भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि
पर स्थित उच्च के प्रभाव से जातक को विद्या-बुद्धि
तथा सन्तान के क्षेत्र में कुछ कमी के साथ सफलता
मिलती है, परन्तु यह किसी कला का विशेषज्ञ भी
अवश्य होता है। ऐसा व्यक्ति स्त्री के प्रभाव में रहने
वाला तथा वाक्-चतुर होता है। उसे बाहरी सम्बन्धों
से शक्ति एवं लाभ भी प्राप्ति होता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी के मार्ग में भी कुछ कठिनाइयाँ आती
रहती हैं।
[कुण्डली ६४३: पंचम भाव (मीन राशि १२) में शुक्र (शु.)]
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक शान्तिपूर्ण उपायों द्वारा शत्रु-
पक्ष पर विजय प्राप्त करता है। गृहस्थी के संचालन में
कुछ कठिनाइयाँ आती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को
देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से अधिक परिश्रम
द्वारा सामान्य लाभ प्राप्त होता है तथा खर्च को
अधिकता बनी रहती है।
[कुण्डली ६४४: षष्ठ भाव (मेष राशि १) में शुक्र (शु.)]
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव शुक्र सातवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव
से जातक की स्त्री एवं दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
अच्छी सफलता मिलती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध
से अपना खर्च चलाने में सहायता भी मिलती है। ऐसा
व्यक्ति बड़ा बुद्धिमान होता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शरीर में दुर्बलता रहती है, फिर भी जातक यशस्वी,
प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला तथा कार्य-कुशल होता
है।
[कुण्डली ६४५: सप्तम भाव (वृषभ राशि २) में शुक्र (शु.)]