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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 163

१५४ नारदीयपुराणम्
तत्र वृद्धिमपायान्ति श्रेयांस्यनुदिनं मुने । यत्र सन्तः प्रकुर्वन्ति महतीं करुणां प्रभो ॥१९६॥
यो मूर्ध्नि धारयेद्ब्रह्मन्महत्पादजलं रजः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु पुण्यात्मा नात्र संशयः ॥२०॥
मम पुत्राश्च दाराश्च संपत्त्वयि समर्पिताः । मामाज्ञापय विप्रेन्द्र किं प्रियं करवाणि ते ॥२१॥
विनयावनतं भूपं स निरीक्ष्य मुनीश्वरः । स्पृशन्करेण तं प्रीत्या प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥२२॥
ऋषिरुवाच
राजन्यदुक्तं भवता तत्सर्वं त्वत्कुलोचितम् । विनयावनतः सर्वो बहुश्रेयो लभेदित ॥२३॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्च नृपसत्तम । विनयाल्लभते मर्त्यो दुर्लभं किं महात्मनाम् ॥२४॥
प्रीतोऽस्मि तव भूपाल सन्मार्गपरिवर्तिनः । स्वस्ति ते सततं भूयाद्यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ॥२५॥
पूजाबहुविधाः सन्ति हरितुष्टिविधायिकाः । तासु नित्यं ध्वजारोपे वर्तसे त्वं सदोद्यतः ॥२६॥
भार्यापि तव साध्वीयं नित्यं नृत्यपरायणा । किमर्थमेतद्वृत्तान्तं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥२७॥
राजोवाच
शृणुष्व भगवन्सर्वं यत्पृच्छसि वदामि तत् । आश्चर्यभूतं लोकानामावयोश्चरितं त्विह ॥२८॥
अहमासं पुरा शूद्रो मालिनिर्नाम सत्तम । कुमार्गनिरतो नित्यं सर्वलोकाहिते रतः ॥२९॥
पिशुनो धर्मविद्वेषी देवद्रव्यापहारकः । गोघ्नश्च ब्रह्महा चौरः सर्वप्राणिवधे रतः ॥३०॥
नित्यं निष्ठुरवक्ता च पापी वेश्यापरायणः । एवं स्थितः कियत्कालमनादृत्य महद्वचः ॥३१॥
सर्वबन्धुपरित्यक्तो दुःखी वनमुपागतः । मृगमांसाशनो नित्यं तथा पान्थविलुम्पकः ॥३२॥
की महान् कृपा होती है, उसके श्रेय और पुण्य दिनों दिन बढ़ते हैं। ब्रह्मन् ! जो महापुरुषों के चरणोदक और चरणरज
को अपने शिर पर धारण करता है उस पुण्यात्मा ने मानो सब तीर्थों में स्नान कर लिया, इसमें लेशमात्र भी सन्देह
नहीं । मेरे पुत्र, स्त्री और सारा कोश आपकी सेवा में अर्पित है । विप्रेन्द्र ! मुझे आज्ञा दीजिए, कौन सी आपकी प्रिय
सेवा करूँ । वे मुनिश्वर उस विनीत राजा को देखकर उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए बड़े प्रेम से बोले ॥१९७-२२॥
ऋषि बोले--राजन् ! जो कुछ तुमने कहा, वह सब तुम्हारे कुल के सर्वथा अनुरूप है, इस संसार में विनय-
शील व्यक्ति को सब श्रेय प्राप्त होते हैं नृपवर्य ! मनुष्य विनय के द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब कुछ प्राप्त
करता है, महापुरुषों के लिए इस संसार में दुर्लभ क्या है ? भूपाल ! सन्मार्ग का प्रदर्शन करने वाले तुम्हारे ऊपर
प्रसन्न हूँ,तुम्हारा सर्वदा कल्याण हो, आज मैं जो कुछ पूछ रहा हूँ, उसका उत्तर दो । भगवान् को प्रसन्न करने
वाली बहुत सी पूजा-विधियाँ हैं, परन्तु तुम उनमें सर्वदा ध्वजारोपण ही उत्साह के साथ किया करते हो, तुम्हारी
वह साध्वी भार्या भी नित्य मन्दिर में नृत्य किया करती है, इस विषय में मुझे यथार्थ बात बतलाओ ॥२३-२७॥
राजा ने कहा-- भगवन् ! आप जो कुछ-पूछ रहे हैं, उसको मैं बता रहा हूँ, सुनिए । इस संसार में हम
दोनों का चरित्र लोक के लिए आश्चर्यजनक है । मुनिसत्तम ! मैं पहले मालिनि नामक शूद्र था । सर्वदा मैं
कुमार्ग में लगा रहता और प्राणियों का अहित किया करता था । सदा धर्म से द्वेष करना, देव सम्पत्ति का
अपहरण करना, चुगली करना, गोहत्या, ब्रह्महत्या, चोरी और प्राणिवध मेरा काम था ॥२८-३०॥ निष्ठुर बातें
करना, वेश्यागमन और पापाचरण ही मेरे नित्य के प्रिय कार्य थे । कुछ काल तक महापुरुषों की बातों के
अनादर कर इसी प्रकार असत्कर्म करता रहा । निदान मैं सब बान्धवों और परिवार को छोड़कर दुःखी हो वन में
चला गया । उस निर्जन वन में मृग मांस खाकर दिन बिताता और प्रति दिन पथिकों को लूटता था, इस प्रकार
अकेला उद्वेगजनक कार्यों को करता हुआ वन में रहने लगा । एक दिन भूख-प्यास से व्याकुल ग्रीष्म की ज्वाला