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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५०७
फल अन्तर में आरम्भ में होता है, मध्य और अन्त में रोग और पीड़ा होती है।।१२।।
नष्टानि सर्वकार्याणि व्याकुलत्वं महद्भयम् ।
द्वितीयसप्तमाधीशो देहबाधा भविष्यति ।।१३।।
सभी कार्य नष्ट हो जाते हैं; व्याकुलता और बड़ा भय होता है। दूसरे या
सातवें भाव के अधिपति हो तो शरीर में बाधा होती है।।१३।।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ।
अन्नदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।१४।।
इस दोष की शान्ति के लिये विष्णु सहस्र नाम स्तोत्र का जप और अन्नदान
करना चाहिये इसके करने से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है।।१४।।
अथशनिदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्-
मन्दस्यान्तर्गते केतौ शुभदृष्टियुतेक्षिते ।
स्वोच्चे वा शुभराशिस्थे योगकारकसंयुते ।।१५।।
शनि की दशा में शुभग्रह से युत दृष्ट वा अपने उच्च वा शुभराशि में गये
हुये

. ५०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
६।८।१२ भाव में केतु हो इसी प्रकार दशेश से भी इन्हीं भावों में हो
तो।।१९।।
अपमृत्युभयं चैव कुत्सितान्नस्य भोजनम् ।
शीतज्वरातिसारश्च व्रणचौरादिपीडनम् ।।२०।।
अपमृत्यु का भय खराब अन्न का भोजन, शीतज्वर, अतिसार, व्रण, चौर
आदि से कष्ट होता है।।२०।।
दारपुत्रवियोगश्च संसारे भवति ध्रुवम् ।
द्वितीयद्यूनराशिस्थे देहपीडा भविष्यति ।
छागदानं प्रकुर्वीत ह्यपमृत्युभयं हरेत् ।।२१।।
स्त्री-पुत्र आदि से वियोग निश्चयरूप से होता है। यदि २ वा ७ भाव में हो
तो शरीर में पीड़ा होती है इसके शान्त्यर्थ बकरी का दान करना चाहिये जिससे अपमृत्यु
का भय नहीं होता है।।२१।।
अथशनिदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम् -
मन्दस्यान्तर्गते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपिवा ।
केन्द्रे वा शुभसंयुक्ते त्रिकोणे लाभगेऽपिवा ।।२२।।
शनि की दशा में अपने उच्च वा राशि में वा केन्द्र में वा शुभयुक्त वा त्रिकोण
वा लाभ स्थान में गये हुये शुक्र के अन्तर में।।२२।।
दारपुत्रधनप्राप्तिर्देहारोग्यं महोत्सवः ।
गृहे कल्याणसम्पत्ती राज्यलाभं महत्सुखम् ।।२३।।
स्त्री-पुत्र-धन का लाभ, देह में आरोग्यता, बड़ा उत्सव, गृह में कल्याण,
धन-धान्य सम्पत्ति का लाभ, राज्य का लाभ और बड़ा सुख।।२३।।
महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा ।
सन्मानः आत्मसन्तोषः प्रियवस्त्रादिलाभकृत् ।।२४।।
और महाराज की प्रसन्नता से सुखकर इष्टसिद्धि, सम्मान, आत्मसंतोष,
प्रियवस्त्रों का लाभ।।२४।।
द्वीपान्तराद्वस्त्रलाभः श्वेताश्वो महिषी तथा ।
गुरुचारवशाद्भाग्यं सौख्यं च धनसम्पदः ।।२५।।
द्वीपान्तर (परदेश) से वस्त्र का लाभ, सफेद घोड़ा, भैंस का लाभ होता है।
गुरु के संचार से भाग्य, सुख और धन सम्पत्ति का लाभ होता है।।२५।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५०९
शनिचारान्मनुष्योऽसौ योगमाप्नोत्यसंशयम् ।
दायेशाद्भाग्यगेनैव केन्द्रे वा लाभसंयुते ॥२६॥
और शनि के संचार होने से निःसंशय योग को पाता है। दशेश से भाग्य -
वा केन्द्र वा लाभ में हो तो॥२६॥
राज्यप्रीतिकरं चैव मनोभीष्टप्रदायकम् ।
दानधर्मदयायुक्तस्तीर्थयात्रादिकं फलम् ॥२७॥
मनोनुकूल अभीष्ट की सिद्धि होती है। दान धर्म दया से युक्त हो तीर्थ यात्रा
आदि करता है॥२७॥
शास्त्रार्थकाव्यरचनां वेदांतश्रवणादिकम् ।
दारपुत्रादिसौख्यं च वाहनछत्रलाभदम् ॥२८॥
शास्त्रार्थ और काव्य रचना और वेदांत को सुनता है। स्त्री पुत्र आदि का सुख
और वाहन छत्र आदि का लाभ होता है॥२८॥
शत्रुनीचास्तगे शुक्रे षष्ठाष्टव्ययराशिगे ।
दारनाशं मनःक्लेशं स्थाननाशं मनोरुजम् ॥२९॥
यदि शुक्र शत्रु राशि वा नीचराशि वा ६।८।१२ भाव में हो तो स्त्री का नाश,
मन को कष्ट, स्थान का नाश, मन में कष्ट॥२९॥
दारनाशं स्वजनक्लेशः सन्तापो जनविग्रहः ।
दायेशाद्व्ययगेशुक्रे षष्ठे वाह्यष्टमेऽपिवा ॥३०॥
स्वजनों को कष्ट सन्ताप, जनसमूह से वैर होता है। दशेश से बारहें वा छठें
वा आठवें भाव में शुक्र हो तो॥३०॥
नेत्रपीडाज्वरभयं स्वकुलाचारवर्जितः ।
कपोले दन्तशूलादि हृदिगुह्ये च पीडनम् ॥३१॥
नेत्र में पीड़ा, ज्वर, भय, आचारभ्रष्ट, कपोल तथा दांत में पीड़ा और हृदय
तथा गुह्य स्थान में पीड़ा॥३१॥
जलभीतिर्मनस्तापो वृक्षात्पतनसम्भवः ।
राजद्वारे जयद्वेषः सोदरेण विरोधनम् ॥३२॥
जल से भय, मन में संताप, वृक्ष से गिरने की संभावना, राजद्वार में विजय
होने से द्वेष अपने भाइयों से विरोध होता है॥३२॥

५१० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
द्वितीयसप्तमाधीशो आत्मक्लेशो भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादिव्याजपंचरेत् ।
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धिदम् ।।३३।।
यदि २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो आत्मा को कष्ट होता है। इस दोष
के शान्त्यर्थ दुर्गादेवी का जप करना चाहिये और सफेद गौ, भैंस का दान करने
से आयु, आरोग्यता की प्राप्ति होती है।।३३।।
अथशनिदशायां सूर्यान्तर्दशाफलम्-
मन्दस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपि वा ।
भाग्याधिपेन संयुक्ते केन्द्रलाभत्रिकोणके ।।३४।।
शनि की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में भाग्येश युक्त अथवा केन्द्र
लाभ-त्रिकोण में।।३४।।
शुभदृष्टियुते वापि स्वप्रभोश्च महत्सुखम् ।
गृहे कल्याणसम्पत्तिः पुत्रादि सुखबर्धनम् ।।३५।।
शुभग्रह से दृष्ट युत सूर्य के अन्तर में अपने मालिक से सुख गृह में कल्याण
और सम्पत्ति, पुत्र आदि के सुख की वृद्धि।।३५।।
वाहनाम्बरपश्वादिगोक्षीरैः संकुलं गृहम् ।
षष्ठाष्टमव्यये सूर्ये दायेशाद्वा तथैव च ।।३६।।
वाहन-वस्त्र पशु आदि की वृद्धि और गौ के दूध से घर भरा रहता है यदि
सूर्य लग्न वा दशेशं ६।८।१२ भाव में हो तो।।३६।।
हृद्रोगो मानहानिश्च स्थानभ्रंशो मनोरुजा ।
इष्टबंधुवियोगश्च उद्योगस्य विनाशनम् ।।३७।।
हृदय का रोग मानहानि, स्थान हानि, मानसिक कष्ट, इष्ट बन्धु का वियोग,
उद्योग (व्यवसाय) की हानि।।३७।।
तापज्वरादिपीडा च व्याकुलत्वं भयं तथा ।
आत्मसम्बन्धिमरणमिष्टबन्धुवियागकृत् ।।३८।।
तापज्वर से पीड़ा, व्याकुलता और भय होता है आत्मीय सम्बंधि का मृत्यु,
प्रियबन्धु का वियोग होता है।।३८।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं सूर्यपूजां च कारयेत् ।।३९।।

अथान्तर्दशादिफलविचारोध्यायः । ५११
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर बाधा होती है। इसके शान्त्यर्थ सूर्य
की पूजा करनी चाहिये।।३६-३९।।
अथशनिदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् -
मन्दस्यान्तर्गते चन्द्रे जीवदृष्टि समन्विते ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रस्थेत्रिकोणेलाभगेऽपि वा ।।४०।।
शनि की दशा में गुरु की दृष्टि से युक्त अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र-
त्रिकोण वा लाभ में।।४०।।
पूर्णचन्द्रे सौम्ययुक्ते राजप्रीति समागमम् ।
महाराजप्रसादेन वाहनाम्बर भूषणम् ।।४१।।
पूर्णचन्द्र शुभग्रह से युत हो तो इसके अन्तर में राजा से प्रेम और समागम
होता है। महाराजा की प्रसन्नता से वाहन वस्त्र आभूषण।।४१।।
सौभाग्यं सुखवृद्धिं च भृत्योश्च परिपालनम् ।
पितृमातृकुले सौख्यं पशुवृद्धिः सुखावहा ।।४२।।
सौभाग्य, सुख में वृद्धि, भृत्यों का पालन, पिता-माता के कुल में सुख देने
वाली पशु वृद्धि होती है।।४२।।
दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे लाभगेऽपिवा ।
वाहनाम्बरपश्वादि भ्रातृवृद्धिः सुखावहा ।।४३।।
दशेश से केन्द्र राशि में वा त्रिकोण में वा लाभ स्थान में हो तो वाहन, वस्त्र,
पशु, भाई की वृद्धि सुखद होती है।।४३।।
पितृमातृसुखावाप्तिः स्त्रीसौख्यं च धनागमम् ।
मित्रप्रभुवशादिष्टं सर्वसौख्यं शुभावहम् ।।४४।।
पिता-माता के सुख की प्राप्ति, स्त्री का सुख, धन का आगम, मित्र और
स्वामी की कृपा से इष्ट सिद्धि, और सभी कल्याण देने वाले सुख होते हैं।।४४।।
क्षीणो वा पापसंयुक्ते पापदृष्टौ विनीचंगे ।
क्रूरांशकगते वापि क्रूरक्षेत्रगतेऽपि वा ।।४५।।
यदि चन्द्रमा क्षीण वा पापग्रह से युक्त पापग्रह दृष्टा वा नीचराशि में हो अथवा
क्रूरग्रह के अंश में वा क्रूरग्रह की राशि में हो तो।।४५।।
जातकस्य महत्कष्टं राजकोपाद्धनक्षयः ।
पितृमातृवियोगश्च पुत्रीपुत्रादिरोगकृत् ।।४६।।

५१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
जातक को महाकष्ट, राजक्रोप से धन का नाश पिता माता से वियोग, पुत्रादि
को रोग होता है।।४६।।
व्यवसायात्फलं नेष्टं नानामार्गे धनव्ययम् ।
अकाले भोजनं चैवौषधस्य च भक्षणम् ।।४७।।
व्यवसाय में हानि, अनेक कार्यों में धनव्यय, कुसमय में भोजन, औषध सेवन,
होता है।।४७।।
फलाधिक्याद्विवादं च आदौ सौख्यं धनागमम् ।
दायेशात्षष्ठरिष्फे वा रन्ध्रे वा बलवर्जिते ।।४८।।
कला अधिक होने से विवाद, प्रथम धन का आगम और सुख होता है। दशेश
से ६।१२।८ भाव में निर्बल हो।।४८।।
शयनं रोगमालस्यं स्थानभ्रष्टं सुखावहम् ।
शत्रुवृद्धिर्विरोधं च इष्टबन्धुवियोगकृत् ।।४९।।
अधिक निद्रा, आलस्य स्थान की हानि, सुख, शत्रु वृद्धि, विरोध, और अभीष्ट
बंधुका वियोग होता है।।४९।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहालस्यो भविष्यति ।
तद्दोषशमनार्थं च तिलहोमादिकं चरेत् ।।५०।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में अधिक आलस्य होता है। इस
दोष के शान्त्यर्थ तिल का हवन आदि करना चाहिये।।५०।।
गुडं घृतं च दघ्नाक्तं तांडुलं च यथाविधि ।
श्वेतां गां महिषीं दद्याद्यायुरारोग्य वृद्धिकृत् ।।५१।।
गुड़, घी, दही मिला हुआ चावल, सफेद गौ, भैंस को यथाविधि दान करने
से आयु, आरोग्यता की प्राप्ति होती है।।५१।।
अथशनिदशायांभौमान्तर्दशाफलम्-
मन्दस्यान्तर्गते भौमे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
तुङ्गे स्वक्षेत्रगे वापि दशाधिपसमन्विते ।।५२।।
शनि की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण वा उच्च वा स्वराशि में दशेश
वा।।५२।।
लग्नाधिपेन संयुक्ते आदौ सौख्यं धनागमम् ।
राजप्रीतिकरं सौख्यं वाहनाम्बरभूषणम् ।।५३।।

अथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः ॥ ५१३
लग्नेश से युक्त भौम के अन्तर में पहले सुख, धन का आगम, राजा से प्रीति,
सुख, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ होता है॥५३॥
सेनाधिपत्यं नृपप्रीतिः कृषिगोधान्यसंग्रहः ।
नूतनस्थाननिर्माणं भ्रातृवर्गेष्टसौख्यकृत् ॥५४॥
सेनाधिपति का अधिकार, राजा से प्रेम, कृषि गौ धान्य का संग्रह, नवीन
स्थान का निर्माण, भाइयों से अभीष्ट सुख का लाभ होता है॥५४॥
नीचे चास्तंगते भौमे षष्ठाष्टव्ययराशिगे ।
पापद्दष्टियुते वापि धनहानिर्भविष्यति ॥५५॥
यदि भौम अपने नीच में वा अस्त हो वा ६।८।१२ भाव में हो तो धन
की हानि होती है॥५५॥
चौराहिब्रणशस्त्रादिग्रंथिरोगादिपीडनम् ।
भ्रातृपुत्रादिपीडा च दायादजनविग्रहम् ॥५६॥
चोर-सर्प-फोड़ा, हथियार, ग्रंथि रोगादि से पीड़ा होती है, भाई पुत्र को पीड़ा,
दायादों से विग्रह॥५६॥
चतुष्पाज्जीवहानिश्च कुत्सितान्नस्यभोजनम् ।
विदेशगमनं चैव नानामार्गे धनव्ययः ॥५७॥
चौपाये जानवर की हानि, खराब अन्न का भोजन, विदेश यात्रा, अनेक प्रकार
से धन व्यय होता है॥५७॥
अष्टमद्यूननाथे तु द्वितीयस्थेऽथवायदि ।
अपमृत्युभयं चैव नानाकष्टपराभवम् ॥५८॥
आठवें वा दूसरे भाव का स्वामी हो तो अनेक कष्ट और पराभव होता
है॥५८॥
तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिहोमं च कारयेत् ।
अनड्वाहं प्रकुर्वीत सर्वारिष्ट प्रशान्तये ॥५९॥
इस दोष के शान्त्यर्थ शान्ति और हवन करना चाहिये। और सभी अरिष्टों
के शान्त्यर्थ बैल का दान करना चाहिये॥५९॥
अथशनिदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् –
मन्दस्यान्तर्भते राहौ कलहश्च मनोव्यथा ।
देहपीडा मनस्तापः पुत्रद्वेषो मनोरूजः ॥६०॥

५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
शनि की दशा में राहु की अन्तर्दशा में कलह, मानसिक कष्ट, शरीर में पीड़ा,
मन में सन्ताप, पुत्र से द्वेष, मन में पीड़ा॥६०॥
अर्थव्ययं राजभयं स्वजनादि ह्युपद्रवम् ।
विदेशगमनं चैव गृहक्षेत्रादिनाशनम् ॥६१॥
धन का व्यय, राजभय, आपस के लोगों का उपद्रव, विदेश यात्रा और गृह
क्षेत्र आदि का विनाश होता है॥६१॥
लग्नाधिपेन संयुक्ते योगकारकसंयुते ।
स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे केन्द्रे दायेशाल्लाभराशिमे ॥६२॥
यदि राहु लग्नेश से वा योगकारक से युत हो तो अपने उच्च, अपने क्षेत्र,
केन्द्र में वा दशेश से लाभ स्थान में हो॥६२॥
आदौ सौख्यं धनावाप्तिं गृहक्षेत्रादिसंपदम् ।
देवब्राह्मणभक्तिं च तीर्थयात्रादिकं लभेत् ॥६३॥
आदि में सुख धन का लाभ, गृह क्षेत्र आदि का सुख, देवता, ब्राह्मण की
भक्ति, तीर्थ यात्रा आदि का लाभ॥६३॥
चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्गृहे कल्याणवर्धनम् ।
मध्ये तु राजभीतिश्च पुत्रमित्र विरोधनम् ॥६४॥
चतुष्पद जीव का लाभ, गृह में कल्याण की वृद्धि होती है। मध्य में राजभय,
पुत्रमित्र आदि से विरोध होता है॥६४॥
मेषादौ कन्यकां चैव कुलीरे वृषभेतथा ।
मीनकोदंडसिंहेषु गजांतैश्वर्यमादिशेत् ॥६५॥
मेष-कन्या, कर्क, वृष, मीन, धन सिंह राशि में हो तो गजांत ऐश्वर्य का
लाभ॥६५॥
राजसन्मानभूषाप्तिं मृदुलाम्बरसौख्यकृत् ।
द्विसप्तमाधिपैर्युक्ते देहबाधाभविष्यति ॥६६॥
राजा से सन्मान, आभूषण का लाभ, कोमल वस्त्र से सुख होता है। यदि
दूसरे वा सातवें भाव के स्वामी से युक्त हो तो शरीर में बाधा होने की सम्भावना
होती है॥६६॥
मृत्युंजय प्रकुर्वीत छागदानं च कारयेत् ।
अनड्वाहं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ॥६७॥

अथान्तर्दशाफलविचाराध्यायः । ५१५
इसकी शान्ति के लिये मृत्युंजय का जप, बकरी और बैल का दान करने
से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है।।६७।।
अथशनिदशायां गुर्वन्तर्दशाफलम्-
मन्दसस्यान्तर्गतेजीवे केन्द्रे लाभत्रिकोणभे ।
लग्नाधिपेन संयुक्ते स्वोच्चे स्वक्षेत्रगेऽपिवा ।।६८।।
शनि की दशा में केन्द्र, लाभ वा त्रिकोण में गये हुये लग्नेश से युत अपने
उच्च वा अपनी राशि में गये हुये गुरु के अन्तर में ।।६८।।
सर्वकार्यार्थसिद्धिः स्याच्छोभनं भवतिध्रुवम् ।
महाराजप्रसादेन धनवाहनभूषणम् ।।६९।।
सभी प्रकार के कार्यों की सिद्धि तथा धन का लाभ होता है। महाराजा की
प्रसन्नता से धन वाहन आभूषण का लाभ।।६९।।
देवतागुरुभक्तिश्च विद्वज्जनसमागमः ।
दारपुत्रादिलाभश्च पुत्रकल्याणवैभवम् ।।७०।।
देवता-गुरु में भक्ति विद्वानों का समागम, स्त्री पुत्र आदि का लाभ पुत्र को
सुख और वैभव की प्राप्ति होती है।।७०।।
दायेशात्केन्द्रकोणे वा धने वा लाभगेऽपि वा ।
विभवं दारसौभाग्यं राजश्री धनसम्पदः ।।७१।।
दशेशं से केन्द्र-कोण वा दूसरे वा लाभ में हो तो वैभव, स्त्री का सुख,
राज्यलक्ष्मी, धन सम्पत्ति।।७१।।
भोजनाम्बर सौख्यं च दानधर्मादिकं लभेत् ।
ब्रह्मप्रतिष्ठासिद्धिश्च ऋतुकर्मफलप्रदम् ।।७२।।
भोजन वस्त्र का सुख, दान, धर्मादि क्रियायें, प्रतिष्ठा का लाभ, यज्ञकर्म का
फल।।७२।।
अन्नदानं महाकीर्त्तिर्वेदांतश्रवणादिकम् ।
षष्ठाष्टमव्यये जीवे नीचे वा पापसंयुते ।।७३।।
अन्नदान, अत्यन्त कीर्त्ति और वेदांत का श्रवण होता है। यदि गुरु ६।८।१२
भाव में हो वा नीच में वा पापयुत हो तो।।७३।।
आत्मसम्बंधि मरणं धनधान्यविनाशनम् ।
राजस्थानजनद्वेषः कार्यहानिर्भविष्यति ।।७४।।

वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
५१६
आत्मीय संबंधी का मरण, धन धान्य का नाश, राजकीय पुरुषों से द्वेष कार्य
की हानि होती है।।७४।।
विदेशगमनं चैव कुष्ठरोगादिसम्भवः ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ।।७५।।
विदेश यात्रा और कुष्ठरोग की सम्भावना होती है। दशेश से ६ वा ८ वा
१२ स्थान में निर्बल हो तो।।७५।।
बंधुद्वेषं मनोदुःखं कलहं पदविच्युतिम् ।
कुभोजनं कर्महानिराजमूलाद्धनव्ययम् ।।७६।।
बंधुओं से द्वेष, मन को दुःख, कलह और पद की हानि, कुभोजन, कार्य
की हानि, राजमूल से धन का व्यय।।७६।।
कारागृहप्रवेशं च पुत्रदारादिपीडनम् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।।७७।।
जेलयात्रा, पुत्र स्त्री को कष्ट होता है। २।७ भाव का स्वामी हो तो शरीर
में बाधा होती है।।७७।।
आत्मसम्बन्धिमरणं भविष्यति न संशयः ।
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।
स्वर्णदानं प्रकुर्वीत आरोग्यं भवति ध्रुवम् ।।७८।।
आत्मीय सम्बन्धि का मरण होता है। इस दोष में शान्ति के लिये
शिवसहस्रनाम का जप और सुवर्ण का दान करने से आरोग्यता होती है।।७८।।
इति शनिदशायामन्तर्दशाफलम्।
अथबुधदशायांबुधान्तर्दशाफलम्-
मुक्ताविद्रुमलाभश्च ज्ञानकर्मसुखादिकम् ।
विद्यामहत्वं कीर्त्तिश्च नूतनप्रभुदर्शनम् ।।१।।
बुध की दशा में बुध के अन्तर में मुक्ता (मोती) मूङा का लाभ, ज्ञान, सत्कर्म,
लाभादि, विद्या का महत्व, कीर्त्ति, नये स्वामी का दर्शन।।१।।
विभवं दारपुत्रादिपितृमातृसुखोवहम् ।
नीचोग्रखेटसंयुक्ते षष्ठाष्टव्ययराशिगे ।।२।।
वैभव और स्त्री, पुत्र पिता का सुख होता हैं। यदि अपनी नीचराशि उग्रग्रह
से युक्त हो वा ६।८।१२ राशि में हो।।२।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५१७
पापयुक्तेऽथवा दृष्टे धनधान्यपशुक्षयम् ।
आत्मबन्धुविरोधं च शूलरोगादिसम्भवम् ॥३॥
पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो धन धान्य पशु का नाश, आत्मीय बन्धु से विरोध,
शूलरोगादि की सम्भावना॥३॥
राजकार्यकलापेन व्याकुलो भवति ध्रुवम् ।
द्वितीयद्यूननाथे तु दारक्लेशो भविष्यति ॥४॥
और राजकार्य के सम्बन्ध से व्याकुलता होती है। २ वा ७ भाव का स्वामी
हो तो स्त्री को कष्ट॥४॥
आत्मसंबन्धिमरणं वातशूलादिसम्भवम् ।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ॥५॥
आत्मीय सम्बन्धी की मृत्यु औरै बातशूलादि रोगों की सम्भावना होती है।
इस दोष की शान्ति के लिये विष्णु सहस्र नाम का जप करना चाहिये॥५॥
बुधस्यान्तर्गते केतौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नाधिपसमन्विते ॥६॥
बुध की दशां में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में शुभग्रह से युक्त वा दृष्ट वा
लग्नेश से युक्त॥६॥
यीगकारकसम्वन्धे दायेशात्केन्द्रलाभगे ।
देहसौख्यं धनाल्पत्वं बन्धुस्नेहसहायकृत् ॥७॥
वा योगकारक से सम्बन्ध करते हुये दशेश से केन्द्र वा लाभ भाव में स्थित
केतु के अन्तर में देह का सुख, धन की अल्पता, बन्धुओं का स्नेह और
सहायता॥७॥
चतुष्पाज्जीवलाभः स्यात्संसारे देहसौख्यभाक् ।
विद्याकीर्त्तिप्रसंगश्च समानप्रभुदर्शनम् ॥८॥
चतुष्पद जीव का लाभ, देह सुखं, विद्या, और यश का प्रसंग अपने समान
स्वामी का दर्शन॥८॥
भोजनाम्बरसौख्यं च ह्यादौ मध्ये सुखावहम् ।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्ययेवा पापसंयुते ॥९॥
भोजन-वस्त्र, सुख पहले होता है मध्य में सुख होता है। दशेश से ६।८।१२
भाव में पापग्रह से युत हो तो॥९॥

५१८ वृहतपाराशरहोराशास्त्रम् ।
वाहनात्पतनं चैव पुत्रक्लेश समायुतम् ।
चौरादिराजभीतिश्च पापकर्मरतः सदा ।।१०।।
वाहन से पतन, पुत्र कष्ट से युक्त, चौर आदि से तथा राजा से भय, सदा
पापकर्म में रत।।१०।।
वृश्चिकादिविषाद्भीतिर्नीचैः कलहसंयुतः ।
शोकरोगादि दुःखं च संसाराद्विचलं भवेत् ।।११।।
वृश्चिक (बिच्छू) आदि जहरीले जानवरों के विष से भय, नीचों से झगड़ा,
शोक-रोग आदि दुःखों से युक्त और संसार से विचलित होता है।।११।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं छागदानं तु कारयेत् ।।१२।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में जड़ता होती है। इसके शान्त्यर्थ
बकरी का दान करना चाहिये।।१२।।
अथबुधदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम् -
सौम्यस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रे लाभत्रिकोणगे ।
सत्कथापुण्यं धर्मादिसंग्रहः पुण्यकर्मकृत् ।।१३।।
'बुध की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में गये हुये शुक्र के अन्तर में
अच्छी कथा, पुण्य धर्मादि का संग्रह, पुण्य कर्म ।।१३।।
मित्रप्रभुवशादिष्टं क्षेत्रलाभः सुखं भवेत् ।
दशाधिपात्केन्द्रगतस्त्रिकोणे लाभगेऽपिवा ।।१४।।
मित्र और स्वामी के इष्ट की सिद्धि, क्षेत्र का लाभ, सुख दशेश से केन्द्र वा
लाभ वा त्रिकोण में हो तो।।१४।।
तत्काले श्रियमाप्नोति राजश्री धनसम्पदः ।
वापीकूपतडागादि दानधर्मादिसंग्रहः ।।१५।।
तत्काल धन का लाभ, राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति, वापी, कूप, तालाब, दान,
धर्म आदि का संग्रह।।१५।।
व्यवसायात्फलाधिक्यं धनधान्यसमृद्धिकृत् ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रस्तेव्यये वा बलवर्जिते ।।१६।।
व्यवसाय से अधिक लाभ और धन-धान्य समृद्धि का लाभ होता है। दशेश -
से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो तो।।१६।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५१९
हृद्रोगो मानहानिश्च ज्वरातीसारपीडनम् ।
आत्मबन्धुवियोगश्च संसारे देहनिष्प्रभम् ।।१७।।
हृदय का रोग, मानहानि, ज्वर अतिसार की पीड़ा, आत्मीय बन्धु का वियोग,
संसार से विरूपता।।१७।।
आत्मक्लेशं मनस्तापमापदादि विपत्तयः ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गादेवी जपं चरेत् ।।१८।।
अपने को क्लेश, मनमें संताप आदि विपत्तियाँ होती हैं। दूसरे वा सातवें
भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ दुर्गा देवी
का जप कराना चाहिये।।१८।।
अथ बुधदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्-
सौम्यस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे ।
त्रिकोणे धनलाभेषु तुङ्गांशे स्वांशगेऽपिवा ।।१९।।
बुध की दशा में अपनी उच्च, अपनी राशि, त्रिकोण वा धन वा लाभ वा
उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये सूर्य के अन्तर में।।१९।।
राजप्रसादसौभाग्यं मित्रप्रभुवशात्सुखम् ।
भूम्यात्मजेन संदृष्टे आदौ भूलाभमेव च ।।२०।।
राजा की प्रसन्नता का सौभाग्य, मित्र और स्वामी के द्वारा महासुख का लाभ
होता है। भौम से देखा जाता हो तो प्रथम भूमि का लाभ होता है।।२०।।
लग्नाधिपेन संदृष्टे बहुसौख्यं धनागमम् ।
ग्रामभूम्यादिलाभं च भोजनाम्बरसौख्यकृत् ।।२१।।
लग्नेश से दृष्ट हो तो बहुत सुख और धन का आगम, ग्राम, भूमि का लाभ
और भोजन वस्त्र का सुख होता है।।२१।।
षष्ठाष्टमव्यये वापि शन्यरफणिसंयुते ।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ।।२२।।
यदि सूर्य ६।८।१२ भाव में शनि भौम राहु से युत हो वा दशेश से ६।८।१२
भाव में निर्बल होतो।।२२।।
चौराग्निशस्त्रपीडा च पित्ताधिक्यं भविष्यति ।
शिरोरूङ्मनसस्तापं इष्टबंधु वियोगकृत् ।।२३।।

५२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
चोर, अग्नि, शस्त्र से पीड़ा और अधिक पित्त होता है। शिर में रोग, मनमें
संताप, इष्ट बंधु का वियोग होता है।।२३।।
द्वितीयसप्तमाधीशे ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ।
सूर्यप्रीतिकरीं चैव दद्याद्धेनुं हिरण्यकम् ।।२४।।
२।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है! इसके शान्त्यर्थ
यथाविधि सूर्य के प्रसन्न करने वाली शान्ति करनी चाहिये और गौ तथा सुवर्ण का
दान करना चाहिये।।२४।।
अथ बुधदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् -
सौम्यस्यान्तर्गते चन्द्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्ष्मे वापि गुरुदृष्टिसमन्विते ।।२५।।
बुध की महादशा में लग्न-से केन्द्र वा त्रिकोण में अपने उच्च में वा अपनी
राशि में गुरु से देखे जाते हुये।।२५।।
योगस्थानाधिपत्येन योगप्राबल्यमादिशेत् ।
स्त्रीलाभं पुत्रलाभं च वस्त्रवाहनभूषणम् ।।२६।।
योगस्थान के अधिपति होने से योग प्रबल होता है, ऐसे चन्द्रमा के अन्तर
में स्त्री का लाभ, पुत्र का लाभ और वस्त्र, वाहन, आभूषण का लाभ।।२६।।
नूतनालयलाभं च नित्यं मिष्टान्नभोजनम् ।
गीतवाद्यप्रसंगश्च शास्त्रविद्याप्रशंसनम् ।।२७।।
नूतन गृह का लाभ नित्य मिष्टान्न का भोजन होता है। गाना-बाजा का सुख,
शास्त्र विद्या की प्रशंसा।।२७।।
दक्षिणांदिशमाश्रित्य प्रयाणं च भविष्यति ।
द्विपान्तरादि वस्त्राणां लाभश्चैवभविष्यति ।।२८।।
दक्षिण दिशा की यात्रा, द्वीपान्तर के वस्त्रों का लाभ।।२८।।
मुक्ताविद्रुमरत्नानि धौतवस्त्रादिलाभदम् ।
नीचारिक्षेत्रसंयुक्ते देहबाधा भविष्यति ।।२९।।
मुक्ता, मूङ्गा का लाभ और धौत वस्त्र का लाभ होता है। अपने नीच वा शत्रु
की राशि में स्थित हो तो शरीर में बाधा होती है।।२९।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२१
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा ।
तद्भुक्त्यादौ पुण्यतीर्थस्थानदैवतदर्शनम् ।।३०।।
दशेश से केन्द्र वा कोण वा तीसरे वा एकादश भाव में हो तो उसके अन्तर
के प्रारम्भ में पुण्यतीर्थ स्थान और देवता का दर्शन।।३०।।
मनोधैर्यं हृदुत्साहं विदेशेधनलाभकृत् ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते ।।३१।।
मन में धैर्य, हृदय में उत्साह और विदेश से धन का लाभ होता है। यदि
चन्द्रमा दशेश से ६ या ८ या १२ भाव में पापग्रह से युत हो तो।।३१।।
चौराग्निनृपभीतिश्च स्त्रीसंगेगमनंतथा ।
दुष्कृतिर्धनहानिश्च कृषिगोऽश्वादिनाशनम् ।।३२।।
चोर, अग्नि, राजा से भय, स्त्री संग में यात्रा, दुष्कीर्त्ति और धन की हानि,
कृषि, गौ, घोड़ा की हानि होती है।।३२।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुगंदेवी जपं चरेत् ।
वस्त्रदानं प्रकुर्वीत आयुर्वृद्धिसुखावहम् ।।३३।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर की बाधा होती है। इस दोष की शान्ति
के लिये दुर्गा देवी का जप करना चाहिये। आयु वृद्धि और सुख के लिये वस्त्र का
दान करना चाहिये।।३३।।
अथ बुधदशायां भौमान्तर्दशाफलम्-
सौम्यस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वर्क्ये भौमे लग्नाधिपसमन्विते ।।३४।।
बुध की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा अपने उच्च वा अपनी राशि
में लग्नेश से युत भौम के अन्तर में।।३४।।
राजानुग्रह शान्तिं च गृहे कल्याण संभवम् ।
लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि नष्टराज्यार्थलाभकृत् ।।३५।।
राजा की कृपा, शान्ति, गृह में कल्याण और लक्ष्मी की प्रसन्नता के चिह्न,
नष्ट हुये राज्य तथा धन का लाभ।।३५।।
पुत्रोत्सवादिसंतोषं गृहे गोधनसंकुलम् ।
गृहक्षेत्रादिलाभं च गजवाजिसमन्वितम् ।।३६।।

५२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
पुत्रोत्सव, गोधन की वृद्धि हाथी घोड़े के साथ गृहभूमि का लाभ।।३६ ।।
राजप्रीतिकरं चैव स्त्रीसौख्यं चातिशोभनम् ।
नीचक्षेत्रसमायुक्ते ह्यष्टमे वा व्ययेऽपिवा ।।३७।।
राजा की प्रसन्नता और स्त्री का सुख प्राप्त होता है। यदि भौम नीच राशि
में आठवें या बारहवें भाव में।।३७।।
पापदृष्टियुते वापि देहपीडा मनोव्यथा ।
उद्योगभङ्गो देशादौ स्वग्रामे धान्यनाशनम् ।।३८।।
पापग्रह से दृष्ट वा युत हो तो शरीर में पीड़ा, मानसिक कष्ट, देश में उद्योग
की हानि और अपने ग्राम में धान्य की हानि।।३८।।
ग्रन्थिशस्त्रव्रणादीनां भयंतापज्वरादिकम् ।
दायेशात्केन्द्रगे भौमे त्रिकोणे लाभगेऽपिवा ।।३९।।
ग्रन्थि, शस्त्र, व्रण आदि का भय, तापज्वर आदि होता है। दशेश से केन्द्र
वा त्रिकोण वा लाभ में भौम हो।।३९।।
शुभदृष्टेश्च सम्प्राप्तिर्देहसौख्यं धनागमम् ।
पुत्रलाभं यशोवृद्धिं मातृवर्गो महाप्रियः ।।४०।।
शुभग्रह से दृष्ट हो तो द्रव्य की प्राप्ति, देहसुख, पुत्र का लाभ, यश की वृद्धि
और भाइयों से प्रीति होती है।।४०।।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
तद्भुक्त्यादौ महाक्लेशं भ्रातृवर्गे महद्भयम् ।।४१।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युक्त भौम हो तो अन्तर के आरम्भ
में महाक्लेश, भाइयों से भय।।४१।।
नृपाग्निचौरभीतिश्च पुत्रमित्रविरोधनम् ।
स्थानभ्रंशं महद्वैरं मध्ये सौख्यं धनागमम् ।।४२।।
राजा, अग्नि, चोर का भय, पुत्र-मित्र से विरोध, स्थान की हानि, महावैर
होता है, मध्य में सुख और धन का आगम।।४२।।
अंते तु राजभीतिः स्यात्स्थानभ्रंशोह्यथापिवा ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युभयं भवेत् ।
अनड्वाहं प्रकुर्वीत मृत्युंजय जपं चरेत् ।।४३।।
और अंत में राजभय, स्थान की हानि होती है। दूसरे या सातवें भाव के

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२३
स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। बैल का दान और मृत्युंजय का जप कराना
चाहिये।।४३।।
अथ बुधदशायांराह्वन्तर्दशाफलम्-
बुधस्यान्तर्गते राहौ केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
कुलीरे मकरे वापि कन्यायां वृषभेऽपि वा ।।४४।।
बुध की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में वा कर्क वा मकर वा कन्या
वा वृष राशि में गये हुये राहु के अन्तर में।।४४।।
राजसम्मानकीर्त्तिं च धनंधान्यं भविष्यति ।
पुण्यतीर्थस्थानलाभं देवतादर्शनं तथा ।।४५।।
राजा से सम्मान, कीर्ति, धन धान्य का लाभ, पुण्यतीर्थ का लाभ, देवता
का दर्शन।।४५।।
इष्टापूर्त्ते च महतो मानश्चाम्बरलाभकृत् ।
भुक्त्यादौ देहपीडा च अंते सौख्यं विनिर्दिशेत् ।।४६।।
यज्ञ और मान, वस्त्र का लाभ होता है। अंतर के आदि में देह पीड़ा और
अन्त में सुख होता है।।४६।।
लग्गाद्युपचये राहौ शुभग्रहसमन्विते ।
राजसंलापसन्तोषं नूतनप्रभुदर्शनम् ।।४७।।
लग्न से उपचय (३।६।१०।११) स्थान में शुभग्रह से युक्त राहु हो तो राजा
से सम्मान संतोष और नवीन स्वामी का दर्शन होता है।।४७।।
षष्ठाष्टव्ययराशिस्थे तद्भुक्तौ धननाशनम् ।
भुक्त्यादौ देहनाशं च वातज्वरमजीर्णकृत् ।।४८।।
यदि राहु ६।८।१२ भाव में हो तो उसके अंतर के आरम्भ में धन का नाश,
देह का नाश, वात ज्वर अजीर्ण से होता है।।४८।।
दायेशात्षष्ठरिःफेवा ह्यष्टमे पापसंयुते ।
निष्ठुरं राजकार्याणि स्थानभ्रंशोमहद्भयम् ।।४९।।
दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो कड़े राजकार्य, स्थान
की हानि, महाभय।।४९।।
बंधनं रोगपीडा च आत्मबन्धु मनोव्यथा ।
हृद्रोगो मानहानिश्च धनहानिर्भविष्यति ।।५०।।

५२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
बंधन, रोगापीड़ा, आत्मीय बंधु को मानसिक कष्ट, हृदय रोग, धन की हानि,
मानहानि और धनहानि होती है॥५०॥
द्वितीयसप्तमस्थे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुर्गालक्ष्मीजपं चरेत् ।
श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यदायिनीम् ॥५१॥
२ वा ७ भाव में हो तो अपमृत्यु होती है। इस दोष की शान्ति के लिये
दुर्गा लक्ष्मी का जप करना चाहिये और आयु और आरोग्यता को देने वाली श्वेत
गौ और भैंस का दान करना चाहिये॥५१॥
अथ बुधदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्-
बुधस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि लाभे वा धनराशिगे ॥५२॥
बुध की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा अपने उच्च वा अपनी राशि
वा लाभ वा दूसरे स्थान में गये हुये गुरु के अन्तर में॥५२॥
देहसौख्यं धनावाप्तिं राजप्रीतिं तथैव च ।
विवाहोत्सवकार्याणि नित्यमिष्टान्नभोजनम् ॥५३॥
देहसुख, धन की प्राप्ति, राजा से प्रेम, घिवाहोत्सव, नित्य मिष्टान्न का
भोजन॥५३॥
गोमहिष्यादिलाभं च पुराणश्रवणादिकम् ।
देवतागुरुभक्तिश्च दानधर्ममखादिकम् ॥५४॥
देवता गुरु में भक्ति, दान, धर्म, गौ, भैंस आदि का लाभ, पुराण आदि का
श्रवण॥५४॥
यज्ञकर्मप्रवृद्धिं च शिवपूजाफलं तथा ।
दायेशात्केन्द्रकोणेवा लाभे वा बलसंयुते ॥५५॥
यज्ञ की वृद्धि शिवपूजन का फल होता है। दशेश से केन्द्र वा कोण वा लाभ
स्थान में बली हो तो॥५५॥
बंधुपुत्रहृदुत्साहं शुभं शोभनसंयुतम् ।
पशुवृद्धियशोलाभमन्नदानादिकं फलम् ॥५६॥
बंधु पुत्र का सुख हृदय में उत्साह और शुभ फल, पशु वृद्धि, यश का लाभ,
अन्न दानादि फल होते हैं॥५६॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः ॥ ५२५
नीचे वास्तंगते वापि षष्ठाष्टव्ययगेऽपिवा ।
शन्र्यारफणिसंयुक्ते कलहोराजविग्रहम् ॥५७॥
यदि गुरु अस्त हो वा ६।८।१२ में हों शनि, भौम राहु से युक्त हो तो कलह,
राजा से विरोध ॥५७॥
चौरादिदेहपीडा च पितृमातृविनाशनम् ।
दायेशात्षष्ठरंध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ॥५८॥
चोर आदि से शरीर में पीड़ा पिता माता का नाश होता है। दशेश से ६।८।१२
में निर्बल हो तो ॥५८॥
अङ्गतापश्च वैकल्यं देहबाधा भविष्यति ।
कलत्रबंधुवैषम्यं राजकोपो धनक्षयः ॥५९॥
शरीर में ताप, अङ्ग में विकलता, देह में बाधा, स्त्री बंधु से बैर, राजकोप,
धन की हानि ॥५९॥
अकस्मात्कलहाद्भीतिः प्रमादो राजविद्विषम् ।
द्वितीय सप्तमस्थे वा देहबाधा भविष्यति ॥६०॥
अकस्मात् कलह से भय प्रमाद से राजा से शत्रुता होती है। २।७ भाव में
हो तो शरीर बाधा होती है॥६०॥
तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।
गोभूहिरण्‍यदानेन सर्वानिष्टं प्रणश्यति ॥६१॥
इस दोष के परिहार के लिये शिवसहस्रनाम का जप और गौ, भूमि, सोना
के दान से सभी अरिष्ट नष्ट हो जाते हैं॥६१॥
अथ बुधदशायांशन्‍यन्तर्दशाफलम् -
सौम्यस्यान्तर्गतेमन्दे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे ।
त्रिकोणलाभगे वापि गृहे कल्याणवर्धनम् ॥६२॥
बुध की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण में वा लाभ
में गये हुये शनि के अन्तर में गृह में कल्याण की वृद्धि॥६२॥
राज्यलाभं महोत्साहं गृहे गोधनसंकुलम् ।
शुभस्थानफलावाप्तिं तीर्थादौ भ्रमणं तथा ॥६३॥
राज्य का लाभ, अत्यंत उत्साह, गौ, धन की वृद्धि, शुभ स्थान की प्राप्ति,
तीर्थ आदि में भ्रमण होता है॥६३॥

५२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
षष्ठाष्टमव्यये मन्दे दायेशाद्वा तथैव च ।
अरातिदुःखबाहुल्यं दारपुत्रादिपीडनम् ।।६४।।
६।८।१२ भाव में शनि हो दशेश से भी इन्हीं स्थानों में हो तो शत्रु...
अधिक दुःख, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा।।६४।।
बुद्धिभ्रंशं बंधुनाशं कर्मनाशं मनोरूजम् ।
विदेशगमनंचैवदुःस्वप्नस्यप्रदर्शनम् ।।६५।।
बुद्धि का नाश, बंधु का नाश, कर्म का नाश, मन में दुःख, विदेश यात्रा,
दुःस्वप्नों का दर्शन होता है।।६५।।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजय जपं चरेत् ।
कृष्णां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यवृद्धिनम् ।।६६।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष की
शान्ति के लिये काली गौ और भैंस का दान आयु आरोग्यता की वृद्धि के लिये
देना चाहिये।।६६।।
इति बुधदशायामन्तर्दशाफलम्।
अथ केतुदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्-
केन्द्रे त्रिकोणलाभे वा लग्नाधिपसमन्विते ।
भाग्यकर्मेशसम्बन्धे वाहनेशसमन्विते ।।१।।
केतु की दशा में केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ स्थान में लग्नेश से युत वा भाग्येश
कर्मेश से अच्छे सम्बन्ध से युक्त वाहनेश से युत केतु के अन्तर में।।१।।
तद्भुक्तौ धनधान्यादि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् ।
पुत्रदारादिसौख्यं च राजप्रीति मनोरूजः ।।२।।
धन धान्य से युक्त चतुष्पद जीव का लाभ, पुत्र स्त्री का सुख, राजा से प्रेम
मानसिक कष्ट।।२।।
ग्रामभूम्यादिलाभश्च गृहं गोधनसंकुलम् ।
नीच ऽखेटसंयुक्ते ह्राष्टमे व्ययगेऽपिवा ।।३।।
ग्राम भूमि आदि का लाभ और घर गोधन से परिपूर्ण होता है। नीच बा अस्त
में गये हुये ग्रह से युक्त हो वा आठवें वा बारहें भाव में हो तो ।।३।।
हृद्रोगं मानहानिं च धनधान्यपशुक्षयम् ।
दारपुत्रादिपीडां च मनश्चांचल्यमेव च ।।४।।