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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 638 में से

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पूर्ण उदय ग्रह पूर्ण प्रभाव देता है, आधा अस्त ग्रह आधा प्रभाव देता है तथा
पूर्ण अस्त ग्रह प्रभावहीन होता है ।
१७. जिस भाव का अधिपति किसी शुभग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो, अथवा
जिस भाव में शुभ ग्रह बैठा हो अथवा जिस भाव को शुभग्रह देख रहा हो, उसका फल
शुभ होता है ।
१८. जिस भाव में कोई पाप ग्रह बैठा हो अथवा उस भाव के अधिपति के साथ
कोई पाप ग्रह बैठा हो अथवा उस भाव या उस भाव के अधिपति पर पाप ग्रह की
दृष्टि पड़ रही हो तो उसका फल अशुभ होता है ।
१९. किसी भाव का स्वामी पाप ग्रह हो और वह लग्न से तृतीय स्थान में
बैठा हो तो शुभ फल देगा, परन्तु किसी भाव का स्वामी शुभ ग्रह हो और वह उस
भाव से तीसरे स्थान पर बैठे तो मध्यम फल देगा ।
२०. जिस भाव में उसका अधिपति ग्रह अथवा शुक्र, बुध या गुरु में से कोई
बैठा हो अथवा इन पर दृष्टि पड़ रही हो अथवा वह अपने भाव के स्वामी के
अतिरिक्त किसी अन्य ग्रह संयुक्त अथवा दृष्ट न हो तो वह शुभ फल देनेवाला सिद्ध
होगा ।
२१. आठवें भाव में जो राशि हो, उसका स्वामी जिस भाव में बैठा होता
है, उसे बिगाड़ देता है ।
२२. राहु, केतु जिस भाव में रहते हैं, उसे बिगाड़ देते हैं ।
२३. चन्द्रमा, बुध, शुक्र, केतु तथा गुरु—ये सब क्रमशः एक दूसरे से अधिक
शुभ ग्रह हैं । ये ग्रह यदि अपनी राशियों में बैठे हों तो अधिक शुभ फल देते हैं और
यदि पाप ग्रहों (सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु) की राशि में बैठे हों तो अल्प शुभ फल
देते हैं । स्मरणीय है कि फल का विचार करते समय केतु को प्रायः पापग्रह माना
जाता है, परन्तु वैसे केतु की गणना शुभ ग्रहों में की जाती है ।
२४. सूर्य, मंगल, शनि तथा राहु—ये सब क्रमशः एक दूसरे से अधिक पाप
ग्रह हैं । ये ग्रह यदि अपनी राशि में बैठे हों तो अधिक शुभ फल देते हैं । यदि अपने
मित्र की राशि, अपनी उच्च राशि अथवा किसी शुभ ग्रह की राशि में बैठे हों तो
न्यून मात्रा में अशुभ फल देते हैं ।
२५. राहु जिसे अशुभ फल देता है, केतु उसे शुभ फल देता है तथा केतु जिसे
अशुभ फल देता है, राहु उसे शुभ फल देता है—यह इन दोनों ग्रहों की एक
विशिष्टता है ।
२६. आठवें भाव का अधिपति अर्थात् अष्टमेश जिस भाव में बैठा होता है,
उस भाव को बिगाड़ता है ।
२७. राहु-केतु जिस भाव में बैठे होते हैं, उसे बिगाड़ देते हैं ।