भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के
प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का उत्तम
सुख प्राप्त होता है। सन्तान-पक्ष में कुछ कमी रहती
है। पांचवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष में बुद्धिमानी से सफलता मिलती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती
है। नवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
राज्य, पिता एवं व्यवसाय के द्वारा सुख, सम्मान
व तथा यश की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा बुद्धिमान तथा धनी होता है।
वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन के
सुख में बाधा आती है तथा पराक्रम में भी कमी
रहती है। विद्या, धन तथा कुटुम्ब का सुख भी
कम रहता है। पांचवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्री से कुछ वैमनस्य रहता है तथा
व्यवसाय में कठिनाई से सफलता मिलती है।
सातवीं उच्च दृष्टि से नवमभाव को
देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है।
वीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी में खूब वृद्धि होती है। ऐसा
क्ति सुखी तथा धनी होता है।
वृश्चिक लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
श्चिक लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक का माता के
साथ कुछ वैमनस्य रहता है तथा भूमि एवं भवन
का सुख प्राप्त होता है। विद्या तथा सन्तान-पक्ष
में भी कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती
है। पांचवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ,
व, सहयोग तथा सम्मान मिलता है। नवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
व्ये की अधिकता रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से सामान्य लाभ होता है।