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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

१४३
विंशोऽध्यायः
श्रीमान्सप्तद्वीपैकनायकः ॥४॥
आसीत्पुरा कृतयुगे सुमतिर्नाम भूपतिः । सोमवंशोद्भवः सर्वसंपद्विभूषितः ॥५॥
धर्मात्मा सत्यसंपन्नः शुचिवंश्योऽतिथिप्रियः । सर्वलक्षणसंपन्नः शुश्रूषुर्निरहंकृतिः ॥६॥
सदा हरिकथासेवी हरिपूजापरायणः । हरिभक्तपराणां च कीर्तिमांस्तथा ॥७॥
पूज्यपूजारतो नित्यं समदर्शी गुणान्वितः । सर्वभूतहितः शान्तः कृतज्ञः सत्यमतिर्मुने ॥८॥
तस्य भार्या महाभागः सर्वलक्षणसंयुता । पतिव्रता पतिप्राणा नाम्ना सत्यपरायणौ ॥६॥
तावुभौ दम्पती नित्यं हरिपूजापरायणौ । जातिस्मरौ महाभागौ सत्यज्ञौ तडागारामवप्रादीनसंख्यातानन्वितैनतुः ॥१०॥
अन्नदानरतौ नित्यं जलदानपरायणौ । मनोज्ञा मञ्जुवादिनी ॥११॥
सा तु सत्यमतिर्नित्यं शुचिर्विष्णोगृहे सती । नृत्यत्यत्यन्तसन्तुष्टा मनोज्ञं बहुविस्तरम् ॥१२॥
सोऽपि राजा महाभागौ द्वादशीद्वादशीदिने । ध्वजमारोपयत्येव प्रियांसत्यमति चास्य देवा अपि सदास्तुवन् ॥१३॥
एवं हरिपरं नित्यं राजानं धर्मकोविदम् । त्रिलोके विश्रुतौ ज्ञात्वा दम्पती धर्मकोविदौ । आययौ बहुभिः शिष्यैर्द्रष्टुकामो विभाण्डकः ॥१४॥
तमायांतं मुनिं श्रुत्वा स तु राजा विभाण्डकम् । प्रत्युद्ययौ सपत्नीकः पूजाभिर्बहुविस्तरम् ॥१५॥
कृतातिथ्यक्रियं शान्तं कृतासनपरिग्रहम् । नीचासनस्थितो भूपः प्राञ्जलिर्मुनिमब्रवीत् ॥१६॥
राजोवाच
भगवन्कृतकृत्योऽस्मि त्वदभ्यागमनेन वै । सतामागमनं सन्तः प्रशंसन्ति सुखावहम् ॥१७॥
यत्र स्यान्महतां प्रेम तत्र स्युः सर्वसंपदः । तेजः कीर्तिर्धनं पुत्रा इति प्राहुर्विपश्चितः ॥१८॥
द्वीपों का एकमात्र शासक, धर्मात्मा, सत्यप्रेमी, शुद्ध परिवार वाला, अतिथिसवेक, सब लक्षणों से युक्त और सब ऐश्वर्यों
से सम्पन्न था ॥३-५॥ वह सर्वदा हरि-कथा में मग्न और भगवान् की पूजा को ही अपना लक्ष्य समझता
था । अहंकार-रहित होकर हरि-भक्तों की सेवा किया करता था । समदर्शी, गुणी वह राजा पूज्यों की पूजा करता
तथा सब प्राणियों के हित में लगा रहता था । वह परम शान्त, कृतज्ञ और यशस्वी था ॥६-७॥
मुनि ! उस राजा की सत्यमति नाम की सौभाग्यवती, सब शुभ लक्षणों से युक्त, पतिव्रता और पति को
प्राणों से भी बढ़कर समझने वाली स्त्री थी । वे दोनों पति-पत्नी सर्वदा विष्णु की पूजा किया करते थे ।
भाग्यशाली, सत्य के जानने वाले और सत्यपरायण उन दोनों को पूर्व जन्म की बातों का भी ज्ञान था ।
वे नित्य अन्न और जल का दान करते थे और असंख्य, तालाब, वाटिका और धर्मशाला आदि बनवाते
थे । वह मंजुभाषिणी सत्यमति प्रति दिन पवित्र भाव से विष्णु मन्दिर में प्रसन्न होकर नृत्य करती थी
॥८-११॥ वह राजा भी प्रति द्वादशी को मनोहर और बहुत बड़ी ध्वजा की स्थापना किया करता था ।
ऐसे हरिभक्त, धर्मज्ञ, राजा और उसकी रानी सत्यमति की देवता भी सर्वदा स्तुति किया करते थे । उस धर्मज्ञ
दम्पती का तीनों लोकों में यश सुनकर अनेकों शिष्यों के साथ विभांडक ऋषि मिलने के लिए आये । राजा ने मुनि
विभांडक का आगमन सुनकर पत्नी सहित बड़े समारोह के साथ अगवानी की । बड़ी श्रद्धा से अतिथिसत्कार कर उस
शान्त मुनि को आसन पर बैठाया । राजा स्वयं मुनि के समीप एक लघु आसन पर बैठकर हाथ जोड़कर मुनि
से बोला ॥१२-१६॥
राजा बोला--भगवन् ! आपके इस शुभागमन से मैं कृतकृत्य हूँ, सज्जन व्यक्ति सुखदायक सज्जन सन्तों
के आगमन की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं । जिस व्यक्ति पर पुण्यात्माओं का स्नेह होता है उसको सारी संपत्तियाँ,
तेज, यश, धन, और पुत्र आदि सब कुछ प्राप्त होते हैं, ऐसा विद्वानों ने कहा है । मुनिवर्य ! प्रभो ! जिस पर सज्जनों

१५४ नारदीयपुराणम्
तत्र वृद्धिमपायान्ति श्रेयांस्यनुदिनं मुने । यत्र सन्तः प्रकुर्वन्ति महतीं करुणां प्रभो ॥१९६॥
यो मूर्ध्नि धारयेद्ब्रह्मन्महत्पादजलं रजः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु पुण्यात्मा नात्र संशयः ॥२०॥
मम पुत्राश्च दाराश्च संपत्त्वयि समर्पिताः । मामाज्ञापय विप्रेन्द्र किं प्रियं करवाणि ते ॥२१॥
विनयावनतं भूपं स निरीक्ष्य मुनीश्वरः । स्पृशन्करेण तं प्रीत्या प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥२२॥
ऋषिरुवाच
राजन्यदुक्तं भवता तत्सर्वं त्वत्कुलोचितम् । विनयावनतः सर्वो बहुश्रेयो लभेदित ॥२३॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्च नृपसत्तम । विनयाल्लभते मर्त्यो दुर्लभं किं महात्मनाम् ॥२४॥
प्रीतोऽस्मि तव भूपाल सन्मार्गपरिवर्तिनः । स्वस्ति ते सततं भूयाद्यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ॥२५॥
पूजाबहुविधाः सन्ति हरितुष्टिविधायिकाः । तासु नित्यं ध्वजारोपे वर्तसे त्वं सदोद्यतः ॥२६॥
भार्यापि तव साध्वीयं नित्यं नृत्यपरायणा । किमर्थमेतद्वृत्तान्तं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥२७॥
राजोवाच
शृणुष्व भगवन्सर्वं यत्पृच्छसि वदामि तत् । आश्चर्यभूतं लोकानामावयोश्चरितं त्विह ॥२८॥
अहमासं पुरा शूद्रो मालिनिर्नाम सत्तम । कुमार्गनिरतो नित्यं सर्वलोकाहिते रतः ॥२९॥
पिशुनो धर्मविद्वेषी देवद्रव्यापहारकः । गोघ्नश्च ब्रह्महा चौरः सर्वप्राणिवधे रतः ॥३०॥
नित्यं निष्ठुरवक्ता च पापी वेश्यापरायणः । एवं स्थितः कियत्कालमनादृत्य महद्वचः ॥३१॥
सर्वबन्धुपरित्यक्तो दुःखी वनमुपागतः । मृगमांसाशनो नित्यं तथा पान्थविलुम्पकः ॥३२॥
की महान् कृपा होती है, उसके श्रेय और पुण्य दिनों दिन बढ़ते हैं। ब्रह्मन् ! जो महापुरुषों के चरणोदक और चरणरज
को अपने शिर पर धारण करता है उस पुण्यात्मा ने मानो सब तीर्थों में स्नान कर लिया, इसमें लेशमात्र भी सन्देह
नहीं । मेरे पुत्र, स्त्री और सारा कोश आपकी सेवा में अर्पित है । विप्रेन्द्र ! मुझे आज्ञा दीजिए, कौन सी आपकी प्रिय
सेवा करूँ । वे मुनिश्वर उस विनीत राजा को देखकर उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्रेम से बोले ॥१९७-२२॥
ऋषि बोले--राजन् ! जो कुछ तुमने कहा, वह सब तुम्हारे कुल के सर्वथा अनुरूप है, इस संसार में विनय-
शील व्यक्ति को सब श्रेय प्राप्त होते हैं नृपवर्य ! मनुष्य विनय के द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब कुछ प्राप्त
करता है, महापुरुषों के लिए इस संसार में दुर्लभ क्या है ? भूपाल ! सन्मार्ग का प्रदर्शन करने वाले तुम्हारे ऊपर
प्रसन्न हूँ,तुम्हारा सर्वदा कल्याण हो, आज मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, उसका उत्तर दो । भगवान् को प्रसन्न करने
वाली बहुत सी पूजा-विधियाँ हैं, परन्तु तुम उनमें सर्वदा ध्वजारोपण ही उत्साह के साथ किया करते हो, तुम्हारी
वह साध्वी भार्या भी नित्य मन्दिर में नृत्य किया करती है, इस विषय में मुझे यथार्थ बात बतलाओ ॥२३-२७॥
राजा ने कहा-- भगवन् ! आप जो कुछ-पूछ रहे हैं, उसको मैं बता रहा हूँ, सुनिए । इस संसार में हम
दोनों का चरित्र लोक के लिए आश्चर्यजनक है । मुनिसत्तम ! मैं पहले मालिनि नामक शूद्र था । सर्वदा मैं
कुमार्ग में लगा रहता और प्राणियों का अहित किया करता था । सदा धर्म से द्वेष करना, देव सम्पत्ति का
अपहरण करना, चुगली करना, गोहत्या, ब्रह्महत्या, चोरी और प्राणिवध मेरा काम था ॥२८-३०॥ निष्ठुर बातें
करना, वेश्यागमन और पापाचरण ही मेरे नित्य के प्रिय कार्य थे । कुछ काल तक महापुरुषों की बातों के
अनादर कर इसी प्रकार असत्कर्म करता रहा । निदान मैं सब बान्धवों और परिवार को छोड़कर दुःखी हो वन में
चला गया । उस निर्जन वन में मृग मांस खाकर दिन बिताता और प्रति दिन पथिकों को लूटता था, इस प्रकार
अकेला उद्वेगजनक कार्यों को करता हुआ वन में रहने लगा । एक दिन भूख-प्यास से व्याकुल ग्रीष्म की ज्वाला

विंशोऽध्यायः १४५
एकाकी दुःखबहुलो न्यवसन्निर्जने वने । एकदा क्षुत्परिश्रान्तो निदाघार्त्तः पिपासितः ॥३३॥
जीर्णं देवालयं विष्णोरपश्यं विजने वने । हंसकारण्डवाकीर्णं तत्समीपे महत्सरः ॥३४॥
पर्यन्तवनपुष्पौघच्छादितं तन्मुनीश्वर । अपिबं तत्र पानीयं तत्तीरे विगतश्रमः ॥३५॥
फलानि जग्ध्वा शीर्णानि स्वयं क्षुच्च निवारिता । तस्मिञ्जीर्णालये विष्णोर्निवासं कृतवानहम् ॥३६॥
जीर्णस्फुटितसंधानं तस्य नित्यमकारिषम् । पर्णैस्तृणैश्च काष्ठौघैर्गृहं सम्यक् प्रकल्पितम् ॥३७॥
स्वसुखार्थं तु तद्भूमिर्मया लिप्ता मुनीश्वर । तत्राहं व्याधवद्वृत्तिस्थो हत्वा बहुविधान्मृगान् ॥३८॥
आजीवं वर्तयन्नित्यं वर्षाणां विंशतिः स्थितः । अथेयमागता साध्वी विन्ध्यदेशसमुद्भवा ॥३६॥
निषादकुलजा विप्र नाम्ना ख्यातावकोकिला । बन्धुवर्गपरित्यक्ता दुःखिता जीर्णविग्रहा ॥४०॥
क्षुत्तृड्घर्मपरिश्रान्ता शोचन्ती स्वकृतं ह्यघम् । दैवयोगात्समायाता भ्रमन्ती विजने वने ॥४१॥
ग्रीष्मतापार्दिता बाह्य स्वान्ते चार्धिनिपीडिता । इमां दुःखार्दितां दृष्ट्वा जाता मे विपुला दया ॥४२॥
दत्तं मया जलं चास्यै मांसं वन्यफलानि च । गतश्रमा त्वियं ब्रह्मन्मया पृष्टा यथातथम् ॥४३॥
अवेदयत्स्ववृत्तान्तं तच्छृणुष्व महामुने । नाम्नावकोकिला चाहं निषादकुलसम्भवा ॥४४॥
दारुकस्य सुता चाहं विन्ध्यपर्वतवासिनी । परस्वहारिणी नित्यं सदा पैशुन्यवादिनौ ॥४५॥
पुंश्चलीत्येवमुक्त्वा तु बन्धुवर्गैः समुज्झिता । कियत्कालं ततः पत्या भृताहं लोकनिन्दिता ॥४६॥
दैवात्सोऽपि गतो लोकं यमस्यात्र विहाय माम् । कान्तारे विजने चैका भ्रमन्ती दुःखपीडिता ॥४७॥
दैवात्तत्सविधं प्राप्ता जीविताहं त्वयाधुना । इत्येवं स्वकृतं कर्म मह्यं सर्वं न्यवेदयत् ॥४८॥
से संतप्त और थका हुआ सा इधर-उधर घूम रहा था, इतने में उस निर्जन वन में एक विष्णु का टूटा हुआ मन्दिर
दिखलायी दिया ॥३१-३३॥ उसके समीप ही हंस और कारंडव पक्षियों से सुशोभित एक महान् सरोवर था।
मुनीश्वर ! उसका तट प्रदेश वन्य पुष्पों से आच्छादित था। वहाँ मैंने पानी पिया और तीर पर बैठकर सारी
थकावट दूर की। भूमि पर गिरे पके फलों को खाकर अपनी भूख मिटाई। उस जीर्ण शीर्ण देव-मन्दिर में मैंने अपना
निवास-स्थान बनाया ॥३४-३६॥ प्रतिदिन उसकी जीर्ण और फटी दरारों को स्वयं जोड़ना प्रारम्भ किया। पत्तियों,
घासों और लकड़ियों से एक अच्छा घर भी बना लिया। मुनीश्वर ! अपने सुख के लिए उस भूमि को लीप पोत
कर रहने के योग्य बनाया। वहाँ मैं व्याध को भाँति अनेक प्रकार के पशुओं को मारकर अपनी जीविका चलाता
था, इस प्रकार वहाँ रहकर बीस वर्ष बिताये । विप्र ! इसके अनन्तर विन्ध्य प्रदेश की रहने वाली, निषाद कुल की
यह साध्वी जिसका नाम अवकोकिला था—आई । अपने बन्धु जनों से छोड़ी हुई, दुःखी, दुबली-पतली, भूख-प्यास
और धूप से व्याकुल, अपने किये पापों पर पश्चात्ताप करती हुई दैव योग से उस विजन वन में घूमती हुई वहाँ
आई ॥३७-४१॥ उस समय धूप से जली हुई वह स्त्री शारीरिक और मानसिक पीड़ा से अत्यन्त पीड़ित थी। दुःख
से पीड़ित इसको देखकर मुझे बड़ी दया आई। मैंने इसको पानी, मांस और जंगली फलों को खाने के लिए दिया।
ब्रह्मन् ! जब इसकी थकावट दूर हो गई तब इससे जो कुछ पूछा और इसने जो कुछ अपना वृत्तान्त कहा उसको
उसी रूप में कह रहा हूँ महामुने ! उसको सुनिए ॥४२-४४॥
मैं निषाद कुल में उत्पन्न हुई हूँ, मेरा नाम अवकोकिला है, मैं दारुक की पुत्री हूँ और विन्ध्य पर्वत पर
निवास करती हूँ। पहले मैं सर्वदा चुगली खाती और दूसरे के धन को चुराया करती थी । परिवार वालों ने मुझे
पुंश्चली कह कर घर से अलग कर दिया। कुछ समय तक पति ने लोक-निन्दित मेरा भरण-पोषण किया। दैव
योग से वह भी यहाँ मुझको अकेली छोड़कर यमलोक को चला गया। मैं दुःखी अकेली इस विजन वन में भटकती
हुई दैव योग से यहाँ आपके पास आई हूँ, आपने मुझे इस समय जीवन दान दिया, इस प्रकार इसने अपने किये
हुए सब कर्मों को मुझसे कह सुनाया ॥४५-४८॥ इसके अनन्तर हम दोनों उस देव-मन्दिर में दम्पति बन कर दस
१९--नारदीयपुराणम्

१४६ नारदीयपुराणम्
ततो देवालये तस्मिन्दम्पतीभावमाश्रितौ । स्थितौ वर्षाणि दश च आवां मांसफलाशिनौ ॥४६॥
एकदा मद्यपानेन प्रमत्तौ निर्भरं मुने । तत्र देवालये रात्रौ मुदितौ मांसभोजनात् ॥५०॥
तनुवस्त्रापरिज्ञानौ नृत्यं चक्रुव मोहितौ । प्रारब्धकर्मभोगान्तमावां युगपदागतौ ॥५१॥
यमदूतास्तदायाताः पाशहस्ता भयंकराः । नेतुमावां नृत्यरतौ सुघोरां यमयातनाम् ॥५२॥
ततः प्रसन्नो भगवान्कर्मणा मम मानद । देवावसथसंस्कारसंज्ञितेन कृतेन नः ॥५३॥
स्वदूतान्प्रेषयामास स्वभक्तावनतत्परः । ते दूता देवदेवस्य शङ्खचक्रगदाधराः ॥५४॥
सहस्रसूर्यसंकाशाः सर्वे चारुचतुर्भुजाः । किरीटकुण्डलधरा हारिणो वनमालिनः ॥५५॥
दिशो वितिमिरा विप्र कुर्वन्तः स्वेन तेजसा । भयंकरान्याशहस्तान्दंष्ट्रिणो यमकिङ्करान् ॥५६॥
आवयोर्ग्रहणे यत्तान्‌ऊचुः कृष्णपरायणः ॥५७॥
विष्णुदूता ऊचुः
भो भो क्रूरा दुराचारा विवेकपरिवर्जिताः । मुञ्चध्वमेतौ निष्पापौ दम्पती हरिवल्लभौ ॥५८॥
विवेकस्त्रिषु लोकेषु संपदामदिकारणम् । अपापे पापधीर्यस्तु तं विद्यात्पुरुषाधमम् ॥५९॥
पापे त्वपापधीर्यस्तु तं विद्यादधमाधमम् ॥६०॥
यमदूता ऊचुः
युष्माभिः सत्यमेवोक्तं कि त्वेतौ पापिसत्तमौ । यमेन पापिनो दण्ड यास्तन्नेष्यामो वयं दिवमौ ॥६१॥
श्रुतिप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः । धर्माधर्मविवेकोऽयं तन्नेष्यामो यमान्तिकम् ॥६२॥
वर्ष बिताये, प्रति दिन मांस और वन्य फलों का ही भोजन होता था । मुनिवर ! एक दिन हम लोग अधिक मदिरा
पी लेने से मतवाले हो गए, रात में उस देव मन्दिर में मांस भोजन कर अत्यन्त आनन्द मनाया । मद विह्वल हो शरीर
और वस्त्र की सुध बुध खोकर हम दोनों नाचने लगे । अकस्मात् एक ही साथ हम दोनों के प्रारब्ध कर्म के भोग
का अन्त भी आ गया ॥४६-५१॥ उस समय भयंकर यमदूत हाथ में पाश लिए हुए नृत्य-रत हम दोनों को घोर
नरक यातना में ले जाने के लिए आये । हे मानदाता ! अपने भक्तों की रक्षा करने में तत्पर रहने वाले, भगवान्
हम दोनों पर देवमन्दिर के संस्कार आदि के करने के कारण प्रसन्न होकर अपने दूतों को भेजा । देवाधिदेव भगवान्
के वे दूत शंख, चक्र और गदा हाथ में लिए हुए, किरीटकुण्डलधारी, वनमाला और हार गले में पहने हुए,
सहस्र सूर्य के समान तेजस्वी और सुन्दर चार भुजा वाले थे । विप्र ! कृष्ण रूप धारी दूत अपने तेज से सब दिशा-
ओं को प्रकाशित करते हुए उन भयंकर, और बड़े-बड़े दाँतों वाले यम दूतों से बोले जो हाथ में पाश लेकर हम
दोनों को बाँधने के लिए उद्यत थे ॥५२-५७॥
विष्णु दूत बोले—अरे क्रूर, दुराचारी, विवेकहीन यमदूतो ! इस भगवद्भक्त, निष्पाप स्त्री-पुरुष को
छोड़ दो । देखो विवेक ही तीनों लोकों में सम्पत्ति का एक मात्र कारण माना गया है । जो पाप-रहित प्राणियों को
पापी समझता है, उसको नराधम समझना चाहिए । इसी प्रकार जो पापी को पुण्यात्मा समझता है उसको परम
अधम समझना चाहिए, ॥५८-६०॥
यमदूत बोले— तुम लोगों ने सत्य ही कहा, किन्तु ये दोनों तो घोर पापी हैं। प्रभु यम द्वारा पापी
दण्ड पाते हैं, इस लिए हम इन दोनों को अवश्य ले जायेंगे । वेदों की आज्ञायें ही धर्म हैं और वेद-विरुद्ध बातें ही
अधर्म कही जाती हैं । धर्म और अधर्म के विषय में यही निर्णय है। अतः हम अवश्य इन दोनों को यम के समीप

विंशोऽध्यायः १४७
एतच्छ्रुत्वातिकुपिता विष्णुदूता महौजसः । प्रत्यूचुस्तान्यमभटान्धर्मे धर्ममानिनः ॥६३॥
विष्णुदूता ऊचुः
अहो कष्टं धर्मदृशामधर्मः स्पृशते सभाम् । सम्यग्विवेकशून्यानां निदानं ह्यापदां महत् ॥६४॥
तर्कणाद्यविशेषेण नरकाध्यक्षतां गताः । यूयं किमर्थमद्यापि कर्तुं पापानि सोद्यमाः ॥६५॥
स्वकर्मक्षयपर्यन्तं महापातकिनोऽपि च । तिष्ठन्ति नरके घोरे यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥६६॥
पूर्वसंचितपापानामदृष्ट्वा निष्कृतिं वृथा । किमर्थं पापकर्मणि करिष्येऽथ पुनः पुनः ॥६७॥
श्रुतिप्रणिहितो धर्मः सत्यं सत्यं न संशयः । किन्त्वाभ्यां चरितान्धर्मान्प्रवक्ष्यामो यथातथम् ॥६८॥
एतौ पापविनिर्मुक्तौ हरिशुश्रूषणे रतौ । हरिणा त्राणमाणौ च मुञ्चध्वमविलम्बितम् ॥६९॥
एषा च नर्तनं चक्रे तथैष ध्वजारोपणम् । अन्तकाले विष्णगृहे तेन निष्पापतां गतौ ॥७०॥
अन्तकाले तु यन्नाम श्रुत्वोक्त्वापि च वै सकृत् । लभते परमं स्थानं किमु शुश्रूषणे रताः ॥७१॥
महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । कृष्णसेवी नरोऽन्तेऽपि लभते परमां गतिम् ॥७२॥
यतीनां विष्णुभक्तानां परिचर्यापरायणा । ते दूताः सहसा यान्ति पापिनोऽपि परां गतिम् ॥७३॥
मुहूर्तं वा मुहूर्त्ताद्धं यस्तिष्ठेद्धरिमन्दिरे । सोऽपि याति परं स्थानं किमु द्वात्रिंशवत्सरान् ॥७४॥
उपलेपनकर्त्तारौ संमार्जनपरायणौ । एतौ हरिगृहे नित्यं जीर्णशीर्णोधिरोपको ॥७५॥
जलसेचनकर्त्तारौ दीपर्दौ हरिमन्दिरे । कथेमेतौ महाभागौ यातनाभोगमर्हतः ॥७६॥
ले जायेंगे । यह सुनकर वे महातेजस्वी विष्णुदूत कुपित होकर अधर्म को ही धर्म मानने वाले उन यम-दूतों से
बोले ॥६१-६३॥
विष्णुदूत बोले—अहो ! यह बड़े दुःख की बात है कि धर्म निर्णायकों की सभा में यह अधर्म (अन्धेर)
फैल रहा है। सम्यक् विवेक से रहितों का निर्णय महान् अनर्थों की जड़ है। तुम लोग विशेष विवेक और तर्क से
शून्य होने के कारण ही नरक के अध्यक्ष बनाये गये हो, क्यों अब भी पाप कर्म करने के लिए तत्पर हुए हो ।
महापापी भी अपने पापों के क्षीण होने तक घोर नरक में कल्पान्त तक रहते हैं। पूर्व संचित पापों को बिना देखे
फल के विषय में सोचना व्यर्थ है। तुम लोग क्यों बार-बार पाप कर्म कह रहे हो ?॥६४-६७॥ वेदविहित धर्म है,
यह सत्य है सत्य है, इसमें सन्देह नहीं किन्तु इन दोनों के किये हुए धर्मों को मैं यथार्थ रूप से कह रहा हूँ। हरि की
शुश्रूषा में लीन रहने वाले ये दोनों निष्पाप हैं । इनको शीघ्र छोड़ दो, क्योंकि भगवान् इनकी रक्षा का स्वयं ध्यान
रखते हैं । इस स्त्री ने विष्णु मन्दिर में नृत्य किया है और इस पुरुष ने जीवन को अन्तिम घड़ियों में विष्णु मन्दिर
में ध्वजारोपण किया है। इसलिए इस धर्माचरण से दोनों निष्पाप हो गये । मृत्यु के समय जब भगवान् के नाम को
एक बार सुनकर या उच्चारण कर मनुष्य परम स्थान को पा जाता है तब जो भगवान् की सेवा में तत्पर हों उनके
विषय में क्या कहा जाय ॥६८-७१॥ महापापों का करने वाला या उप पापों से युक्त व्यक्ति भी अन्तिम समय में
भी कृष्ण की सेवा से परम गति को पा जाता है । दूतो ! यतियों और विष्णु-भक्तों की सेवा करने वाले पापी भी
एकाएक परा गति को प्राप्त कर लेते हैं। जो हरि मन्दिर में एक क्षण या आधे क्षण तक रहता है वह भी परम
स्थान को चला जाता है तो जिसने बत्तीस वर्ष तक निवास किया उसके विषय में क्या कहा जाय । ये दोनों प्रति
दिन जीर्ण शीर्ण मन्दिर का जीर्णोद्धार करते थे, श्रद्धापूर्वक झाडू लगाते और लीपते थे। नित्य प्रति मन्दिर में
जल छिड़कते और भगवान् को दीपक दिखाते थे । तुम्हीं बताओ, क्या ये दोनों भाग्यशाली किसी भी दृष्टि से यम-
यातना के योग्य हैं ? ॥७२-७६॥

१४८ नारदीयपुराणम्
इत्युक्तवा विष्णुदूतास्ते छित्त्वा पाशांस्तदैव हि। आरोप्यावां विमानाग्र्यंययु विष्णोः परं पदम् ॥७७॥
तत्र सामीप्यमापन्नौ देवदेवस्य चक्रिणः। दिव्यान्भोगान्भुक्त्तवन्तौ तावत्कालं मुनीश्वर ॥७८॥
दिव्यान्भोगॉस्तु तत्रापि भुक्त्वा यातौ महीमिमाम्। अत्रापि संपदतुला हरिसेवाप्रसादतः ॥७९॥
अनिच्छया कृतेनापि सेवनेन हरेर्मुने। प्राप्तमीदृक् फलं विप्र देवानामपि दुर्लभम् ॥८०॥
इच्छयाराध्य विश्वेशं भक्तिभावेन माधवम्। प्राप्स्यावः परमं श्रेय इति हेतुर्निरूपितः ॥८१॥
अवशेनापि यत्कर्म कृतं स्यात्सुमहत्फलम्। जायते भूमिदेवेन्द्र किं पुनः श्रद्धया कृतम् ॥८२॥
एतदुक्तं निशम्यासौ स मुनींद्रो विभाण्डकः। प्रशस्य दम्पती तौ तु प्रययौ स्वतपोवनम् ॥८३॥
तस्माज्जानीहि देवर्षे देवदेवस्य चक्रिणः। परिचर्या तु सर्वेषां कामधेनूपमा स्मृता ॥८४॥
हरिपूजापराणां तु हरिरेव सनातनः। ददाति परं श्रेयः सर्वकामफलप्रदः ॥८५॥
य इदं पुण्यमाख्यानं सर्वपापप्रणाशनम्। पठेच्च शृणुयाद्वापि सोऽपि याति परां गतिम् ॥८६॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सुमतिभूपकथावर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥२०॥

यह कह कर उन विष्णुदूतों ने तत्काल यम पाश को तोड़ डाला और हम दोनों को उत्तम विमान पर
बैठाकर विष्णु के परम लोक में पहुँचा दिया। मुनीश्वर ! वहाँ हमको देवाधिदेव चक्रधर विष्णु की सामीप्य-मुक्ति
प्राप्त हुई, उचित समय तक दिव्य भोगों का भी भोग किया। वहाँ से दिव्य भोगों को भोग कर इस पृथ्वी पर आया
और यहाँ भी हरि-सेवा के प्रसाद से अतुल सम्पत्ति प्राप्त हुई ॥७७-७९॥ मुने ! इच्छा के बिना भी की गई हरि भक्ति
के कारण यह देव-दुर्लभ फल प्राप्त हुआ तो इच्छा से भक्तिभावपूर्वक माधव की आराधना कर परम श्रेय हम प्राप्त
प्राप्त करेंगे, यह कारण बता दिया। भूदेवेन्द्र ! जब अनिच्छा से भी किये हुए कर्म से ऐसा उत्तम फल मिलता
है तब श्रद्धा से किये हुए कर्मों का क्या फल होगा, इसके विषय में क्या कहा जाय ? ॥८०-८२॥
वे मुनीन्द्र विभांडक सुमति की कही हुई इन बातों को सुनकर उन दोनों पति-पत्नियों के भाग्य को प्रशंसा कर
अपने तपोवन को चले गए। इसलिए, देवर्षि नारद ! देवाधिदेव चक्रधर की सेवा सबको कामधेनु के समान
फल देने वाली कही गयी है, ऐसा जानो। विष्णुपुजापरायण भक्तों को स्वयं सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले
सनातन हरि ही परम श्रेय प्रदान करते हैं। जो सब पापों को नष्ट करने वाली इस पुण्य कथा को सुनता है अथवा
पढ़ता है वह भी परा गति को प्राप्त करता है ॥८३-८६॥
श्रीनारदीयमहापुराण में सुमति भूप की कथा का वर्णन नामक बीसवां अध्याय समाप्त ॥२०॥

एकविंशोऽध्यायः
सनक उवाच
अन्यद्व्रतं प्रवक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः । दुर्लभं सर्वलोकेषु विख्यातं हरिपञ्चकम् ॥१॥
नारीणां च नराणां च सर्वदुःखनिवारणम् । धर्मकामार्थमोक्षाणां निदानं मुनिसत्तम ॥२॥
सर्वाभीष्टप्रदं चैव सर्वव्रतफलप्रदम् । मार्गशीर्षे सिते पक्षे दशम्यां नियतेन्द्रियः ॥३॥
कुर्यात्स्नानादिकं कर्म दन्तधावनपूर्वकम् । कृत्वा देवार्चनं सम्यक्तथा पञ्च महाध्वरान् ॥४॥
एकाशी च भवेत्तस्मिन् दिने नियममास्थितः । ततः प्रातः समुत्थाय ह्येकादश्यां मुनीश्वर ॥५॥
स्नानं कृत्वा यथाचारं हरिं चार्चयेद्गृहे । स्नापयेद्देवदेवेशं पञ्चामृतविधानतः ॥६॥
अर्चयेत्परया भक्त्या गन्धपुष्पादिभिः क्रमात् । धूपैर्दीपैश्च नैवेद्यैस्ताम्बूलैश्च प्रदक्षिणैः ॥७॥
संपूज्य देवदेवेशमिमं मन्त्रमुदीरयेत् । नमस्ते ज्ञानरूपाय ज्ञानदाय नमोऽस्तु ते ॥८॥
नमस्ते सर्वरूपाय सर्वसिद्धिप्रदायिने । एवं प्रणम्य देवेशं वासुदेवं जनार्दनम् ॥६॥
वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण ह्युपवासं समर्पयेत् । पञ्चरात्रं निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव ॥१०॥
त्वदाज्ञया जगत्स्वामिन्ममाभीष्टप्रदो भव । एवं समर्प्य देवस्य उपवासं जितेन्द्रियः ॥११॥
रात्रौ जागरणं कुर्यादेकादश्यामथो द्विज । द्वादश्यां च त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां जितेन्द्रियः ॥१२॥
पौर्णमास्यां च कर्तव्यमेवं विवर्चनं मुने । एकादश्यां पौर्णमास्यां कर्तव्यं जागरं तथा ॥१३॥
अध्याय २१
हरिपंचरात्रव्रत का वर्णन
सनक बोले-- नारद ! दूसरे व्रत को यथार्थ रूप से कह रहा हूँ सुनो। हरिपंचक व्रत परम दुर्लभ
और सब लोकों में प्रसिद्ध व्रत है। मुनिवर्य ! यह व्रत नर-नारी सबके दुःखों को दूर करने वाला, धर्म, अर्थ, काम
मोक्ष का एकमात्र कारण है ॥१-२॥ सब मनोरथों और सब व्रतों के फल को देने वाला है। अगहन महीने की
शुक्ल पक्ष की दशमी को इन्द्रिय संयम पूर्वक दातौन, स्नान आदि नित्य कर्म तथा भली भाँति पंचमहायज्ञ और
देवार्चन कर के उस दिन नियमपूर्वक एकाहार व्रत करे। मुनीश्वर ! दूसरे दिन एकादशी को प्रातः काल उठकर
स्नान करे और आचारानुकूल घर पर ही विष्णु को पूजा करे, देवदेवेश को विधि पूर्वक पंचामृत से स्नान करावे
और अत्यन्त श्रद्धा से पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल से क्रमशः पूजन कर प्रदक्षिणा करे ॥३-७॥ देवदेवेश की
पूजा कर आगे कहे गए मन्त्रों का उच्चारण करे। मन्त्र-- 'ज्ञान रूप को नमस्कार है, ज्ञानदाता को नमस्कार हैं,
सर्वरूप, सब सिद्धियों को देने वाले को नमस्कार करता हूँ' इस प्रकार देवेश, वासुदेव, जनार्दन को प्रणामकर
आगे कहे गये मन्त्र से अपने उपवास व्रत को भगवदर्पण करे 'केशव ! आज से तुम्हारी आज्ञा से पाँच रात्रि तक
निराहार रहूँगा, जगन्नाथ ! मेरे मनोरथों को प्रदान कीजिए, द्विज ! वह जितेन्द्रिय इस प्रकार भगवान् को अपना
उपवास व्रत अर्पित कर एकादशी की रात्रि में जागरण करे। मुने ! इसी प्रकार द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी
और पूर्णिमा को वह संयमी व्रती विष्णु को पूजा करे। एकादशी और पूर्णिमा को जागरण करना चाहिए और
पाँचों दिन पंचामृत आदि से सामान्य रूप से पूजा करनी चाहिए, परन्तु पूर्णिमा के दिन अपनी शक्ति के अनुसार दूध

१५० नारदीयपुराणम्
पञ्चामृतादिपूजा तु सामान्या दिनपञ्चसु । क्षीरेण स्नापयेद्विष्णुं पौर्णमास्यां तु शक्तितः ।
तिलहोमश्च कर्त्तव्यस्तिलदानं तथैव च ॥१४॥
ततः षष्ठे दिने प्राप्ते निर्वर्त्य स्वाश्रमक्रियाम् । संप्राश्य पञ्चगव्यं च पूजयेद्विधिवद्धरिम् ॥१५॥
ब्राह्मणाम्भोजयेत्पश्चाद्विभवे सत्यवारितम् । ततः स्वबन्धुभिः सार्द्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥१६॥
एवं पौषादिमासेषु कार्त्तिकान्तेषु नारद । शुक्लपक्षे व्रतं कुर्यात्पूर्वोक्तविधिना नरः ॥१७॥
एवं संवत्सरं कार्यं व्रतं पापप्रणाशनम् । पुनः प्राप्ते मार्गशीर्षे कुर्यादुद्यापनं व्रती ॥१८॥
एकादश्यां निराहारो भवेत्पूर्वमिव द्विज । द्वादश्यां पञ्चगव्यं च प्राशयेत्सुसमाहितः ॥१९॥
गन्धपुष्पादिभिः सम्यग्देवदेवं जनार्दनम् । अभ्यर्च्योपायनं दद्याद्ब्राह्मणाय जितेन्द्रियः ॥२०॥
पायसं मधुसंमिश्रं घृतयुक्तं फलान्वितम् । सुगन्धजलसंयुक्तं पूर्णकुम्भं सदक्षिणम् ॥२१॥
वस्त्रेणाच्छादितं कुम्भं पञ्चरत्नसमन्वितम् । दद्यादध्यात्मविदुषे ब्राह्मणाय मुनीश्वर ॥२२॥
सर्वात्मन् सर्वभूतेश सर्वव्यापिन्सनातन । परमान्नप्रदानेन सुप्रीतो भव माधव ॥२३॥
अनेन पायसं दत्वा ब्राह्मणाम्भोजयेत्ततः । शक्तितो बन्धुभिः सार्द्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥२४॥
व्रतमेतत्तुयः कुर्याद्धरिपञ्चकसंज्ञितम् । न तस्य पुनरावृत्तिर्ब्रह्मलोकात्कदाचन ॥२५॥
व्रतमेतत्प्रकर्त्तव्यमिच्छद्भिर्मोक्षमुत्तमम् । समस्तपापकान्तारदावानलसमं द्विज ॥२६॥
गवां कोटिसहस्राणि दत्त्वा यत्फलमाप्नुयात् । तत्फलं लभ्यते पुम्भिरेतस्मादुपवासतः ॥२७॥
यस्त्वेतच्छृणुयाद्भक्त्या नारायणपरायणः । स मुच्यते महाघोरैः पातकानां च कोटिभिः ॥२८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मार्गशीर्षशुक्लैकादशीमारभ्य पञ्चरात्रिव्रतं
नामैकविंशोऽध्यायः ॥२१॥
से भगवान् को नहलाना चाहिए । तिल का हवन और तिल का दान भी यथा शक्ति करना श्रेयस्कर है ॥८-१४॥
तदनन्तर छठे दिन अपनी नित्य क्रिया से निवृत्त हो, पंचगव्य का पान कर विधिवत् हरि की पूजा करनी चाहिए ।
पूजा के अनन्तर विभवानुकूल अनिवार्य रूप से ब्राह्मण भोजन करावे । पश्चात् स्वयं अपने भाई-बन्धुओं के साथ
मौन होकर भोजन करे। नारद ! इस प्रकार पौष आदि मासों में तथा कार्तिक के अन्त में प्रति शुक्ल पक्ष में
पूर्वोक्त विधि से व्रत करे ॥१५-१७॥ इस प्रकार एक वर्ष तक इस पापनाशक व्रत का अनुष्ठान करे, पुनः अगहन
आने पर व्रती व्रतोद्यापन करे । द्विज ! पूर्व की ही भाँति एकादशी को निराहार रहे, द्वादशी के दिन सावधान होकर
पंचगव्य पान करे । गंध, पुष्प आदि से देवाधिदेव जनार्दन की पूजा कर वह जितेन्द्रिय ब्राह्मणों को
उपहार दे ॥१८-२०॥ मुनीश्वर अध्यात्मज्ञानी विद्वान् ब्राह्मण को मधु, घृत और फल के सहित खीर, सुगन्धित
जल से भरा दक्षिणा सहित पूर्ण कलश और वस्त्र से ढँक कर पंचरत्न सहित एक कलश देना चाहिए । सर्वात्मन् !
सर्वभूतेश ! सर्वव्यापक ! सनातन ! माधव ! इस उत्तम अन्न के दान से प्रसन्न होइए, इस मन्त्र से खीर का
दान करने के बाद शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को खिलावे, स्वयं भी शान्त होकर भाई बन्धुओं के साथ भोजन करे ।
इस हरिपंचक नामक व्रत का जो अनुष्ठान करता है, वह कभी भी ब्रह्मलोक से नहीं लौटता ॥२१-२५॥ द्विज !
उत्तम मोक्ष पाने की इच्छा करने वाले को अवश्य यह व्रत करना चाहिए, यह व्रत समस्त पाप रूपी महावन के
लिए दावानल के समान है। सहस्र कोटि गौओं के दान से जो फल मिलता है वह फल इस उपवासव्रत से मनुष्यों को
प्राप्त होता है । जो नारायण की सेवा में तल्लीन रहकर भक्ति पूर्वक इस व्रत कथा को सुनता है, वह करोड़ों घोर
महापापों से मुक्त हो जाता है ॥२६-२८॥
“श्रीनारदीयमहापुराण में पंचरात्रव्रतकथन नामक इक्कीसवां अध्याय समाप्त ॥२१॥

द्वांविशोऽध्यायः
सनक उवाच
अन्यद् व्रतवरं वक्ष्ये तच्छृणुष्व समाहितः । सर्वपापहरं पुण्यं सर्वलोकोपकारकम् ॥१॥
आषाढे श्रावणे वापि तथा भाद्रपदेऽपि च । तथैवाश्विनके मासे कुर्यादेतद्व्रतं द्विज ॥२॥
एतेष्वन्यतमे मासे शुक्लपक्षे जितेन्द्रियः । प्राशयेत्पञ्चगव्यं च स्वपेद्विष्णुसमीपतः ॥३॥
ततः प्रातः समुत्थाय नित्यकर्म समाप्य च । श्रद्धया पूजयेद्विष्णुं वशीक्रोधविवर्जितः ॥४॥
विद्वद्भिः सहितो विष्णुमर्चयित्वा यथोचितम् । संकल्पं तु ततः कुर्यात्स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥५॥
मासमेकं निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव । मासान्तं पारणं कुर्वे देवदेव तवाज्ञया ॥६॥
तपोरूप नमस्तुभ्यं तपसां फलदायक । ममाभीष्टप्रदं देहि सर्वविघ्नान्निवारय ॥७॥
एवं समर्प्य देवस्य विष्णोर्मासव्रतं शुभम् । ततः प्रभृति मासान्तं निवसेद्धरिमन्दिरे ॥८॥
प्रत्यहं स्नपयेद्देवं पञ्चामृतविधानतः । दीपं निरन्तरं कुर्यात्तस्मिन्मासे हरेर्गृहे ॥६॥
प्रत्यहं खादयेत्काष्ठं ह्यपामार्गं समुद्भवम् । ततः स्नायीत विधिवन्नारायणपरायणः ॥१०॥
ततः संस्नापयेद्विष्णुं पूर्ववत्प्रयतोऽर्चयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या भक्तियुक्तः सदक्षिणम् ॥११॥
स्वयं च बन्धुभिः सार्द्धं भुञ्जीत प्रयतेन्द्रियः । एवं मासोपवासांश्च व्रती कुर्यात्त्रयोदश ॥१२॥
वर्षान्ते वेदविदुषे गां प्रदद्यात्सदक्षिणाम् । भोजयेद्ब्राह्मणांस्तद्वद् द्वादशैव विधानतः ॥
शक्त्या च दक्षिणां दद्याद्ब्राह्मण्याभरणानि च ॥१३॥
अध्याय २२
विशेष मास में व्रत करने का वर्णन
सनक बोले--अब सब पापों को दूर करने वाले, पुण्यप्रद और लोकोपकारक दूसरे उत्तम व्रत के विषय
में कह रहा हूँ, उसको सावधान होकर सुनो । ॥१॥
द्विज ! आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद अथवा आश्विन मास में इस व्रत को करना चाहिए । इनमें से
किसी मास के शुक्ल पक्ष में जितेन्द्रिय व्यक्ति पंचगव्य पिये और विष्णु के समीप ही सोये । प्रातः काल उठकर
नित्य क्रिया से निवृत्त हो वह वशी शान्ति पूर्वक अनन्य भाव से विष्णु की पूजा करे ॥२-४॥ विद्वानों के साथ
यथाविधि विष्णु की पूजा कर स्वस्तिपाठ और संकल्प करे । मन्त्र--'केशव ! आपकी आज्ञा से आज एक मास तक
निराहार व्रत रहूँगा, देवाधिदेव ! मास के अन्त में व्रत का पारण करूंगा, तपरूप ! आपको नमस्कार है, तपस्या
के फल देने वाले ! मेरे मनोरथों को पूर्ण करो, सब प्रकार विघ्नों से मुझको बचाओ, इस प्रकार शुभ मास व्रत को
देवाधिदेव विष्णु की सेवा में अर्पितकर उसी दिन से मास के अन्त तक हरि-मन्दिर में ही निवास करे ॥५-८॥
प्रतिदिन पंचामृत विधान से देव को स्नान करावे, उस मास में भगवान् के मन्दिर में निरन्तर दीपक जलावे ।
प्रतिदिन चिचड़ा की दातौन कर विधिपूर्वक नारायणपरायण होकर स्नान करे । तदनन्तर पूर्व की भाँति
सावधान हो विष्णु को स्नान करावे, भक्ति पूर्वक यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन करावे और दक्षिणा भी दे।
तत्पश्चात् स्वयं संयमपूर्वक बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन करे । व्रती इस प्रकार तेरह बार मासोपवास व्रत
करे ॥६-१२॥ वर्ष के अन्त में किसी वेदज्ञ ब्राह्मण को दक्षिणा के सहित एक गाय दान करे । विधान के अनुसार

१५२ नारदीयपुराणम्
मासोपवासत्रितयं यः कुर्यात्संयतेन्द्रियः । आप्तोर्यामस्य यज्ञस्य द्विगुणं फलमश्नुते ॥१४॥
चतुः कृत्वः कृतं येन पाराकं मुनिसत्तम । स लभेत्परमं पुण्यमष्टाग्निष्टोमसंभवम् ॥१५॥
पञ्चकृत्वो व्रतमिदं कृतं येन महात्मना । अत्यग्निष्टोमजं पुण्यं द्विगुणं प्राप्नुयान्नरः ॥१६॥
मासोपवासषट्कं यः करोति सुसमाहितः । ज्योतिष्टोमस्य यज्ञस्य फलं सोऽष्टगुणं लभेत् ॥१७॥
निराहारः सप्तकृत्वो नरो मासोपवासकान् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् ॥१८॥
मासोपवासान्यः कुर्यादष्टकृत्वो मुनीश्वर । नरमेधाख्ययज्ञस्य फलं पञ्चगुणं लभेत् ॥१९॥
यस्तु मासोपवासांश्च नवकृत्वः समाचरेत् । गोमेधमखजं पुण्यं लभते त्रिगुणं नरः ॥२०॥
दशकृत्वस्तु यः कुर्यात्पराकं मुनिसत्तम । स ब्रह्ममेधयज्ञस्य त्रिगुणं फलमश्नुते ॥२१॥
एकादश पराकांश्च यः कुर्यात्संयतेन्द्रियः । स याति हरिसारूप्यं सर्वभोगसमन्वितम् ॥२२॥
त्रयोदश पराकांश्च यः कुर्यात्प्रयतो नरः । स याति परमानन्दं यत्र गत्वा न शोचति ॥२३॥
मासोपवासनिरता गङ्गास्नानपरायणाः । धर्ममार्गप्रवक्तारो मुक्ता एव न संशयः ॥२४॥
अवीराभिश्च नारीभिर्यतिभिर्ब्रह्मचारिभिः । मासोपवासः कर्त्तव्यो वनस्थैश्च विशेषतः ॥२५॥
नारी वा पुरुषो वापि व्रतमेतत्सुदुर्लभम् । कृत्वा मोक्षमवाप्नोति योगिनामपि दुर्लभम् ॥२६॥
गृहस्थो वानप्रस्थो वा व्रती वा भिक्षुरेव वा । मूर्खो वा पण्डितो वापि श्रुत्वैतन्मोक्षभाग्भवेत् ॥२७॥
इदं पुण्यं व्रताख्यानं नारायणपरायणः । शृणुयाद्वाचयेद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥२८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने मासोपवासवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२॥
बारह ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति ब्राह्मणों को दक्षिणा और आभूषण दे । जो संयमी व्यक्ति तीन
मासोपवास व्रत को करता है वह आप्तोर्याम यज्ञ का दुगुना फल पाता है । मुनिसत्तम ! जो चार बार पारण-
पूर्वक इस व्रत का अनुष्ठान करता है उसको आठ अग्निष्टोम यज्ञ के तुल्य फल प्राप्त हो जाता है । जो महात्मा
पाँच बार इस व्रत का अनुष्ठान करता उस मनुष्य को अत्यग्निष्टोम यज्ञ का दूना फल मिलता है । जो एकाग्र
होकर छह मासोपवास व्रत करता है वह ज्योतिष्टोम यज्ञ का अठगुना फल पाता है ॥१३-१७॥ निराहार
रहकर जो मनुष्य सात बार इस व्रत का अनुष्ठान करता है वह अश्वमेध यज्ञ का अठगुना फल पाता है ।
जो आठ बार इस व्रत को करता है वह नरमेध यज्ञ का पाँचगुना फल पाता है । जो नव बार इस मासोपवास व्रत
को करता है वह मनुष्य तीन गोमेधयज्ञ के बराबर फल पाता है । मुनिसत्तम ! जो दशबार इस व्रत का अनुष्ठान
करता है, वह ब्रह्म (ज्ञान) मेध यज्ञ का तिगुना फल पाता है ॥१८-२१॥ जो संयमी व्यक्ति ग्यारह बार इस व्रत को करता
है वह हरिसारूप्य प्राप्त कर सब भोगों का भोग भी करता है । जो संयमी व्यक्ति तेरह बार इस व्रत को करता है
वह उस परमानन्द को प्राप्त करता है जहाँ जाकर किसी प्रकार का शोक नहीं रह जाता । मासोपवास व्रत करने
वाले, गंगा स्नान परायण और धर्म मार्ग का उपदेश करने वाले मनुष्य निःसन्देह मुक्ति प्राप्त करते हैं ॥२२-२४॥
पति-पुत्र-हीन स्त्री, संन्यासी, ब्रह्मचारी और विशेष रूप से वानप्रस्थाश्रमी को यह व्रत अवश्य करना चाहिए । प्रत्येक
नारी या नर इस सुलभ व्रत का अनुष्ठान करके योगि-दुर्लभ फल को प्राप्त करते हैं । गृहस्थ, वानप्रस्थ, व्रती,
भिक्षुक, मूर्ख अथवा पंडित सभी इस व्रत-कथा को सुनकर मोक्ष के अधिकारी हो जाते हैं । नारायण का भक्त इस
पुण्यदायक व्रत के पाठ या श्रवण के द्वारा सब पापों से मुक्त हो जाता है ॥२५-२८॥
श्रीनारदीयपुराण में मासोपवास-वर्णन नामक बाईसवां अध्याय समाप्त ॥२२॥

त्रयोविंशोऽध्यायः
सनक उवाच
इदमन्यत्प्रवक्ष्यामि व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्। सर्वपापप्रशमनं सर्वकामफलप्रदम् ॥१॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां चैव योषिताम्। मोक्षदं कुर्वतां भक्त्या विष्णोः प्रियतरं द्विज ॥२॥
एकादशीव्रतं नाम सर्वाभीष्टप्रदं नृणाम्। कर्त्तव्यं सर्वथा विप्रविष्णुप्रीतिकरं यतः ॥३॥
एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि। यो भुंक्ते सोऽत्र पापीयान्नरकं व्रजेत् ॥४॥
उपवासफलं लिप्सुर्जह्याद्भुक्तित्वचतुष्टयम्। पूर्वापरदिने रात्रावहोरात्रं तु मध्यमे ॥५॥
एकादशीदिने यस्तु भोक्तुमिच्छति मानवः। स भोक्तुं सर्वपापानि स्पृहयालुनं संशयः ॥६॥
भवेद्दशम्यामेकाशी द्वादश्यां च मुनीश्वर। एकादश्यां निराहारो यदि मुक्तिमभीप्सति ॥७॥
यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च। अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति तानि विप्र हरेर्दिने ॥८॥
ब्रह्महत्यादिपापानां कथंचिन्निष्कृतिर्भवेत्। एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते तस्य नैवास्ति निष्कृतिः ॥९॥
महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः। एकादश्यां निराहारः स्थित्वा याति परां गतिम् ॥१०॥
एकादशी महापुण्या विष्णोः प्रियतमा तिथिः। संसेव्या सर्वथा विप्रैः संसारच्छेदलिप्सुभिः ॥११॥

अध्याय २३
भद्रशील ब्राह्मण का उपाख्यान
सनक बोले—अब लोक-विख्यात, सब पापों को दूर करने वाले, सब मनोरथों को पूर्ण करने वाले दूसरे
व्रत को कह रहा हूँ। द्विज ! यह व्रत भक्तिपूर्वक व्रत करने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री सबको
मोक्ष देने वाला और भगवान् को अत्यन्त प्रिय है। विप्र ! एकादशी व्रत मनुष्यों के सब मनोरथों को निश्चित
रूप से पूर्ण कर देता है। मनुष्य को यह व्रत अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह विष्णु को प्रसन्न करने वाला
व्रत है ॥१-३॥ दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। जो भोजन करता है, वह पापी
है और परलोक में नरक का भागी होता है। उपवास-फल का इच्छुक व्यक्ति चार बेला का भोजन दशमी और
द्वादशी की रात को और एकादशी के दिन और रात को त्याग दे। जो मनुष्य एकादशी के दिन भोजन करना
चाहता है वह निःसन्देह सब पापों का भोग करना करना चाहता है। मुनीश्वर ! यदि कोई मुक्ति चाहता है
तो वह अवश्य दशमी और द्वादशी को एकाहार करे और एकादशी को निराहार रहे ॥४-७॥ विप्र ! जो कुछ
ब्रह्महत्या आदि पाप हैं वे एकादशी के दिन अन्न पर आ जाते हैं। ब्रह्महत्या आदि पापों का प्रायश्चित्त किसी
प्रकार नहीं होता। जो एकादशी के दिन भोजन करते हैं उनके पापों का तो कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है ॥८-६॥
महापाप या सब पापों का कर्त्ता भी एकादशी के दिन निराहार रहकर परागति को प्राप्त कर लेता है। एका-
दशी अतिपुण्यप्रद और विष्णु की अति प्रिय तिथि है। इसलिए संसार से मुक्ति पाने के इच्छुक ब्राह्मण सर्वथा
इस व्रत को अपनावें ॥१०-११॥
२०—नार०

१५४ . | नारदीयपुराणम्
दशम्यां प्रातरुत्थाय दन्तधावनपूर्वकम् । स्नापयेद्विधिवद्विष्णुं पूजयेत्प्रयतेन्द्रियः ॥१२॥
एकादश्यां निराहारो निगृहीतेन्द्रियो भवेत् । शयीत सन्निधौ विष्णोर्नारायणपरायणः ॥१३॥
एकादश्यां तथा स्नात्वा सम्पूज्य च जनार्दनम् । गन्धपुष्पादिभिः सम्यक् ततस्त्वेवमुदीरयेत् ॥१४॥
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाद्याहं परेऽहनि । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥१५॥
इमं मन्त्रं समुच्चार्य देवदेवस्य चक्रिणः । भक्तिभावेन तुष्टात्मा उपवासं समर्पयेत् ॥१६॥
देवस्य पुरतः कुर्याज्जागरं नियतो व्रती । गीतैर्वाद्यैश्च नृत्यैश्च पुराणश्रवणादिभिः ॥१७॥
ततः प्रातः समुत्थाय द्वादशीदिवसे व्रती । स्नात्वा च विधिवद्विष्णुं पूजयेत्प्रयतेन्द्रियः ॥१८॥
पञ्चामृतेन संस्नाप्य एकादश्यां जनार्दनम् । द्वादश्यां पयसा विप्र हरिसारूप्यमश्नुते ॥१९॥
अज्ञानतिमिराग्धस्य व्रतेनानेन केशव । प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥२०॥
एवं विज्ञाप्य विप्रेन्द्र माधवं सुसमाहितः । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्त्या दद्याद्वै दक्षिणां तथा ॥२१॥
ततः स्वन्धुभिः सार्द्धं नारायणपरायणः । कृतपञ्चमहायज्ञः स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥२२॥
एवं यः प्रयततः कुर्यात्पुण्यमेकादशीव्रतम् । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥२३॥
उपवासव्रतपरो धर्मकार्यपरायणः । चाण्डालान्पतितांश्चैव नेक्षेदाप कदाचन ॥२४॥
नास्तिकान्भिन्नमर्यादान्निन्दकान्पिशुनांस्तथा । उपवासव्रतपरो नालपेच्च कदाचन ॥२५॥
वृषलीसुतिपोष्टारं वृषलीपतिमेव च । अयाज्ययाजकं चैव नालपेत्सर्वदा व्रती ॥२६॥
कुण्डाशिनं गायकं च तथा देवलकाशिनम् । भिषजं काव्यकर्त्तारं देवद्विजविरोधिनम् ॥२७॥
दशमी के दिन प्रातःकाल उठकर स्वयं दातौन आदि से निवृत्त हो संयमपूर्वक भगवान् को विधिवत्
स्नान करावे। एकादशी के दिन निराहार रहकर अपनी इन्द्रियों को वश में रखे और नारायण का ही ध्यान
करता हुआ विष्णु के समीप ही शयन करे। एकादशी के दिन इस प्रकार स्नान कर, गन्ध, पुष्प आदि से भली
भाँति जनार्दन की पूजा करने के अनन्तर हाथ जोड़कर कहे 'पुण्डरीकाक्ष ! आज एकादशी के दिन निराहार रह
कर कल भोजन करूँगा। अच्युत ! मुझे शरण दीजिए।' इस प्रकार देवाधिदेव चक्रधर के सम्मुख मन्त्र का
उच्चारण कर भक्तिपूर्वक प्रसन्न होकर अपना उपवास भगवान् को ही अर्पित कर दे ॥१२-१६॥ व्रती नियमपूर्वक
देव के ही सम्मुख गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण श्रवण आदि करता हुआ जागरण करे। तत्पश्चात् व्रती द्वादशी
के दिन उठकर स्वयं स्नान आदि से निवृत्त हो संयम पूर्वक भगवान् की पूजा करे । विप्र ! एकादशी के दिन
भगवान् को पंचामृत से और द्वादशी को दूध से स्नान करा कर मनुष्य हरि का सामीप्य प्राप्त करता है ॥१७-१९॥
'केशव ! इस व्रत से आप सन्तुष्ट हों, कृपा कीजिए और अज्ञान रूपी अन्धकार में भटकने वाले मुझको
ज्ञान-दृष्टि प्रदान कीजिए। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार एकाग्र हो भगवान् माधव से आत्मनिवेदन करके यथाशक्ति
ब्राह्मणों को भोजन करावे और दक्षिणा भी दे। तत्पश्चात् स्वयं पाँच महायज्ञों को समाप्त कर नारायण का
ध्यान करता हुआ मौन होकर भाई-बन्धुओं के साथ भोजन करे। इस प्रकार जो अनन्य भाव से पुण्यदायक
एकादशी व्रत को करता है वह आवागमन से रहित होकर विष्णुलोक को चला जाता है। उपवास व्रत करते
वाला, धर्मकार्यपरायण व्यक्ति चाण्डाल और पतितों को कभी भी न देखे ॥२०-२४॥ उपवासव्रतपरायण व्यक्ति
नास्तिक, समाज-बहिष्कृत, निन्दक और पिशुन से कभी भी बातचीत न करे। व्रती वृषली (शूद्रा) के सन्तान का
पालन करने वाले, वृषलोपति और अनधिकारो को यज्ञ कराने वाले से कभी वार्तालाप न करे। व्रती कुण्ड१ का
अन्न खाने वाले, गायक, पुजारियों का अन्न खाने वाले, वैद्य, कवि (भाट), देवब्राह्मण-विरोधी, परान्नलोलुप, और
१. पति के जीवित रहने पर अन्य पति से उत्पन्न किया हुआ पुत्र ।

त्रयोविंशोऽध्यायः १५५
परान्नलोलुपं चैवं परस्त्रीनिरतं तथा । व्रतोपवासनिरतो वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥२८॥
इत्येवमादिभिः शुद्धो वशी सर्वहिते रतः । उपवासपरो भूत्वा परां सिद्धिमवाप्नुयात् ॥२९॥
नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरुः । नास्ति विष्णुसमं दैवं तपो नानशनात्परम् ॥३०॥
नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्तिसमं धनम् । नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्मसमः पिता ॥३१॥
न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्याः परं व्रतम् । अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् ॥३२॥
संवादं भद्रशीलस्य तत्पितुर्गलवस्य च । पुरा हि गालवो नाम मुनिः सत्यपरायणः ॥३३॥
उवास नर्मदातीरे शान्तो दान्तस्तपोनिधिः । बहुवृक्षसमाकीर्णे गजभल्लूकनिषेविते ॥३४॥
सिद्धचारणगन्धर्वयक्षविद्याधरान्विते । कन्दमूलफलैः पूर्ण मुनिवृन्दनिषेविते ॥३५॥
गालवो नाम विप्रेन्द्रो निवासमकरोच्चिरम् । तस्याभवद्भद्रशील इति ख्यातः सुतो वशी ॥३६॥
जातिस्मरो महाभागो नारायणपरायणः । बालकीडनकालेऽपि भद्रशीलो महामतिः ॥३७॥
मृदा च विष्णोः प्रतिमां कृत्वा पूजयते क्षणम् । वयस्यान्योधयेच्चापि विष्णुः पूज्यो नरैः सदा ॥३८॥
एकादशीव्रतं चैव कर्तव्यमपि पण्डितैः । एवं ते बोधितास्तेन शिशवोऽपि मुनीश्वर ॥३९॥
हरिं मृदेव निर्माय पृथक्संभूय वा मुदा । अर्चयन्ति महाभागा विष्णुभक्तिपरायणाः ॥४०॥
नमस्कुर्वन्भद्रमतिः विष्णवे सर्वविष्णवे । सर्वेषां जगतां स्वस्ति भूयादित्यब्रवीदिदम् ॥४१॥
क्रीडाकाले मुहूर्त्तं वा मुहूर्ताद्धमथापि वा । एकादशीति संकल्प्य व्रतं यच्छति केशवे ॥४२॥
एवं सुचरितं दृष्ट्वा तनयं गालवो मुनिः । अपृच्छद्विस्मयाविष्टः समालिङ्ग्य तपोनिधिः ॥४३॥

परस्त्रीगामी की चर्चा भी न चलावे । इन नियमों का पालन करने वाला, शुद्ध, जितेन्द्रिय और सब प्राणियों
की भलाई करने वाला व्रती उपवासपरायण होकर परम सिद्धि को प्राप्त करता है ॥२८-२९॥
गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, माता के समान कोई गुरु नहीं, विष्णु के समान कोई देवता नहीं और
उपवास से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है । क्षमा के समान माता नहीं और कीर्ति के समान धन नहीं है। इसी
प्रकार विवेक के समान कोई बन्धु नहीं और एकादशी से बढ़कर कोई व्रत नहीं है । इस व्रत के विषय में एक
पुरातन इतिहास, जो भद्रशील और उनके पिता गालव के संवाद के रूप में है, सुना रहा हूँ ॥३०-३२॥ प्राचीन
काल में गालव नाम के एक सत्यवादी मुनि थे । वे शान्त, दान्त और तपोनिधि मुनि नर्मदा तट पर एक घने
वन में रहते थे । जंगली हाथो और भालुओं से भरा वह वन सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष और विद्याधरों का क्रीड़ा
स्थल था ॥३३-३४॥ कंद, मूल और फलों से परिपूर्ण और मुनियों से सुशोभित उस वन में वे विप्रशिरोमणि
गालव चिरकाल तक निवास करते रहे । उनको भद्रशील नामक एक संयमी पुत्र उत्पन्न हुआ । वह नारायण का
भक्त, महासौभाग्यशाली और अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का ज्ञाता था । वह महामति भद्रशील बालकों के साथ
खेलने के समय भी विष्णु की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर कुछ देर तक पूजा करता था और अपने
साथियों को समझाता था कि मनुष्य को विष्णु की सर्वदा पूजा करनी चाहिए ॥३५-३८॥ ज्ञानी को
भी एकादशी व्रत करना चाहिए । मुनीश्वर ! इस प्रकार उसके द्वारा उपदेश पाये हुए वे भाग्यशाली
बालक भी मिलजुलकर या अलग प्रेमपूर्वक मिट्टी की विष्णु-प्रतिमा बनाते थे और विष्णुभक्तिपरायण
होकर भगवान् की पूजा करते थे । सबके रक्षक विष्णु को नमस्कार करते समय वह भद्रमति 'सारे विश्व का
कल्याण हो' यही कहता था । क्रीड़ा के समय क्षणभर या आधे क्षण तक एकादशी व्रत का संकल्प कर भगवान्
को अर्पण करता था । मुनि गालव पुत्र के शुभ चरित्र को देखकर आश्चर्यचकित हो गए । उस तपोनिधि ने पुत्र
को छाती से लगाकर पूछा ॥३९-४३॥

१५६ नारदीयपुराणम्
गालव उवाच
भद्रशील महाभाग भद्रशीलोऽसि सुव्रत । चरितं मंगलं यत्ते योगिनामपि दुर्लभम् ॥४४॥
हरिपूजापरो नित्यं सर्वभूतहितेरतः । एकादशीव्रतपरो निषिद्धाचारवर्जितः ॥४५॥
निर्द्वन्द्वो निर्ममः शान्तो हरिध्यानपरायणः ॥४५॥
एवमेतादृशी बुद्धिः कथं जातार्भकस्य ते । विनापि महतां सेवां हरिभक्तिर्हि दुर्लभा ॥४६॥
स्वभावतो जनस्यास्य ह्यविद्याकामकर्मसु । प्रवर्त्तते मतिर्वत्स कथं तेऽलौकिकी कृतिः ॥४७॥
सत्सङ्गेऽपि मनुष्याणां पूर्वपुण्यातिरेकतः । जायते भगवद्भक्तिस्तदहं विस्मयं गतः ॥४८॥
पृच्छामि प्रीतिमापन्नस्तद्भवान्वक्तुमर्हसि । भद्रशीलो मुनिश्रेष्ठः पित्रैवं सुविकल्पितैः ॥४६॥
जातिस्मरः सुकृतात्मा हृष्टप्रहसिताननः । स्वानुभूतं यथावृत्तं सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥५०॥
भद्रशील उवाच
शृणु तात मुनिश्रेष्ठ ह्यनुभूतं मया पुरा । जातिस्मरत्वाज्जानामि यमेन परिभावितम् ॥५१॥
एतच्छ्रुत्वा महाभागो गालवो विस्मयान्वितः । उवाच प्रीतिमापन्नो भद्रशीलं महामतिम् ॥५२॥
गालव उवाच
कस्त्वं पूर्वं महाभाग किमुक्तं च यमेन ते । कस्य वा केन वा हेतोस्तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥५३॥
गालव बोले--भद्रशील ! महाभाग ! सुव्रत ! तुम सचमुच भद्रशील हो, क्योंकि तुम्हारा शुभ चरित्र
योगियों के लिए भी दुर्लभ है । तुम नित्य हरि की पूजा करते, सब प्राणियों के हित में लगे रहते, एकादशी व्रत
करते और निषिद्ध कर्मों से सदा दूर रहते हो । तुम शान्त, निर्मम, निर्द्वन्द्व और भगवान् के ध्यान में मग्न रहते
हो । तुम बालक की ऐसी बुद्धि कैसे हो गई ? बिना महात्माओं की सेवा के हरि-भक्ति दुर्लभ है ॥४४-४६॥
स्वभावतः मनुष्यों की बुद्धि अविद्या, काम आदि दुष्कर्मों की ओर ही झुकती है, परन्तु वत्स ! तुममें यह अलौकिक
क्रियाशीलता कैसे आई ? सत्संगति में भी पूर्वजन्म के पुण्यों की अधिकता से ही भगवद्भक्ति प्राप्त होती है, परन्तु
तुम्हारे सदाचार को तो देखकर मैं आश्चर्यचकित हूँ । मैं अत्यन्त प्रसन्न होकर पूछ रहा हूँ, तुम अवश्य मुझसे
कहो ॥४७-४८॥
मुनिश्रेष्ठ भद्रशील पिता के इस प्रकार के शुभ विकल्पों को सुनकर प्रसन्न हो गया । सुकृतशील, पूर्व
जन्म का ज्ञान रखने वाले उस बालक ने अपने पूर्वानुभूत रहस्यों को यथावत् रूप से पिता से कह दिया ॥४६॥
भद्रशील बोला--'तात ! मुनिश्रेष्ठ ! मुझे पूर्वकाल की जो अनुभूति है, उसको सुनो । मैं जातिस्मर१
होने के कारण उन सब बातों को जानता हूँ जिनको यम ने कहा था ।
महाभाग्यशाली गालव इतनी बातें सुनकर विस्मित हो गए और प्रसन्न हो महामति भद्रशील से बोले
॥५०-५२॥
महाभाग ! तुम पूर्व जन्म में कौन थे ? यम ने क्यों किसलिए और क्या कहा ? इसको पूर्णरूप से मुझसे
कहो ॥५३॥
१--पूर्व जन्म का ज्ञान रखने वाला ।

१५७
त्रयोविंशोऽध्यायः
भद्रशील उवाच
अहमासं पुरा तात राजा सोमकुलोद्भवः । धर्मकीर्तिरिति ख्यातो दत्तात्रेयेण शासितः ॥५४॥
नव वर्षसहस्राणि महीं कृत्स्नामपालयन् । अधर्माश्च तथा धर्मा मया तु बहवः कृताः ॥५५॥
ततः श्रिया प्रमत्तोऽहं बहुधर्ममकारिषम् । पाषण्डजनसंसर्गात्पाषण्डचरितोऽभवम् ॥५६॥
पुराजितानि पुण्यानि मया तु सुबहून्यपि । पाषण्डैर्बाधितोऽहं तु वेदमार्गं समत्यजम् ॥५७॥
मखाश्च सर्वे विध्वस्ता कूटयुक्तिविदा मया । अधर्मनिरतं मां तु दृष्ट्वा मद्देशजाः प्रजाः ॥५८॥
सदैव दुष्कृतं चक्रुः षष्ठांशस्तत्र मेऽभवत् । एवं पापसमाचारो व्यसनाभिरतः सदा ॥५९॥
मृगयाभिरतो भूत्वा ह्येकदा प्राविशं वनम् । ससैन्योऽहं वने तत्र हत्वा बहुविधान्मृगान् ॥६०॥
क्षुत्तृट्परिवृतः श्रांतो रेवातीरमुपागमम् । रवितीक्ष्णातपक्लांता रेवायां स्नानमाचरम् ॥६१॥
अदृष्टसैन्य एकाकी पीड्यमानः क्षुधा भृशम् ॥६२॥
समेतास्तत्र ये केचिद्रेवातीरनिवासिनः । एकादशीव्रतपरा मया दृष्टा निशामुखे ॥६३॥
निराहारश्च तत्राहमेकाकी तज्जनैः सह । जागरं कृतवांश्चापि सेनया रहितो निशि ॥६४॥
अध्वश्रमपरिश्रांतः क्षुत्पिपासाप्रपीडितः । तत्रैव जागरन्तेऽहं तात पंचत्वमागतः ॥६५॥
ततो यमभटैर्बद्धो महादंष्ट्राभयंकरैः । अनेकक्लेशसंपन्नमार्गेणाप्तो यमांतिकम् ।
दंष्ट्राकरालवदनमपश्यं समवर्तिनम् ॥६६॥
अथ कालश्चित्रगुप्तमाहूयेदमभाषत । अस्य शिक्षाविधानं च यथावद्वद पंडित ॥६७॥
एवमुक्तश्चित्रगुप्तो धर्मराजेन सत्तम । चिरं विचारयामास पुनश्चेदमभाषत ॥६८॥
भद्रशील बोला--तात ! मैं पहले सोमवंशीय राजा था । धर्मकीर्ति मेरा नाम और दत्तात्रेय द्वारा मुझे
ज्ञान प्राप्त हुआ था । मैंने नौ हजार वर्ष तक इस सम्पूर्ण भूमण्डल का शासन किया । इस बीच बहुत से धर्म
और अधर्म भी किये । पाखण्डी जनों की कुसंगति में पड़कर स्वयं मैं पाखण्डी बन गया ॥५४-५६॥ यद्यपि मैंने
पूर्व जन्म में बहुत से पुण्य किये थे, तथापि पाखण्ड से विवश होकर वेदमार्ग का त्याग कर दिया । कूटनीति के
सहारे मैंने सारे यज्ञों को ध्वस्त कर दिया । मुझको पापकर्म करते देखकर मेरी प्रजा भी सर्वदा दुष्कर्म ही करती
रही, जिसका छठा भाग मुझको मिला । इस प्रकार पापाचरण में लीन रहने वाला, व्यसनशील मैं एक दिन
आखेट खेलने के लिए वन में गया । सैनिकों के सहित मैंने उस वन में बहुविध पशुओं का वध किया ॥५७-६०॥
भूख प्यास से व्याकुल और थका हुआ मैं रेवा (नर्मदा) के तीर पर पहुँचा । उस समय सूर्य के असह्य ताप से मेरा
शरीर झुलस गया था । अकेला ही रेवा में नहाकर सैनिकों के दृष्टि-पथ से दूर चला गया । मैं भूख से उस समय
अत्यन्त पीड़ित था । सायंकाल देखा कि नर्मदा तीर निवासी सभी एकादशी व्रत कर रहे हैं। मैं भी उन्हीं लोगों
के साथ रात्रि में अकेला ही निराहार रह गया और जागरण भी करता रहा । मेरे सैनिक तो पीछे ही छूट गये
थे ॥६१-६४॥ तात ! रास्ता चलते-चलते थक जाने, भूखप्यास से पीड़ित होने के कारण जागरण के बाद वहीं
मेरी मृत्यु हो गई । तदनन्तर महाभयङ्कर दांतों वाले यमदूतों ने मुझे बांधा और अनेक कष्टों से युक्त मार्ग से
यमराज के समीप ले आये । वहाँ मैंने भयङ्कर दांत और मुख वाले, समीप में बैठे हुए अनेक समान आकार वाले
यमदूतों से घिरे हुए यमराज को देखा । यमराज ने चित्रगुप्त को बुलाकर कहा ।
पंडित ! इसके किये कर्मों का लेखा यथार्थ रूप से प्रस्तुत करो ॥६५-६७॥ सज्जनाग्रणी !
धर्मराज की इस प्रकार की आज्ञा पाकर चित्रगुप्त बहुत देर तक सोचता रहा । अन्त में उसने कहा

१५८ नारदीयपुराणम्
असौ पापरतः सत्यं तथापि शृणु धर्मप । एकादश्यां निराहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६९॥
एष रेवातटे रम्ये निराहरो हरेदिने । जागरं चोपवासं च कृत्वा निष्पापतां गतः ॥७०॥
यानि कानि च पापानि कृतानि सुबहूनि च । तानि सर्वाणि नष्टानि ह्युपवासप्रभावतः ॥७१॥
एवमुक्तो धर्मराजश्चित्रगुप्तेन धीमता । ननाम दंडवद् भूमौ ममाग्रे सोऽनुकंपितः ॥७२॥
धर्मराज उवाच
पूजयामास मां तत्र भक्तिभावेन धर्मराट् । ततश्च स्वभटाःसर्वान्नाहूयेदमुवाच ह ॥७३॥
शृणुध्वं मद्बचो दूता हितं वक्ष्याम्यनुत्तमम् । धर्ममार्ग रतान्मर्त्यान्मानयध्वं ममान्तिकम् ॥७४॥
ये विष्णुपूजनरताः प्रयताः कृतज्ञाश्चैकादशीव्रतपरा विजितेन्द्रियाश्च ।
नारायणाच्युतहरे शरणं भवेति शान्ता वदन्ति सततं तरसा त्यजध्वम् ॥७५॥
नारःयणाच्युत जनार्दन कृष्ण विष्णो पद्मेश पद्मजपितः शिव शंकरेति ।
नित्यं वदन्त्यखिललोकहिताः प्रशान्ता दूराद्भटास्त्यजत तान्न ममैष शिक्षा ॥७६॥
नारायर्णापितकृतान्हरिभक्तिभाजः स्वाचारमार्गनिरतान् गुरुसेवकांश्च ।
सत्पात्रदाननिरतांश्च सुदीनपालान्दूतास्त्यजध्वमनिशं हरिनामसक्तान् ॥७७॥
पाखंडसङ्गरहितान्द्विजभक्तिनिष्ठान्सत्संगलोलुपतरांश्च तथातिथेयान् ।
शंभौ हरौ च समबुद्धिमतरतयैवत्तांस्त्यजध्वमुपकारपराञ्जनानाम् ॥७८॥
ये वर्जिता हरिकथामृतसेवनैश्च नारायणस्मृतिपरायणमानसैश्च ।
विप्रेन्द्रपादजलसेचनतोऽप्रहृष्टांस्तान्पापिनो मम भटा गृह्मानयध्वम् ॥७९॥
यद्यपि यह पापी है तथापि धर्मराज ! सुनिए । एकादशी के दिन निराहार रहने से मनुष्य सब प्रकार के
पापों से मुक्त हो जाता है । यह तो नर्मदा तट पर एकादशी के दिन निराहार रहा, रात्रि में जागरण करने और
उपवास करने से यह तो निष्पाप हो गया । इसने जो अत्यधिक पाप किये थे वे तो व्रत के प्रभाव से नष्ट
हो गये । धीमान् चित्रगुप्त के इस प्रकार कहने पर धर्मराज ने बड़ी कृपा की और मेरे सामने ही दण्डवत् प्रणाम
किया । धर्मराज ने भक्तिपूर्वक मेरी पूजा की और अपने अनुचरों को बुलाकर कहा ॥६८-७२॥
धर्मराज बोले-दूतो ! मेरी बातें सुनो, मैं तुम लोगों के हित की उत्तम बातें कह रहा हूँ । धर्म मार्ग में
निरत रहने वाले मनुष्यों को मेरे समीप मत लाओ । सम्पूर्ण लोक का हित चाहने वाले उन शान्त महापुरुषों को
जो प्रतिदिन नारायण ! अच्युत ! जनार्दन ! कृष्ण ! विष्णु ! पद्मेश ! शिव ! शंकर ! आदि कहा करते हैं उनको
दूर से ही प्रणाम करो और उनको मेरे पास न ले आओ यही मेरी इन लोगों के विषय में शिक्षा है ॥७३-७६॥
नारायण को ही अपना सब कुछ अर्पित करने वाले, भगवद्भक्ति के प्रेमी, अपने कुलाचार का पालन करने वाले,
गुरुसेवक, सत्पात्र को दान देने वाले, दीनों का पालन करने वाले और हरिनाम स्मरण करने वाले सज्जनों को
सर्वदा छोड़ दो । दूतो ! उसी प्रकार पाखण्डियों की संगति न करने वालों, ब्राह्मण-भक्तों, सत्संगति-प्रेमियों,
अतिथि-सेवकों, शम्भु और विष्णु में समान भाव रखने वालों और उपकार-परायण जनों को भी छोड़ दिया करो ।
मेरे सेवको ! जो भगवत्कथा रूपी अमृत के पान से अपने को दूर रखते, नारायण के स्मरण में दिन रात लगे
रहने वालों से दूर रहते और जो विप्रेन्द्रों के चरणोदक के अभिषेक से प्रसन्न नहीं होते उन पापियों को ही मेरे यहाँ

१५६
त्रयोविंशोऽध्यायः
ये मातृतातपरिभर्त्सनशीलिनश्च लोकद्विषो हितजनाहितकर्मणश्च ।
देवस्वलोभनिरताज्जननाशकृत् न्त्रानयध्वमपराघपरांश्च दूताः ॥८०॥
एकादशीव्रतपराङ्मुखमुग्रशीलं लोकापवादिनिरतं परनिंदकं च ।
ग्रामस्य नाशकरमुत्तमवैरयुक्तं दूताः समानयत विप्रधनेषु लुब्धम् ॥८१॥
ये विष्णुभक्तिविमुखाः प्रणमंति नैव नारायणं हि शरणागतपालकं च ।
विष्णुवाल्यं च नहि यांति नराः सुमूर्खास्तानयध्वमतिपापरतान्प्रसह्य ॥८२॥
एवं श्रुतं यदा तत्र यमेन परिभाषितम् । मयानुतापद्ग्धेन स्मृतं तत्कर्म निंदितम् ॥८३॥
असत्कर्मानुतापेन सद्धर्मश्रवणेन च । तत्रैव सर्वपापानि निःशेषाणि गतानि मे ॥८४॥
पापशेषाद्विनिर्मुक्तं हरिसारूप्यतां गतम् । सहस्रसूर्यसंकाशं प्रणनाम यमश्च तम् ॥८५॥
एवं दृष्ट्वा विस्मितास्ते यमदूता भयोत्कटाः । विश्वासं परमं चक्रुर्यमेन परिभाषिते ॥८६॥
ततः संपूज्य मां कालो विमानशतसंकुलम् । सद्यः संप्रेषयामास तद्विष्णोः परमं पदम् ॥८७॥
विमानकोटिभिः सार्द्धं सर्वभोगसमन्वितैः । कर्मणा तेन विप्रर्षे विष्णुलोके मयोवितम् ॥८८॥
कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । स्थित्वा विष्णुपदं पश्चादिंद्रलोकमुपागमम् ॥८६॥
तत्रापि सर्वभोगाढ्यः सर्वदेवनमस्कृतः । तावत्कालं दिवि स्थित्वा ततो भूमिमुपागतः ॥६०॥
अत्रापि विष्णुभक्तानां जातोऽहं भवतां कुले । जातिस्मरत्वाज्जानामि सर्वमेतन्मुनीश्वर ॥६१॥
तस्माद्विष्ण्वर्चनोद्योगं करोमि सह बालकैः । एकादशीव्रतमिदमिति न ज्ञातवान्पुरा ॥६२॥
लाओ ॥७७-७६॥ दूतो ! जो माता-पिता को झिड़कियाँ सुनाते, जो लोकद्वेषी, शुभचिन्तकों का अहित करने
वाले, देव-धन का अपहरण करने वाले, अपराधी और जनता की हत्या करने वाले पापी हैं उनको यहाँ लाओ।
दूतो ! एकादशी व्रत न करने वाले, उग्रस्वभाव, मेरे-निन्दक, लोकापवाद-प्रेमी, ग्राम हित को हानि पहुँचाने वाले,
ब्राह्मणों की सम्पत्ति हड़प जाने वाले और कट्टर शत्रुता करने वाले को यहाँ लाओ ॥८०-८१॥ जो विष्णु-
भक्ति से विमुख रहते और शरणागत-पालक नारायण को प्रणाम नहीं करते अथवा जो महामूर्ख और हरि-मन्दिर
में नहीं जाते उन घोर पापियों को हठपूर्वक यहाँ लाओ ।
जिस समय वहाँ यम की कही हुई इन बातों को सुना मेरा हृदय पश्चात्ताप की ज्वाला से जल उठा, अपने
किये हुये निन्दित कर्मों का स्मरण करके दुःखी हो गया ॥८२-८३॥ असत्कर्मों के लिये पश्चात्ताप करने और धर्म
की उत्तमोत्तम बातें सुनने से वहीं मेरे सम्पूर्ण पाप निःशेष हो गए । अशेष पापों के नष्ट हो जाने से मुझे हरि का
सारूप्य प्राप्त हो गया । यमराज ने सहस्र सूर्य के समान तेजोमय उस रूप को देखकर प्रणाम किया । यह देखकर
वे भयंकर यमदूत विस्मित हो गए । उनको यम की बातों पर पूर्णरूप से विश्वास हो गया । तदनन्तर यम ने
मेरी पूजा की और तत्काल सैकड़ों देव विमानों के साथ मुझे विष्णु के परम पद को भेज दिया ।॥८४-८७॥
विप्रर्षि ! उस सत्कर्म के प्रभाव से करोड़ों देव-विमानों और सब प्रकार के भोगों का उपभोग करता हुआ
वहाँ रहने लगा । असंख्य कल्पों तक उस विष्णु लोक में निवास करने के बाद इन्द्रलोक में आया । वहाँ भी उतने
ही कल्पों तक सब देवताओं की श्रद्धा का पात्र बनकर मैंने सम्पूर्ण दिव्य भोगों का उपभोग किया । तत्पश्चात्
मैं इस पृथ्वी पर आया । यहाँ भी आप के समान विष्णु भक्त के कुल में ही उत्पन्न हुआ । मुनीश्वर ! जातिस्मर
होने के कारण ही मैं इन बातों को जानता हूँ ॥८८-९१॥ इसलिए मैं बालकों के साथ विष्णु-पूजा के लिये प्रयत्न
किया करता हूँ । पहले इस एकादशी व्रत की उत्कृष्टता को नहीं जानता था; परन्तु इस समय पूर्वजन्म के ज्ञान के

१६० नारदीयपुराणम्
जातिस्मृतिप्रभावेण तज्ज्ञातं सांप्रतं मया । अत्र स्वेनापि यत्कर्म कृतं तस्य फलं त्विदम् ॥६३॥
एकादशीव्रतं भक्त्या कुर्वतां किमुत प्रभो । तस्माच्चरिष्ये विप्रेन्द्र शुभमेकादशीव्रतम् ॥६४॥
विष्णुपूजां चाहरहः परमस्थानकांक्षया । एकादशीव्रतं यत्तु कुर्वंति श्रद्धया नराः ॥६५॥
तेषां तु विष्णुभवनं परमानंददायकम् । एवं पुत्रवचः श्रुत्वा संतुष्टो गालवो मुनिः ॥६६॥
अवाप परमां तुष्टिं मनसा चातिहर्षितः । मज्जन्म सफलं जातं मद्द्वंशः पावनीकृतः ॥६७॥
यतस्त्वं मद्गृहे जातो विष्णुभक्तिपरायणः । इति संतुष्टचित्तस्तु तस्य पुत्रस्य कर्मणा ॥६८॥
हरिपूजाविधानं च यथावत्समबोधयत् । इत्येतत्ते मुनिश्रेष्ठ यथावत्कथितं मया ।
संकोचविस्तराभ्यां च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥६९॥
इति श्रीबृहन्नारदीये पुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने ॥२३॥
एकादशीव्रतमहिमानुवर्णनंनाम त्रयोविंशोऽध्यायः

प्रभाव से सब कुछ जान लिया है। यहाँ अनिच्छया जो कुछ किया उसका यह फल मिला । प्रभो ! तो भक्तिपूर्वक
एकादशी व्रत करने वाले को कितना फल मिलता होगा । विप्रेन्द्र ! इसीलिए इस शुभ एकादशी व्रत को मैं करता
हूँ । श्रद्धा पूर्वक जो मनुष्य परम पद पाने की अभिलाषा से प्रतिदिन विष्णु की पूजा करते और एकादशी व्रत
को करते हैं, उनको अवश्य परमानन्ददायक विष्णु-पद प्राप्त होता है ॥६२-६५॥
पुत्र की इन बातों को सुनकर मुनि गालव सन्तुष्ट हो गये । उनको परमानन्द प्राप्त हो गया । वे अन्तः-
करण से अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—
मेरा जन्म सफल हो गया, मेरा वंश पवित्र हो गया क्योंकि तुम्हारे समान विष्णु भक्त मेरे घर में उत्पन्न
हो गया है ।
उस पुत्र के कर्त्तव्यों से प्रसन्न होकर उन्होंने पूर्णरूप से हरि-पूजन की विधि बता दी ।
मुनिश्रेष्ठ ! ये सारी बातें तुमसे संक्षेप और विस्तार से भी ज्यों की त्यों कह दी । अब और क्या सुनना
चाहते हो ॥६६-६९॥
श्रीनारदीयमहापुराण में एकादशीव्रतकथन नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३॥

चतुर्विंशोऽध्यायः
सूत उवाच
एतन्निशम्य सनकोदितमप्रमेयं पुण्यं हरेर्दिनभवं निखिलोत्त मं च ।
पापौघशांतिकरणं व्रतसारमेवं ब्रह्मात्मजः पुनरभाषत हर्षयुक्तः ॥१॥
नारद उवाच
कथितं भवता सर्वं मुने तत्त्वार्थकोविद । व्रताख्यानं महापुण्यं यथावद्धरिभक्तिदम् ॥२॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि वर्णाचारविधिं मुने । तथा सर्वाश्रमाचारं प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥३॥
एतत्सर्वं महाभाग सर्वतत्त्वार्थकोविद । कृपया परया मह्यं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥४॥
सनक उवाच
शृणुष्व मुनिशार्दूल यथा भक्तप्रियंकरः । वर्णाश्रमाचारपरैः पूज्यते हरिरव्ययः ॥५॥
मन्वाद्यैरुदितं यच्च वर्णाश्रमनिबंधनम् । तत्ते वक्ष्यामि विधिवद्भक्तोऽसि त्वमधोक्षजे ॥६॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चत्वार एव ते । वर्णा इति समाख्याता एतेषु ब्राह्मणोऽधिकः ॥७॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या द्विजाः प्रोक्तास्त्रयस्तथा । मातृतश्चोपनयनाद्द्विजत्वं प्राप्यते त्रिभिः ॥८॥
एतैर्वर्णैः सर्वधर्माः कार्या वर्णानुरूपतः । स्ववर्णधर्मत्यागेन पाखंडः प्रोच्यते बुधैः ॥६॥
स्वगृह्याचोदितं कर्म द्विजः कुर्वन्कृती भवेत् । अन्यथा पतितो भूयात्सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥१०॥
अध्याय २४
ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि के सदाचार-वर्णन
सूत बोले- सनक जी ने पाप-समूहों को नष्ट करने वाले, सम्पूर्ण व्रतों के सारभूत एकादशी व्रत के
परमोत्तम असंख्य पुण्यों को कहा। ब्रह्मा के पुत्र नारद जी इस रहस्य को सुनकर आनन्दित होकर फिर
पूछने लगे ॥१॥
नारद बोले- मुनिवर ! तत्त्वार्थ के ज्ञाता ! आपने अत्यन्त पुण्यदायक हरिभक्ति प्रदान करने वाले व्रता-
ख्यान को पूर्ण रूप से कह दिया । मुने ! अब मैं वर्ण-धर्म, सब आश्रमों के आचार और प्रायश्चित्त विधि को
सुनना चाहता हूँ । महाभाग ! सब रहस्यों के ज्ञाता ! आप अत्यन्त कृपा करके इन सब तत्त्वों को यथार्थ रूप से
मुझसे कहिए ॥२-४॥
सनक बोले- मुनिवर ! सुनो। वर्ण और आश्रम के आचारों का पालन करने वाले सज्जन जिस विधि से
भक्तों के प्रिय कार्य करने वाले, अव्यय, हरि की पूजा करते हैं और मनु आदि धर्माचार्यों ने वर्णाश्रम धर्म के जिन
नियमों को बनाया है उनको विधिपूर्वक कह रहा हूँ, सुनो; क्योंकि तुम भगवान् हरि के भक्त हो। ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण कहे गये हैं। इनमें ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विज कहे
जाते हैं। इन तीनों ने मातृजन्म और उपनयन के कारण द्विजत्व प्राप्त किया है। इन वर्णों के लोगों को अपने
वर्णों के अनुरूप सब धर्मों का पालन करना चाहिए। बुधजन अपने वर्णानुकूल धर्म के त्याग को 'पाखण्ड' कहते
हैं ॥५-९॥ अपने गृह्यसूत्रों के अनुसार कर्म को करने वाला द्विज कृती होता है, अन्यथा वह अपने धर्मों से
२१-नार०

१६२ नारदीयपुराणम्
युगधर्मः परिग्राह्यो वर्णैरेतैर्यथोचितम् । देशाचारास्तथाग्राह्याः स्मृतिधर्माविरोधतः ॥११॥
कर्मणा मनसा वाचा यत्नाद्धर्मं समाचरेत् । अस्वर्ग्यं लोक विद्विष्टं धर्म्यमप्याचरेन्न तु ॥१२॥
समुद्रयात्रास्वीकारः कमंडलुविधारणम् । द्विजानामसवर्णासु कन्या सूपयमस्तथा ॥१३॥
देवराच्च सुतोत्पत्तिमधुपर्के पशोर्वधः । मांसादनं तथा श्राद्धे वानप्रस्थाश्रमस्तथा ॥१४॥
दत्ताक्षतायाः कन्यायाः पुनर्दानं वराय च । नैष्ठिकं ब्रह्मचर्यं च नरमेधाश्वमेधकौ ॥१५॥
महाप्रस्थानगमनं गोमेधश्च तथा मखः । एतान्धर्मान्कलियुगे वर्ज्यानाहुर्मनीषिणः ॥१६॥
देशाचाराः परिग्राह्यास्तत्तद्देशगतैर्नरैः । अन्यथा पतितो ज्ञेयः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥१७॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च द्विजोत्तम । क्रियाः सामान्यतो वक्ष्ये तच्छृणुष्व समाहितः ॥१८॥
दानं दद्याद्ब्राह्मणेभ्यस्तथा यज्ञैर्यजेत्सुरान् । वृत्त्यर्थं याचयेच्चैव अन्यानध्यापयेत्तथा ॥१९॥
याजयेद्यजने योग्यान्विप्रो नित्योदकी भवेत् । कुर्याच्च वेदग्रहणं तथाग्नेश्च परिग्रहम् ॥२०॥
ग्राह्ये द्रव्ये च पारक्ये समबुद्धिर्भवेत्तथा । सर्वलोकहितं कुर्यान्मृदुवाक्यमुदीरयेत् ॥२१॥
ऋतावभिगमः पत्न्यां शस्यते ब्राह्मणस्य वै । न कस्याप्यहितं ब्रूयाद्विष्णुपूजापरो भवेत् ॥२२॥
दद्याद्दानानि विप्रेभ्यः क्षत्रियोऽपि द्विजोत्तम । कुर्याच्च वेदग्रहणं यज्ञैर्देवान्यजेत्तथा ॥२३॥
शस्त्राजीवी भवेच्चैव पालयेद्धर्मतो महीम् । दुष्टानां शासनं कुर्याच्छिष्टानां पालनं तथा ॥२४॥
पाशुपाल्यं च वाणिज्यं कृषिश्च द्विजसत्तम । वेदस्याध्ययनं चैव वैश्यस्यापि प्रकीर्तितम् ॥२५॥
कुर्याच्च दारग्रहणं धर्मांश्चैव समाचरेत् । क्रयविक्रयजैर्वापि धनैः कारुक्रियोद्भवैः ॥२६॥
दद्याद्दानानि शूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेन्न च । ब्राह्मणक्षत्रियविशां शुश्रूषानिरतो भवेत् ॥२७॥
बहिष्कृत होकर पतित हो जाता है। इन द्विजों को उचित रूप से अपने युगधर्मों का आचरण करना चाहिए और
स्मृतियों के अनुकूल ही देशाचार को अपनाना चाहिए। मन, वचन और कर्म से यत्न पूर्वक धर्म का आचरण
करना चाहिए। लोक-विरुद्ध और स्वर्ग प्राप्ति में सहायता न पहुँचाने वाले कर्मों को, चाहे वह धर्मसंगत ही क्यों
न हो, नहीं करना चाहिए ॥१०-१२॥ मनीषियों ने कलियुग में समुद्र-यात्रा करना, संन्यास ग्रहण करना, असवर्ण
कन्याओं के साथ द्विजों का विवाह, देवर से पुत्र उत्पन्न करना, मधुपर्क में पशुओं का वध, श्राद्ध में मांस-भोजन,
वानप्रस्थाश्रम, एक बार की दी हुई अक्षत कन्या का पुनर्विवाह, नैष्ठिक ब्रह्मचर्य, नरमेध, अश्वमेध, महाप्रस्थानगमन
(सती प्रथा) गोमेध-यज्ञ, इन धर्मों को कलियुग के लिए निषिद्ध कहा है। तत्तद्देशीय मनुष्यों को उन देशों के आचारों
को ही अपनाना चाहिए, अन्यथा वह सब धर्मों से बहिष्कृत होकर पतित समझा जाता है ॥१३-१७॥ द्विजोत्तम ! ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्मों का सामान्य रूप से वर्णन कर रहा हूँ, उसको सावधान होकर सुनो। दान
ब्राह्मणों को ही देना चाहिए और यज्ञों द्वारा देवताओं की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण जीविका के लिए याचना
करे और दूसरों को पढ़ावे। ब्राह्मण यज्ञाधिकारी जनों को यज्ञ करावे और सर्वदा सन्ध्यार्पण आदि करे।
वेदाध्ययन और अग्न्याधान अवश्य करे ॥१८-२०॥ ग्राह्य द्रव्य और पराये द्रव्य में समान भाव
रखे। लोक हित में सर्वदा लीन रहे और प्रिय भाषण करे। ब्राह्मण का ऋतुकाल में स्वस्त्रीगमन प्रशंसनीय है।
किसी के अहित की बात न सोचे, न तो बोले ही, सर्वदा विष्णु पूजा में लवलीन रहे। द्विजवर्य ! क्षत्रिय भी ब्राह्मणों
को ही दान दे। वह भी वेद का अध्ययन करे और यज्ञों द्वारा देवों को पूजा करे। वह शस्त्र द्वारा जीविका चलावे
और पृथिवी का पालन करे। दुष्टों का शासन और सज्जनों का पालन क्षत्रिय का धर्म है ॥२१-२४॥ पशु पालन,
व्यापार, कृषि और वेदाध्ययन वैश्य का धर्म माना गया है। विवाह करना और धर्माचरण वैश्य के लिए प्रशस्त हैं।
क्रय-विक्रय अथवा शिल्प के द्वारा धनोपार्जन करे। शूद्र भी दान दे परन्तु पाक-यज्ञ न करे। वह ब्राह्मण, क्षत्रिय,