बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्प्रीतोऽस्मि तवानेन महाभागेन कर्मणा ।
यस्य ते मयि भावोऽयं फलेभ्योऽपि पराङ्मुखः ॥६.८
इसलिए तुम्हारे इस उत्तम कर्म से प्रसन्न हूँ। मेरे प्रति तुम्हारा यह भाव निस्वार्थ और निष्काम है ॥8॥
को जनस्य फलस्थस्य न स्यादभिमुखो जनः ।
जनीभवति भूयिष्ठं स्वजनोऽपि विपर्यये ॥६.९
फल में स्थित (= फल देनेवाले व्यक्ति के) अनुकूल कौन नही होगा? विपरीत में (अर्थात् फल न मिलने
की आशा नही रहनेपर) स्वजन भी प्रायः पराया हो जाता है ॥9॥
कुलार्थं धार्यते पुत्रः पोषार्थं सेव्यते पिता ।
आशयाश्लेष्यति जगन्नास्ति निष्कारणा स्वता ॥६.१०
वंश-वृद्धि के लिए पुत्र का पालन किया जाता है और पोषण के लिए पिता की सेवा की जाती है।
आशय से ही जगत् मेल करता है, बिना कारण के अपनापन नही होता है ॥10॥
किमुक्त्वा बहु सङ्क्षेपात्कृतं मे सुमहत्प्रियम् ।
निवर्तस्वाश्वमादाय सम्प्राप्तोऽस्मीप्सितं पदम् ॥६.११
बहुत कहने से क्या? संक्षेप में, तुमने मेरा बड़ा प्रिय किया। घोड़े को लेकर लौट जाओ। मैं इच्छित
स्थान को पहुँच गया हूँ।” ॥11॥
इत्युक्त्वा स महाबाहुरनुशंसचिकीर्षया ।
भूषणान्यवमुच्यास्मै सन्तप्तमनसे ददौ ॥६.१२
इतना कहकर प्रिय (उपकार) करने की इच्छा से, उस महाबाहु ने अपने आभूषण खोलकर उस संतप्त-
चित्त को दिये ॥12॥
मुकुटाद्दीपकर्माणं मणिमादाय भास्वरम् ।
ब्रुवन्वाक्यमिदं तस्थौ सादित्य इव मन्दरः ॥६.१३
दीए का काम करनेवाली चमकीली मणि को मुकुट से लेकर, मन्दराचल के समान जिसके ऊपर सूर्य
स्थित हो, शोभित होते हुए, उसने ये वचन कहे:- ॥13॥
अनेन मणिना छन्द प्रणम्य बहुशो नृपः ।
विज्ञाप्योऽमुक्तविश्रम्भं सन्तापविनिवृत्तये ॥६.१४
“इस मणि से, हे छन्दक, राजा का बार-बार प्रणाम कर उनका सन्ताप दूर करने के लिए विश्वासपूर्वक
(यह सन्देश) निवेदन करना:- ॥14॥
जन्ममरणनाशार्थं प्रविष्टोऽस्मि तपोवनम् ।
न खलु स्वर्गसर्गेण नास्नेहेन न मन्युना ॥६.१५
जरा और मरण का विनाश करने के लिए मैंने तपोवन में प्रवेश किया है, अवश्य ही स्वर्ग की तृष्णा से
नही, स्नेह के अभाव से नही, क्रोध से नही ॥15॥
तदेवमभिनिष्क्रान्तं न मां शोचितुमर्हसि ।
भूत्वापि हि चिरं श्लेषः कालेन न भविष्यति ॥६.१६
अतः इस तरह मुझे निकले हुए के लिए आपको शोक नही करना चाहिए; क्योंकि संयोग (= मिलन)
चिरकाल तक होकर भी समय पाकर नही रहेगा ॥16॥
ध्रुवो यस्माच्च विश्लेषस्तस्मान्मोक्षाय मे मतिः ।
विप्रयोगः कथं न स्याद्भूयोऽपि स्वजनादिति ॥६.१७
और, क्योंकि वियोग निश्चित है, इसलिए मोक्ष (पाने) के लिए मेरा विचार है, जिसमें फिर भी स्वजन से
वियोग न हो ॥17॥
शोकत्यागाय निष्क्रान्तं न मां शोचितुमर्हसि ।
शोकहेतुषु कामेषु सक्ताः शोच्यास्तु रागिणः ॥६.१८
शोक-त्याग के मुझे निकले हुए के लिए आपको शोक नही करना चाहिए। शोक के हेतु-स्वरूप काम
भोगों में आसक्त रागी व्यक्तियों के लिए शोक करना चाहिए ॥18॥
अयं च किल पूर्वेषामस्माकं निश्चयः स्थिरः ।
इति दायाद्यभूतेन न शोच्योऽस्मि पथा व्रजन् ॥६.१९
और, यह तो हमारे पूर्वपुरुषों का दृढ़ निश्चय था; (इस) पैतृक (= पूर्वजों के) मार्गपर चल रहा हूँ, अतः
मेरे लिए शोक नही किया जाना चाहिए ॥19॥
भवन्ति ह्यर्थदायादाः पुरुषस्य विपर्यये ।
पृथिव्यां धर्मदायादा दुर्लभास्तु न सन्ति वा ॥६.२०
उलट-पुलट (= मृत्यु) होनेपर पुरुष के धन के दायाद होते हैं; किन्तु पृथिवी पर धर्म के दायाद दुर्लभ हैं
या हैं ही नहीं ॥20॥
यदपि स्यादसमये यातो वनमसाविति ।
अकालो नास्ति धर्मस्य जीविते चञ्चले सति ॥६.२१
यह कि वह (कुमार) असमय में वन गया है, तो (कहूँगा कि) जीवन चञ्चल होने के कारण धर्म के लिए
असमय नही है ॥21॥
तस्मादद्यैव मे श्रेयश्चेतव्यमिति निश्चयः ।
जीविते को हि विश्रम्भो मृत्यौ प्रत्यर्थिनि स्थिते ॥६.२२
इसलिए कल्याण का चयन (= अर्जन) मैं आज ही करूँगा, यही निश्चय है; क्योंकि मृत्युरूप शत्रु के
रहनेपर जीवन में क्या विश्वास? ॥22॥
एवमादि त्वया सौम्य विज्ञाप्यो वसुधाधिपः ।
प्रयतेथास्तथा चैव यथा मां न स्मरेदपि ॥६.२३
बुद्धचरित 33