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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 638 में से

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'मेष' लग्न की कुण्डली से 'द्वितीयभाव' 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीय भाव : सूर्य
दूसरे भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को आर्थिक कठि-
नाइयों का सामना करना होगा । इस कुण्डली में
सूर्य पंचमभाव का स्वामी होकर शत्रु की राशि
पर बैठा है, अतः जातक के विद्याध्ययन एवं संतान
पक्ष में भी कठिनाइयां आती रहेंगी । कुटुम्ब, रत्न
तथा बन्धन-विषयक विवाद भी उठते रहेंगे । यहाँ
से सूर्य अष्टम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है, अतः
जातक की आयु दीर्घ होगी तथा उसे गुप्त अथवा आकस्मिक धन का लाभ भी होगा ।
'मेष' लग्न कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित सूर्य का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक के बुद्धिबल एवं पराक्रम में वृद्धि
होगी । सूर्य को सातवीं दृष्टि भाग्य-भवन पर होने से
जातक भाग्यवान्, धर्मात्मा, दानी तथा तीर्थसेवी होगा ।
नवें भाव में सूर्य के मित्र तथा शुभग्रह गुरु की राशि होने
के कारण जातक शुभ कार्य करने वाला तथा भगवद्
भक्त होगा ।
तृतीय भाव से भाई तथा वाणी का तो विचार किया जाता है, अतः यह
जातक भाइयों का सुख प्राप्त करेगा तथा ओजस्वी वाणी वाला होगा ।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य
चौथे भाव में अपने मित्र चन्द्रमा की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक भूमि, गृह, वाहन आदि
अनेक प्रकार के सुख प्राप्त करेगा । वह विद्वान् तथा
विद्या द्वारा सुख प्राप्त करने वाला भी होगा। यहाँ से
सूर्य सातवीं दृष्टि से अपने शत्रु शनि की राशि वाले दशम
भाव को देखता है अतः जातक की अपने पिता से अनबन
रहेगी तथा राजकीय मामलों में विफलताऐं आयेंगी। परंतु
सूर्य से प्रभाव से कुछ-न-कुछ सम्मान अवश्य बना रहेगा ।