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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

७१
'धनु' राशि की कुण्डली 'मकर' राशि की कुण्डली
[कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), नवम भाव में धनु (९) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), दशम भाव में मकर (१०) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)]
१०७ १०८
'कुम्भ' राशि की कुण्डली 'मीन' राशि की कुण्डली
[कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), एकादश भाव में कुम्भ (११) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)] [कुण्डली चक्र: मेष लग्न (१), द्वादश भाव में मीन (१२) राशि में स्थित चन्द्र (चं.)]
१०९ ११०
स्थानाधिपति
जातक की जन्मकुण्डली में जो राशि जिस स्थान (भाव या खाने) में स्थित
होती है, उस राशि का स्वामी ग्रह ही उस स्थान भाव का अधिपति अर्थात् 'स्थाना-
धिपति' होता है। जैसे—किसी कुण्डली के चतुर्थभाव में सिंह राशि (५) स्थित है
तो सिंह राशि के स्वामी 'सूर्य' को ही उस स्थान अर्थात् भाव का अधिपति अर्थात्
'सुखेश' माना जायेगा, फिर चाहे वह सूर्य कुण्डली के अन्य किसी भी भाव में स्थित
क्यों न हो। मान लीजिए कि वह चतुर्थभाव में न रह कर दशमभाव में बैठा है तो
यह कहा जायेगा कि 'चतुर्थेश या सुखेश राज्य अर्थात् दशमभाव में चला गया है।'
इसी प्रकार सब भावों, राशियों तथा ग्रहों के सम्बन्ध में समझ कर किस भाव का
स्थानाधिपति कहाँ बैठा है, इसकी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
स्थानाधिपतियों के नाम
विभिन्न भावों के स्वामियों को निम्नलिखित नामों से पुकारा जाता है :
१. प्रथम भाव के स्वामी को—प्रथमेश, लग्नेश, देहाधीश ।
२. द्वितीयभाव के स्वामी को—द्वितीयेश, धनेश, द्रव्येश ।
३. तृतीयभाव के स्वामी को—तृतीयेश, सहजेश, पराक्रमेश ।

७२
४. चतुर्थभाव के स्वामी को—चतुर्थेश, सुखेश, सुहृदेश ।
५. पंचमभाव के स्वामी को—पंचमेश, सन्तानेश, विद्येश ।
६. षष्ठ भाव के स्वामी को—षष्ठेश, द्वेषेश, शत्र्वेश ।
७. सप्तमभाव के स्वामी को—सप्तमेश, जायेश, मदनेश ।
८. अष्टमभाव के स्वामी को—अष्टमेश, जीवनेश, कालेश ।
९. नवमभाव के स्वामी को—नवमेश, भाग्येश, धर्मेश ।
१०. दशमभाव के स्वामी को—दशमेश, राज्येश, कर्मेश ।
११. एकादशभाव के स्वामी को—एकादशेश, लाभेश, उत्तमेश ।
१२. द्वादशभाव के स्वामी को—द्वादशेश, व्ययेश, दण्डेश ।
विशिष्ट ज्ञातव्य-विषय
१. भावों की गणना लग्न से आरंभ की जाती है। लग्न को पहला भाव
(घर) मान कर क्रमशः उसके बाईं ओर को गिनते हुए द्वादश भावों की गणना करनी
चाहिए। लग्न कोई भी क्यों न हो, इससे क्रमिक-गणना में कोई अन्तर नही आता।
२. जन्मकुण्डली के द्वादश भावों में स्थित विभिन्न राशियों के भावों की
उनके लिए निश्चित अंकों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। जैसे—मेष के लिए १, वृष
के लिए २, मिथुन के लिए ३, कर्क के लिए ४, सिंह के लिए ५, कन्या के लिए ६,
तुला के लिए ७, वृश्चिक के लिए ८, धनु के लिए ९, मकर के लिए १०, कुम्भ के
लिए ११ और मीन के लिए १२।
३. उच्चस्थ, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री अथवा उच्चक्षेत्र एवं स्वक्षेत्र पर दृष्टि
डालने वाले ग्रह जिस स्थान पर बैठे होते हैं अथवा जहां दृष्टि डालते हैं, उस स्थान
के फल की वृद्धि करते हैं। यथा—
'सूर्य' सिंह, मेष, वृश्चिक, धनु अथवा मीन राशि पर बैठा हो अथवा इन
पर दृष्टि डालता हो।
'चन्द्रमा' कर्क, वृष, सिंह, मिथुन अथवा कन्या राशि पर बैठा हो अथवा
इन पर दृष्टि डालता हो।
'मंगल' मेष, वृश्चिक, मकर, सिंह, कर्क, धनु अथवा मीन राशि पर बैठा हो
अथवा इन पर दृष्टि डालता हो।
'बुध' मिथुन, कन्या, सिंह, वृष अथवा तुला राशि पर बैठा हो अथवा इन पर
दृष्टि डालता हो।
'गुरु' धनु, मीन, कर्क, सिंह, मेष अथवा वृश्चिक राशि पर बैठा हो अथवा
इन पर दृष्टि डालता हो
'शुक्र' वृष, तुला, मीन, कन्या, मिथुन, मकर अथवा कुंभ राशि पर बैठा हो
अथवा इन पर दृष्टि डालता हो।

७३
'शनि' मकर, कुम्भ, तुला, कन्या, मिथुन, वृष अथवा तुला राशि पर बैठा
हो अथवा इन पर दृष्टि डालता हो।
'राहु' मिथुन (मतान्तर से वृष) राशि पर बैठा हो, अथवा लग्न से तीसरे,
छठे अथवा ग्यारहवें में से किसी भी ऐसे स्थान में बैठा हो, जहाँ धनु राशि न हो।
'केतु' धनु (मतान्तर से वृश्चिक) राशि पर बैठा हो अथवा लग्न से तीसरे,
छठे अथवा ग्यारहवें में से किसी भी ऐसे स्थान में बैठा हो, जहाँ मिथुन राशि न हो।
केन्द्र अर्थात् पहले, चौथे, सातवें एवं दसवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह विशेष
शक्तिशाली होने के कारण अपना पूर्ण प्रभाव प्रदर्शित करते हैं।
५. त्रिकोण अर्थात् पांचवें एवं नवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक के धन
की वृद्धि करते हैं।
६. दूसरे तथा ग्यारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक के धन की वृद्धि
करते हैं। विशेषतः ग्यारहवें भाव में बैठा हुआ प्रत्येक ग्रह विशेष लाभकारी होता है।
७. तृतीय भाव में बैठे हुए ग्रह जातक के पराक्रम की बढ़ाते हैं।
८. प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम, दशम तथा एकादश
भाव में बैठे हुए ग्रह उत्तम फल देते हैं।
६. षष्ठ, अष्टम तथा द्वादश भाव में बैठे हुए ग्रह जातक के लिए कठिनाइयों
उपस्थित करते हैं।
१०. लग्न से तीसरे, छठे तथा ग्यारहवें भाव में क्रूर ग्रहों—शनि, केतु का
बैठना शक्ति एवं शुभफल देने वाला होता है।
११. ग्यारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह शुभफल देते हैं।
१२. आठवें तथा बारहवें भाव में बैठे हुए सभी ग्रह जातक को थोड़ी-बहुत
हानि अवश्य पहुँचाते हैं।
१३. जिस भाव का जो ग्रह कारक माना गया है, वह यदि अकेला उसी
भाव में बैठा हो तो उस भाव को बिगाड़ देता है।
१४. जिस भाव का स्वामी उच्च राशिस्थ, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री अथवा मूल
त्रिकोण स्थित होता है, उस भाव का शुभ फल प्राप्त होता है।
१५. जिस भाव में शुभ ग्रह बैठा हो, उसका फल उत्तम होता है तथा जिसमें
पाप ग्रह बैठा हो, उसके शुभ फल की हानि पहुँचती है।
१६. जो ग्रह सूर्ये के बराबर अथवा उमके निकटवर्ती अंशों पर होता है,
उसे 'पूर्ण अस्त' माना जाता है। जो ग्रह सूर्य से ८ अंश की दूरी पर होता है, उसे
'आधा अस्त' माना जाता है तथा जो ग्रह सूर्य के 15 अंश की दूरी पर होता है उसे
'पूर्ण उदय'. माना जाता है।

७४
पूर्ण उदय ग्रह पूर्ण प्रभाव देता है, आधा अस्त ग्रह आधा प्रभाव देता है तथा
पूर्ण अस्त ग्रह प्रभावहीन होता है ।
१७. जिस भाव का अधिपति किसी शुभग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो, अथवा
जिस भाव में शुभ ग्रह बैठा हो अथवा जिस भाव को शुभग्रह देख रहा हो, उसका फल
शुभ होता है ।
१८. जिस भाव में कोई पाप ग्रह बैठा हो अथवा उस भाव के अधिपति के साथ
कोई पाप ग्रह बैठा हो अथवा उस भाव या उस भाव के अधिपति पर पाप ग्रह की
दृष्टि पड़ रही हो तो उसका फल अशुभ होता है ।
१९. किसी भाव का स्वामी पाप ग्रह हो और वह लग्न से तृतीय स्थान में
बैठा हो तो शुभ फल देगा, परन्तु किसी भाव का स्वामी शुभ ग्रह हो और वह उस
भाव से तीसरे स्थान पर बैठे तो मध्यम फल देगा ।
२०. जिस भाव में उसका अधिपति ग्रह अथवा शुक्र, बुध या गुरु में से कोई
बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि पड़ रही हो अथवा वह अपने भाव के स्वामी के
अतिरिक्त किसी अन्य ग्रह संयुक्त अथवा दृष्ट न हो तो वह शुभ फल देनेवाला सिद्ध
होगा ।
२१. आठवें भाव में जो राशि हो, उसका स्वामी जिस भाव में बैठा होता
है, उसे बिगाड़ देता है ।
२२. राहु, केतु जिस भाव में रहते हैं, उसे बिगाड़ देते हैं ।
२३. चन्द्रमा, बुध, शुक्र, केतु तथा गुरु—ये सब क्रमशः एक दूसरे से अधिक
शुभ ग्रह हैं । ये ग्रह यदि अपनी राशियों में बैठे हों तो अधिक शुभ फल देते हैं और
यदि पाप ग्रहों (सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु) की राशि में बैठे हों तो अल्प शुभ फल
देते हैं । स्मरणीय है कि फल का विचार करते समय केतु को प्रायः पापग्रह माना
जाता है, परन्तु वैसे केतु की गणना शुभ ग्रहों में की जाती है ।
२४. सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु—ये सब क्रमशः एक दूसरे से अधिक पाप
ग्रह हैं । ये ग्रह यदि अपनी राशि में बैठे हों तो अधिक शुभ फल देते हैं । यदि अपने
मित्र की राशि, अपनी उच्च राशि अथवा किसी शुभ ग्रह की राशि में बैठे हों तो
न्यून मात्रा में अशुभ फल देते हैं ।
२५. राहु जिसे अशुभ फल देता है, केतु उसे शुभ फल देता है तथा केतु जिसे
अशुभ फल देता है, राहु उसे शुभ फल देता है—यह इन दोनों ग्रहों की एक
विशिष्टता है ।
२६. आठवें भाव का अधिपति अर्थात् अष्टमेश जिस भाव में बैठा होता है,
उस भाव को बिगाड़ता है ।
२७. राहु-केतु जिस भाव में बैठे होते हैं, उसे बिगाड़ देते हैं ।

७६
दैनिक ग्रहगोचर का प्रभाव
जन्मकुण्डली जातक के जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति की परिचायक होती
है तथा उन ग्रहों की स्थिति का जातक के जीवन पर स्थायी प्रभाव पड़ता रहता है,
परन्तु आकाशमण्डल में विभिन्न ग्रह निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं जिनका
तात्कालिक-अस्थायी प्रभाव भी जातक के दैनिक-जीवन पर पड़ता रहता है। इस
प्रकार प्रत्येक ग्रह प्रत्येक प्राणी के जीवन पर अपना दो प्रकार से प्रभाव डालता है।
अस्तु, स्थायी प्रभाव के साथ ही ग्रहों के अस्थायी प्रभाव का विचार करना भी
आवश्यक होता है। दैनिक ग्रह गोचर में किस समय कौनसा ग्रह किस स्थान पर
चल रहा है, इसका ज्ञान 'पंचांग' द्वारा प्राप्त किया जाता है। इस विषय की
जानकारी किसी ज्योतिषी से पूछ कर, अथवा एतद् विषयक हमारी अन्य पुस्तकों
का अध्ययन करके प्राप्त की जा सकती है।
इस पुस्तक के द्वितीय खण्ड में जन्मकुण्डली के जिस भाव तथा राशि में स्थित
स्थायी ग्रहों के जिस फलादेश का उल्लेख किया गया है, दैनिक ग्रहगोचर कुण्डली के
विभिन्न भावों तथा राशियों में स्थित विभिन्न ग्रहों का फलादेश भी ठीक वैसा ही
होता है। किस दिन, मास अथवा वर्ष में दैनिक ग्रह गोचरस्थ ग्रहों का फलादेश किस
उदाहरण कुण्डली द्वारा ज्ञात करना चाहिए, इसका उल्लेख द्वितीय खण्ड में प्रत्येक
लग्न की उदाहरण-कुण्डलियों का फलादेश आरम्भ करने से पूर्व ही कर दिया
गया है।
जन्म कुण्डलीस्थ ग्रह के स्थायी तथा दैनिक ग्रहगोचर के अस्थायी फलादेश
के समन्वय स्वरूप जो भी निष्कर्ष निकले, उसी को सच्चा फलादेश समझना
चाहिए।
'वर्ष कुण्डली' स्थित ग्रहों के फलादेश का ज्ञान भी जन्मकुण्डली स्थित ग्रहों
के फलादेश की भाँति इसी पुस्तक की सहायता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
वर्षकुण्डली स्थित 'मुंथा' एवं 'वर्षेश' के विशिष्ट फलादेश के विषय में किसी ज्योतिषी
द्वारा जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। अथवा हमारी लिखी पुस्तक 'वर्षकुण्डली
फल विचार' का अध्ययन करना चाहिए।
सम्मिलित परिवार का फलादेश
सम्मिलित परिवार होने पर उस परिवार के सभी सदस्यों की जन्मकुण्डली के
ग्रहों का थोड़ा-बहुत प्रभाव एक दूसरे पर पड़ता रहता है। अतः सम्मिलित-परिवार
के किसी सदस्य के विषय में ग्रहों का फलादेश ज्ञात करते समय यदि उस परिवार
के अन्य सदस्यों की जन्मकुण्डलियों का भी सम्यक् अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला
जाय तो उचित रहेगा। इस पुस्तक की सहायता से किसी भी स्त्री, पुरुष, बालक,
युवा अथवा वृद्ध मनुष्य की जन्मकुण्डलीस्थ ग्रहों के शुभाशुभ प्रभाव की जानकारी
सरलतापूर्वक प्राप्त की जा सकती है।

७७
गलत जन्मकुण्डली का संशोधन
जन्मकुण्डलीस्थ ग्रहों के फलादेश की यथार्थता शुद्ध लग्न पर निर्भर करती
है। यदि लग्न ठीक न होगी तो जन्मकुण्डली के ग्रहों का फलादेश भी ठीक नहीं
बैठेगा।
शुद्ध 'लग्न' का निर्णय जातक के ठीक जन्म समय के आधार पर किया
जाता है। समय में थोड़ा-सा भी अन्तर पड़ जाने से लग्न के अशुद्ध हो जाने की
सम्भावना रहती है, अतः लग्न की शुद्धता का विचार कर लेना आवश्यक है।
लग्न की शुद्धता का विचार करने की एक सरल विधि यहाँ दी जा रही है।
इसके आधार पर गलत लग्न वाली कुण्डली का बिना किसी विशेष परिश्रम के सुधार
किया जा सकता है। विधि इस प्रकार है—
उपस्थित जन्मकुण्डली के ग्रहों के फलादेश से यदि ज्ञात हो कि वह जातक
के जीवन से ठीक मिल रहा है, तब तो कोई बात ही नहीं, परन्तु यदि फलादेश ठीक
न मिले तो लग्न को अशुद्ध समझ कर दो कुण्डलियाँ ऐसी तैयार करनी चाहिए, जिनमें
से एक में लग्न आगे की तथा दूसरी में पीछे की हो, फिर उन दोनों कुण्डलियों के
विभिन्न भावों में उपस्थित कुण्डली के आधार पर ग्रहों को लिखकर उनके फलादेश
का अध्ययन करें तथा जिस कुण्डली का फलादेश ठीक बैठता हो, उसी लग्न की
कुण्डली को शुद्ध समझें।
उदाहरण के लिए नीचे तीन कुण्डली-चित्र दिये जा रहे हैं। उपस्थित कुण्डली
'वृश्चिक' लग्न की है, जिसे बीच में प्रदर्शित किया गया है। पहली तथा तीसरी
उसी के आधार पर धनु तथा मकर लग्न की कुण्डलियाँ दिखाई गई हैं। इन तीनों
कुण्डलियों में से जिसका फलादेश जातक के जीवन पर ठीक-ठीक घटे, उसी की
लग्न शुद्ध समझनी चाहिए।
'धनु' लग्न की कुण्डली | 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली | 'मकर' लग्न की कुण्डली
चित्र १२१ | चित्र १२२ | चित्र १२३
इन उदाहरण-कुण्डलियों में जिस प्रकार लग्न को बदल कर उसके आधार
पर विभिन्न भावों में विभिन्न ग्रहों को बैठाया गया है, इसी आधार पर किसी भी
गलत लग्न वाली कुण्डली को शुद्ध किया जा सकता है।

हस्तलिखित, असली, प्राचीन
भृगुसंहिता फलित प्रकाश
फलादेश

[कुण्डली चक्र]

  • प्रथम भाव (तनु): १
  • द्वितीय भाव (धन): २
  • तृतीय भाव (सहज): ३
  • चतुर्थ भाव (सुहृद्): ४
  • पञ्चम भाव (पुत्र): ५
  • षष्ठ भाव (रिपु): ६
  • सप्तम भाव (जाया): ७
  • अष्टम भाव (आयु): ८
  • नवम भाव (धर्म): ९
  • दशम भाव (राज्य): १०
  • एकादश भाव (आय): ११
  • द्वादश भाव (व्यय): १२

११४
2
द्वितीय खण्ड
[द्वादश लग्नों की कुण्डलियों का फलादेश]

८०
विभिन्न लग्नों वाली जन्मकुण्डलियों का फलादेश जानने की विधि
इस द्वितीय खण्ड में विभिन्न लग्नों वाली कुण्डलियों के विभिन्न भागों में
स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का वर्णन अलग-अलग उदाहरण-कुण्डलियों द्वारा
प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक लग्न की उदाहरण कुण्डलियों को अलग-अलग अध्यायों
में बाँट कर, विभिन्न ग्रहों के फलादेश को सूर्यादि के क्रम से अलग-अलग लिखा गया
है। किस लग्न वाली कुण्डली का फलादेश किन संख्याओं वाली उदाहरण कुण्डलियों
में देखना चाहिए, इसे निम्नानुसार समझ लें—
१. 'मेष लग्न'—उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६ से २२३ तक
२. 'वृष' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या २२५ से ३३२ तक
३. 'मिथुन' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या ३३४ से ४४१ तक
४. 'कर्क' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या ४४३ से ५५० तक
५. 'सिंह' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या ५५२ से ६५९ तक
६. 'कन्या' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या ६६१ से ७६८ तक
७. 'तुला' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या ७७० से ८७७ तक
८. 'वृश्चिक' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या ८७९ से ९८६ तक
९. 'धनु' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या ९८८ से १०९५ तक
१०. 'मकर' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या १०९७ से १२०४ तक
११. 'कुम्भ' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या १२०६ से १३१३ तक
१२. 'मीन' लग्न—उदाहरण-कुण्डली संख्या १३१५ से १४२२ तक
यह बात पहले बताई जा चुकी है कि जन्मकुण्डली में स्थित ग्रहों का जातक
के जीवन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है, परन्तु तात्कालिक गोचर कुण्डली के ग्रह भी
उसके जीवन पर अपने स्थितिकाल में अस्थायी प्रभाव डालते रहते हैं। अतः जिस
समय जो ग्रह जिस राशि पर चल रहा हो, उसके बारे में पंचांग अथवा किसी
ज्योतिषी द्वारा जानकारी प्राप्त करके तात्कालिक प्रभाव के विषय में भी अवश्य
जान लेना चाहिए।
उदाहरण के लिए 'सूर्य' किसी जातक की मेष लग्न वाली जन्मकुण्डली के
द्वितीय भाव में बैठा है तो वह उदाहरण-कुण्डली संख्या ११७ के अनुसार जातक के
जीवन पर अपना स्थायी प्रभाव डालता रहेगा। परन्तु जब वह तात्कालिक गोचर
में मिथुन राशि पर चल रहा होगा, तब जातक के ऊपर मेष लग्न वाली कुण्डली
के, मिथुन राशि वाले तृतीय भाव में स्थित सूर्य के अनुसार उदाहरण-कुण्डली संख्या

८१
११८ में वर्णित फलादेश रूपी प्रभाव भी तब तक डालता रहेगा, जब तक कि वह
गोचर में उस राशि से हट कर आगे कर्क राशि में नही चला जाता। कर्क राशि में
पहुँच कर उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६ के अनुसार प्रभाव डाल उठेगा। इसी प्रकार
गोचर की सब राशियों तथा उसके ग्रहों के अस्थायी-फलादेश के विषय में समझ लेना
चाहिए।
उक्त विधि के प्रत्येक ग्रह के स्वामी तथा अस्थायी प्रभाव को जानकर, उसके
समन्वय स्वरूप जो निष्कर्ष निकलता हो, उसी को अपने वर्तमान काल का यथार्थ
फलादेश समझना चाहिए। गोचर के आधार पर किस ग्रह का फलादेश किस उदा-
हरण-कुण्डली में देखा जाय, इसका निर्देश प्रत्येक लग्न की उदाहरण-कुण्डलियों के
आरम्भ में यथास्थान किया गया है।
स्मरणीय है कि इस ग्रंथ में प्रदर्शित प्रत्येक लग्न की उदाहरण-कुण्डलियों में
विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों के फलादेश का वर्णन अलग-अलग किया गया
है, अतः प्रत्येक जन्मकुण्डली का फलादेश ज्ञात करने के लिए ६ उदाहरण-कुण्डलियों
के अध्ययन की आवश्यकता पड़ेगी। यही नियम गोचर कुण्डली के फलादेश पर भी
लागू होगा।
यदि लग्न कुण्डली के किसी भाव में दो या उससे अधिक ग्रह एक साथ बैठे
हों तो उसके विशिष्ट प्रभाव को 'ग्रहों' की युति, सम्बन्धी वाले तृतीय खण्ड में देखना
चाहिए।
स्मरणीय है कि जो ग्रह जितने अंश का होता है, उसी के अनुरूप वह
न्यूनाधिक फल प्रदान करता है। अतः ग्रहों के अंशों की जानकारी रखना भी आवश्यक
है। यह जानकारी पंचांग अथवा किसी ज्योतिषी द्वारा प्राप्त की जा सकती है।
उक्त विधि से इस पुस्तक द्वारा संसार के किसी भी स्त्री-पुरुष की जन्म
कुण्डली का फलादेश ज्ञात किया जा सकता है। यदि ग्रंथ में वर्णित किसी विषय को
समझने में कोई कठिनाई हो अथवा जन्मपत्र-निर्माण आदि ज्योतिष सम्बन्धी भी कोई
जानकारी प्राप्त करनी हो तो जवाबी-पत्र लिख कर निम्न पते पर पूछताछ की जा
सकती है। पता यह है—
पं० राजेश दीक्षित, कृष्णापुरी, मथुरा (उ० प्र०)

८२
'मेष लग्न'
[कुण्डली: १ 'मेष' लग्न, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२]
११५
['मेष' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]
'मेष' लग्न का फलादेश
'मेष' लग्न में जन्म लेने वाले जातक का शरीर इकहरा तथा कुछ लालिमा
लिए गौर वर्ण का होता है। वह स्वभाव से रजोगुणी, पित्त प्रकृति वाला, उग्र,
अहंकारी, चंचल, अत्यन्त चतुर, बुद्धिमान, धर्मात्मा, उदार, कुल-दीपक तथा अल्प-
संततिवान् होता है। स्त्रियों के प्रति उसका स्वार्थपूर्ण अल्प लगाव अथवा द्वेष
होता है।
इस लग्न वाले जातक को अपनी आयु के ६, ८, १५, २१, ३६, ४४, ५६
तथा ६३वें वर्ष में धन-हानि एवं शारीरिक कष्टों का सामना करना पड़ता है।
आयु के १६, २०, २८, ३४, ४१, ४८ तथा ५१वें वर्ष में उसे धन, वाहन, सौभाग्य
आदि का सुख प्राप्त होता है।
'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न
ग्रहों का स्थायी-फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ११६ से २२३ के
बीच देखना चाहिए।
गोचर-कुण्डली ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे
लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।

८३
'मेष' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में 'सूर्य' का
स्थायी-फलादेश उदाहरण कुण्डली-संख्या ११६ से १२७ के बीच देखना चाहिए ।
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'सूर्य'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ११६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ११७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ११८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ११९
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १२०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १२१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १२२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १२३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १२४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १२५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १२६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १२७
'मेष' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १२८ से १३९ के बीच देखना
चाहिए ।
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'चन्द्रमा'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १२८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १२९
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १३०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १३१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १३२

८४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १३३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १३४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १३५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १३६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १३७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १३८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १३६
'मेष' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'मंगल' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १४० से १५१ के बीच देखना
चाहिए।
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मंगल'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १४०
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १४१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १४२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १४३
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १४४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १४५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १४६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १४७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १४८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १४६
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १५०
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १५१
'मेष' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १५२ से १६३ के बीच देखना
चाहिए।
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—

८५
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १५२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १५३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १५४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १५५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १५६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १५७
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १५८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १५९
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १६०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १६१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १६२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १६३
'मेष' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुंडली संख्या १६४ से १७५ के बीच देखना
चाहिए।
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'गुरु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १६४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १६५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १६६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १६७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १६८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १६९
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १७०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १७१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १७२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १७३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १७४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १७५

८६
'मेष' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १७६ से १८७ के बीच देखना
चाहिए।
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १७६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १७७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १७८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १७९
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १८०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १८१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १८२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १८३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १८४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १८५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १८६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १८७
'मेष' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालो को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शनि' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १८८ से १९९ के बीच देखना
चाहिए।
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'शनि'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १८८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १८९
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १९०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १९१

८७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १६२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १६३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १६४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १६५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १६६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १६७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १६८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १६९
'मेष' लग्न में 'राहु' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'राहु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या २०० से २११ के बीच देखना
चाहिए।
२—'मेष' लग्न वालों को अपनी गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'राहु' का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'राहु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २००
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २०१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २०२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २०३
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २०४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २०५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २०६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २०७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २०८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २०९
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २१०
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २११
'मेष' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१—'मेष' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी-फलादेश उदाहरण कुण्डली संख्या २१२ से २२३ के बीच देखना
चाहिए :

८८
२—'मेष' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली से विभिन्न भावों में स्थित 'केतु'
का अस्थायी-फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या २१२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या २१३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या २१४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या २१५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या २१६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या २१७
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या २१८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या २१९
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या २२०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या २२१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या २२२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या २२३
'मेष' लग्न में 'सूर्य'
'मेष' लग्न वाली कुण्डली से 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : सूर्य

+---------------+---------------+
|       \   २   /       \   १२  /
|   ३    \     /    १    \     /   ११
|         \   /    सू     \   /
+----------\ /             \ /---------+
|           X               X          |
|   ४      / \      ७      / \    १०   |
|         /   \           /   \        |
+----------/ \             \ /---------+
|   ५     /   \     ६     /   \    ९   |
|        /  ६  \         /  ८  \       |
+---------------+---------------+
               [११६]

पहले भाव में अपने मित्र मंगल की राशि में
उच्चस्थ सूर्य अपने मित्र मंगल की राशि पर है, अतः
जातक तेजस्वी, विद्वान्, साहसी, स्वस्थ, स्वाभिमानी
तथा पराक्रमी होगा। महत्वाकांक्षा, व्यवहार-कुशलता,
धैर्य आदि सद्गुण प्राप्त होंगे तथा सन्तानें भी अधिक
होंगी।
परन्तु सूर्य की सप्तमभाव पर नीच-दृष्टि पड़ने
के कारण जातक के दाम्पत्य-सुख में कमी रहेगी। पत्नी
(यदि स्त्री की जन्मकुण्डली हो तो पति) अधिक सुन्दर नहीं होगी। पति-पत्नी में
मन-मुटाव भी रह सकता है। दैनिक जीविकोपार्जन के क्षेत्र में भी अनेक प्रकार की
कठिनाइयाँ आती रहेंगी।

८६
'मेष' लग्न की कुण्डली से 'द्वितीयभाव' 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीय भाव : सूर्य
दूसरे भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को आर्थिक कठि-
नाइयों का सामना करना होगा । इस कुण्डली में
सूर्य पंचमभाव का स्वामी होकर शत्रु की राशि
पर बैठा है, अतः जातक के विद्याध्ययन एवं संतान
पक्ष में भी कठिनाइयां आती रहेंगी । कुटुम्ब, रत्न
तथा बन्धन-विषयक विवाद भी उठते रहेंगे । यहाँ
से सूर्य अष्टम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है, अतः
जातक की आयु दीर्घ होगी तथा उसे गुप्त अथवा आकस्मिक धन का लाभ भी होगा ।
'मेष' लग्न कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित सूर्य का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक के बुद्धिबल एवं पराक्रम में वृद्धि
होगी । सूर्य को सातवीं दृष्टि भाग्य-भवन पर होने से
जातक भाग्यवान्, धर्मात्मा, दानी तथा तीर्थसेवी होगा ।
नवें भाव में सूर्य के मित्र तथा शुभग्रह गुरु की राशि होने
के कारण जातक शुभ कार्य करने वाला तथा भगवद्
भक्त होगा ।
तृतीय भाव से भाई तथा वाणी का तो विचार किया जाता है, अतः यह
जातक भाइयों का सुख प्राप्त करेगा तथा ओजस्वी वाणी वाला होगा ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य
चौथे भाव में अपने मित्र चन्द्रमा की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक भूमि, गृह, वाहन आदि
अनेक प्रकार के सुख प्राप्त करेगा । वह विद्वान् तथा
विद्या द्वारा सुख प्राप्त करने वाला भी होगा। यहाँ से
सूर्य सातवीं दृष्टि से अपने शत्रु शनि की राशि वाले दशम
भाव को देखता है अतः जातक की अपने पिता से अनबन
रहेगी तथा राजकीय मामलों में विफलताऐं आयेंगी। परंतु
सूर्य से प्रभाव से कुछ-न-कुछ सम्मान अवश्य बना रहेगा ।

६०
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : पंचमभाव : सूर्य
पाँचवें भाव में स्वक्षेत्री सूर्य के प्रभाव से जातक
बड़ा विद्वान्, बुद्धिमान्, यशस्वी तथा सन्तान-सुख से परि-
पूर्ण रहेगा। यहाँ से सूर्य की सप्तम दृष्टि अपने शत्रु शनि
की राशि वाले ग्यारहवें भाव पर पड़ती है, अतः आय के
साधनों में रुकावटें आती रहेंगी तथा आर्थिक लाभ के
लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ेगा।
इस ग्रह स्थिति का जातक कटुभाषी तथा अह-
कारी होता है, जिसके कारण लोग परोक्ष में उसकी
निन्दा भी करते हैं।
१२०
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
छठे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक
अपने शत्रुओं पर निरन्तर विजय प्राप्त करता रहेगा। पंचमभाव का स्वामी षष्ठभाव
मेष लग्न : षष्ठभाव : सूर्य में होने के कारण विद्याध्ययन में कुछ कठिनाइयां तो
आयेंगी, परन्तु जातक परम विद्वान् तथा बुद्धिमान भी
होगा। सूर्य की सप्तदृष्टि व्ययस्थान में पड़ने के कारण
जातक बाहरी संबंधों से लाभ एवं सफलता पाने वाला,
विदेशों में सम्मानित तथा अधिक खर्च करने वाला भी
होगा। इसे सन्तानपक्ष से कुछ चिन्ताएं अवश्य बनी
रहेंगी। शत्रुपक्ष कठिनाइयां खड़ी करता रहेगा, परन्तु
यह हारेगा तो।
१२१
'मेष' लग्न कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि में
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने स्वास्थ्य एवं
स्त्री के विषय में निरन्तर कठिनाइयों का सामना
करना पड़ेगा। सप्तम उच्चदृष्टि से मित्र मंगल की
राशि वाले लग्नभाव को देखने के कारण जातक लंबे
कद का तेजस्वी तथा स्वाभिमानी होगा। वह युक्ति
एवं बुद्धिबल से अपना काम निकालने में प्रवीण होगा।
सूर्य के पंचमेश होने के कारण जातक का विद्या तथा
सन्तान का पक्ष भी कमजोर रहेगा तथा जीवन-यापन के
क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती रहेंगी।
१२२

६१
'मेष' लग्न कुण्डली से 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्व एवं
गुप्त धन सम्बन्धी लाभ तो होगा परन्तु आठवाँ घर
मृत्यु-भवन होने से विद्या एवं संतान पक्ष में कमजोरी
रहेगी । दैनिक जीवन में भी कठिनाइयाँ आती रहेंगी ।
सातवीं दृष्टि से शत्रु के द्वितीय भाव को देखने के
कारण जातक को धन एवं कुटुम्ब विषयक असन्तोष भी
निरन्तर बना रहेगा । कुल मिलाकर जीवन संघर्षपूर्ण
रहेगा ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : नवमभाव : सूर्य नववें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक श्रेष्ठ विद्या, बुद्धि एवं
ज्ञान का स्वामी होगा । यह धर्म, धर्मज्ञ शास्त्रों का
ज्ञाता, ईश्वर भक्त, यशस्वी, भाग्यवान, दयालु, दानी
तथा तीर्थसेवी भी होगा । भाग्योन्नति के क्षेत्र में
निरन्तर, सफलताएँ मिलती रहेंगी ।
सातवीं दृष्टि से अपने मित्र बुध की राशि
वाले तृतीय भाव को देखने के कारण जातक के परा-
क्रम, भाई-बहन, साहस तथा योग्यताओं में वृद्धि
होगी । सूर्य की यह स्थिति बहुत श्रेष्ठ है ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में अपने शत्रु शनि की राशि
पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को अपने पिता, व्यव-
साय, राज्य नौकरी तथा प्रतिष्ठा के क्षेत्र में कुछ कमियों
शिकार होना पड़ता है, परन्तु यह विदेशी भाषा एवं का
राजभाषा का श्रेष्ठ जानकार होता है ।
सातवीं दृष्टि से अपने मित्र चन्द्रमा की राशि
से चौथे भाव को देखने से माता, भूमि, भवन का श्रेष्ठ
सुख प्राप्त होता है । ऐसा जातक अपने बुद्धिबल से
राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करता है ।

६२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में अपने शत्रु शनि पर स्थित सूर्य
के प्रभाव से जातक को अर्थ-लाभ के लिए विशेष परिश्रम
तो करना पड़ता है, परन्तु लाभ भी अत्यधिक होता है।
ग्यारहवें भाव में पापग्रह शक्तिशाली माना जाता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले पञ्चमभाव से देखने
के कारण जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान का भी
विशेष लाभ होता है। ऐसा जातक अपनी स्वार्थ पूर्ति
के लिए कटुभाषी भी होता है तथा उसी से लाभ भी
उठाता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में अपने मित्र गुरु की राशि
पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का बाहरी
स्थानों से श्रेष्ठ सम्बन्ध होता है, परन्तु व्यय की
अधिकता भी बनी रहती है। उसे अपना खर्च
चलाने के लिए बुद्धिबल का अधिक प्रयोग करना
पड़ता है। सन्तान एवं विद्या पक्ष की हानि तथा
चिन्ता के योग भी उपस्थित होते हैं।
सातवीं दृष्टि से अपने मित्र बुध की राशि
वाले षष्ठभाव को देखने के कारण जातक को शत्रुपक्ष पर विजय प्राप्त होती है,
परन्तु वह मानसिक चिंताओं का शिकार भी बना रहता है।
'मेष' लग्न में 'चन्द्रमा'
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में अपने मित्र मंगल की राशि
पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक मानसिक
तथा पारिवारिक सुख-शांति प्राप्त करता है।
सातवीं दृष्टि से शुक्र की राशि वाले सप्तम
भाव को देखने के कारण स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय
के क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त होती है। ऐसे जातक
का दाम्पत्य-जीवन सुखी तथा शारीरिक स्वास्थ्य
उत्तम रहता है।