बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
पुत्रोत्सव, गोधन की वृद्धि हाथी घोड़े के साथ गृहभूमि का लाभ।।३६ ।।
राजप्रीतिकरं चैव स्त्रीसौख्यं चातिशोभनम् ।
नीचक्षेत्रसमायुक्ते ह्यष्टमे वा व्ययेऽपिवा ।।३७।।
राजा की प्रसन्नता और स्त्री का सुख प्राप्त होता है। यदि भौम नीच राशि
में आठवें या बारहवें भाव में।।३७।।
पापदृष्टियुते वापि देहपीडा मनोव्यथा ।
उद्योगभङ्गो देशादौ स्वग्रामे धान्यनाशनम् ।।३८।।
पापग्रह से दृष्ट वा युत हो तो शरीर में पीड़ा, मानसिक कष्ट, देश में उद्योग
की हानि और अपने ग्राम में धान्य की हानि।।३८।।
ग्रन्थिशस्त्रव्रणादीनां भयंतापज्वरादिकम् ।
दायेशात्केन्द्रगे भौमे त्रिकोणे लाभगेऽपिवा ।।३९।।
ग्रन्थि, शस्त्र, व्रण आदि का भय, तापज्वर आदि होता है। दशेश से केन्द्र
वा त्रिकोण वा लाभ में भौम हो।।३९।।
शुभदृष्टेश्च सम्प्राप्तिर्देहसौख्यं धनागमम् ।
पुत्रलाभं यशोवृद्धिं मातृवर्गो महाप्रियः ।।४०।।
शुभग्रह से दृष्ट हो तो द्रव्य की प्राप्ति, देहसुख, पुत्र का लाभ, यश की वृद्धि
और भाइयों से प्रीति होती है।।४०।।
दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ।
तद्भुक्त्यादौ महाक्लेशं भ्रातृवर्गे महद्भयम् ।।४१।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युक्त भौम हो तो अन्तर के आरम्भ
में महाक्लेश, भाइयों से भय।।४१।।
नृपाग्निचौरभीतिश्च पुत्रमित्रविरोधनम् ।
स्थानभ्रंशं महद्वैरं मध्ये सौख्यं धनागमम् ।।४२।।
राजा, अग्नि, चोर का भय, पुत्र-मित्र से विरोध, स्थान की हानि, महावैर
होता है, मध्य में सुख और धन का आगम।।४२।।
अंते तु राजभीतिः स्यात्स्थानभ्रंशोह्यथापिवा ।
द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युभयं भवेत् ।
अनड्वाहं प्रकुर्वीत मृत्युंजय जपं चरेत् ।।४३।।
और अंत में राजभय, स्थान की हानि होती है। दूसरे या सातवें भाव के