बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary
महाकवि अश्वघोष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुखैश्च तासां नयनाम्बुताडितैः रराज तद्राजनिवेशनं तदा ।
नवाम्बुकालेऽम्बुदवृष्टिताडितैः स्रवज्जलैस्तामरसैर्यथा सरः ॥८.२७
तब उनके अश्रुपूर्ण मुखों से वह राज-भवन वैसे ही शोभित हुआ, जैसे कि सरोवर, जो वर्षा के आरम्भ में
वृष्टि-जल से ताड़ित हुए जल-स्रावी कमलों से भरा हो ॥27 ॥
सुवृत्तपीनाङ्गुलिभिर्निरन्तरैरभूषणैर्गूढसिरैर्वराङ्गनाः ।
उरांसि जघ्नुः कमलोपमैः करैः स्वपल्लवैर्वातचला लता इव ॥८.२८
उत्तम स्त्रियों ने गोल, मोटी व सटी अङ्गुलियोंवाले कमलोपम करों से, जो भूषण-रहित थे और जिनकी
सिराएँ (= धमनियों) छिपी हुई थीं, छाती पीटी, जैसे हवा से हिलती लताएँ अपने पल्लवों से (अपने को
ही पीटती हैं) ॥28 ॥
करप्रहारप्रचलैश्च ता बभुस्तथापि नार्यः सहितोन्नतैः स्तनैः ।
वनानिलाघूर्णितपद्मकम्पितै रथाङ्गनाम्नां मिथुनैरिवापगाः ॥८.२९
हाथों की चोटों से हिलते हुए कठोर व उन्नत स्तनोंवाली वे स्त्रियाँ उन नदियों के समान शोभित हुईं
जिनके चक्रवाक-युगल जङ्गल की हवा से हिलाये गये कमलों से काँप रहे हों ॥29 ॥
यथा च वक्षांसि करैरपीडयंस्तथैव वक्षोभिरपीडयन् करान् ।
अकारयंस्तत् परस्परं व्यथाः कराग्रवक्षांस्यबला दयालसाः ॥८.३०
और, जैसे हाथों से छातियों को पीड़ित किया, वैसे ही छातियों से भी हाथों को पीड़ित किया। निर्दय
होकर अबलाओं ने हाथों व छातियों द्वारा एक दूसरे को व्यथित कराया ॥30 ॥
ततस्तु रोषप्रविरक्तलोचना विषादसम्बन्धिकषायगद्गदम् ।
उवाच निश्वासचलत्पयोधरा विगाढशोकाश्रुधरा यशोधरा ॥८.३१
तब रोष से लाल आँखोंवाली, साँसों से हिलते स्तनोंवाली गाढ़ शोक से आँसू बहानेवाली यशोधरा ने
विषाद-सम्बन्धी कसैलेपन (= कटुता से) गद्गद होकर कहा:— ॥31 ॥
निशि प्रसुप्तामवशां विहाय मां गतः क्व स च्छन्दक मन्मनोरथः ।
उपागते च त्वयि कन्थके च मे समं गतेषु त्रिषु कम्पते मनः ॥८.३२
“रात को सोई हुई मुझ विवश को छोड़कर, हे छन्दक, मेरा वह मनोरथ (= प्रियतम) कहाँ गया? तीनों
साथ गये थे, और कन्थक व तुम आ गये, मेरा मन काँप रहा है ॥32 ॥
अनार्यमस्निग्धममित्रकर्म मे नृशंस कृत्वा किमिहाद्य रोदिषि ।
नियच्छ बाष्पं भव तुष्टमानसो न संवदत्यश्रु च तच्च कर्म ते ॥८.३३
मेरे लिए अनार्य, अस्निग्ध और शत्रुतापूर्ण काम करके, हे क्रूर, क्यों आज यहाँ रो रहे हो? आँसू रोको,
सन्तुष्टचित्त होओ, आँसू और तुम्हारा वह काम (परस्पर) मेल नहीं खाते ॥33 ॥
प्रियेण वश्येन हितेन साधुना त्वया सहायेन यथार्थकारिणा ।
गतोऽर्यपुत्रो ह्यपुनर्निवृत्तये रमस्व दिष्ट्या सफलः श्रमस्तव ॥८.३४
प्रिय, वशवर्ती, हित, साधु और यथार्थकारी तुझ साथी के साथ आर्यपुत्र गये, फिर लौटने के लिए नही।
आनन्द करो, सौभाग्य से तुम्हारा श्रम सफल (हुआ) ॥34 ॥
वरं मनुष्यस्य विचक्षणो रिपुर्न मित्रमप्राज्ञमयोगपेशलम् ।
सुहृद्ब्रुवेण ह्यविपश्चिता त्वया कृतः कुलस्यास्य महानुपप्लवः ॥८.३५
मनुष्य का चतुर शत्रु अच्छा है, न कि मूर्ख मित्र जो वियोग (कराने) में निपुण होता है। मित्र कहे
जानेवाले तुझ मूर्ख ने इस कुल का बड़ा ही अनर्थ किया ॥35 ॥⁴⁰
इमा हि शोच्या व्यवमुक्तभूषणाः प्रसक्तबाष्पाविलरक्तलोचनाः ।
स्थितेऽपि पत्यौ हिमवन्महीसमे प्रनष्टशोभा विधवा इव स्त्रियः ॥८.३६
हिमालय और पृथिवी के समान (धैर्यशाली) स्वामी के रहनेपर भी, विधवाओं के सदृश शोभा-हीन हुई ये
स्त्रियाँ दयनीय हैं, जिन्होंने गहने फेंक दिये हैं और जिनकी आँखें निरन्तर बहते अश्रु-जल से मलिन और
लाल हैं ॥36 ॥
इमाश्च विक्षिप्तविटङ्कबाहवः प्रसक्तपारावतदीर्घनिस्वनाः ।
विनाकृतास्तेन सहावरोधनैर्भृशं रुदन्तीव विमानपङ्क्तयः ॥८.३७
और कपोत-पालिका भुजाएँ फैलाये हुए ये प्रासाद-पङ्क्तियाँ, जो आसक्त कपोतों से लम्बी साँसे ले रही हैं
रनिवासों के साथ उनके वियोग में मानो खूब रो रही हैं ॥37 ॥
अनर्थकामोऽस्य जनस्य सर्वथा तुरङ्गमोऽपि ध्रुवमेष कन्थकः ।
जहार सर्वस्वमितस्तथा हि मे जने प्रसुप्ते निशि रत्नचौरवत् ॥८.३८
निश्चय ही यह कन्थक घोड़ा भी इस व्यक्ति के अनर्थ का सर्वथा इच्छुक था; क्योंकि लोगों के सोये
रहनेपर रात में रत्न-चोर के समान इसने मेरे सर्वस्व का यहाँ से उस प्रकार हरण किया है ॥38 ॥
यदा समर्थः खलु सोढुमागतानिषुप्रहारानपि किं पुनः कशाः ।
गतः कशापातभयात्कथं न्वयं श्रियं गृहीत्वा हृदयं च मे समम् ॥८.३९
जब तीरों के आये हुए प्रहार सहने में वह समर्थ है, कोड़ों का क्या कहना, तब कोड़े के भय से यह मेरे
हृदय और सौभाग्य को साथ लेकर कैसे गया? ॥39 ॥
अनार्यकर्मा भृशमद्य हेषते नरेन्द्रधिष्ण्यं प्रतिपूरयन्निव ।
यदा तु निर्वाहयति स्म मे प्रियं तदा हि मूकस्तुरगाधमोऽभवत् ॥८.४०
(यह) अनार्यकर्मा आज खूब हिनहिना रहा है, मानो राज-भवन को भर रहा हो। किन्तु जब मेरे प्रियतम
को ले जा रहा था, तब यह अधम अश्व गूँगा हो गया था ॥40 ॥
यदि ह्यहेषिष्यत बोधयन् जनं खुरैः क्षितौ वाप्यकरिष्यत ध्वनिम् ।
हनुस्वनं वाजनिष्यदुत्तमं न चाभविष्यन्मम दुःखमीदृशम् ॥८.४१
⁴⁰ - "अयोग-पेशल" का दूसरा अर्थ होगा—"अनुचित करने में निपुण" ।
बुद्धचरित 43