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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 800 में से

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पृष्ठ 519

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५२१
दायेशात्केन्द्रकोणस्थे दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा ।
तद्भुक्त्यादौ पुण्यतीर्थस्थानदैवतदर्शनम् ।।३०।।
दशेश से केन्द्र वा कोण वा तीसरे वा एकादश भाव में हो तो उसके अन्तर
के प्रारम्भ में पुण्यतीर्थ स्थान और देवता का दर्शन।।३०।।
मनोधैर्यं हृदुत्साहं विदेशेधनलाभकृत् ।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा पापसंयुते ।।३१।।
मन में धैर्य, हृदय में उत्साह और विदेश से धन का लाभ होता है। यदि
चन्द्रमा दशेश से ६ या ८ या १२ भाव में पापग्रह से युत हो तो।।३१।।
चौराग्निनृपभीतिश्च स्त्रीसंगेगमनंतथा ।
दुष्कृतिर्धनहानिश्च कृषिगोऽश्वादिनाशनम् ।।३२।।
चोर, अग्नि, राजा से भय, स्त्री संग में यात्रा, दुष्कीर्त्ति और धन की हानि,
कृषि, गौ, घोड़ा की हानि होती है।।३२।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं दुगंदेवी जपं चरेत् ।
वस्त्रदानं प्रकुर्वीत आयुर्वृद्धिसुखावहम् ।।३३।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर की बाधा होती है। इस दोष की शान्ति
के लिये दुर्गा देवी का जप करना चाहिये। आयु वृद्धि और सुख के लिये वस्त्र का
दान करना चाहिये।।३३।।
अथ बुधदशायां भौमान्तर्दशाफलम्-
सौम्यस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वर्क्ये भौमे लग्नाधिपसमन्विते ।।३४।।
बुध की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा अपने उच्च वा अपनी राशि
में लग्नेश से युत भौम के अन्तर में।।३४।।
राजानुग्रह शान्तिं च गृहे कल्याण संभवम् ।
लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि नष्टराज्यार्थलाभकृत् ।।३५।।
राजा की कृपा, शान्ति, गृह में कल्याण और लक्ष्मी की प्रसन्नता के चिह्न,
नष्ट हुये राज्य तथा धन का लाभ।।३५।।
पुत्रोत्सवादिसंतोषं गृहे गोधनसंकुलम् ।
गृहक्षेत्रादिलाभं च गजवाजिसमन्वितम् ।।३६।।