बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५६ नारदीयपुराणम्
गालव उवाच
भद्रशील महाभाग भद्रशीलोऽसि सुव्रत । चरितं मंगलं यत्ते योगिनामपि दुर्लभम् ॥४४॥
हरिपूजापरो नित्यं सर्वभूतहितेरतः । एकादशीव्रतपरो निषिद्धाचारवर्जितः ॥४५॥
निर्द्वन्द्वो निर्ममः शान्तो हरिध्यानपरायणः ॥४५॥
एवमेतादृशी बुद्धिः कथं जातार्भकस्य ते । विनापि महतां सेवां हरिभक्तिर्हि दुर्लभा ॥४६॥
स्वभावतो जनस्यास्य ह्यविद्याकामकर्मसु । प्रवर्त्तते मतिर्वत्स कथं तेऽलौकिकी कृतिः ॥४७॥
सत्सङ्गेऽपि मनुष्याणां पूर्वपुण्यातिरेकतः । जायते भगवद्भक्तिस्तदहं विस्मयं गतः ॥४८॥
पृच्छामि प्रीतिमापन्नस्तद्भवान्वक्तुमर्हसि । भद्रशीलो मुनिश्रेष्ठः पित्रैवं सुविकल्पितैः ॥४६॥
जातिस्मरः सुकृतात्मा हृष्टप्रहसिताननः । स्वानुभूतं यथावृत्तं सर्वं पित्रे न्यवेदयत् ॥५०॥
भद्रशील उवाच
शृणु तात मुनिश्रेष्ठ ह्यनुभूतं मया पुरा । जातिस्मरत्वाज्जानामि यमेन परिभावितम् ॥५१॥
एतच्छ्रुत्वा महाभागो गालवो विस्मयान्वितः । उवाच प्रीतिमापन्नो भद्रशीलं महामतिम् ॥५२॥
गालव उवाच
कस्त्वं पूर्वं महाभाग किमुक्तं च यमेन ते । कस्य वा केन वा हेतोस्तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥५३॥
गालव बोले--भद्रशील ! महाभाग ! सुव्रत ! तुम सचमुच भद्रशील हो, क्योंकि तुम्हारा शुभ चरित्र
योगियों के लिए भी दुर्लभ है । तुम नित्य हरि की पूजा करते, सब प्राणियों के हित में लगे रहते, एकादशी व्रत
करते और निषिद्ध कर्मों से सदा दूर रहते हो । तुम शान्त, निर्मम, निर्द्वन्द्व और भगवान् के ध्यान में मग्न रहते
हो । तुम बालक की ऐसी बुद्धि कैसे हो गई ? बिना महात्माओं की सेवा के हरि-भक्ति दुर्लभ है ॥४४-४६॥
स्वभावतः मनुष्यों की बुद्धि अविद्या, काम आदि दुष्कर्मों की ओर ही झुकती है, परन्तु वत्स ! तुममें यह अलौकिक
क्रियाशीलता कैसे आई ? सत्संगति में भी पूर्वजन्म के पुण्यों की अधिकता से ही भगवद्भक्ति प्राप्त होती है, परन्तु
तुम्हारे सदाचार को तो देखकर मैं आश्चर्यचकित हूँ । मैं अत्यन्त प्रसन्न होकर पूछ रहा हूँ, तुम अवश्य मुझसे
कहो ॥४७-४८॥
मुनिश्रेष्ठ भद्रशील पिता के इस प्रकार के शुभ विकल्पों को सुनकर प्रसन्न हो गया । सुकृतशील, पूर्व
जन्म का ज्ञान रखने वाले उस बालक ने अपने पूर्वानुभूत रहस्यों को यथावत् रूप से पिता से कह दिया ॥४६॥
भद्रशील बोला--'तात ! मुनिश्रेष्ठ ! मुझे पूर्वकाल की जो अनुभूति है, उसको सुनो । मैं जातिस्मर१
होने के कारण उन सब बातों को जानता हूँ जिनको यम ने कहा था ।
महाभाग्यशाली गालव इतनी बातें सुनकर विस्मित हो गए और प्रसन्न हो महामति भद्रशील से बोले
॥५०-५२॥
महाभाग ! तुम पूर्व जन्म में कौन थे ? यम ने क्यों किसलिए और क्या कहा ? इसको पूर्णरूप से मुझसे
कहो ॥५३॥
१--पूर्व जन्म का ज्ञान रखने वाला ।