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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 166

विंशोऽध्यायः १४७
एतच्छ्रुत्वातिकुपिता विष्णुदूता महौजसः । प्रत्यूचुस्तान्यमभटान्धर्मे धर्ममानिनः ॥६३॥
विष्णुदूता ऊचुः
अहो कष्टं धर्मदृशामधर्मः स्पृशते सभाम् । सम्यग्विवेकशून्यानां निदानं ह्यापदां महत् ॥६४॥
तर्कणाद्यविशेषेण नरकाध्यक्षतां गताः । यूयं किमर्थमद्यापि कर्तुं पापानि सोद्यमाः ॥६५॥
स्वकर्मक्षयपर्यन्तं महापातकिनोऽपि च । तिष्ठन्ति नरके घोरे यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥६६॥
पूर्वसंचितपापानामदृष्ट्वा निष्कृतिं वृथा । किमर्थं पापकर्मणि करिष्येऽथ पुनः पुनः ॥६७॥
श्रुतिप्रणिहितो धर्मः सत्यं सत्यं न संशयः । किन्त्वाभ्यां चरितान्धर्मान्प्रवक्ष्यामो यथातथम् ॥६८॥
एतौ पापविनिर्मुक्तौ हरिशुश्रूषणे रतौ । हरिणा त्राणमाणौ च मुञ्चध्वमविलम्बितम् ॥६९॥
एषा च नर्तनं चक्रे तथैष ध्वजारोपणम् । अन्तकाले विष्णगृहे तेन निष्पापतां गतौ ॥७०॥
अन्तकाले तु यन्नाम श्रुत्वोक्त्वापि च वै सकृत् । लभते परमं स्थानं किमु शुश्रूषणे रताः ॥७१॥
महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । कृष्णसेवी नरोऽन्तेऽपि लभते परमां गतिम् ॥७२॥
यतीनां विष्णुभक्तानां परिचर्यापरायणा । ते दूताः सहसा यान्ति पापिनोऽपि परां गतिम् ॥७३॥
मुहूर्तं वा मुहूर्त्ताद्धं यस्तिष्ठेद्धरिमन्दिरे । सोऽपि याति परं स्थानं किमु द्वात्रिंशवत्सरान् ॥७४॥
उपलेपनकर्त्तारौ संमार्जनपरायणौ । एतौ हरिगृहे नित्यं जीर्णशीर्णोधिरोपको ॥७५॥
जलसेचनकर्त्तारौ दीपर्दौ हरिमन्दिरे । कथेमेतौ महाभागौ यातनाभोगमर्हतः ॥७६॥
ले जायेंगे । यह सुनकर वे महातेजस्वी विष्णुदूत कुपित होकर अधर्म को ही धर्म मानने वाले उन यम-दूतों से
बोले ॥६१-६३॥
विष्णुदूत बोले—अहो ! यह बड़े दुःख की बात है कि धर्म निर्णायकों की सभा में यह अधर्म (अन्धेर)
फैल रहा है। सम्यक् विवेक से रहितों का निर्णय महान् अनर्थों की जड़ है। तुम लोग विशेष विवेक और तर्क से
शून्य होने के कारण ही नरक के अध्यक्ष बनाये गये हो, क्यों अब भी पाप कर्म करने के लिए तत्पर हुए हो ।
महापापी भी अपने पापों के क्षीण होने तक घोर नरक में कल्पान्त तक रहते हैं। पूर्व संचित पापों को बिना देखे
फल के विषय में सोचना व्यर्थ है। तुम लोग क्यों बार-बार पाप कर्म कह रहे हो ?॥६४-६७॥ वेदविहित धर्म है,
यह सत्य है सत्य है, इसमें सन्देह नहीं किन्तु इन दोनों के किये हुए धर्मों को मैं यथार्थ रूप से कह रहा हूँ। हरि की
शुश्रूषा में लीन रहने वाले ये दोनों निष्पाप हैं । इनको शीघ्र छोड़ दो, क्योंकि भगवान् इनकी रक्षा का स्वयं ध्यान
रखते हैं । इस स्त्री ने विष्णु मन्दिर में नृत्य किया है और इस पुरुष ने जीवन को अन्तिम घड़ियों में विष्णु मन्दिर
में ध्वजारोपण किया है। इसलिए इस धर्माचरण से दोनों निष्पाप हो गये । मृत्यु के समय जब भगवान् के नाम को
एक बार सुनकर या उच्चारण कर मनुष्य परम स्थान को पा जाता है तब जो भगवान् की सेवा में तत्पर हों उनके
विषय में क्या कहा जाय ॥६८-७१॥ महापापों का करने वाला या उप पापों से युक्त व्यक्ति भी अन्तिम समय में
भी कृष्ण की सेवा से परम गति को पा जाता है । दूतो ! यतियों और विष्णु-भक्तों की सेवा करने वाले पापी भी
एकाएक परा गति को प्राप्त कर लेते हैं। जो हरि मन्दिर में एक क्षण या आधे क्षण तक रहता है वह भी परम
स्थान को चला जाता है तो जिसने बत्तीस वर्ष तक निवास किया उसके विषय में क्या कहा जाय । ये दोनों प्रति
दिन जीर्ण शीर्ण मन्दिर का जीर्णोद्धार करते थे, श्रद्धापूर्वक झाडू लगाते और लीपते थे। नित्य प्रति मन्दिर में
जल छिड़कते और भगवान् को दीपक दिखाते थे । तुम्हीं बताओ, क्या ये दोनों भाग्यशाली किसी भी दृष्टि से यम-
यातना के योग्य हैं ? ॥७२-७६॥