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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 122 में से

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पृष्ठ 44

यदि हिनहिनाकर लोगों को जगाता, या खुरों से पृथिवी पर शब्द करता, या जबड़ों से जोरों का शब्द
करता, तो मुझे ऐसा दुःख न होता" ॥41 ॥
इतीह देव्याः परिदेविताश्रयं निशम्य बाष्पग्रथिताक्षरं वचः ।
अधोमुखः साश्रुकलः कृताञ्जलिः शनैरिदं छन्दक उत्तरं जगौ ॥८.४२
देवी का यह शोक-मूलक वचन, जिसके अक्षर आँसुओं से ग्रथित थे, सुनकर अधोमुख छन्दक ने, रोते
हुए, हाथ जोड़कर, धीरे-धीरे यह उत्तर दिया:- ॥42 ॥
विगर्हितुं नार्हसि देवि कन्थकं न चापि रोषं मयि कर्तुमर्हसि ।
अनागसौ स्वः समवेहि सर्वशो गतो नृदेवः स हि देवि देववत् ॥८.४३
“हे देवि, आपको न कन्थक की निन्दा करनी चाहिए और न मुझपर ही रोष करना चाहिए। हम दोनों
को सर्वथा निर्दोष समझिये, हे देवि, वह नरदेव देवता के समान गये ॥43 ॥
अहं हि जानन्नपि राजशासनं बलात्कृतः कैरपि दैववतैरिव ।
उपानयं तूर्णमिमं तुरङ्गमं तथान्वगच्छं विगतश्रमोऽध्वनि ॥८.४४
यद्यपि मैं राजा की आज्ञा को जानता था, तो भी मानो किन्हीं देवताओं ने मुझसे बलात् कराया। जल्दी
से मैं इस घोड़े का समीप ले आया। मार्ग में बिना थके ही उस प्रकार उसके पीछे-पीछे गया ॥44 ॥
व्रजन्नयं वाजिवरोऽपि नास्पृशन्महीं खुराग्रैर्विधृतैरिवान्तरा ।
तथैव दैवादिव संयताननो हनुस्वनं नाकृत नाप्यहेषत ॥८.४५
जाते हुए इस अश्व-श्रेष्ठ ने भी खुरों के अग्रभाग से, जो मानो बीच में ही (किसी के द्वारा) पकड़े हुए थे,
धरती का स्पर्श नही किया। उसी प्रकार मानो दैव-वंश संयत-मुख होकर न जबड़ों से शब्द किया और न
हिनहिनाया ॥45 ॥
यतो बहिर्गच्छति पार्थिवात्मजे तदाभवद्द्वारमपावृतं स्वयम् ।
तमश्च नैशं रविणेव पाटितं ततोऽपि दैवो विधिरेष गृह्यताम् ॥८.४६
क्योंकि जब राजा का पुत्र बाहर जा रहा था, तब द्वार आप ही आप खुल गया और रात्रि का अन्धकार
दूर हो गया, जैसे सूर्य द्वारा विदीर्ण हुआ हो, इससे भी इसे दैव-विधान ही समझना चाहिए ॥46 ॥
यदप्रमत्तोऽपि नरेन्द्रशासनाद्गृहे पुरे चैव सहस्रशो जनः ।
तदा स नाबुध्यत निद्रया हृतस्ततोऽपि दैवो विधिरेष गृह्यताम् ॥८.४७
क्योंकि राजा की आज्ञा से सावधान रहनेपर भी महल और नगर में हजार-हजार लोग नहीं जागे, नींद से
अभिभूत थे, इससे भी इसे दैव-विधान ही समझना चाहिए ॥47 ॥
यतश्च वासो वनवाससम्मतं निसृष्टमस्मै समये दिवौकसा ।
दिवि प्रविद्धं मुकुटं च तद्धृतं ततोऽपि दैवो विधिरेष गृह्यताम् ॥८.४८
और, क्योंकि वन-वास-योग्य वस्त्र देवता ने उन्हें समय पर दिया और आकाश में फेंका गया वह मुकुट
पकड़ा गया, इससे भी इसे दैव-विधान ही समझना चाहिए ॥48 ॥
तदेवमावां नरदेवि दोषतो न तत्प्रयातं प्रति गन्तुमर्हसि ।
न कामकारो मम नास्य वाजिनः कृतानुयात्रः स हि दैववैर्गतः ॥८.४९
इसलिए, हे नर-देवि, इनके जाने के बारे में आपको हमें दोषी नहीं समझना चाहिए। न मेरी इच्छा से
(कुछ) हुआ और न इस घोड़े की इच्छा से ही। देवों से अनुसूत होकर वह गये” ॥49 ॥
इति प्रयाणं बहुदेवमद्भुतं निशम्य तास्तस्य महात्मनः स्त्रियः ।
प्रनष्टशोका इव विस्मयं ययुर्मनोज्वरं प्रव्रजनात्तु लेभिरे ॥८.५०
इस तरह उस महात्मा का अनेक देवों से युक्त अद्भुत प्रयाण सुनकर वे स्त्रियाँ विस्मित हुईं, जैसे उनका
शोक नष्ट हो गया हो; किन्तु उसके प्रव्रज्या ग्रहण करने से उन्हें मानसिक ताप हुआ ॥50 ॥
विषादपारिप्लवलोचना ततः प्रनष्टपोता कुररीव दुःखिता ।
विहाय धैर्यं विरराव गौतमी तताम चैवाश्रुमुखी जगाद च ॥८.५१
तब विषाद से चंचल आँखोंवाली गौतमी, उस कुररी के समान जिसके बच्चे खो गये हों, दुःखी और अधीर
होकर रोईं। वह मूर्च्छित हुईं और रोती हुई बोली:- ॥51 ॥
महॉर्मिमन्तौ मृदवोऽसिताः शुभाः पृथक्पृथक्स्थूलरुहाः समुद्गताः ।
प्रवेरितास्ते भुवि तस्य मूर्धजा नरेन्द्रमौलिपरिवेष्टनक्षमाः ॥८.५२
“क्या उसके वे अत्यन्त तरङ्गित कोमल काले और मङ्गलमय केश, जो पृथक्-पृथक् मूल से उत्पन्न होकर
ऊपर उठे थे और जो राजमुकुट के परिवेष्टन के योग्य थे, पृथिवी पर गिराये गये? ॥52 ॥
प्रलम्बबाहुर्मृगराजविक्रमो महर्षभाक्षः कनकोज्ज्वलद्युतिः ।
विशालवक्षा घनदुन्दुभिस्वनस्तथाविधोऽप्याश्रमवासमर्हति ॥८.५३
उसकी भुजाएँ लम्बी हैं, मृगराज की-सी गति है, महा वृषभ की-सी आँखें हैं। सोने की-सी उज्जवल द्युति
है, वक्षःस्थल विशाल है, मेघरूपी दुन्दुभी की-सी ध्वनि है; क्या ऐसा (कुमार) भी आश्रम-वास के योग्य
है? ॥53 ॥
अभागिनी नूनमियं वसुन्धरा तमार्ककर्माणमनुत्तमं पतिम् ।
गतस्ततोऽसौ गुणवान् हि तादृशो नृपः प्रजाभाग्यगुणैः प्रसूयते ॥८.५४
निश्चय ही वह आर्यकर्मा अद्वितीय पति इस वसुन्धरा के भाग्य में नहीं है, इसीलिए तो वह चला गया।
ऐसा गुणवान् राजा प्रजा के सौभाग्य से ही जन्म लेता है ॥54 ॥
सुजातजालावतताङ्गुली मृदू निगूढगुल्फौ बिषपुष्पकोमलौ ।
वनान्तभूमिं कठिनां कथं नु तौ सचक्रमध्यौ चरणौ गमिष्यतः ॥८.५५
वे मृदु चरण-जिनकी अङ्गुलियों पर सुन्दर (रेखा-) जाल बिछा हुआ है, जिनकी पाद-ग्रन्थियाँ छिपी हुई
हैं, जो कमल-तन्तु या फूल के समान कोमल हैं, जिनके मध्य भाग में चक्र हैं-वन की कठिन भूमि पर
कैसे चलेंगे? ॥55 ॥
44 अश्वघोष