुरोहित और मन्त्री) जानें ॥४॥
**** तस्येन्द्रकल्पस्य जयन्तकल्पः पुत्रो जरामृत्युभयं तितीर्षुः ।
**** इहाभ्युपेतः किल तस्य हेतोरावामुपेतौ भगवानवैतु ॥९.५
**** उस इन्द्र-तुल्य का जयन्त-तुल्य पुत्र जरा और मृत्यु का भय पार करने की इच्छा से यहाँ आया है, इस
**** हेतु हम दोनों आये हैं, ऐसा भगवान् जानें” ॥५॥
**** तौ सोऽब्रवीदस्ति स दीर्घबाहुः प्राप्तः कुमारो न तु नावबुद्धः ।
**** धर्मोऽयमावर्तक इत्यवेत्य यातस्त्वराडाभिमुखो मुमुक्षुः ॥९.६
**** उसने उन दोनों से कहा— “वह दीर्घबाहु आया था, कुमार है, किन्तु बुद्धिहीन नहीं। यह धर्म आवर्तक
**** (= भ्रामक) है, ऐसा जानकर वह मुमुक्षु अराड के (आश्रम की) ओर चला गया” ॥६॥
**** तस्मात्तस्ताबुपलभ्य तत्त्वं तं विप्रमामन्त्र्य तदैव सद्यः ।
**** खिन्नावखिन्नाविव राजभक्त्या प्रसस्रतुस्तेन यतः स यात: ॥९.७
**** तब उससे वे दोनों सच्ची बात जानकर, उस विप्र से उसी समय तुरत विदा लेकर, उस ओर चल पड़े
**** जिधर वह गया था, खिन्न होकर भी राज-भक्ति के कारण वे मानो अ-खिन्न थे ॥७॥
**** यान्तौ ततस्तौ मृजया विहीनमपश्यतां तं वपुषोज्वलन्तम् ।
**** उपोपविष्टं पथि वृक्षमूले सूर्यं घनाभोगमिव प्रविष्टम् ॥९.८
**** तब जाते हुए उन दोनों ने मार्जन-विहीन, किन्तु रूप से जलते कुमार को देखा; रास्ते पर वृक्ष की जड़ में
**** वह बैठा हुआ था, जैसे बादलों के फैलाव में सूर्य घुसा हुआ हो ॥८॥
**** यानं विहायाथोपयौ ततस्तं पुरोहितो मन्त्रधरेण सार्धम् ।
**** यथा वनस्थं सहवामदेवो रामं दिदृक्षुर्मुनि रौर्वशेयः ॥९.९
**** तब रथ छोड़कर मन्त्री के साथ पुरोहित उसके समीप गया, जैसे वन में स्थित राम के समीप वामदेव के
**** साथ दर्शनाभिलाषी और्वशेय मुनि (= वशिष्ठ) गया था ॥९॥
**** तावर्चयामासतुरर्हतस्तं दिवीव शुक्राङ्गिरसौ महेन्द्रम् ।
**** प्रत्यर्चयामास स चार्जतस्तौ दिवीव शुक्राङ्गिरसौ महेन्द्रः ॥९.१०
**** उन दोनों ने उसकी उचित पूजा की, जैसे स्वर्ग में शुक्र और आङ्गिरस (= बृहस्पति) ने इन्द्र की (पूजा की
**** थी) और उसने उन दोनों की उचित पूजा की, जैसे स्वर्ग में इन्द्र ने शुक्र और आङ्गिरस की (पूजा की
**** थी) ॥१०॥
**** कृताभ्यनुज्ञावभितस्तस्तौ निषेदतुः शाक्यकुलध्वजस्य ।
**** विरेजतुस्तस्य च सन्निकर्षे पुनर्वसू योगगताविवेन्दोः ॥९.११
**** आज्ञा पाकर, शाक्य-कुल की पताका (सिद्धार्थ) की दोनों ओर वे दोनों बैठ गये और उसके समीप ऐसे
**** विराजे जैसे चन्द्रमा के समीप योग को प्राप्त पुनर्वसु-युगल ॥११॥
**** तं वृक्षमूलस्थमभिज्वलन्तं पुरोहितो राजसुतं बभाषे ।
**** यथोपविष्टं दिवि पारिजाते बृहस्पतिः शक्रसुतं जयन्तम् ॥९.१२
**** वृक्ष-मूल में स्थित उस जलते हुए राज-पुत्र से पुरोहित ने कहा, जैसे स्वर्ग में परिजात वृक्ष के नीचे बैठे
**** हुए शक्र-पुत्र जयन्त से बृहस्पति (कह रहा हो):- ॥१२॥
**** बुद्धचरित 47
त्वच्छोकशल्ये हृदयावगाढे मोहं गतो भूमितले मुहूर्तम्।
कुमार राजा नयनाम्बुवर्षो यत्वामवोचत्तदिदं निबोध ॥९.१३
"तुम्हारा शोकरूप शल्य हृदय में गड़नेपर, भूतल पर मुहूर्त भर मूर्छित होकर, हे कुमार, राजा ने नयन-
जल बरसाते हुए, तुम्हें जो कहा है वह यह है, सुनो:- ॥13 ॥
जानामि धर्मं प्रति निश्चयं ते परैमि ते भाविनमेतमर्थम् ।
अहं त्वकाले वनसंश्रयात्ते शोकाग्निनाग्निप्रतिमेन दह्ये ॥९.१४
"धर्म के प्रति तुम्हारा निश्चय जानता हूँ, समझता हूँ कि यह तुम्हारा भावी लक्ष्य है, किन्तु असमय में तुम
वन का आश्रय ले रहे हो, अतः अग्नि-तुल्य शोकाग्नि से मैं जल रहा हूँ॥14 ॥
तदेहि धर्मप्रिय मत्प्रियार्थं धर्मार्थमेव त्यज बुद्धिमेताम् ।
अयं हि मा शोकरयः प्रवृद्धो नदीरयः कूलमिवाभिहन्ति ॥९.१५
इसलिए, हे धर्मप्रिय, मेरा प्रिय करने के लिए आओ, धर्म के लिए ही इस बुद्धि को छोड़ो। यह बढ़ा हुआ
शोक का वेग मुझे वैसे ही मार रहा है, जैसे बढ़ा हुआ नदी का वेग किनारे को (काटता है) ॥15 ॥
मेघाम्बुकक्षाद्रिषु या हि वृत्तिः समीरणार्काग्निमहाशनीनाम् ।
तां वृत्तिमस्मासु करोति शोको विकर्षणोच्छोषणदाहभेदैः ॥९.१६
मेघ, जल, तृण व पर्वत के प्रति (क्रमशः) पवन, सूर्य अग्नि व महा-वज्र का जो काम होता है, विकर्षण,
शोषण, दाह व भेदन द्वारा वही काम हमारे प्रति शोक कर रहा है ॥16 ॥⁴¹
तद्भुङ्क्ष्व तावद्वसुधाधिपत्यं काले वनं यास्यसि शास्त्रदृष्टे ।
अनिष्ठबन्धौ कुरु मय्यपेक्षां सर्वेषु भूतेषु दया हि धर्मः ॥९.१७
इसलिए तबतक वसुधा के आधिपत्य का भोग करो, शास्त्र-सम्मत समय पर वन जाओगे। मुझ अवांछित
पिता की आकाङ्क्षा करो, क्योंकि सब भूतों पर दया (करना ही तो) धर्म है ॥17 ॥
न चैष धर्मो वन एव सिद्धः पुरेऽपि सिद्धिर्नियता यतीनाम् ।
बुद्धिश्च यत्नश्च निमित्तमत्र वनं च लिङ्गं च हि भीरुचिह्नम् ॥९.१८
और, यह धर्म (केवल) वन में ही सिद्ध नहीं होता, नगर में भी यतियों (= संयमियों) की सिद्धि नियत है।
इसमें बुद्धि और यत्न निमित्त हैं, वन और (भिक्षु-) वेष तो कायर के चिह्न हैं ॥18 ॥
मौलीधरैरंसविषक्तहारैः केयूरविष्टब्धभुजैर्नरेन्द्रैः ।
लक्ष्म्यङ्कमध्ये परिवर्तमानैः प्राप्तो गृहस्थैरपि मोक्षधर्मः ॥९.१९
मुकुट धारण करनेवाले राजाओं ने, जिनके गले में हार लटकते थे और जिनकी भुजाएँ केयूरों से बँधी थीं,
गृहस्थ होकर भी (= घर में रहकर भी) लक्ष्मी की गोद में लोटते हुए मोक्ष-धर्म प्राप्त किया ॥19 ॥
⁴¹_ देखिये, सौ० सत्रह 59 ।
48 अश्वघोष
ध्रुवानुजौ यौ बलिवज्रबाहू वैभ्राजमाषाढमथान्तिदेवम् ।
विदेहराजं जनकं तथैव (रामं) द्रुमं सेनजितश्च राज्ञः ॥९.२०
ध्रुव के जो दो छोटे भाई बलि और वज्रबाहु, वैभ्राज, आषाढ़ और अन्तिदेव, विदेह-राज जनक, राम द्रुम
और सेनजित् राजागण ॥20 ॥
एतान् गृहस्थान्नृपतीनवेहि नैःश्रेयसे धर्मविधौ विनीतान् ।
उभौऽपि तस्माद्युगपद्भजस्व चित्ताधिपत्यं च नृपश्रियं च ॥९.२१
विदित हो कि ये गृहस्थ राजा परम कल्याण-कारी धर्म-विधि में शिक्षित थे। इसलिए एक ही साथ ज्ञान
के आधिपत्य व राज्यलक्ष्मी दोनों का सेवन करो ॥21 ॥
इच्छामि हि त्वामुपगूह्य गाढं कृताभिषेकं सलिलार्द्रमेव ।
धृतातपत्रं समुदीक्ष्यमाणस्तेनैव हर्षेण वनं प्रवेष्टुम् ॥९.२२
मैं चाहता हूँ कि अभिषेक करनेपर जल से आर्द्र रहनेपर ही तुम्हारा गाढ़ आलिङ्गन कर, छत्र के नीचे तुम्हें
देखता हुआ उसी आनन्द से वन में प्रवेश करूँ" ॥22 ॥
इत्यब्रवीद्भूमिपतिर्भवन्तं वाक्येन बाष्पग्रथिताक्षरेण ।
श्रुत्वा भवानर्हति तत्प्रियार्थं स्नेहेन तत्स्नेहमनुप्रयातुम् ॥९.२३
राजा ने आपको ऐसा कहा; उसके वाक्य के अक्षर बाष्प से ग्रथित थे। यह सुनकर उसका प्रिय करने के
लिए आपको स्नेहपूर्वक उसके स्नेह का अनुसरण करना चाहिए ॥23 ॥
शोकाम्भसि त्वत्प्रभवे ह्यगाधे दुःखार्णवे मज्जति शाक्यराजः ।
तस्मात्तमुत्तारय नाथहीनं निराश्रयं मग्नमिवार्णवे नौः ॥९.२४
तुमसे उत्पन्न अगाध दुःख सागर में, जिसका जल शोक है, शाक्यराज डूब रहा है। उससे उस नाथ-हीन
को उबारो, जैसे सागर में डूबते निराश्रय (व्यक्ति) को नाव (उबारती) है ॥24 ॥
भीष्मेण गङ्गोदरसम्भवेन रामेण रामेण च भार्गवेण ।
श्रुत्वा कृतं कर्म पितुः प्रियार्थं पितुस्त्वमप्यर्हसि कर्तुमिष्टम् ॥९.२५
गङ्गा के उदर से उत्पन्न भीष्म ने, राम ने, और भार्गव राम ने, पिता के प्रिय के लिए काम किया, यह
सुनकर तुम्हें भी पिता का प्रिय करना चाहिए ॥25 ॥
संवर्धयित्रीं समवेहि देवीमगस्त्यजुष्टां दिशमप्रयाताम् ।
प्रनष्टवत्सामिव वत्सलां गामजस्रमार्तां करुणं रुदन्तीम् ॥९.२६
विदित हो कि तुम्हारा संवर्धन करनेवाली देवी, (गौतमी) जो (अबतक) अगस्त्य से सेवित दिशा को नहीं
गई है (= नहीं मरी है), उस वत्सल गाय के समान, जिसका बछड़ा नष्ट हो गया हो, आर्त और करुण
होकर निरन्तर रो रही है ॥26 ॥
हंसेन हंसीमिव विप्रयुक्तां त्यक्तां गजेनेव वने करेणुम् ।
आर्त्तां सनाथामपि नाथहीनां त्रातुं वधूमर्हसि दर्शनेन ॥९.२७
हंस से वियुक्त हंसी के समान, हाथी से वन में परित्यक्त हथिनी के समान, आर्त पत्नी को, जो सनाथा
होनेपर भी अनाथा है, तुम्हें दर्शन देकर बचाना चाहिए ॥२7 ॥
एकं सुतं बालमनर्हदुःखं सन्तापमन्तर्गतमुद्वहन्तम् ।
तं राहुलं मोक्षय बन्धुशोकाद्ग्राहूपसर्गादिव पूर्णचन्द्रम् ॥९.२८
एकमात्र बाल-पुत्र, जो दुःख के योग्य नही है, भीतरी सन्ताप वहन कर रहा है। उस राहुल को पितृ-शोक
से मुक्त करो, जैसे राहु के ग्रहण से पूर्ण चन्द्र को (मुक्त किया जाय) ॥२8 ॥
शोकाग्निना त्वद्विरहेन्धनेन निःश्वासधूमेन तमःशिखेन।
त्वद्दर्शनाम्ब्विच्छति दह्यमानमन्तःपुरं चैव पुरं च कृत्स्नम् ॥९.२९
शोकरूप अग्नि से, जिसका ईंधन तुम्हारा विरह है, जिसका धुआँ लम्बी साँसें हैं, जिसकी शिखा अन्धकार
है, जलता हुआ अन्तःपुर और सम्पूर्ण नगर तुम्हारे दर्शन-जल की इच्छा कर रहे हैं।" ॥२9 ॥
स बोधिसत्त्वः परिपूर्णसत्त्वः श्रुत्वा वचस्तस्य पुरोहितस्य ।
ध्यात्वा मुहूर्तं गुणवद्गुणज्ञः प्रत्युत्तरं प्रश्रितमित्युवाच ॥९.३०
उस पुरोहित का वचन सुनकर धैर्यशाली, गुणवान् व गुणज्ञ बोधिसत्त्व ने मुहूर्त भर ध्यान किया और
विनय-युक्त यह उत्तर दियाः— ॥30 ॥
अवैमि भावं तनये पितॄणां विशेषतो यो मयि भूमिपस्य ।
जानन्नपि व्याधिजराविपद्भ्यो भीतस्त्वगत्या स्वजनं त्यजामि ॥९.३१
“पुत्र के प्रति पिता का भाव जानता हूँ, विशेषकर मेरे प्रति राजा का जो (भाव) है; यह जानता हुआ भी
मैं रोग, बुढ़ापे व मौत से डरकर, (अन्य) उपाय के अभाव में स्वजन को छोड़ रहा हूँ ॥31 ॥
द्रष्टुं प्रियं कः स्वजनं हि नेच्छेन्नान्ते यदि स्यात्प्रियविप्रयोगः ।
यदा तु भूत्वापि चिरं वियोगस्ततो गुरुं स्निग्धमपि त्यजामि ॥९.३२
यदि अन्त में वियोग न हो, तो प्यारे स्वजन को देखना कौन नही चाहेगा? जब कि देर होकर भी वियोग
होता ही है, इसलिए स्नेही पिता को भी छोड़ रहा हूँ ॥32 ॥
मद्धेतुकं यत्तु नराधिपस्य शोकं भवानह न तत्प्रियं मे ।
यत्स्वप्नभूतेषु समागमेषु सन्तप्यते भाविनि विप्रयोगे ॥९.३३
मेरे कारण हुआ राजा का शोक आपने जो कहा वह मुझे प्रिय नही; क्योंकि समागम स्वप्न-सदृश होनेपर
और वियोग अवश्यम्भावी होनेपर वह सन्ताप कर रहे हैं ॥33 ॥
एवं च ते निश्चयमेतु बुद्धिर्दृष्ट्वा विचित्रं जगतः प्रचारम् ।
सन्तापहेतुर्न सुतो न बन्धुरज्ञाननैमित्तिक एष तापः ॥९.३४
जगत् की विचित्र गति देखकर, आपकी बुद्धि इस प्रकार निश्चय करे—सन्ताप का कारण न पुत्र है न
पिता, इस सन्ताप का कारण निमित्त अज्ञान है ॥34 ॥
यथाध्वगानामिहं सङ्गतानां काले वियोगो नियतः प्रजानाम् ।
प्राज्ञो जनः को नु भजेत शोकं बन्धुप्रतिज्ञातजनैर्विहीनः ॥९.३५
पथिकों के समान, इस संसार में, सम्मिलित हुए लोगों का वियोग नियत है; अतः बन्धु समझे जानेवाले
लोगों से वियुक्त होकर कौन ज्ञानीजन शोक करे ॥35 ॥
इहैति हित्वा स्वजनं परत्र प्रलभ्य चेहापि पुनः प्रयाति ।
गत्वापि तत्राप्यपरत्र गच्छत्येवं जने त्यागिनि कोऽनुरोधः ॥९.३६
पूर्व जन्म में स्वजन को छोड़कर मनुष्य यहाँ आता है और फिर यहाँ से भी (स्वजन को) ठगकर वह यहाँ
से (परलोक) चला जाता है, वहाँ भी जाकर वहाँ से अन्यत्र चला जाता है; इस प्रकार परित्याग करनेवाले
आदमी में आसक्ति क्यों की जाय? ॥36 ॥
यदा च गर्भात्प्रभृति प्रवृत्तः सर्वास्ववस्थासु वधाय मृत्युः ।
कस्मादकाले वनसंश्रयं मे पुत्रप्रियस्तत्प्रभवानवोचत् ॥९.३७
और जब गर्भ से लेकर सब अवस्थाओं में मौत मारने के लिए तैयार रहती है, तब क्यों पुत्र-प्रिय पूज्य
(पिताजी) ने कहा कि मैं अकाल में वन का आश्रय ले रहा हूँ ॥37 ॥
भवत्यकालो विषयाभिपत्तौ कालस्तथैवार्थविधौ प्रदिष्टः ।
कालो जगत्कर्षति सर्वकालान्निर्वाहके श्रेयसि नास्ति कालः ॥९.३८
विषय-सेवन के लिए अकाल होता है, उसी प्रकार धन (= अर्जन) के उपाय के लिए समय निर्दिष्ट है, सब
समय में काल संसार को लाचार करता रहा है, मोक्ष-प्रद कल्याण के लिए (कोई निश्चित) समय नही
है ॥38 ॥
राज्यं मुमुक्षुर्मयि यच्च राजा तदप्युदारं सदृशं पितुश्च ।
प्रतिग्रहीतुं मम न क्षमं तु लोभादपथ्यान्नमिवातुरस्य ॥९.३९
मेरे ऊपर राजा राज्य छोड़ना चाहते हैं यह उनकी उदारता है और पिता के अनुरूप है; किन्तु मेरे लिए
इसे ग्रहण करना ठीक नही, जैसे रोगी के लिए लोभ से अपथ्य अन्न ग्रहण करना ठीक नही ॥39 ॥
कथं नु मोहायतनं नृपत्वं क्षमं प्रपत्तुं विदुषा नरेण ।
सोद्वेगता यत्र मदः श्रमश्च परापचारेण च धर्मपीडा ॥९.४०
किस प्रकार विद्वान् आदमी के लिए उस राजत्व का सेवन करना उचित नही है, जो मोह का मन्दिर है,
जहाँ उद्वेग, मद व थकावट हैं, और जहाँ दूसरों पर अनाचार करने से धर्म में बाधा होती है? ॥40 ॥
जाम्बूनदं हर्म्यमिव प्रदीप्तं विषेण संयुक्तमिवोत्तमान्नम् ।
ग्राहकुलं चाम्ब्विव सारविन्दं राज्यं हि रम्यं व्यसनाश्रयं च ॥९.४१
सोने के जलते महल के समान, विष-युक्त उत्तम भोजन के समान, घडियालों से भरे कमल-युक्त जलाशय
के समान, राज्य रमणीय है और विपत्तियों का आश्रय है ॥41 ॥
बुद्धचरित 49