सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 176

१५७
त्रयोविंशोऽध्यायः
भद्रशील उवाच
अहमासं पुरा तात राजा सोमकुलोद्भवः । धर्मकीर्तिरिति ख्यातो दत्तात्रेयेण शासितः ॥५४॥
नव वर्षसहस्राणि महीं कृत्स्नामपालयन् । अधर्माश्च तथा धर्मा मया तु बहवः कृताः ॥५५॥
ततः श्रिया प्रमत्तोऽहं बहुधर्ममकारिषम् । पाषण्डजनसंसर्गात्पाषण्डचरितोऽभवम् ॥५६॥
पुराजितानि पुण्यानि मया तु सुबहून्यपि । पाषण्डैर्बाधितोऽहं तु वेदमार्गं समत्यजम् ॥५७॥
मखाश्च सर्वे विध्वस्ता कूटयुक्तिविदा मया । अधर्मनिरतं मां तु दृष्ट्वा मद्देशजाः प्रजाः ॥५८॥
सदैव दुष्कृतं चक्रुः षष्ठांशस्तत्र मेऽभवत् । एवं पापसमाचारो व्यसनाभिरतः सदा ॥५९॥
मृगयाभिरतो भूत्वा ह्येकदा प्राविशं वनम् । ससैन्योऽहं वने तत्र हत्वा बहुविधान्मृगान् ॥६०॥
क्षुत्तृट्परिवृतः श्रांतो रेवातीरमुपागमम् । रवितीक्ष्णातपक्लांता रेवायां स्नानमाचरम् ॥६१॥
अदृष्टसैन्य एकाकी पीड्यमानः क्षुधा भृशम् ॥६२॥
समेतास्तत्र ये केचिद्रेवातीरनिवासिनः । एकादशीव्रतपरा मया दृष्टा निशामुखे ॥६३॥
निराहारश्च तत्राहमेकाकी तज्जनैः सह । जागरं कृतवांश्चापि सेनया रहितो निशि ॥६४॥
अध्वश्रमपरिश्रांतः क्षुत्पिपासाप्रपीडितः । तत्रैव जागरन्तेऽहं तात पंचत्वमागतः ॥६५॥
ततो यमभटैर्बद्धो महादंष्ट्राभयंकरैः । अनेकक्लेशसंपन्नमार्गेणाप्तो यमांतिकम् ।
दंष्ट्राकरालवदनमपश्यं समवर्तिनम् ॥६६॥
अथ कालश्चित्रगुप्तमाहूयेदमभाषत । अस्य शिक्षाविधानं च यथावद्वद पंडित ॥६७॥
एवमुक्तश्चित्रगुप्तो धर्मराजेन सत्तम । चिरं विचारयामास पुनश्चेदमभाषत ॥६८॥
भद्रशील बोला--तात ! मैं पहले सोमवंशीय राजा था । धर्मकीर्ति मेरा नाम और दत्तात्रेय द्वारा मुझे
ज्ञान प्राप्त हुआ था । मैंने नौ हजार वर्ष तक इस सम्पूर्ण भूमण्डल का शासन किया । इस बीच बहुत से धर्म
और अधर्म भी किये । पाखण्डी जनों की कुसंगति में पड़कर स्वयं मैं पाखण्डी बन गया ॥५४-५६॥ यद्यपि मैंने
पूर्व जन्म में बहुत से पुण्य किये थे, तथापि पाखण्ड से विवश होकर वेदमार्ग का त्याग कर दिया । कूटनीति के
सहारे मैंने सारे यज्ञों को ध्वस्त कर दिया । मुझको पापकर्म करते देखकर मेरी प्रजा भी सर्वदा दुष्कर्म ही करती
रही, जिसका छठा भाग मुझको मिला । इस प्रकार पापाचरण में लीन रहने वाला, व्यसनशील मैं एक दिन
आखेट खेलने के लिए वन में गया । सैनिकों के सहित मैंने उस वन में बहुविध पशुओं का वध किया ॥५७-६०॥
भूख प्यास से व्याकुल और थका हुआ मैं रेवा (नर्मदा) के तीर पर पहुँचा । उस समय सूर्य के असह्य ताप से मेरा
शरीर झुलस गया था । अकेला ही रेवा में नहाकर सैनिकों के दृष्टि-पथ से दूर चला गया । मैं भूख से उस समय
अत्यन्त पीड़ित था । सायंकाल देखा कि नर्मदा तीर निवासी सभी एकादशी व्रत कर रहे हैं। मैं भी उन्हीं लोगों
के साथ रात्रि में अकेला ही निराहार रह गया और जागरण भी करता रहा । मेरे सैनिक तो पीछे ही छूट गये
थे ॥६१-६४॥ तात ! रास्ता चलते-चलते थक जाने, भूखप्यास से पीड़ित होने के कारण जागरण के बाद वहीं
मेरी मृत्यु हो गई । तदनन्तर महाभयङ्कर दांतों वाले यमदूतों ने मुझे बांधा और अनेक कष्टों से युक्त मार्ग से
यमराज के समीप ले आये । वहाँ मैंने भयङ्कर दांत और मुख वाले, समीप में बैठे हुए अनेक समान आकार वाले
यमदूतों से घिरे हुए यमराज को देखा । यमराज ने चित्रगुप्त को बुलाकर कहा ।
पंडित ! इसके किये कर्मों का लेखा यथार्थ रूप से प्रस्तुत करो ॥६५-६७॥ सज्जनाग्रणी !
धर्मराज की इस प्रकार की आज्ञा पाकर चित्रगुप्त बहुत देर तक सोचता रहा । अन्त में उसने कहा