बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 505, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५०७
फल अन्तर में आरम्भ में होता है, मध्य और अन्त में रोग और पीड़ा होती है।।१२।।
नष्टानि सर्वकार्याणि व्याकुलत्वं महद्भयम् ।
द्वितीयसप्तमाधीशो देहबाधा भविष्यति ।।१३।।
सभी कार्य नष्ट हो जाते हैं; व्याकुलता और बड़ा भय होता है। दूसरे या
सातवें भाव के अधिपति हो तो शरीर में बाधा होती है।।१३।।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् ।
अन्नदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।१४।।
इस दोष की शान्ति के लिये विष्णु सहस्र नाम स्तोत्र का जप और अन्नदान
करना चाहिये इसके करने से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है।।१४।।
अथशनिदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्-
मन्दस्यान्तर्गते केतौ शुभदृष्टियुतेक्षिते ।
स्वोच्चे वा शुभराशिस्थे योगकारकसंयुते ।।१५।।
शनि की दशा में शुभग्रह से युत दृष्ट वा अपने उच्च वा शुभराशि में गये
हुये