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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 179

१६० नारदीयपुराणम्
जातिस्मृतिप्रभावेण तज्ज्ञातं सांप्रतं मया । अत्र स्वेनापि यत्कर्म कृतं तस्य फलं त्विदम् ॥६३॥
एकादशीव्रतं भक्त्या कुर्वतां किमुत प्रभो । तस्माच्चरिष्ये विप्रेन्द्र शुभमेकादशीव्रतम् ॥६४॥
विष्णुपूजां चाहरहः परमस्थानकांक्षया । एकादशीव्रतं यत्तु कुर्वंति श्रद्धया नराः ॥६५॥
तेषां तु विष्णुभवनं परमानंददायकम् । एवं पुत्रवचः श्रुत्वा संतुष्टो गालवो मुनिः ॥६६॥
अवाप परमां तुष्टिं मनसा चातिहर्षितः । मज्जन्म सफलं जातं मद्द्वंशः पावनीकृतः ॥६७॥
यतस्त्वं मद्गृहे जातो विष्णुभक्तिपरायणः । इति संतुष्टचित्तस्तु तस्य पुत्रस्य कर्मणा ॥६८॥
हरिपूजाविधानं च यथावत्समबोधयत् । इत्येतत्ते मुनिश्रेष्ठ यथावत्कथितं मया ।
संकोचविस्तराभ्यां च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥६९॥
इति श्रीबृहन्नारदीये पुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे व्रताख्याने ॥२३॥
एकादशीव्रतमहिमानुवर्णनंनाम त्रयोविंशोऽध्यायः

प्रभाव से सब कुछ जान लिया है। यहाँ अनिच्छया जो कुछ किया उसका यह फल मिला । प्रभो ! तो भक्तिपूर्वक
एकादशी व्रत करने वाले को कितना फल मिलता होगा । विप्रेन्द्र ! इसीलिए इस शुभ एकादशी व्रत को मैं करता
हूँ । श्रद्धा पूर्वक जो मनुष्य परम पद पाने की अभिलाषा से प्रतिदिन विष्णु की पूजा करते और एकादशी व्रत
को करते हैं, उनको अवश्य परमानन्ददायक विष्णु-पद प्राप्त होता है ॥६२-६५॥
पुत्र की इन बातों को सुनकर मुनि गालव सन्तुष्ट हो गये । उनको परमानन्द प्राप्त हो गया । वे अन्तः-
करण से अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले—
मेरा जन्म सफल हो गया, मेरा वंश पवित्र हो गया क्योंकि तुम्हारे समान विष्णु भक्त मेरे घर में उत्पन्न
हो गया है ।
उस पुत्र के कर्त्तव्यों से प्रसन्न होकर उन्होंने पूर्णरूप से हरि-पूजन की विधि बता दी ।
मुनिश्रेष्ठ ! ये सारी बातें तुमसे संक्षेप और विस्तार से भी ज्यों की त्यों कह दी । अब और क्या सुनना
चाहते हो ॥६६-६९॥
श्रीनारदीयमहापुराण में एकादशीव्रतकथन नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥२३॥