सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 800 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 510

५१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
जातक को महाकष्ट, राजक्रोप से धन का नाश पिता माता से वियोग, पुत्रादि
को रोग होता है।।४६।।
व्यवसायात्फलं नेष्टं नानामार्गे धनव्ययम् ।
अकाले भोजनं चैवौषधस्य च भक्षणम् ।।४७।।
व्यवसाय में हानि, अनेक कार्यों में धनव्यय, कुसमय में भोजन, औषध सेवन,
होता है।।४७।।
फलाधिक्याद्विवादं च आदौ सौख्यं धनागमम् ।
दायेशात्षष्ठरिष्फे वा रन्ध्रे वा बलवर्जिते ।।४८।।
कला अधिक होने से विवाद, प्रथम धन का आगम और सुख होता है। दशेश
से ६।१२।८ भाव में निर्बल हो।।४८।।
शयनं रोगमालस्यं स्थानभ्रष्टं सुखावहम् ।
शत्रुवृद्धिर्विरोधं च इष्टबन्धुवियोगकृत् ।।४९।।
अधिक निद्रा, आलस्य स्थान की हानि, सुख, शत्रु वृद्धि, विरोध, और अभीष्ट
बंधुका वियोग होता है।।४९।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहालस्यो भविष्यति ।
तद्दोषशमनार्थं च तिलहोमादिकं चरेत् ।।५०।।
२ वा ७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में अधिक आलस्य होता है। इस
दोष के शान्त्यर्थ तिल का हवन आदि करना चाहिये।।५०।।
गुडं घृतं च दघ्नाक्तं तांडुलं च यथाविधि ।
श्वेतां गां महिषीं दद्याद्यायुरारोग्य वृद्धिकृत् ।।५१।।
गुड़, घी, दही मिला हुआ चावल, सफेद गौ, भैंस को यथाविधि दान करने
से आयु, आरोग्यता की प्राप्ति होती है।।५१।।
अथशनिदशायांभौमान्तर्दशाफलम्-
मन्दस्यान्तर्गते भौमे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ।
तुङ्गे स्वक्षेत्रगे वापि दशाधिपसमन्विते ।।५२।।
शनि की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण वा उच्च वा स्वराशि में दशेश
वा।।५२।।
लग्नाधिपेन संयुक्ते आदौ सौख्यं धनागमम् ।
राजप्रीतिकरं सौख्यं वाहनाम्बरभूषणम् ।।५३।।