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सर्वकोश
बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

बुद्धचरितम् (महाकवि अश्वघोष - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Buddhacharitam of Mahakavi Ashvaghosa with Hindi Commentary

महाकवि अश्वघोष द्वारा

DevanagariHindipublished122 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 122 में से

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पृष्ठ 30

यहाँ दी गई पृष्ठ-प्रतिमा का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:


खिड़की की बगल के सहारे सोई हुई दूसरी स्त्री, जिसकी देह धनुष के समान झुकी हुई थी और जिसके
सुन्दर हार लटक रहे थे, इस प्रकार विराजी जैसे तोरण पर बनी कठपुतली हो ॥52॥
मणिकुण्डलदष्टपत्रलेखं मुखपद्मं विनतं तथापरस्याः ।
शतपत्रमिवार्धवकनाडं स्थितकारणडवघट्टितं चकाशे ॥५.५३
उसी प्रकार दूसरी का झुका हुआ मुख-पद्म, जिसके पत्रलेख (= कपोल आदि पर बने चित्र) को रत्न-
कुण्डल मिटा रहे थे, (उस) कमल के समान शोभित हुआ जिसका नाल आधा झुका हो और जो कारण्डव
पक्षी के बैठने से हिल रहा हो ॥53॥
अपराः शयिता यथोपविष्टाः स्तनभारैरवनम्यमानगात्राः ।
उपगृह्य परस्परं विरेजुर्गजपाशैस्तपनीयहारिहार्यैः ॥५.५४
दूसरी बैठी-बैठी ही सो गईं, उनके गात्र स्तनों के भार से झुके हुए थे। वे सुवर्ण-वलय युक्त बाहु-लताओं
से एक दूसरे का आलिङ्गन किये शोभ रही थीं ॥54॥
महतीं परिवादिनीं च काचिद्दयितालिङ्गय सखीमिव प्रसुप्ता ।
विजुघूर्ण चलत्सुवर्णसूत्रां वदनेनाकुलयोक्तकेण ॥५.५५
और, कोई वनिता एक बड़ी सात तारवाली वीणा का सखी के समान आलिङ्गन कर सोई हुई थी। हिलते
सुवर्ण-सूत्रोंवाली वह स्त्री अस्त-व्यस्त योक्त्र (= सूत्र ?) वाले मुख से घूम (= चक्कर खा) रही थी ॥55॥
पणवं युवतिर्भुजांसदेशादवविस्रंसितचारुपाशमन्या ।
सविलासरतान्ततान्तमूर्वोरविवरे कान्तमिवाभिनीय शिश्ये ॥५.५६
दूसरी स्त्री पणव (बाजे) को, जिसकी सुन्दर डोरी काँख से गिर गई थी, सविलास सम्भोग के अन्त में
थके प्रियतम के समान, दोनों जाँघों के बीच लाकर सोई ॥56॥
अपरा बभूर्निमीलिताक्ष्यो विपुलाक्ष्योऽपि शुभभ्रुवोऽपि सत्यः ।
प्रतिसङ्कुचितारविन्दकोशाः सवितर्यस्तमिते यथा नलिन्यः ॥५.५७
सुन्दर भौंहोंवाली व बड़ी-बड़ी आँखोंवाली होनेपर भी दूसरी (स्त्रियों) की आँखें बन्द हो गईं, जैसे सूर्यास्त
होनेपर कमलिनियों के कमल-कोश बन्द हो जाते हैं ॥57॥
शिथिलाकुलमूर्धजा तथान्या जघनस्त्रस्तविभूषणांशुफान्ता ।
अशयिष्ट विकीर्णकण्ठसूत्रा गजभग्ना प्रतियातनाङ्गनेव ॥५.५८
उसी प्रकार दूसरी (स्त्रियाँ), जिनके केश शिथिल व अस्त-व्यस्त थे और जाँघों से जिनके गहने व कपड़े के
छोर गिर गये थे, और जिनके कण्ठ-सूत्र बिखरे हुए थे, इस तरह (बेहोश होकर) सोईं, जैसे हाथी द्वारा
तोड़ी गई स्त्री की प्रतिमा (पड़ी हो) ॥58॥
अपरास्त्ववशा हिया वियुक्ता धृतिमत्योऽपि वपुर्गुणैरुपेताः ।
विनिशश्वसुरुल्बणं शयाना विकृताः क्षिप्तभुजा जजृम्भिरे च ॥५.५९
दूसरी (स्त्रियाँ) अत्यन्त रूपवती तथा धीर होनेपर भी विवशता के कारण लाज-रहित हो असभ्य ढङ्ग से
सोती हुई, जोरों से साँसें छोड़ रही थीं; वे विकृत थीं, भुजाएँ फेंक रही थीं और जँभाई ले रही थीं ॥59॥
व्यपविद्धविभूषणस्रजोऽन्या विसृताग्रन्थनवाससो विसञ्ज्ञाः ।
अनिमीलितशुक्लनिश्शलाक्ष्यो न विरेजुः शयिता गतासुकल्पाः ॥५.६०
दूसरी, जिनके गहने व मालाएँ अलग फेंकी हुई थीं और जिनके वस्त्रों की ग्रन्थियाँ खुली हुई थीं, बेहोश
पड़ी थीं। उनकी निश्चल आँखों की सफेदी दिखाई पड़ती थी। मुर्दों के समान सोई हुई वे शोभित नहीं
हुईं ॥60॥
विवृतास्यपुटा विवृद्धगात्री प्रपतद्वक्त्रजला प्रकाशगुह्या ।
अपरा मदघूर्णितेव शिश्ये न बभाषे विकृतं वपुः पुपोष ॥५.६१
दूसरी मदमाती की भाँति सोई। उसका मुख-पुट खुला था, गात्र फैले हुए थे, (अतः क्रमशः) उसके मुख
से जल गिर रहा था और गुह्य भाग प्रकाशित हो रहे थे। वह शोभित नहीं हुई उसने विकृत रूप धारण
किया ॥61॥
इति सत्त्वकुलान्वयानुरूप विविधं स प्रमदाजनः शयानः ।
सरसः सदृशं बभार रूपं पवनावर्जितरुग्नपुष्करस्य ॥५.६२
स्वभाव, कुल, एवं अन्वय के अनुसार भाँति-भाँति से सोये हुए उस प्रमदावृन्द ने उस सरोवर के सदृश रूप
धारण किया, जिसके कमल हवा में झुकाये और टेढ़े किये गये हों ॥62॥
समवेक्ष्य तथा तथा शयाना विकृतास्ता युवतीरधीरचेष्टाः ।
गुणवद्वपुषोऽपि वल्गुभाषा नृपसूनुः स विगहर्यांबभूव ॥५.६३
उस उस प्रकार से सोती हुई चञ्चल चेष्टाओंवाली युवतियों को, यद्यपि उनके शरीर रूपवान् और वचन
मनोहर थे, वीभत्स देखकर उस राजकुमार ने यों निन्दा की:- ॥63॥
अशुचिर्विकृतश्च जीवलोके वनितानामयमीदृशः स्वभावः ।
वसनाभरणैस्तु वञ्च्यमानः पुरुषः स्त्रीविषयेषु रागमेति ॥५.६४
"जीव-लोक में वनिताओं का यह ऐसा स्वभाव वीभत्स और अपवित्र है; किन्तु वस्त्रों और आभूषणों से
ठगा जाता पुरुष स्त्रियों से अनुराग करता है ॥64॥
विमृशेद्यदि योषितां मनुष्यः प्रकृतिं स्वप्नविकारमीदृशं च ।
ध्रुवमत्र न वर्धयेत्प्रमादं गुणसङ्कल्पहतस्तु रागमेति ॥५.६५
यदि मनुष्य स्त्रियों के स्वभाव तथा स्वाभावस्था के ऐसे विकार का विचार करे, तो अवश्य ही उसमें वह
अपनी असावधानी न बढ़ावे; किन्तु, स्त्री में गुण हैं, इस विचार से अभिभूत होकर वह उनसे अनुराग
करता है" ॥65॥
इति तस्य तदन्तरं विदित्वा निशि निश्चिक्रमिषा समुद्बभूव ।
अवगम्य मनस्ततोऽस्य देवैर्भवनद्वारमपावृतं बभूव ॥५.६६
30 अश्वघोष