बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वच्छोकशल्ये हृदयावगाढे मोहं गतो भूमितले मुहूर्तम्।
कुमार राजा नयनाम्बुवर्षो यत्वामवोचत्तदिदं निबोध ॥९.१३
"तुम्हारा शोकरूप शल्य हृदय में गड़नेपर, भूतल पर मुहूर्त भर मूर्छित होकर, हे कुमार, राजा ने नयन-
जल बरसाते हुए, तुम्हें जो कहा है वह यह है, सुनो:- ॥13 ॥
जानामि धर्मं प्रति निश्चयं ते परैमि ते भाविनमेतमर्थम् ।
अहं त्वकाले वनसंश्रयात्ते शोकाग्निनाग्निप्रतिमेन दह्ये ॥९.१४
"धर्म के प्रति तुम्हारा निश्चय जानता हूँ, समझता हूँ कि यह तुम्हारा भावी लक्ष्य है, किन्तु असमय में तुम
वन का आश्रय ले रहे हो, अतः अग्नि-तुल्य शोकाग्नि से मैं जल रहा हूँ॥14 ॥
तदेहि धर्मप्रिय मत्प्रियार्थं धर्मार्थमेव त्यज बुद्धिमेताम् ।
अयं हि मा शोकरयः प्रवृद्धो नदीरयः कूलमिवाभिहन्ति ॥९.१५
इसलिए, हे धर्मप्रिय, मेरा प्रिय करने के लिए आओ, धर्म के लिए ही इस बुद्धि को छोड़ो। यह बढ़ा हुआ
शोक का वेग मुझे वैसे ही मार रहा है, जैसे बढ़ा हुआ नदी का वेग किनारे को (काटता है) ॥15 ॥
मेघाम्बुकक्षाद्रिषु या हि वृत्तिः समीरणार्काग्निमहाशनीनाम् ।
तां वृत्तिमस्मासु करोति शोको विकर्षणोच्छोषणदाहभेदैः ॥९.१६
मेघ, जल, तृण व पर्वत के प्रति (क्रमशः) पवन, सूर्य अग्नि व महा-वज्र का जो काम होता है, विकर्षण,
शोषण, दाह व भेदन द्वारा वही काम हमारे प्रति शोक कर रहा है ॥16 ॥⁴¹
तद्भुङ्क्ष्व तावद्वसुधाधिपत्यं काले वनं यास्यसि शास्त्रदृष्टे ।
अनिष्ठबन्धौ कुरु मय्यपेक्षां सर्वेषु भूतेषु दया हि धर्मः ॥९.१७
इसलिए तबतक वसुधा के आधिपत्य का भोग करो, शास्त्र-सम्मत समय पर वन जाओगे। मुझ अवांछित
पिता की आकाङ्क्षा करो, क्योंकि सब भूतों पर दया (करना ही तो) धर्म है ॥17 ॥
न चैष धर्मो वन एव सिद्धः पुरेऽपि सिद्धिर्नियता यतीनाम् ।
बुद्धिश्च यत्नश्च निमित्तमत्र वनं च लिङ्गं च हि भीरुचिह्नम् ॥९.१८
और, यह धर्म (केवल) वन में ही सिद्ध नहीं होता, नगर में भी यतियों (= संयमियों) की सिद्धि नियत है।
इसमें बुद्धि और यत्न निमित्त हैं, वन और (भिक्षु-) वेष तो कायर के चिह्न हैं ॥18 ॥
मौलीधरैरंसविषक्तहारैः केयूरविष्टब्धभुजैर्नरेन्द्रैः ।
लक्ष्म्यङ्कमध्ये परिवर्तमानैः प्राप्तो गृहस्थैरपि मोक्षधर्मः ॥९.१९
मुकुट धारण करनेवाले राजाओं ने, जिनके गले में हार लटकते थे और जिनकी भुजाएँ केयूरों से बँधी थीं,
गृहस्थ होकर भी (= घर में रहकर भी) लक्ष्मी की गोद में लोटते हुए मोक्ष-धर्म प्राप्त किया ॥19 ॥
⁴¹_ देखिये, सौ० सत्रह 59 ।
48 अश्वघोष
ध्रुवानुजौ यौ बलिवज्रबाहू वैभ्राजमाषाढमथान्तिदेवम् ।
विदेहराजं जनकं तथैव (रामं) द्रुमं सेनजितश्च राज्ञः ॥९.२०
ध्रुव के जो दो छोटे भाई बलि और वज्रबाहु, वैभ्राज, आषाढ़ और अन्तिदेव, विदेह-राज जनक, राम द्रुम
और सेनजित् राजागण ॥20 ॥
एतान् गृहस्थान्नृपतीनवेहि नैःश्रेयसे धर्मविधौ विनीतान् ।
उभौऽपि तस्माद्युगपद्भजस्व चित्ताधिपत्यं च नृपश्रियं च ॥९.२१
विदित हो कि ये गृहस्थ राजा परम कल्याण-कारी धर्म-विधि में शिक्षित थे। इसलिए एक ही साथ ज्ञान
के आधिपत्य व राज्यलक्ष्मी दोनों का सेवन करो ॥21 ॥
इच्छामि हि त्वामुपगूह्य गाढं कृताभिषेकं सलिलार्द्रमेव ।
धृतातपत्रं समुदीक्ष्यमाणस्तेनैव हर्षेण वनं प्रवेष्टुम् ॥९.२२
मैं चाहता हूँ कि अभिषेक करनेपर जल से आर्द्र रहनेपर ही तुम्हारा गाढ़ आलिङ्गन कर, छत्र के नीचे तुम्हें
देखता हुआ उसी आनन्द से वन में प्रवेश करूँ" ॥22 ॥
इत्यब्रवीद्भूमिपतिर्भवन्तं वाक्येन बाष्पग्रथिताक्षरेण ।
श्रुत्वा भवानर्हति तत्प्रियार्थं स्नेहेन तत्स्नेहमनुप्रयातुम् ॥९.२३
राजा ने आपको ऐसा कहा; उसके वाक्य के अक्षर बाष्प से ग्रथित थे। यह सुनकर उसका प्रिय करने के
लिए आपको स्नेहपूर्वक उसके स्नेह का अनुसरण करना चाहिए ॥23 ॥
शोकाम्भसि त्वत्प्रभवे ह्यगाधे दुःखार्णवे मज्जति शाक्यराजः ।
तस्मात्तमुत्तारय नाथहीनं निराश्रयं मग्नमिवार्णवे नौः ॥९.२४
तुमसे उत्पन्न अगाध दुःख सागर में, जिसका जल शोक है, शाक्यराज डूब रहा है। उससे उस नाथ-हीन
को उबारो, जैसे सागर में डूबते निराश्रय (व्यक्ति) को नाव (उबारती) है ॥24 ॥
भीष्मेण गङ्गोदरसम्भवेन रामेण रामेण च भार्गवेण ।
श्रुत्वा कृतं कर्म पितुः प्रियार्थं पितुस्त्वमप्यर्हसि कर्तुमिष्टम् ॥९.२५
गङ्गा के उदर से उत्पन्न भीष्म ने, राम ने, और भार्गव राम ने, पिता के प्रिय के लिए काम किया, यह
सुनकर तुम्हें भी पिता का प्रिय करना चाहिए ॥25 ॥
संवर्धयित्रीं समवेहि देवीमगस्त्यजुष्टां दिशमप्रयाताम् ।
प्रनष्टवत्सामिव वत्सलां गामजस्रमार्तां करुणं रुदन्तीम् ॥९.२६
विदित हो कि तुम्हारा संवर्धन करनेवाली देवी, (गौतमी) जो (अबतक) अगस्त्य से सेवित दिशा को नहीं
गई है (= नहीं मरी है), उस वत्सल गाय के समान, जिसका बछड़ा नष्ट हो गया हो, आर्त और करुण
होकर निरन्तर रो रही है ॥26 ॥
हंसेन हंसीमिव विप्रयुक्तां त्यक्तां गजेनेव वने करेणुम् ।
आर्त्तां सनाथामपि नाथहीनां त्रातुं वधूमर्हसि दर्शनेन ॥९.२७