बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३३७
पिता के जन्मलग्न से तीसरी राशि में जन्म हो तो वह पिता के धन
का आश्रित होता है॥१७॥
पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः।
तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेन्नरः॥१८॥
पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में उत्पन्न हो तो जातक पिता के गुणों
के सदृश गुण वाला होता है और दशम राशि का स्वामी लग्न
में हो तो पिता से श्रेष्ठ होता है॥१८॥
अथ विशेषफलमाह-
सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं मासे तद्दिवसेऽपि वा।
विवाहव्यवहारादि मासेऽस्मिन्वर्जयेत्सदा ॥१९॥
सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में शून्य हो उस राशि संबंधी मास और
दिन में विवाह आदि शुभ कार्य, व्यवहार आदि न करे॥१९॥
कलहोत्पातदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च।
संशोध्यपिण्डं सूर्यस्य रन्ध्रमानेन वर्धयेत् ॥२०॥
शून्य वाले मास में कलह, उत्पात आदि दुःख होते हैं। सूर्य के पिंड का
शोधन कर अष्टम स्थान की फल रेखा से योगपिंड को गुणाकरं ॥२०॥
द्वादशहृतावशेषं मेषादिगणयेत्पुनः।
तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्तत्त्रिकोणगतेऽपि वा॥२१॥
उसमे १२ से भाग दे, शेष मेषादि से गिनने से जो राशि हो उस राशि
के मास में अरिष्ट होता है अथवा उससे त्रिकोण राशि के मास में अरिष्ट
होता है॥२१॥
इति सूर्याष्टकवर्गफलविचारः।
अथ चन्द्राष्टकवर्गफलविचारः-
चन्द्राच्चतुर्थगे मातुः प्रासादग्रामचिन्तनम्।
चन्द्राष्टवर्गे यच्छून्यं तत्र राशिगते विधौ॥२२॥
चन्द्रमा से चौथे माता, गृह, ग्राम का विचार करना चाहिए। चन्द्राष्टक
वर्ग में जिस राशि में शून्य हो उस राशि में जब चन्द्रमा हो॥२२॥
तन्नक्षत्रं परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत्।
चन्द्राष्टमेशनक्षत्रे त्रितयेषु विशेषतः॥२३॥
३३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथवा वह राशि जिन २ नक्षत्रों से बनती है उन २ नक्षत्रों पर जब चन्द्रमा
हो तो शुभ कर्म नहीं करना चाहिए। चन्द्रमा से अष्टमेश जिस नक्षत्र
पर हो, उससे त्रिकोण के दो नक्षत्र अर्थात् इन तीनों नक्षत्रों पर ।।२३।।
आयामव्याधिदुःखानि लभते नात्र संशयः।
चन्द्रात्सुखफलात्पिण्डं वर्धयेत्सप्तद्भिभाजयेत् ।।२४।।
आयाम- व्याधि और दुःख की प्राप्ति होती है। चन्द्रमा से चौथे स्थान
के फल को चन्द्राष्टक वर्ग के पिंड को गुणाकर गुणन फल में २७ का
भाग देने से ।।२४।।
शेषमृक्षे शनौ याने मातृहानिं विनिर्दिशेत्।
तत्त्रिकोणेषु वा केचिन्मातृकष्टं समादिशेत् ।।२५।।
शेष तुल्य अश्विन्यादि नक्षत्र में शनि के रहने से माता की हानि
होती है अथवा उससे त्रिकोण के नक्षत्रों पर शनि के रहने से माता को
कष्ट होता है ।।२५।।
उदाहरण- जैसे चन्द्रमा मिथुन राशि में है, उससे अष्टम मकर
राशि के स्वामी शनि विशाखा नक्षत्र के चौथे चरण में वृश्चिक राशि
में हैं, अतः विशाखा, शतभिषा और पुनर्वसु में आयामादि फल होंगे। चन्द्रमा
से चौथे स्थान में फल ३ है, इससे योगपिंड ८७ को गुणने से
२६१ हुआ। इसमें २७ का भाग देने से १८ शेष हुआ। अश्विनी से गिनने
से १८वाँ ज्येष्ठा नक्षत्र हुआ, अतः ज्येष्ठा नक्षत्र पर जब शनि आयेगा
तो माता की हानि होगी।
इति चन्द्राष्टकवर्गफलम्।
अथ भौमाष्टकवर्गफलम्—
भौमाष्टंवर्गे सञ्चिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम्।
भौमस्थितस्य सहजो राशिर्भ्रातृगृहं स्मृतम् ।।२६।।
भौम के अष्टक वर्ग से भाई, पराक्रम, धैर्य का विचार करना
चाहिए। भौम जिस राशि पर हो उससे तीसरी राशि भाई की होती
है।।२६।।
त्रिकोणशोधनं कृत्वा यत्र भूयांसि वै फलम्।
भूमेर्भवति भार्याया भ्रातृगेहसुखं तथा ।।२७।।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३३९
त्रिकोण-शोधन के उपरान्त जिस राशि के नीचे अधिक फल हों उस
राशि पर जब भौम जाता है तब भूमि, स्त्री, भाई और गृह का सुख होता
है॥२७॥
भौमो बलविहीनश्चेद्दीर्घायुर्भातृको भवेत्।
फलानि यत्र क्षीयन्ते तत्र भौमे स्थितें क्षतिः॥२८॥
यदि भौम निर्बल हो तो भाई दीर्घायु होते हैं। जिस राशि में फल शून्य
हो उस राशि में भौम के रहते समय भाई को कष्ट होता है॥२८॥
तद्राशिफलसंख्याभिर्वर्धयेत्पिण्डं च पूर्ववत्।
शेषमृक्षं शनौ याते भ्रातृहानिर्विनिर्दिशेत् ॥२९॥
भौम से तीसरी राशि के रेखा से योगपिंड को गुणाकर २७ से भाग देने
से जो शेष नक्षत्र हो उस पर शनि के रहने से भाई को कष्ट होता है॥२९॥
उदाहरण— मंगल कुम्भ राशि में है, उससे तीसरी राशि मेष है, उसमें
३ रेखा है, उससे योगपिंड शून्य ० को गुणाकर २७ का भाग
देने से शून्य शेष बचा। अतः रेवती नक्षत्र पर शनि के रहने से वा इससे
त्रिकोण (५,९) नक्षत्र पर शनि के रहने से भाई को कष्ट होगा। इसी
प्रकार १२ से भाग देने से शेष ० अर्थात् मीन राशि पर अथवा उससे त्रिकोण
कर्क, वृश्चिक पर शनि के होने से भाई को कष्ट होगा।
इति भौमाष्टकवर्गफलम्।
अथ बुधाष्टकवर्गफलम्—
बुधात्तूर्ये कुटुम्बं च धनमित्रादिमातुलाः।
तत्पञ्चमे मन्त्रविद्यालिपिबुद्ध्यादि चिन्तयेत् ॥३०॥
बुध से चौथे भाव में कुटुम्ब, धन, मित्र, मामा का विचार और उससे
पाँचवें भाव में मन्त्रणा, विद्या, लेख और बुद्धि का विचार करना
चाहिए॥३०॥
बुधाष्टवर्गं संशोध्य शेषमृक्षगते शनौ।
लभते कुटुम्बकादीनां विनाशं नात्र संशयः॥३१॥
बुधाष्टक वर्ग का संशोधन करके पूर्ववत् योगपिंड द्वारा नक्षत्र एवं
राशि का ज्ञान कर कुटुम्बादि के दुःख-सुख आदि को समझना
चाहिए॥३१॥
३४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
उदाहरण- बुध सिंह राशि में है, इससे चौथी वृश्चिक राशि में ५ रेखा
है। इसे योगपिंड ३४ से गुणा कर २७ का भाग देने से शेष ८वाँ पुष्य
नक्षत्र पर अथवा इससे त्रिकोण (५-९) नक्षत्र पर शनि के रहने से
कुटुम्बादि को दुःख होगा। वा गुणनफल में १२ से भाग देने पर शेष २ वृष
राशि अथवा इससे त्रिकोण पर शनि के रहने से कुटुम्बादि को दुःख
होगा।
इति बुधाष्टकवर्गफलम्।
अथ गुर्वष्टकवर्गफलम्-
जीवात्पञ्चमतो ज्ञानं पुत्रधर्मधनादिकम्।
गुरुस्थितं सुतस्थाने यावच्च विद्यते फलम्।
शत्रुनीचगृहं त्यक्त्वा तावन्तः सन्ततिर्भवेत्॥३२॥
गुरु से पाँचवें भाव में ज्ञान, पुत्र, धर्म, धन आदि का विचार करना
चाहिए। गुरु से पाँचवें भाव में जो फल (रेखा) है यदि वह राशि (पाँचवीं)
गुरु के शत्रु वा नीच की न हो तो उतनी ही संतान होती है॥३२॥
संख्या नवांशतुल्या वा तदीशस्था नवा पुनः।
सुतमेशनवांशैश्च समानावपि कल्पयेत्॥३३॥
अथवा पंचमेश स्थित भाव के नवांश की संख्या तुल्य वा पंचमेश के
नवांश की संख्या तुल्य संतान होती है॥३३॥
गुरोः सुतात्फलेनैव पिण्डात्संवर्ध्य पूर्ववत्।
शेषभं च गते सौरे पुत्रकष्टं न संशयः॥३४॥
गुरु से पाँचवें भाव के फल से गुरु के योगपिंड को गुणाकर २७ से
भाग देने से शेष तुल्य नक्षत्र पर वा उससे त्रिकोण के नक्षत्र पर शनि
के होने से पुत्र को कष्ट होता है॥३४॥
इति गुर्वष्टकवर्गफलम्।
अथ शुक्राष्टकवर्गफलम्-
भृगोरष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु।
येषु येषु फलानि स्युर्भूयांसि किल तत्र तु॥३५॥
ग्रहों के सहित शुक्र के अष्टकवर्ग को रखकर जिन-जिन राशियों में
अधिक फल हों॥३५॥
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४१
भूमिं कलत्रं वित्तं च तद्देशे निर्दिशेन्नृणाम्।
शुक्राज्जामित्रतो लब्धिं दारेशान्वितदिग्भवा ।।३६।।
उसके अनुसार मनुष्यों को भूमि, स्त्री, धन और देश का आदेश करना
चाहिए। शुक्र से ७वें स्थान के देश में वा सप्तमेश के देश में स्त्री का
लाभ होता है।।३६।।
दाराधिपस्थितं क्षेत्रं दाराजन्मर्क्षकं विदुः।
तस्यांशके त्रिकोणे वा दाराजन्मर्क्षकं विदुः।।३७।।
मन्दांशे मन्दसंयुक्ते मन्दक्षेत्रेऽथवा भृगौ।
नीचांशे मन्दसंयुक्ते नीचस्त्रीभोगमिच्छति।।३८।।
दारेश जिस राशि में हो वही राशि स्त्री की होती है। अथवा उसके
नवांश की राशि वा उसके त्रिकोण की राशि स्त्री की राशि होती
है।।३८।।
भौमांशकगते शुक्रे भौमक्षेत्रगतेऽपि वा।
भौमेन युतदृष्टे च परस्त्रीभोगमिच्छति।।३९।।
शुक्र शनि के नवांश में हो और शनि से युत हो अथवा शनि की राशि
में हो, अपने नीचांश में पापग्रह से युक्त हो तो नीच स्त्री की इच्छा होती
है। शुक्र भौम के नवांश में हो अथवा भौम की राशि में हो और भौम
से युत वा देखा जाता हो तो परस्त्रीगामी होता है।।३९।।
जामित्रे मन्दभौमांशे तदीशे मन्दभौमभे।
वेश्या वा जारिणी वापि तस्य भार्या न संशयः।।४०।।
सप्तम स्थान में शनि वा भौम का अंश हो और उसके स्वामी शनि
वा भौम की राशि में हो तो उसकी स्त्री वेश्या वा जारिणी होती है।।४०।।
शुक्रजामित्रतो लब्धिस्त्रिकोणा देशदिक्स्त्रियः।
भृगुदारेशयुक्तर्क्ष फलसंख्या स्त्रियो विदुः।।४१।।
शुक्र से सातवें स्थान के अनुसार वा उससे त्रिकोण राशि के अनुसार
देश, दिशा, स्त्री का कहना चाहिए। शुक्र से सप्तमेश से युत राशि के
फल की संख्या तुल्य स्त्री की संख्या कहनी चाहिए।।४१।।
शुक्रांशकसमाना स्त्री वर्णरूपगुणान्विता।
भवेच्छाशाङ्कतुल्या वा दारेशस्य गुणान्विता।।४२।।
३४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
शुक्र के नवांश के सदृश वर्ण-रूप-गुण के युक्त वा चन्द्रमा के नवांश
सदृश वा सप्तमेश के गुण के अनुरूप स्त्री होती है।।४२।।
शुक्रान्मन्दे त्रिकोणस्थे नेष्टं जीवे सुखप्रदम्।
तेषां बलविवेकेन भार्याया लक्षणं वदेत् ।।४३।।
शुक्र से शनि त्रिकोण में हो तो स्त्री का सुख नहीं होता है और गुरु
हों तो स्त्री का सुख होता है। इनके बल के अनुसार ही स्त्री के सुख-
दुःख का विवेचन करना चाहिए।।४३।।
शुक्राज्जामित्रफलैः संवर्ध्य पिण्डञ्च पूर्ववत्।
स्त्रियः दुःखं सुखं ज्ञेयं पूर्वरीत्यनुसारतः।।४४।।
शुक्र से सातवें भाव के फल को पूर्ववत् शुक्र के योगपिंड से गुणा कर
गुणनफलं में २७ का भाग देने से शेष नक्षत्र पर जब शनि जावे तो स्त्री
को कष्ट कहना।।४४।।
इति शुक्राष्टकवर्गफलम्।
अथ शन्यष्टकवर्गफलम्—
शनैश्चरस्थितस्थानादष्टमं मृतिरुच्यते।
शनेरष्टकवर्गे च स्वस्यायुष्यं विनिर्दिशेत् ।।४५।।
शनि जिस भाव में हो उससे आठवें स्थान में आयु का विचार करना
चाहिए।।४४।।
लग्नात्प्रभृति मन्दान्तं फलान्येकत्र कारयेत्।
लग्नादिफलतुल्याब्दे व्याधिवैरं समादिशेत् ।।४६।।
लग्न से आरम्भ कर शनि पर्यन्त रेखाओं का योग करे। योग तुल्य वर्ष
में शरीर में व्याधि और लोगों से वैर, विदेश यात्रा, धन की हानि होती
है।।४६।।
मन्दाद्विलग्नपर्यन्तं फलान्येकत्र संयुतम्।
मन्दादिफलतुल्याब्दे व्याधिं तस्य समादिशेत् ।।४७।।
शनि से लग्न पर्यन्त रेखाओं का योग करे। योग तुल्य वर्ष में पूर्व के
तुल्य ही वर्ष में व्याधि आदि फल होते हैं।।४७।।
तयोर्योगसमाङ्के तु मृत्युयोगं प्रचक्षते।
शोध्यादि गुणनं कृत्वा पिण्डं संस्थाप्य यत्नतः ।।४८।।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४३
अष्टमस्य फलैर्हत्वा सप्तविंशतिभाजितम् ।
शतादूर्ध्वं तत्पिण्डं शतमेवाग्रतस्त्यजेत् ।।४९।।
दोनों के योग तुल्य वर्ष में मृत्युयोग वा व्याधि आदि फल
होते हैं। शनि के त्रिकोणादि शोधन से उत्पन्न योगपिंड लग्न से अष्टम
स्थान के फल से गुणाकर २७ से भाग देने पर शेष १०० से अधिक बचे
तो उसमें से १०० घटाकर शेष तुल्य आयु होती है।।४९।।
आयुःपिण्डं तु जानीयात्प्राग्वद्वेलां तु कल्पयेत् ।
त्रिकोणैकाधिपत्यादि शोधनं विरचय्य च ।।५०।।
पिण्डं संस्थाप्य गुणयेल्लग्नादष्टमगैः फलैः ।
सप्तविंशतिहृच्छेषं मृत्युकालं वदेद्बुधः ।।५१।।
समूलाष्टकवर्गे च यत्र नास्ति फलं गृहे ।
तत्र नास्ति फलं तस्य यदायाति शनैश्चरः ।।५२।।
इस प्रकार आयुपिंड को जानकर समय का निश्चय करे। एकाधिपत्य
आदि शोधन बनाकर शनि के सम्पूर्ण अष्टकवर्ग में जिस राशि का फल
न हो अर्थात् शून्य हो तो उस राशि में जब शनि होता है तो उसका
कोई फल नहीं होता है।।५०-५२।।
तद्गृहे रविचन्द्रौ चेद्दशाछिद्रे मृतिं वदेत् ।
दशाछिद्रसमायोगे मृत्युरेव न संशयः ।।५३।।
तथा उस राशि में जब सूर्य-चन्द्र होते हैं और अनिष्टकारी दशा होती
है तो मृत्यु होती है, इसमें सन्देह नहीं।।५३।।
विलग्नशनिमध्यगानि च फलानि सन्ताडयेन्नगै-
र्भाविहतानि शेषमितर्क्षे खले याति चेत् ।
तदा धनसुखक्षतिं तदनु चाङ्गभादष्टमस्थितै-
र्विगुणयेत्पिण्डं भपरिशेषभस्थे शनौ ।।५४।।
लग्न से शनि पर्यन्त फलों को सात ७ से गुणांकर २७ से भाग देने
पर शेष तुल्य नक्षत्र पर पापग्रह के रहने से सुख की हानि होती
है। लग्न से अष्टम स्थान के फल से शनि के योगपिंड को गुणाकर २७
का भाग देने से शेष तुल्य नक्षत्र अथवा कोण नक्षत्र (५।९) पर शनि
के होने से सुख-धन की हानि होती है।।५४।।
३४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
उदाहरण- लग्न से शनि पर्यन्त क्रम से
६+१+३+७+३+४+२+१+२=२९ रेखाओं का योग २९ हुआ। तत्तुल्य
वर्ष अर्थात् २९वें वर्ष में शरीर में व्याधि, विदेशयात्रा, धन की हानि होगी
एवं शनि से लग्न पर्यन्त रेखाओं के योग ४+५=९ तुल्य वर्ष में पूर्ववत्
कष्ट आदि फल होगा। दोनों के योग तुल्य ३८वें वर्ष में पूर्ववत् कष्ट
आदि फल होंगे। अथवा शनि के योगपिंड ६७ को लग्न से आठवें
भाव की रेखा संख्या ५ से गुणने पर ३३५ हुआ। इसमें २७ का भाग देने
पर शेष ११ हुआ, अश्विनी से गिनने से पूर्वाफाल्गुनी वा इससे त्रिकोण
स्वाती, मूल नक्षत्र पर जब शनि होंगे तो कष्ट होगा। लग्न से शनि पर्यन्त
रेखा की संख्या २९ इसे ७ से गुणने से २०३ हुआ। इसमें २७
का भाग देने से शेष १४ के तुल्य चित्रा नक्षत्र हुआ। इस पर पापग्रह के
रहने से धन-सुख की हानि होगी।
इति शनेरष्टकवर्गफलम्।
सर्वाष्टकवर्ग (समुदायाष्टकवर्ग) फलम्-
सर्वाष्टकग्रहफलैश्च नियोज्यचक्रं
मूर्त्यादिभावमशुभं शुभमेव तत्र।
जन्मादितः फलसमानदशा समीक्ष्य
यात्राविवाहसमये बहुमूलयुक्ता।।५५।।
सभी ग्रहों के अष्टक वर्ग की रेखाओं के योग से सर्वाष्टक वर्ग बनता
है (पृ. ३१८ में देखिए)। इसमें लग्न से द्वादश भाव की राशियों को
देखना चाहिए। जिस राशि में रेखा अधिक हो उसकी दशा में यात्रा, विवाह
आदि करने से अधिक शुभफल होता है।।५५।।
मेषादिभानां सकलाष्टवर्गे
उत्पन्नरेखागणमेवं कुर्यात्।
धृत्यादि तत्त्वान्तमितं कनिष्ठं
त्रिंशावसानं किल मध्यवीर्याः।।५६।।
सर्वाष्टकवर्ग में जिस राशि में १८ से कम रेखा हों वह कष्टप्रद और
२५ तक रेखा हो तो कनिष्ठ फल, ३० पर्यन्त मध्यफल।।५६।।
त्रिंशाधिकं तूत्तमवीर्यदाः स्युः
शरीरसौख्यार्थयशो विशेषाः।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४५
स्वस्वाष्टवर्गे यदि वेदहीनाः
क्लेशाय सौख्याय च वेदपुष्टाः ।।५७।।
और इसके बाद जितनी रेखा हो वह शुभप्रद राशि होती है। उस राशि
की दशा में शरीर का सुख, यश और धन का विशेष लाभ होता
है। अपने-अपने अष्टकवर्ग में जिस राशि में ४ से कम रेखा होती है
वह राशि कष्टप्रद और ४ से अधिक रेखावाली राशि सुखप्रद होती
है।।५७।।
दशमभवनरेखाभ्योऽधिकं लाभमानं
भवति यदि विहीनं स्याद्व्ययाख्यं ततोऽपि।
अधिकतरविलग्नं भोगसम्पत्तिभूयः
विनिमयवशतस्तद्वैपरीत्यं जनस्य।।५८।।
दशम भाव की रेखा से अधिक लाभ भाव में रेखा हो और लाभ
भाव से अल्प द्वादशभाव में तथा इससे अधिक लग्न भाव में रेखा
हो तो वह जातक अधिक धन-संपत्तिवाला होता है। यदि इससे विपरीत
हो तो विपरीत फल होता है।।५८।।
प्राग्दाक्षिण्यादिभानां सकलफलयुतिं दिक्चतुष्कक्रमेण
कृत्वा तद्भागतो यः समधिकफलतः शोभनं हानिमल्पात्।
सौम्याः स्वोच्चस्वगेहोदितखचरयुते दिग्विभागे स्वकार्ये
वित्तेशाशासु वित्तं मृतिपतिगतदिग्भागगे देहनाशः ।।५९।।
लग्नादि भावों को प्राग्दक्षिण क्रम से अर्थात् लग्न, द्वादश, एकादश
भाव की पूर्वदिशा; दशम, नवम, अष्टम भाव की दक्षिणदिशा; सप्तम,
षष्ठ, पंचम भाव की पश्चिम दिशा और चतुर्थ, तृतीय और द्वितीय भाव
की उत्तर दिशा कल्पना करें। दिशा के प्रत्येक भावों की रेखाओं का योग
करके एकत्र रख दे। जिस दिशा में अधिक रेखा हो और उसमे शुभग्रह
युत हों, अपनी उच्च राशि में हों तो उस दिशा से धन का लाभादि
होता है। धनेश की दिशा से धन का लाभ और अष्टमेश की दिशा में शरीर
में क्लेश होता है, यह यात्रा में देखना चाहिए।।५९।।
अथ भावफलम्-
भावं विलोक्य सदसत्फलदायकंयत्तद्राशिसम्भवफलैश्चतदुक्तपिण्डम्।
पिण्डेरेखाताडिते भावशेषे राशौ यदायाति सौरिः समायाम्।।६०।।
३४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
शुभ-अशुभ भावों को देखकर उनकी राशियों के रेखापिंड को रेखा
से गुणाकर १२ का भाग देने से शेष तुल्य राशि पर जब शनि जाता
है।।५९।।
यस्यां तत्तद्भावहानिं च विद्यात्
पूर्वे अंशे वाथवा तत्त्रिकोणे।
कृत्वा बिन्दुभ्यस्तु कालं सुधीमां-
स्तस्मात् वाच्यः प्राप्तिकालः शुभत्वे।।६१।।
उस वर्ष में राशि संबंधी भाव की हानि होती है अथवा उस राशि से
त्रिकोण राशि में जब शनि जाता है तब भी उस भाव को हानि होती
है। यदि भाव शुभ है तो रेखा से भिन्न भाव के बिन्दुओं से उस भाव के
शुभ फल की प्राप्ति के समय को कहना चाहिए।।६०।।
अथारिष्टसमयज्ञानमाह-
मृत्युभावेशभात्कोणनिघ्नं फलं मृत्युजं सूर्यशेषर्क्षयुक्ते रवौ।
तत्त्रिकोणेऽथवारिष्टमासं वदेत्तातमातुर्गृहाद्येऽथवा कल्पयेत्।।६२।।
अष्टमेश जिस राशि में है उस राशि के त्रिकोण-शोधन से
उत्पन्न फल को अष्टम भाव स्थित फल से गुणाकर उसमें १२ का
भाग देने से शेषतुल्य राशि पर अथवा उससे त्रिकोण राशि पर सूर्य के आने
से उस मास में अरिष्ट होता है।।६२।।
अवस्थापरत्वेन शुभाशुभविचारः-
मीनाद्यं मिथुनान्तकं प्रथमकं प्रोक्तं वयः प्राक्तनैः
कर्काद्यं वणिजान्तकं तरुणता संज्ञं च मध्यं बुधैः।
कुम्भान्तं स्थविराह्वयं च बहुभिर्यत्तत्फलैः संयुतं
तत्सौख्यार्थविशेषकं बलयुतेनैतद्विशेषाच्छुभम्।।६३।।
मीन राशि से मिथुन पर्यन्त चार राशियों की प्रथम (बाल्यावस्था)
अवस्था होती है। कर्क राशि से तुला पर्यन्त चार राशियों की तरुण
(युवावस्था) अवस्था होती है। वृश्चिक राशि से कुम्भ पर्यन्त चार
राशियों की स्थविर (वृद्धावस्था) अवस्था होती है। जिन-जिन अवस्था के
रेखाओं का योग अधिक हो उन-उन अवस्थाओं में सुख होता है।।६३।।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४७
विशेष- जैसे सर्वाष्टकवर्गचक्र में-
राशयः फलानि योगः
(१) - १२+१+२+३=३२+४२+३२+३८=१४४
(२) ४+५+६+७=२५+३२+२६+२९=११२
(३) ८+९+१०+११=३७+३४+३४+२९=१३३
३८९
प्रथम अवस्था में १४४ रेखा है, अतः प्रथम अवस्था सुखमय व्यतीत
होगी। क्योंकि लग्न सहित सप्तग्रहों की सम्पूर्ण रेखाओं का योग ३८९
है, इसका खंडत्रय करने से १२९ होता है। इससे अल्प रेखा में कष्ट आदि
की संभावना होती है। इसी प्रकार युवावस्था में ११२ रेखा है, अतः
कुछ कष्ट से व्यतीत होगा। वृद्धावस्था में १३३ रेखायें हैं, अतः वृद्धावस्था
सुखमय व्यतीत होगी।
अथ राहुयुक्तगुरुफलम्-
राहुयुक्तगुरुराशिगे गुरौ तत्त्रिकोणमथ रिष्टकारकम्।
अल्पमृत्युरिपुभावनाथको योगकृत्तदिह मृत्युसम्भव ।।६४।।
राहु से युक्त गुरु की राशि में गुरु हो अथवा उससे त्रिकोण की राशि
में हो तो अरिष्टकारक होता है। यदि षष्ठेश योग करता हो तो मृत्यु होती
है॥६४॥
अथ निधनार्कमाह-
मृत्युपद्वादशांशत्रिकोणेऽसुरो मृत्युनाथत्रिकोणस्थसूर्ये मृतिः।
अर्कलिप्ताहतो राहुलिप्तागणश्चक्रलिप्ताप्तयुक्तो रविर्मृत्युदः॥६५॥
अष्टम स्थान का स्वामी जिस द्वादशांश में हो उससे त्रिकोण राशि में
जब राहु जाये तो उससे (अष्टमेश राशि के) त्रिकोण राशि में सूर्य के
जाने से मृत्यु होती है। सूर्य की कला-विकला को राहु की कला-विकला
से गुणाकर गुणनफल में चक्रकला (२१६००) से भाग दें, जो लब्ध
हो उसे सूर्य की कला में जोड़ दें। उसका राश्यादि बनावे, उसके तुल्य
सूर्य जिस मास में हो उस मास में मृत्यु होती है॥६५॥
भौममार्त्तण्डलिप्ताहतिः कारयेच्चक्रलिप्ताहताल्लब्धयुक्तो रविः।
यातियस्मिंस्तदात्तत्त्रिकोणेऽपिवाक्लेशमाहुःक्षयंमासिधीमान्वदेत्।।
भौम की कला को सूर्य की कला से गुणा कर दे, गुणनफल में २१६००
से भाग दें, लब्ध को सूर्य की कला में जोड़ दे। योगफल का राश्यादि
३४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
बनावे, उस राश्यादि के तुल्य सूर्य जिस मास में हों, उस मास में क्लेश
अथवा मृत्यु कहना ।।६५।।
उदाहरण— सूर्य ३।१८।२६ इसका कला बनाने से ६५०६ हुआ।
राहु ७।१३।२७ इसका कला १३४०७ हुआ। सूर्य के कला से राहु के
कला को गुणने से गुणनफल ८७२२५९४२ हुआ। इसमें २१६०० का भाग
देने से लब्ध ४०३८ हुआ। इसे सूर्य की कला में जोड़ने से १०५४४
हुआ। इसमें ६० का भाग देने से लब्ध १७५ अंश और शेष ४४ कला
हुआ। अंश में ३० का भाग देने से ५ राशि २५ अंश और ४४ कला
हुआ। इसके तुल्य राश्यादि सूर्य जब जिस मास में होगा उस मास में मृत्यु
होगी।
मंगल राश्यादि १०।२२।३२ इसका कला १९३२० हुआ। इसे सूर्य के
कला ६५०६ से गुण दिया तो गुणनफल १२५६९५९२० हुआ। इसमें
२१६०० से भाग देने से लब्धि ५८१९ हुई। इसे सूर्य के कला में जोड़ देने
से १२३२५ कला हुआ। इसका राश्यादि बनाने से ६।२५।२५ हुआ।
इसके तुल्य सूर्य जब होवें उस समय कष्ट वा मृत्यु कहना।
अथ निधनचन्द्रमाह—
अष्टमेशत्रिकोणे विधुः स्याद्यदा योगमिन्दौ तथा तन्नवांशेऽपि वा।
तत्रिकोणे प्रयाते मृतिं निर्दिशेन्निश्चयात्स्वल्परेखोद्भवेवासरे ।।
अष्टमेश जिस राशि में है उससे त्रिकोण राशि में जब चन्द्रमा
होता है अथवा अष्टमेश जिस नवांश में है उससे त्रिकोण राशि में जब
चन्द्रमा हो और उस दिन अल्प रेखा हो तो उस दिन मृत्यु होती है।।६६।।
अथ सशान्तिकरेखाफलम्—
रेखाभिः सप्तभिर्युक्ते मासे मृत्युर्नृणां भवेत्।
सुवर्णं विंशतिपलं दद्याद् द्वौ तिलपर्वतौ ।।६७।।
जिस राशि में सात रेखायें हों उस राशि के सूर्य में जातक को कष्ट
होता है। इसकी शान्ति के लिए २० तोला सोना और २ तिल के पर्वत
दान करना चाहिए।।६७।।
रेखाभिर्वसुभिर्जाते शीघ्रं मृत्युवशो नरः।
असत्फलविनाशाय दद्यात्कर्पूरजां तुलाम् ।।६८।।
जिस राशि में ८ रेखायें हों उस मास में मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। इसकी
शान्ति के लिए कपूर का तुलादान करना चाहिए।।६८।।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३४९
रेखाभिर्नवभिः सर्पान्म्रियते मनुजो ध्रुवम्।
अश्वैश्चतुर्भिः संयुक्तं रथं दद्याच्छुभाप्तये।।६९।।
नव रेखाएँ जिस राशि में हों उस मास में सर्प का भय होता है। इसकी
शान्ति के लिए ४ घोड़ों के सहित रथ का दान करना चाहिए।।६९।।
रेखाभिर्दशभिः शस्त्रात्प्राणांस्त्यजति मानवः।
दद्याच्छुभफलावाप्त्यै कवचं वज्रसंयुतम् ।।७० ।।
जिस राशि में दस रेखाएँ हों तो उस मास में शस्त्र से भय होता है।
इसकी शान्ति के लिए वज्र ही से युक्त कवच का दान करना
चाहिए ।।७०।।
रुद्रैः प्राप्याभिशापं च प्राणैर्युक्तो भवेन्नरः।
दिक्पलैः स्वर्णघटितां प्रदद्यात्प्रतिमां विधोः।।७१।।
जिस राशि में ११ रेखाएँ हों तो उस मास में अभिशाप से मृत्युभय होता
है। उससे बचने के लिए १० तोले सुवर्ण की चन्द्रमा की प्रतिमा को दान
करें।।७१।।
आदित्यैर्जलदोषेण मानवस्य मृतिं वदेत्।
भूमिं दद्याद्ब्राह्मणाय दाने शुभफलं भवेत् ।।७२।।
जिस राशि में १२ रेखायें हों उस मास में जल से मृत्युभय होता है।
उसकी शान्ति के लिए भूमि का दान करना चाहिए ।।७२ ।।
त्रयोदशमितैर्व्याघ्रान्मानवो मृत्युमाप्नुयात् ।
विष्णोर्हिरण्यगर्भस्य दानं कुर्याच्छुभाप्तये।।७३।।
जिस राशि में १३ रेखायें हों उस मास में व्याघ्र का भय होता है। इसकी
शान्ति के लिए विष्णु की हिरण्यगर्भ प्रतिमा (शालिग्राम) का दान करना
चाहिए ।।७३ ।।
अचिराज्जीवितं जह्याच्छक्रैः कालेन भक्षितः।
वराहप्रतिमां दद्यात्कनकेन विनिर्मिताम् ।।७४ ।।
जिस राशि में १४ रेखाएँ हों तो उस मास में अधिक कष्ट होता है। उसकी
शान्ति के लिए सुवर्ण की वाराह की प्रतिमा का दान करना चाहिए।।७४।।
राज्ञो भयं तिथिमितैस्तत्र हस्ती प्रदीयते ।
रिष्टं भूपैः कल्पतरोः प्रतिमां च निवेदयेत् ।।७५ ।।
३५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
जिस राशि में १५ रेखाएँ हों उस मास में राजभय की संभावना होती
है। इसकी शान्ति के लिए हाथी का दान करना चाहिए। जिस राशि
में १६ रेखा हों उस मास में कष्ट होता है। इसकी शान्ति के लिए कल्पतरु
की प्रतिमा का दान करे।।७५।।
ऋषिचन्द्रैर्व्याधिभयं गुडधेनुं निवेदयेत्।
कलाहोऽष्टेन्दुभिर्दद्याद्रत्नगोभूहिरण्यकम् ।।७६।।
जिस राशि में १७ रेखा हों उस मास में व्याधि का भय होता है। उसके
शान्त्यर्थ गुड़ के धेनु का दान करें। जिस राशि में १८ रेखा हों उस मास
में कलह होने का भय होता है। उसकी शान्ति के लिए गौ, भूमि,
रत्न और सुवर्ण का दान करना चाहिए।।७६।।
देशत्यागोऽङ्कचन्द्रैः स्याच्छान्तिं कुर्याद्विधानतः।
विंशत्या बुद्धिनाशः स्यात्कुर्याल्लक्षमितं जपम्।।७७।।
जिस राशि में १९ रेखा हों उस मांस में देश के त्यागने का भय
होता है। इसकी शान्ति के लिए विधिपूर्वक शान्ति करनी चाहिए।
जिस राशि में २० रेखा हों उस मास में बुद्धि का नाश होता है। इसकी
शान्ति के लिए १ लक्ष जप करना चाहिए।।७७।।
भूमिपक्षै रोगपीडा दद्यात् धान्यस्य पर्वतम्।
यमाश्विभिर्बन्धुपीडा दद्यादादर्शकं बुधः।।७८।।
जिस राशि में २१ रेखा हों उस मास के रवि में रोग और पीड़ा होती
है। उसकी शान्ति के लिए धान्य का पर्वत देना चाहिए। जिस राशि में
२२ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बन्धुओं को पीडा होती है। उसकी
शान्ति के लिए आदर्श (ऐनक) का दान करना चाहिए।।७८।।
रामपक्षयुते मासे नानाक्लेशान्प्रपद्यते।
सौवर्णीं प्रतिमां दद्याद्रवेः सप्तपलैः क्रमात्।।७९।।
जिस राशि में २३ रेखा हों उस राशि के रवि में अनेक प्रकार के
कष्ट होते हैं। उसकी शान्ति के लिए सूर्य की सोने की सात तोले की
प्रतिमा देनी चाहिए।।७९।।
वेदाश्विभिर्बन्धुहीनो दद्याद्गोदानकं दश।
सर्वरोगादिनाशार्थं जपहोमादि कारयेत्।।८०।।
जिस राशि में २४ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बन्धुओं का नाश
होता है। उसके शान्त्यर्थ १० गोदान करना चाहिए और सभी रोगों
के शान्त्यर्थ जप-होम आदि करना चाहिए।।८०।।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३५१
शराश्विभिस्तथा विद्वन्प्रज्ञा मन्दोऽभिजायते ।
ऋतुपक्षैर्बुद्धिहीनः पूज्या वागीश्वरी तथा।
धनक्षयः स्यान्नक्षत्रैः श्रीसूक्तं तत्र संजपेत् ।।८१।।
जिस राशि में २५ या २६ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बुद्धि मंद होती
है। इसके शान्त्यर्थ वागीश्वरी देवी की उपासना करनी चाहिए। जिस राशि
में २७ रेखा हों उस राशि के सूर्य में धन की हानि होती है। उसकी शान्ति
के लिए श्रीसूक्त का जप करना चाहिए।।८१।।
वसुपक्षयुते मासे न लाभो हानि खेचरैः।
सूर्यहोमश्च विधिना कर्त्तव्यः शुभकांक्षिभिः ।।८२।।
जिस राशि में २८ रेखा हों उस राशि के सूर्य में किसी प्रकार का लाभ
नहीं होता है। इसके शान्त्यर्थ विधिवत् सूर्य का हवन कराना
चाहिए।।८२।।
एकोनत्रिंशता चापि चिन्ता व्याकुलितो भवेत् ।
घृतवस्त्रसुवर्णानि तत्र दद्याद्विचक्षणः।।८३।।
जिस राशि में २९ रेखा हों उस राशि के सूर्य में मनुष्य चिन्ता से
व्याकुल होता है। उसके शान्त्यर्थ घी, वस्त्र-सुवर्ण का दान करना
चाहिए।।८३।।
त्रिंशता धनधान्याप्तिरिति जातकनिर्णयः ।
भूवह्निभिर्महोद्योगः पुत्रसम्पद्गुणाग्निभिः ।।८४।।
जिस राशि में ३० रेखा हों उस राशि के सूर्य में धन-धान्य का लाभ
होता है। जिस राशि में ३१ रेखा हों उस मास में बड़े उद्योग की तथा
पुत्र और सम्पत्ति का लाभ होता है।।८४।।
सहेमवस्त्रलाभश्च चतुस्त्रिंशत्समन्विते ।
पञ्चरामैर्भवेद्धीमान्षट्त्रिंशत्सुतवित्तदा ।।८५।।
जिस राशि में ३४ रेखा होती है उस मास में सुवर्ण, वस्त्र आदि का
लाभ होता है। जिस राशि में ३५ रेखा हों उस मास में बुद्धि में प्रखरता
और जिसमें ३६ रेखा हों उस राशि में पुत्र-धन का लाभ होता है।।८५।।
सप्तत्रिंशद्धनस्याप्तिरष्टत्रिंशत्सुखार्थदा ।
द्रव्यरत्नाप्तिरेकोनचत्वारिंशाच्च विद्यते ।।८६।।
३५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
जिस राशि में ३७ रेखा हों उस मास में धन का लाभ होता है। जिस
राशि में ३८ रेखा हों उस मास में धनसुख होता है। जिस राशि
में ३९ रेखा हों उसमें द्रव्य-रत्न का लाभ होता है।।८६।।
धनवान्कीर्तिमांश्चैव चत्वारिंशति वर्धते।
अत ऊर्ध्वं यशोऽर्थाप्तिः पुण्यश्रीरुपचीयते।।८७।।
जिस राशि में ४० रेखा हों उस मास में धन-कीर्ति में वृद्धि होती
है। इसके बाद जितनी ही अधिक रेखा होती है उतना ही अधिक
यश-धन का लाभ उत्तरोत्तर होता है।।८७।।
अथ शुभाशुभफलमाह-
शुभखचरफलैक्यं प्राप्तवर्षे नितान्तं
धनतनयसुखानां भाजनं स्यान्मनुष्यः।
धरणितनयवर्गे बिन्दुसंज्ञांतयोगे
तनुलयमिह वर्षे पापगे मृत्युभीतिः।।८८।।
शुभग्रह की रेखाओं के योगतुल्य वर्ष में धन, पुत्र, सुख को भोगने वाला
मनुष्य होता है। भौमाष्टक वर्ग में भौम से लग्नांत फलों के योगतुल्य
वर्ष और लग्न से भौमांत रेखाओं के योगतुल्य वर्ष में पापग्रह का योग होने
से कष्ट होता है।।८८।।
इति बृहत्पाराशरहोरायाम् अष्टकवर्गफलाध्यायः।
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः
पार्वत्युवाच-
देवदेव जगन्नाथ शूलपाणे वृषध्वज।
केन योगेन मर्त्यानां जायते शिशुनाशनम् ।।१।।
पार्वतीजी ने कहा- हे देवों के देव, जगत् के स्वामी, शूलपाणि,
वृषध्वज! किस दुर्योंग के कारण मनुष्यों की सन्तानों का नाश होता
है।।१।।
तत्सर्वमत्र योगेन ब्रूहि मे शशिशेखर।
शापमोक्षं च कृपया प्राणिनामल्पमेधसाम् ।।२।।
और हे शशिशेखर ! उन सभी योगों को मुझे बताइये और उस शाप
से कैसे मनुष्य मुक्त हो सकता है इसे भी बताने की कृपा करें।।२।।
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५३
शङ्कर उवाच-
साधु पृष्टं त्वया देवि कथयामि सविस्तरात् ।
शृणुष्वैकमना भूत्वा बलाबलवशादपि ॥३॥
शंकरजी ने कहा- तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है। हे देवि ! मैं
उसे विस्तार से कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त से सुनो ॥३॥
ज्ञेयं सुनिश्चितं सर्वं राशिचक्रे विशेषतः।
मेषादि मीनपर्यन्तं मूर्त्यादिद्वादशक्रमात् ॥४॥
यह सब राशिचक्र में निश्चित है ॥४॥
भावं च भावजं ज्ञात्वा फलं ब्रूयाद्विचक्षणः।
तनुर्वित्तं बन्धुमातृपुत्रशत्रुस्मरो मृतिः ॥५॥
मेषादि राशियों के बारह भाव तनु, धन, सहज, सुख, सुत, रिपु, जाया,
मृत्यु ॥५॥
पितृकर्म च लाभं च व्ययान्ता भावसंज्ञकाः।
गुरुलग्नेशदारेशपुत्रस्थानाधिपेषु च ॥६॥
धर्म, कर्म, आय और व्यय होते हैं। इसमें गुरु, लग्नेश, दारेश और
पंचमेश ॥६॥
सर्वेषु बलहीनेषु वक्तव्या त्वनपत्यता।
रव्यारराहुशनयः पुत्रस्था बलसंयुताः।
कारकाख्यात्क्षीणबलादनपत्यत्वमादिशेत् ॥७॥
ये सभी निर्बल हों तो अनपत्य योग होता है। सूर्य, भौम, राहु, शनि
पुत्रस्थान में हों और बली हों तथा पुत्रकारक (गुरु) निर्बल हो तो अनपत्य
(निःसन्तान) योग होता है ॥७॥
अथ शापज्ञानमाह-
पुत्रस्थानगते राहौ कुजेनापि निरीक्षिते।
कुजक्षेत्रगते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥८॥
यदि पाँचवें भाव में राहु हो तथा भौम से देखा जाता हो अथवा भौम
की राशि में हो तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है॥८॥
पुत्रेशे राहुसंयुक्ते पुत्रस्थे भानुनन्दने।
चन्द्रदृष्टे युते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥९॥
३५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पंचमेश राहु से युक्त हो, पंचम में शनि हो और चन्द्रमा से युत वा दृष्ट
हो तो सर्प के शाप से संतान नष्ट होते हैं ॥९॥
कारके राहुसंयुक्ते पुत्रेशे बलवर्जिते।
विलग्नेशे भौमयुते सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१०॥
कारक (गुरु) राहु से युक्त हो, पंचमेश बलहीन से लग्नेश भौम से युत
हो तो सर्प के शाप से संतान नष्ट होते हैं ॥१०॥
कारके भौमसंयुक्ते लग्ने च राहुसंयुते।
पुत्रस्थानेश्वरे दुःस्थे सर्पशापात्सुतक्षयः ॥११॥
कारक (गुरु) भौम से युक्त हो, लग्न में राहु हो और पंचमेश ६।८।१२
भाव में हो तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है ॥११॥
भौमांशे भौमसंयुक्ते पुत्रेशे सोमनन्दने।
राहुमान्दियुते लग्ने सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१२॥
भौम के अंश में भौम से युक्त पंचमेश बुध हो और लग्न, राहु, मान्दि
(गुलिक) हो तो सर्ग के शाप से संतान की हानि होती है ॥१२॥
पुत्रस्थाने कुजक्षेत्रे पुत्रे राहुसमन्विते।
सौम्यदृष्टे युते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१३॥
यदि पंचम भाव मंगल की राशि (७, ८) हो और पंचम में राहु युत हो,
बुध से युत वा दृष्ट हो तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है ॥१३॥
पुत्रस्था भानुमन्दाराः स्वर्भानुः शशिजोऽङ्गिराः।
निर्बलौ पुत्रलग्नेशौ सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१४॥
पंचम भाव में सूर्य, शनि, मंगल, राहु, बुध, गुरु हों और पंचमेश, लग्नेश
निर्बल हों तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है ॥१४॥
लग्नेशे राहुसंयुक्ते पुत्रेशे भौमसंयुते।
कारके राहुसन्दृष्टे सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१५॥
लग्नेश राहु से युत हो, पंचमेश मंगल से युत हो, कारक (गुरु) राहु
से युत हों तो सर्प के शाप से सन्तान की हानि होती है।।
अथ शान्तिमाह—
ग्रहयोगवशादेवं योगं ज्ञात्वा सुधीमता।
तद्दोषपरिहारार्थं नागपूजां समारभेत् ॥१६॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५५
इस प्रकार ग्रहयोगवश शाप को जानकर उस दोष के शान्त्यर्थ
नाग की पूजा करे।।१६।।
स्वगृह्योक्तविधानेन प्रतिष्ठां कारयेत्सुधीः।
नागमूर्तिं सुवर्णेन कृत्वा पूजां समाचरेत् ।।१७।।
अपने वेदोक्त गृह्यसूत्र के अनुसार विधानपूर्वक सुवर्ण की नांगमूर्त्ति
बनाकर उसकी प्रतिष्ठा करे और उसका यथोक्त रीति से पूजन करे।।१७।।
गोभूतिलहिरण्यादि दद्याद्वित्तानुसारतः।
एवं कृते तु नागेन्द्रप्रसादाद्वर्धते कुलम् ।।१८।।
गौ, भूमि, तिल, सुवर्णादि का दान अपनी शक्ति के अनुसार करे।
ऐसा करने से नागदेव प्रसन्न होकर कुल की वृद्धि करते हैं।।१८।।
अथ पितृशापात्सुतक्षययोगम्—
पुत्रस्थानगते भानौ नीचे मन्दाशकस्थिते।
पार्श्वयोः क्रूरसम्बन्धे पितृशापात्सुतक्षयः ।।२०।।
पंचम स्थान में सूर्य अपनी नीच राशि में शनि के अंश में हों और उसके
आगे तथा पीछे पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की हानि होती
है।।१९।।
पुत्रस्थानाधिपे भानौ त्रिकोणे पापसंयुते।
क्रूरेऽन्तरे पापद्रष्टे पितृशापात्सुतक्षयः ।।२०।।
पुत्रस्थानेश सूर्य हो, क्रूरग्रहों के मध्य में त्रिकोण में पापग्रह हों, पापग्रह
से देखे जाते हों तो पिता के शाप से वंश की क्षति होती है।।२०।।
भानुराशिस्थिते जीवे पुत्रेषु भानसंयुते।
पुत्रे लग्ने पापयुते पितृशापात्सुतक्षयः ।।२१।।
सूर्य की राशि में गुरु हो और पंचमेश सूर्य से युत हो तथा पंचम
और लग्न में पापग्रह हों तो पिता के शाप से सन्तान की हानि होती
है।।२१।।
लग्नेशे दुर्बले पुत्रे पुत्रेशे भानुसंयुते।
पुत्रे लग्ने पापयुते पितृशापात्सुतक्षयः ।।२२।।
लग्नेश दुर्बल होकर पंचम भाव में हो और पंचमेश सूर्य से युतः हों तथा
पंचम और लग्न में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की हानि होती
है।।२२।।
३५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पितृस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे वा तथा स्थिते।
लग्ने पुत्रे पापयुते पितृशापात्सुतक्षयः॥२३॥
पितृस्थानेश (१०वें भाव का स्वामी) पाँचवें भाव में हो और पंचमेश
१०वें भाव में हो तथा लग्न और पाँचवें भाव में पापग्रह हों तो
पिता के शाप से संतान की हानि होती है॥२३॥
पितुःस्थानाधिपो भौमः पुत्रेशेन समन्वितः।
लग्ने पुत्रे पितृस्थाने पापात्सन्ततिनाशनम् ॥२४॥
पितृस्थान (१०) का स्वामी होकर भौम पंचमेश से युत हो और
लग्न, पंचम तथा दशम में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की
हानि होती है॥२४॥
पितृस्थानाधिपे दुःस्थे कारके पापराशिगे।
सपापे पुत्रलग्नेशे पितृशापात्सुतक्षयः॥२५॥
पितृस्थान (१०) का स्वामी ६, ८, १२ भाव में हो तथा कारक (गुरु)
पापग्रह की राशि में हो और पंचमेश तथा लग्नेश पापयुत हों तो पिता
के शाप से संतान की हानि होती है॥२५॥
लग्नपञ्चमभावस्था भानुभौमशनैश्चराः।
रन्ध्रे रिःफे राहुजीवौ पितृशापात्सुतक्षयः॥२६॥
लग्न तथा पंचम भाव में सूर्य, भौम, शनि हों और ८, १२ स्थान में राहु
तथा गुरु हों तथा लग्न में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की हानि
होती है॥२६॥
लग्नाष्टमगे भानौ पुत्रस्थे भानुनन्दने।
पुत्रेशे राहुसंयुक्ते लग्ने पापे सुतक्षयः॥२७॥
बारहवें लग्न से आठवें में सूर्य हों, पाँचवें भाव में शनि हो, पंचमेश राहु
से युत हो और लग्न में पापग्रह हों तो पितृशाप से संतान की हानि होती
है॥२७॥
व्ययेशे लग्नभावस्थे रन्ध्रेशे पुत्रराशिगे।
पितृस्थानाधिपे रन्ध्रे पितृशापात्सुतक्षयः॥२८॥
व्यय भाव के स्वामी लग्न में हो और अष्टमेश पाँचवें भाव में हो तथा
पितृस्थानेश आठवें भाव में हो तो पिता के शाप से संतानहीन होता
है॥२८॥