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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के
प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का उत्तम
सुख प्राप्त होता है। सन्तान-पक्ष में कुछ कमी रहती
है। पांचवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष में बुद्धिमानी से सफलता मिलती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती
है। नवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
राज्य, पिता एवं व्यवसाय के द्वारा सुख, सम्मान
व तथा यश की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा बुद्धिमान तथा धनी होता है।
वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन के
सुख में बाधा आती है तथा पराक्रम में भी कमी
रहती है। विद्या, धन तथा कुटुम्ब का सुख भी
कम रहता है। पांचवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्री से कुछ वैमनस्य रहता है तथा
व्यवसाय में कठिनाई से सफलता मिलती है।
सातवीं उच्च दृष्टि से नवमभाव को
देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है।
वीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी में खूब वृद्धि होती है। ऐसा
क्ति सुखी तथा धनी होता है।
वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का माता के
साथ कुछ वैमनस्य रहता है तथा भूमि एवं भवन
का सुख प्राप्त होता है। विद्या तथा सन्तान-पक्ष
में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती
है। पांचवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ,
व, सहयोग तथा सम्मान मिलता है। नवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
व्ये की अधिकता रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से सामान्य लाभ होता है।

४०२
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'गुरु' के
प्रभाव से जातक विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र
में विशेष सफलता प्राप्त करता है। धन तथा
कुटुम्ब का सुख भी उसे मिलता है। पाँचवीं मित्र
तथा उच्चदृष्टि से नवमभाव को देखने से धर्म
तथा भाग्य की विशेष उन्नति होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को
देखने से आमदनी खूब रहती है। नवीं मित्रदृष्टि
से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, शक्ति,
सम्मान, प्रतिष्ठा तथा यश की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा ऐश्वर्यशाली होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में बुद्धि-
बल से सफलता पाता है तथा धन एवं कुटुम्ब के
कारण झगड़ों में फंसता है। विद्या तथा सन्तान
पक्ष कमजोर रहता है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से
दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय
के द्वारा लाभ, सुख, सम्मान आदि की प्राप्ति
होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
स्थानों से लाभ होता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव को देखने से धन
तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। कुटुम्ब से कुछ वैमनस्य भी रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की सामान्य
मतभेदों के बावजूद स्त्री का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता
है तथा व्यवसाय में सफलता मिलती है। पाँचवीं
मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी
खूब रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव की प्राप्ति होती
है। नवीं नीचदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी का अनुभव होता है।

४०३
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आयु तथा
पुरातत्त्व का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु विद्या,
बुद्धि, सन्तान, धन एवं कुटुम्ब के सुख में कमी
रहती है। पाँचवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को
देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से कुछ लाभ होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीयभाव
की देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि होती है। नवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव
की देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ कठिनाइयों के साथ मिलता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित उच्च के 'गुरु' के प्रभाव से जातक के धर्म
तथा भाग्य की वृद्धि होती है। धन तथा कुटुम्ब
[

४०४
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में वृद्धि
होती है। धन तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है।
पाँचवीं शत्रु तथा नीच दृष्टि से तृतीयभाव में देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कमी आती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव की
देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान-पक्ष की विशेष उन्नति
होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव की देखने से
पत्नी के साथ कुछ वैमनस्य रहते हुए भी लाभ होता है
तथा दैनिक व्यवसाय में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता
है तथा बाहरी सम्बन्ध भी कमजोर रहते हैं। धन, कुटुम्ब,
विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में भी कमी रहती है।
पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि
एवं भवन के सुख में कमी रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव की देखने से शत्रु-
पक्ष में चतुराई से सफलता प्राप्त होती है। नवीं मित्र
दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की
अच्छी शक्ति प्राप्त होती है। ऐसी ग्रह-स्थिति वाले जातक का चित्त प्रायः अशान्त
ही बना रहता है।
'वृश्चिक' लग्न में 'शुक्र'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक का शरीर कमजोर रहता
है, परन्तु प्रभाव, चातुर्य एवं कार्य-कुशलता में वृद्धि
होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को
देखने से स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय
में भी सफलता प्राप्त होती रहती है, परन्तु शुक्र के
व्ययेश होने के कारण इन क्षेत्रों में सामान्य कठिनाइयों
का सामना भी करना पड़ता है।

४०५
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि
पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के धन तथा
कौटुम्बिक सुख में कुछ परेशानी रहती है यद्यपि धन का
लाभ भी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु में वृद्धि होती है, परन्तु पुरातत्त्व का लाभ कम
रहता है। ऐसा व्यक्ति धनी तथा चतुर समझा जाता
है।

'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की भाई-बहिन के
सुख तथा पुरुषार्थ में कमी प्राप्त होती है। खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ भी होता है।
स्त्री-पक्ष में भी कुछ कमी रहती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से
भाग्योन्नति में कुछ कमी रहती है तथा धर्म का पालन
भी थोड़ा ही होता है।

'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा
भवन के सुख में कुछ कमी रहती है। स्त्री-पक्ष भी
कमजोर रहता है। बाहरी सम्बन्धों से सुख प्राप्त होता
है और खर्च आराम से चलता रहता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों
के बाद लाभ, सुख, यश एवं सफलता की प्राप्ति होती
रहती है।

४०६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि
पर स्थित उच्च के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि
तथा सन्तान के क्षेत्र में कुछ कमी के साथ सफलता
मिलती है, परन्तु यह किसी कला का विशेषज्ञ भी
अवश्य होता है। ऐसा व्यक्ति स्त्री के प्रभाव में रहने
वाला तथा वाक्-चतुर होता है। उसे बाहरी सम्बन्धों
से शक्ति एवं लाभ भी प्राप्ति होता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी के मार्ग में भी कुछ कठिनाइयाँ आती
रहती हैं।
[कुण्डली ६४३: पंचम भाव (मीन राशि १२) में शुक्र (शु.)]
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक शान्तिपूर्ण उपायों द्वारा शत्रु-
पक्ष पर विजय प्राप्त करता है। गृहस्थी के संचालन में
कुछ कठिनाइयाँ आती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को
देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से अधिक परिश्रम
द्वारा सामान्य लाभ प्राप्त होता है तथा खर्च को
अधिकता बनी रहती है।
[कुण्डली ६४४: षष्ठ भाव (मेष राशि १) में शुक्र (शु.)]
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव शुक्र सातवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव
से जातक की स्त्री एवं दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
अच्छी सफलता मिलती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध
से अपना खर्च चलाने में सहायता भी मिलती है। ऐसा
व्यक्ति बड़ा बुद्धिमान होता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शरीर में दुर्बलता रहती है, फिर भी जातक यशस्वी,
प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला तथा कार्य-कुशल होता
है।
[कुण्डली ६४५: सप्तम भाव (वृषभ राशि २) में शुक्र (शु.)]

४०७
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को आयु तथा
पुरातत्त्व के क्षेत्र में संकटों तथा कठिनाइयों का
सामना करना पड़ता है। यही स्थिति स्त्री तथा
व्यवसाय के पक्ष में भी रहती है, परन्तु गुप्त चातुर्य
एवं कठिन परिश्रम द्वारा सफलता प्राप्त होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख में भी कठिनाइयां
आती हैं। बड़ी चतुराई से काम लेकर जातक किसी तरह अपनी इज्जत बचाता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति
तथा धर्म-पालन के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं।
स्त्री-पक्ष से भी परेशानी रहती है। वह बड़ी चतु-
राई से काम निकालता है तथा बाहरी सम्बन्धों से
लाभ उठाता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिन एवं पराक्रम के क्षेत्र में भी असन्तोष-
जनक स्थिति बनी रहती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : दशमभाव : सुख दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता
मिलती है। स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
भी कमी बनी रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
से माता, भूमि तथा भवन का सुख-सहयोग प्राप्त
होता है।

४०८
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि
पर स्थित नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की
आमदनी में कमी आती है। स्त्री तथा दैनिक
व्यवसाय का क्षेत्र भी असन्तोषजनक रहता है।
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से चातुर्य द्वारा कुछ लाभ
भी मिलता है।
सातवीं उच्च तथा शत्रु दृष्टि से पञ्चमभाव
को देखने से विद्या-बुद्धि की शक्ति प्राप्त होती है,
परन्तु सन्तान-पक्ष में कुछ कमजोरी बनी रहती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली से 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के
प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ मिलता है। स्त्री
तथा दैनिक व्यवसाय के पक्ष में भी कुछ परेशानियां
रहती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से
शत्रु-पक्ष में भी कुछ परेशानियों के बाद ही सफलता
प्राप्त होती है।
'वृश्चिक' लग्न में 'शनि'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का स्वभाव शान्त
तथा उग्र दोनों प्रकार का होता है। माता, भूमि
तथा भवन का सामान्य सुख मिलता है। तीसरी
दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव को देखने से पराक्रम
में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन का सुख प्राप्त
होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती
है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता है तथा राज्य
एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिलती है।

४०६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन, कुटुम्ब
का सामान्य सुख मिलता है, परन्तु भाई-बहिन के
सुख में कमी आती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि
में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन
का सुख प्राप्त होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। दसवीं
मित्र-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। ऐसा
जातक सुखी तथा धनी जीवन बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में स्वक्षेत्री 'शनि' के प्रभाव से
जातक को भाई-बहिनों का सुख प्राप्त होता है तथा
पराक्रम में वृद्धि होती है। माता, भूमि एवं भवन
का सुख भी मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से
पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र
में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य की उन्नति
होती है तथा मतभेदों के साथ धर्म का भी पालन
होता है। दसवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अच्छी तरह
चलता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव
से जातक को माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख
प्राप्त होता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम
में भी वृद्धि होती है। तीसरी नीच-दृष्टि से षष्ठभाव
को देखने से शत्रु-पक्ष द्वारा अशान्ति मिलती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव की देखने
से पिता से मतभेद रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में भी अधिक सफलता नहीं मिलती। दसवीं
शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक
सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है किन्तु जातक बहुत परिश्रमी होता है।

४१०
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में भ्रातृ 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तान-सुख तो
मिलता है, परन्तु सन्तान से मतभेद भी रहता है।
विद्या-बुद्धि पर्याप्त रहती है। माता से वैमनस्य
रहता है तथा भूमि-भवन का सामान्य सुख प्राप्त
होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सुख एवं सफ-
लता की प्राप्ति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से आमदनी अच्छी रहती है।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कुटुम्ब से वैमनस्य रहता है तथा अधिक
प्रयत्न करने पर भी धन का विशेष संचय नहीं हो पाता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में युक्ति
से काम निकालता है। माता, भूमि तथा भवन का
सुख भी अल्प मात्रा में प्राप्त होता है। तीसरी मित्र
दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से आयु तथा पुरातत्त्व
का लाभ होता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध
से लाभ होता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव की देखने से पराक्रम की
वृद्धि होती है तथा विरोध रहते हुए भी भाई-बहिनों का सुख मिलता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा
दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सुख एवं सफलता की
प्राप्ति होती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को
देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म
की उन्नति होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है तथा श्रम
अधिक करना पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव की देखने से माता,
भूमि एवं भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है। दैनिक जीवन प्रभावशाली तथा
आमोदपूर्ण रहता है।

४११
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु तथा
पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु माता के सुख में
बहुत कमी आती है। भूमि, भवन तथा भाई-बहिनों
का सुख भी कम ही मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि
से दशमभाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता
है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि उठानी
पड़ती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव की
देखने से धन-संचय में कमी तथा कुटुम्ब से वैमनस्य
रहता है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का
पक्ष अपूर्ण रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित शनि' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति
कुछ रुकावटों के साथ होती है तथा धर्म का पालन
भी कठिनाई सहित होता है। माता, भूमि तथा
भवन का सुख प्राप्त होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से
एकादशभाव की देखने से आमदनी खूब रहती है तथा
धन का अच्छा लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से
स्वराशि में तृतीयभाव की देखने से भाई-बहिन
के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। दसवीं नीच तथा शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव
को देखने से शत्रु पक्ष में परेशानी रहती है तथा ननसाल पक्ष कमजोर रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के
साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता,
सहयोग तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। भाई-बहिनों
का सुख भी कम ही मिलता है परन्तु पराक्रम में
वृद्धि होती है। तीसरी मित्र तथा उच्च दृष्टि से
द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु
बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव की देखने से माता से कुछ मतभेद
रहता है तथा भूमि, भवन का सुख प्राप्त होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है तथा घरेलू
जीवन सुखमय बना रहता है।

४१२
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में
अच्छी वृद्धि होती है। भाई-बहिन, माता, भूमि
तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है तथा परा-
क्रम भी बढ़ता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से प्रथम
भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कमी
आती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या एवं सन्तान
का लाभ होता है। दसवी मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से जातक दीर्घायु होता
है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित उच्च के 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च
अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से सुख एवं
लाभ की प्राप्ति भी होती है। भाई-बहिन, माता
तथा भवन के सुख में भी कुछ कमी आ जाती है।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-
संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कमी रहती है।
सातवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से
शत्रुपक्ष से परेशानी रहती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु
तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति अधिक धनी न होते हुए भी अमीरी
ढंग से जीवन बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न में 'राहु'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शरीर में किसी
गुप्त कष्ट अथवा चिन्ता का निवास रहता है। कभी-
कभी उसे मृत्यु-तुल्य शारीरिक कष्ट भी होता है।
वह उन्नति के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा
गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है। ऐसा व्यक्ति
तेज स्वभाव का, स्वार्थी तथा असुन्दर होता है।

४१३
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६४ : लग्न ८, द्वितीय भाव ९ में राहु]
दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को धन-प्राप्ति के लिए कठिन
परिश्रम करना पड़ता है तथा कुटुम्ब के विषय में चिन्ताएँ
बनी रहती हैं।
अनेक गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर भी वह
ऋणी ही बना रहता है। आर्थिक चिन्ताओं से छुटकारा
नहीं पाता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६५ : लग्न ८, तृतीय भाव १० में राहु]
तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि
होती है। उसे भाई-बहिनों का सुख भी खूब मिलता है,
परन्तु उनके बारे में चिन्ताएँ भी बनी रहती हैं।
ऐसा व्यक्ति चतुर, हिम्मत वाला, धैर्यवान्,
असाधारण साहसी तथा कठिन परिश्रमी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६६ : लग्न ८, चतुर्थ भाव ११ में राहु]
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कुछ कमी बनी रहती है।
कभी-कभी पारिवारिक संकटों का सामना भी
करना पड़ता है, जिनके निराकरण के लिए उसे गुप्त
युक्तियों, हिम्मत तथा धैर्य का सहारा लेना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति होशियार तथा परिश्रमी भी होता है।

४१४
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : राहु
पांचवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन तथा सन्तान के
पक्ष में कठिनाइयां आती हैं, बाद में कुछ सफलता भी
मिलती है।
ऐसा व्यक्ति चतुर, गुप्त युक्तियों में प्रवीण तथा
हर समय चिन्तित रहने वाला होता है, परन्तु वह अपनी
परेशानियों को किसी पर प्रकट नहीं करता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव
रखता है तथा उन पर विजयी होता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त चातुर्य, धैर्य, हिम्मत, कठिन
परिश्रम तथा युक्तियों के बल पर हर प्रकार की कठिना-
इयों पर विजय पाता रहता है तथा कभी भी हिम्मत
नहीं हारता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में
कठिनाइयां आती हैं। कभी-कभी स्त्री अथवा व्यवसाय
के कारण घोर संकटों में भी फंस जाना पड़ता है,
परन्तु वह अपनी हिम्मत, युक्ति, चतुराई एवं धैर्य के
बल पर उन सब कठिनाइयों को पार कर जाता है।

४१५
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को पुरातत्त्व का लाभ होता
है तथा आयु में वृद्धि होती है। उसका जीवन उमंग एवं
उत्साह से भरा रहता है। वह बड़े ठाठ-बाट की जिंदगी
बिताता है, परन्तु कभी-कभी उसे हानि भी उठानी
पड़ती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा यशस्वी भी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : राहु
नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति में बहुत
बाधाएँ आती हैं तथा धर्म के प्रति भी अश्रद्धा रहती है।
वह मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है। कई बार
निराश भी हो जाता है। अनेक प्रकार के कष्ट भोगने के
बाद अन्त में उसे थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता द्वारा परेशानी
रहती है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कष्ट
उठाने पड़ते हैं। कभी-कभी वह अत्यधिक निराश भी हो
जाता है। अन्त में धैर्य, साहस एवं चातुर्य के बल पर
किसी प्रकार उन संकटों पर विजय पाकर थोड़ी-बहुत
उन्नति कर लेता है।

४१६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी के क्षेत्र में खूब
सफलता मिलती है। वह अधिक मुनाफा कमाने के लिए
उचित-अनुचित का विचार भी नहीं करता।
ऐसा व्यक्ति घोर स्वार्थी तथा चतुर होता है।
कभी-कभी उसे आकस्मिक धन-लाभ होता है, तो कभी
अचानक ही भारी घाटा भी चला जाता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता
है, जिसके कारण उसे परेशानियां रहती हैं। बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से उसे कुछ कठिनाइयों के साथ
लाभ भी होता है। कभी आकस्मिक धन-लाभ तो
कभी आकस्मिक धन-हानि के अवसर भी उपस्थित
होते हैं। अन्य प्रकार के कष्ट भी उठाने पड़ते हैं।
'वृश्चिक' लग्न में 'केतु'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में कई बार चोट
लगती है तथा शारीरिक सौन्दर्य में कमी आ जाती है।
ऐसा व्यक्ति स्वभाव का उग्र, दिमाग का
कमजोर तथा कठिन शारीरिक श्रम करने वाला होता
है। उसके शरीर पर चोट आदि का कोई स्थायी
चिन्ह भी बनता है।

४१७
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : केतु
दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक धन-प्राप्ति के
लिए प्रयत्न करता है। कभी-कभी आकस्मिक रूप
से भी धन-लाभ हो जाता है। कौटुम्बिक सुख में
कुछ कमी बनी रहती है।
ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने
के लिए सदैव सतर्क बना रहता है।
६७६


'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : केतु
तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में
अत्यधिक वृद्धि होती है। भाई-बहिनों के संबंध
के कष्ट का अनुभव होता है।
झगड़े-झंझटों में उसे सफलता प्राप्त
होती है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, परिश्रमी,
धैर्यवान् तथा हिम्मती होता है।
६७७


'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की अपनी माता
के कारण परेशानी उठानी पड़ती है। भूमि तथा
भवन के सुख में भी कमी रहती है। चित्त सदैव
अशान्त रहता है।
कठिन परिश्रम के बाद उसे कुछ चैन
मिलता है। स्थान बदल देने अर्थात् परदेश में
रहने से कुछ सुख मिलता है। घर में उसे सदैव
अशान्ति ही बनी रहती है।
६७८

४१८
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : केतु
पाँचवें भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन
में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष से भी
कष्ट मिलता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, दृढ़-निश्चयी,
गुप्त युक्तियों से काम लेने वाला, धैर्यवान् तथा
निडर होता है। वह अपनी गुप्त चिन्ताओं को
किसी पर प्रकट नहीं होने देता ।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर
अपना विशेष प्रभाव रखता है। वह झगड़ों,
कठिनाइयों आदि पर अपने साहस, गुप्त युक्ति,
धैर्य, परिश्रम एवं बहादुरी के बल पर विजयपाता
है। उसका ननिहाल-पक्ष कमजोर रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
घोर कष्ट मिलता है। गृहस्थ जीवन में अनेक
संकट उठ खड़े होते हैं, दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
भी बड़ी कठिनाइयां आती हैं।
ऐसा व्यक्ति अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य
साहस आदि के बल पर संकटों का कुछ निवारण
कर पाने में समर्थ हो जाता है।

४१६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित नीच के 'केतु' के प्रभाव से जातक को
अपने जीवन में अनेक बार मृत्यु-तुल्य कष्टों का
सामना करना होता है। पुरातत्त्व की भी हानि
होती है।
ऐसा व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए
कठिन परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का
आश्रय लेता है परन्तु संकटों से मुक्ति नहीं मिल
पाती।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति
में बड़े संकट आते हैं तथा धर्म की हानि होती है।
ऐसा व्यक्ति हर समय चिन्ताओं से घिरा
रहता है। कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी
करता है। गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के
बल पर भाग्य को बनाने की चेष्टा करते रहने पर
भी सफलता नहीं मिल पाती।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता
द्वारा कष्ट प्राप्त होता है। राज्य के क्षेत्र में मान-
भंग होता है तथा व्यवसाय-क्षेत्र में घोर संकट
आते रहते हैं। यद्यपि वह धैर्य, हिम्मत एवं गुप्त
युक्तियों के आश्रय से अन्ततः थोड़ी-बहुत राहत भी
प्राप्त कर लेता है, परन्तु उसका जीवन सुख से
नहीं बीतता।

४२०
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की
आमदनी अच्छी रहती है। कभी-कभी आकस्मिक धन का लाभ होता है तो कभी-कभी संकट भी आते हैं।
ऐसा व्यक्ति चालाक, स्वार्थी, धूर्त तथा मतलबी होता है। उसे अपनी आमदनी से कभी सन्तोष नहीं होता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से लाभ भी मिलता है।
वह गुप्त युक्ति, चातुर्य तथा परिश्रम के बल पर अपने खर्च को चलाता है, परन्तु कभी-कभी उसे घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। फिर भी वह अपने धैर्य को कभी नहीं छोड़ता।